भटकन

















मन रे ! तू भागे क्यों ?

क्यूँ भागे इन गलियन में-
जो उलझी सी हैं  आपस में
गाँठ भी पड़ती जाती है
सुलझाने की कोशिश में  
आखिर क्या पायेगा  भटकन में..........

क्यूँ भागे...मन क्यूँ भागे...

जीवन की लम्बी भाग दौड़ में
अंतहीन इस होड़ में
गुणा-भाग और जोड़ में

खतरनाक से मोड़ में
निकला कोई न आगे........

मन क्यूँ भागे ...तू क्यूँ भागे ?

इस रंग बिरंगे रेले में,
इन चक्कर खाते झूले में..
जब खोना तय इस मेले में...
तो क्यूँ पड़ विकट झमेले में...
रे चंचल मन,तू क्यूँ भागे....

इस झिलमिल करती दुनिया में,
जब आँखें तेरी चुंधियाती हैं
दृष्टी भी धुंधला जाती है...
जब मन तेरा बैरागी है
तो क्यू न रहे अकेले में
मन मस्त मगन अकेले में....



मत भाग रे मन इस रेले में.............


अनु 
18 aug 2011

Comments

  1. मन मस्त मगन अकेले में....

    सही बात है,खुद को पाने के लिए यही ठीक है.

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  2. मत भाग रे मन इस रेले में....
    बेहतरीन भाव पुर्ण प्रस्तुति,सुन्दर रचना...

    RECENT POST...फुहार....: रूप तुम्हारा...

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  3. किसी कवि ने सही कहा है;
    "मन के जीते जीत है मन के हारे हार."
    आप भी भावपूर्ण शब्दों में यही तो बयां करना चाहती है शायद ? आभार !!

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  4. मन बड़ा चंचल होता है और मन के द्वारा ही हम भरपूर जी लेते है

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  5. सुन्दर शब्द चयन-
    गतिमान पाठ ||

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  6. मन कहाँ रुकता है ...

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  7. तो क्यू न रहे अकेले में
    मन मस्त मगन अकेले में....
    man ko samjhane ka trika bda accha lga.

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  8. बेहद सुन्दर आत्म-मंथन अनु जी !

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  9. भावपूर्ण अभिव्यक्ति...पर किसी ने ये भी फ़रमाया था...

    मन का कहना मत टालो...
    मन को पिंजरे में ना डालो...
    मन तो है इक उड़ता पंछी...
    जितना उड़े उड़ा लो...

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  10. इस रंग बिरंगे रेले में,
    इन चक्कर खाते झूले में..
    जब खोना तय इस मेले में...
    तो क्यूँ पड़ विकट झमेले में...
    रे चंचल मन,तू क्यूँ भागे....

    बड़ी चक्कर वाली दुनियाँ है .... सुंदर प्रस्तुति ...

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  11. man rey tu kahe na dhir dhre...sunder bahv...

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  12. मन पर नियंत्रण के लिए एक नुख्सा .सूरदास की गोपियाँ बोलती है .
    मन न भये दस बीस
    एक हुतो सो गए श्याम संग
    अब को अराधे इश .

    मन की भटकन केवल इश्वर में रम कर ही नियंत्रित की जा सकती है . सुन्दर अभिव्यक्ति .

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  13. बहुत मंथन करके लिखा है आपने.. पुरानी रचना है लेकिन हर समय प्रासंगिक..

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  14. मन जब भागता है तो ऐसे ही उलझ जाता है जैसा पहले चित्र में पटरियां उलझी हुई हैं.. ;)
    सुन्दर कविता :)

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  15. इस रंग बिरंगे रेले में,
    इन चक्कर खाते झूले में..
    जब खोना तय इस मेले में...
    तो क्यूँ पड़ विकट झमेले में...
    रे चंचल मन,तू क्यूँ भागे....//bahut sunder geet anu ji , sach ki sattik chitran
    badhai.aapko

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  16. इस झिलमिल करती दुनिया में,
    जब आँखें तेरी चुंधियाती हैं
    दृष्टी भी धुंधला जाती है...
    जब मन तेरा बैरागी है
    तो क्यू न रहे अकेले में
    मन मस्त मगन अकेले में.............वाह: अनु बहुत सुन्दर ..लाजवाब..

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  17. वाह..
    बहुत खूब लिखा अनुजी..
    कितनी भी दृष्टी चुधियाए..चलता रहेगा रेला.बस कोशिश करो न रहे कोई अकेला..

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  18. मन सर्वश्रेष्ठ धावक है जी .

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  19. जी, शायद तभी ललचाता है स्वर्ण पदक के लिए.........
    :-)

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  20. सुंदर प्रस्तुति

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  21. वाह ...बहुत खूब ।

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  22. इस झिलमिल करती दुनिया में,
    जब आँखें तेरी चुंधियाती हैं
    दृष्टी भी धुंधला जाती है...

    जीवन के महत्वपूर्ण पक्षों को उजागर करती और मानव को सचेत करती आपकी यह रचना महत्वपूर्ण है .....!

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  23. अकेले हैं तो क्या ग़म है ...

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  24. मन कब किसके कहने में आया है ....कब कहाँ भला वह रुक पाया है ...एक वही तो है जो उड़ सकता ....सूरज का गोला छू सकता ....या छिटकी शीतल चान्दिनी को, ओक लगाकर पी सकता ....मन कहाँ भला रुकने वाला .....

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  25. मत भाग रे मन इस रेले में.............
    मन कब माना है भला ..

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  26. जब खोना तय इस मेले में...
    तो क्यूँ पड़ विकट झमेले में...

    खोना भी तय है.. फिर भी मन की धरा नहीं रूकती.... उसकी छह बढती ही जाती है

    nice one.... loved it... :)

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  27. मन क्यूँ भागे ...तू क्यूँ भागे ? :-) Bahut sundar dhang se man ki chanchalta ko abhivyakt kiya hia....nice!

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