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Showing posts from September, 2013

आसमान था उस माँ का आँचल....

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मदर टेरेसा (आधी आबादी पत्रिका के सितम्बर अंक में प्रकाशित मेरा आलेख)
ईश्वर हर जगह नहीं हो सकता इसलिए उसने माँ बनायी...लाखों लोगों को अपने स्नेहिल स्पर्श से मुस्कराहट बांटने वाली माँ,”मदर टेरेसा” को कौन नहीं जानता, और कौन नहीं चाहता !
मनुष्यत्व का प्रतिनिधित्व करने वाली मदर टेरसा ने अपने प्रेम और सेवा भाव के उजाले से पूरे विश्व को आलोकित किया. दीनदुखियों की सेवा को ईश्वर की उपासना समझने वाली इस पवित्र आत्मा ने अपना पूरा जीवन सेवा को समर्पित किया.मदर टेरेसा सच्चे अर्थों में माँ थीं.
२६ अगस्त १९१० को स्कोप्ज़े,मेसेडोनिया में जन्मी मदर टेरेसा का वास्तविक नाम “एग्नेस गोंक्ज्हा बोयाझियु ” था.अपने पिता की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात वे अपनी माँ के बेहद करीब आयीं और माँ के धार्मिक संस्कारों की वजह से उनमें सेवाभाव पनपने लगा और वे सांसारिक सुखों से विमुख होने लगीं.
12 वर्ष की उम्र में एक चर्च के रास्ते में उन्हें “ईश्वर के बुलावे” का एहसास हुआ और फिर १८ साल की उम्र में वे आयरलैंड गयीं जहाँ उन्होंने संन्यास लिया और नन बन गयीं.उन्हें नया नाम मिला-“सिस्टर मैरी टेरेसा”. इतनी छोटी उम्र से ही उनका धर्म और …

“अमलतास की डाली”

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फेनिल नदी में  कंपकंपाते चाँद का प्रतिबिम्ब
बिंम्ब जो  
ठहरा हुआ है वहीं
बहता नहीं लहरों के साथ, और उस पर झुकी वो  अमलतास की डाली,
जिसने उतार फेंके थे अपने सभी स्वर्ण आभूषण और हरे रेशमी वस्त्र भी
लहरों संग बह जाने को...  कि प्रेम में जोगन बन जाना सुहाता है इसे पंखुड़ियों और पत्तों का झड़ना मत कहो ये प्रेम है,विशुद्ध प्रेम....
ठूंठ हुई डाली अपना सर्वस्व तजना चाहती है   प्रेम के लिए स्थान बनाने को.
संसार के आवागमन से परे
मन समर्पित हो जाना चाहता है ! हाँ ! प्रेम की पराकाष्ठा भी तथागत बना देती है.
-अनुलता-
19/9/2013

परफेक्शन

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तुम परेशान थे  मेरी आदतों से......चाहते थे कि बदल जाऊं मैं !! हार कर, न चाहते हुए भी, सिर्फ तुम्हारी  खुशी के लिए मैंने भी अपना वजूद एक  लिबास की तरह उतार डाला...और उतारते हुए पलट गया मेरा "मैं",एक लिबास की तरह ही फिर पहन लिया मैंने उसे, उल्टा !!
नतीजतन , अब मेरी आदतें भी उलट गयी हैं, देखो बदल डाला है मैंने खुद को तुम्हारे लिए.......
अब मुझ में जो बुरा था वो भला हो गया और जो थोडा कुछ भला था बुरा हो गया.......

जानती हूँ !
तुम अब भी परेशां हो ??

बस परेशानी की वजहें बदल गयी हैं!!

(गलती तुम्हारी बस ये है कि तुम रिश्तों में परफेक्शन खोजते रहे,और मैं खोजती रहे प्रेम.....तुमने सिर्फ मुझे खोया और मैंने खोया सारा का सारा प्रेम....

[मन की सबसे ऊपरी परत और बक्से में सबसे नीचे दबी हुई  डायरी के पन्ने से.... ]
~अनु ~


रोटी

भूख जगा देती है नींद से,
बेसुध कर देती है सपनों  को
फिर
उनमें आग लगा कर
जलते ख़्वाबों पर
सेकती है रोटियां ....

एक आधी रोटी का टुकड़ा
ढांक लेता है आकांक्षाओं और
उम्मीदों के बीज को,
सड़ा देता है उसे भीतर ही भीतर 
अंकुरण के पहले ही....

भूखा नहीं देखता इन्द्रधनुषी सपने
भूखे को नहीं दिखती रोटी पर लगी नीली हरी फफूंद
उसको नहीं दिखते रंग
उसकी आँख नहीं होती
भूखे के पास  होता है सिर्फ एक पेट...

~अनु ~