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Showing posts from April, 2014

रूपांतरण

स्त्री के भीतर
उग आती हैं और एक स्त्री
या अनेक स्त्रियाँ.....
जब वो अकेली होती है
और दर्द असह्य हो जाता है |
फिर सब मिल कर बाँट लेती हैं दुःख !

औरत अपने भीतर उगा लेती है एक बच्चा
और खेलती हैं बच्चों के साथ
खिलखिलाती है,तुतलाती है 
घुलमिल कर !
रूपांतरण की ये कला ईश्वर प्रदत्त है |

कभी कभी
एक पुरुष भी उग आया करता है
स्त्री के भीतर
जब बाहर के पुरुषों द्वारा
तिरस्कृत की जाती है |
तब वो सशक्त होती  है उनकी तरह !

सदियों से
इस तरह कायम  है
स्त्रियों का अस्तित्व !
कि उनके भीतर की उपजाऊ मिट्टी में
उम्मीद के बीज हैं बहुत
और नमी है काफी !
~अनुलता ~

एक कहानी यह भी.......मन्नू भंडारी

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"मेरी प्रिय लेखिका मन्नू भंडारी जी पर लिखा मेरा ये आलेख आधी आबादी पत्रिका के ताज़ा अंक में प्रकाशित"

जन्म- 3 अप्रैल 1931
“एक कहानी यह भी” के पन्ने पलटते-पलटते मैं डूबती जा रही थी हिन्दी की एक बेहद लोकप्रिय कथाकार महेंद्र कुमारी - ”मन्नू भंडारी” की जीवन सरिता में | मन्नू जी की यह आत्मकथा पढ़ते हुए मैंने जाना कि एक मीठे पानी की नदी सा मालूम पड़ने वाला उनका जीवन दरअसल तटबंध किये हुए खारे सागर के जैसा था मगर मन्नू के भीतर अथाह क्षमता थी,डूब कर मोती खोज लाने की |एक बेहद ईमानदार व्यक्तित्व और उतनी ही सच्ची,बेबाक और स्पष्ट लेखन शैली वाली लेखिका,जिनके करीब जाने पर आप एक बेहद आम सी औरत को पायेंगे जो स्वंय को हीनता ग्रंथि से ग्रस्त मानती हैं पर उनके भीतर झांकते ही या उनकी रचनाएं पढ़ते ही एहसास होता है कि कितनी विनम्र , निर्मल हृदया और गंभीर लेखिका हैं मन्नू भंडारी |
मन्नू जी के लिए लेखन एक अनवरत यात्रा है जिसका न कोई अंत है न मंज़िल| बस,निरंतर चलते जाना ही जिसकी अनिवार्यता है,शायद नियति भी | इसीलिये पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों का बखूबी निर्वाह करते हुए भी उनकी लेखनी चलती रही अनवरत और फल…

चिड़िया

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बीती रात ख्वाब में
मैं एक चिड़िया थी........
चिडे ने
चिड़िया से
मांगे पंख,
प्रेम के एवज में.
और
पकड़ा दिया प्यार
चिड़िया की चोंच में !
चिड़िया चहचहाना  चाहती थी
उड़ना चाहती थी...
मगर मजबूर थी,
मौन रहना उसकी मजबूरी थी
या शर्त थी चिडे की,
पता नहीं....

नींद टूटी,
ख्वाब टूटा,
सुबह हुई......

मैं एक चिड़िया हूँ
सुबह भी
अब भी....

~अनु ~

कसम

रख कर हाथ
नीले चाँद के सीने पर
हमने खायीं थीं जो कसमें
वो झूठी थीं |

मुझे लगा तुम सच्चे हो,
तुम्हें यकीन था मुझ पर....

इसलिए तो खाई जाती हैं कसमें

अपने अपने झूठ पर
सच की मोहर लगाने को !

~अनुलता ~

चुप्पी

चुप थे तुम
जब पूछा था लोगों ने
मेरा तुम्हारा रिश्ता...

चुप लगा जाते हैं लोग
अक्सर यूँ ही
कि वो एक सुरक्षा कवच है उनका !

गूंगी हो जाती है रात
जब चीखती है कोई बेबस..
चुप रहता है समाज
सिसकियाँ सुन कर भी !

बादलों के फट जाने पर
सवाल करती हैं लाशें...
और मौन रहता है आसमान |

खामोश रहते वृक्ष
पत्तों को तजने के बाद,
अनसुना करते हैं
चरमराते,सरसराते सूखे पत्तों की  चीख |

रिश्तों पर लगी घुन है
ख़ामोशी |
चुप्पी लील जाती है
मन का विश्वास !

चुप रह जाता है प्रेम...
जब वो प्रेम नहीं रहता !!
~अनुलता ~


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वो पूरे चाँद सा चेहरा

जिसे मैं छू सकती थी

हाथ बढ़ा कर कभी भी....

और महसूस कर सकती थी

अपनी उँगलियों पर

उन गालों की नरमाई,

नर्म जैसे बादल !

और वो मुस्कराहट

खनकती हंसीं......

जैसे किसी ने खोल दी हो

अपनी अशर्फियों भरी पोटली

या बिखर गयें हो किसी के हाथ से पूजा के फूल....

वो कोमल स्पर्श, आवाज़ की खनक और स्नेह की सौंधी महक का एहसास अब भी जिंदा है.....

बस बिखेर रही हूँ आज

ढेर सा हरसिंगार

तुम्हारी तस्वीर के आगे.

अनु
(दुःख कभी बीतता नहीं....दिन बीतते हैं, और दुःख शायद उनकी परतों के नीचे कहीं पलता रहता है ख़ामोशी से.....)
अंजलि दीदी के जन्मदिन पर ...उनको याद करते हुए !!
4/4/2013