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Showing posts from November, 2012

बावली नदी

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नदी हूँ मैंनदिया के जैसी ही चाहत मेरी है...समंदर! तू कितना खारा हैफिर भी मुझे जान से प्यारा है....
इतराती,इठलाती मेरी हर मस्ती पर तू रोक लगा देता है ठहरा देता है मुझे... पर मेरा मन तो तेरे लिए बावरा है समंदर ! तू मुझे जान से प्यारा है...
तुझ में मिल कर मैं भी खारी हो जाती नदी,नदी न रहती वो भी समंदर हो जाती.. मुझे मेरा अस्तित्व खोना भी गवारा है तू मुझे जान से जो प्यारा है...

अब न कोई फूल खिले मुझमें 
न प्यास बुझे प्यासे की मुझ जैसी जाने कितनी को तूने खुद में उतारा है मैंने  ये सच सहर्ष स्वीकारा है क्यूँकि एक तू ही मुझे जान से प्यारा है... 
-अनु 

प्रेम और जुदाई (दूसरी किश्त)

प्रेम की दूसरी किश्त तो जुदाई ही हो सकती है...कौन सा प्रेम है जिसने जुदाई का दर्द न भोगा हो.....जब जुदाई है तो दर्द है...और दर्द है तभी तो उपजी है कविता...

पहले मेरे दिल में तुम्हारा प्रेम पला करता था
अब तुम्हारे लौट आने की उम्मीद... तुम्हारे प्रेम से उत्सर्जित
पराबैंगनी किरणों ने
मुझे दृष्टिहीन कर दिया है...
नष्ट हो जाती है
प्रेमोन्माद में
ओजोन लेयर.......
(प्रेम ह्रदय में एक झूठी आस का दीप जला देता है.....और रोशन रहता है मन इस की लौ से)

तेरे जाने के बाद
जिए हैं मैंने
एक बरस में कई बरस..
कुछ साल
तुमसे
बड़ी हो गयी हूँ
उम्र में ..
अब तो मान लो मेरा कहा ..... (प्रेम याचक बना देता है कभी कभी,या शायद हमेशा...प्रेम देता अधिकार से है मगर इसके पास मांगने के हक़ नहीं हुआ करते...)
तय होती है सबके हिस्से की ज़िन्दगी जन्म के पहले से ही.... तेरे साथ उन चंद सालों में जी ली मैंने

प्रेम और जुदाई (पहली किश्त )

तेरे बाद......

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तेरे  बाद
बेतरतीब सी ज़िन्दगी को
समेटा पहले...
अपने बिखरे वजूद को
करीने  से लगाया ..

अब इकट्ठा कर रही हूँ
तेरी यादों की रद्दी,
गराज में पड़े एक
पुराने सीले
गत्ते के बक्से में..
वक्त  के साथ पड़ती
दीमक  देख कर
तसल्ली  भी है,
कि शायद 
देर सवेर निजात पा ही लूंगी
इन बासी होती यादों से.....

मोहब्बत  से खाली दिल
भुतही  यादों का डेरा बन गया है
जल्द  से जल्द
कैसे  निज़ात पाऊं इनसे ?

कमबख्त यादें...
इनमें ज़ंग भी तो नहीं लगती !!

अनु

आप ही आप रूठी हूँ इन दिनों....

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सुस्त रफ़्तार दिन
नीरस पल छिन
बेसुर गीत
बेसुध हवा
पसरा  सन्नाटा
अलसाया जंगल
चिड़चिड़ी चिड़िया
अनमना आसमान
बुझे बुझे तारे
अटपटा  चाँद
रूठे से फूल
ज़र्द पत्ते
सर्द मौसम
बेतरतीब किरणें
उलझे लोग
निरुत्तरित आँखें


मुझे सब मुझ जैसा  दिखता  इन दिनों.....
      शायद आप ही आप रूठी हूँ इन दिनों.......

-अनु