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Showing posts from August, 2012

सन्नाटा........

अस्पताल में पतिदेव की तीमारदारी में ६ दिन और ६ रातें गुजारी....दिन तो जैसे तैसे कट जाते मगर रात का सन्नाटा असह्य था....बल्ब की धीमी रौशनी में मन में जो टूटा फूटा सा उपजा वो क्षणिकाओं के रूप में आपके समक्ष रखती हूँ...
(आप सभी के ब्लॉग पर आती हूँ धीरे धीरे ..... )

१-जब शब्द हो जाते हैं बेमानी,
   तब सन्नाटे से उपजता है
   संवाद !!

२-रात के सन्नाटे में
   अस्पताल में कोलाहल??
   लगता है फिर छायेगा
   सन्नाटा....
   किसी घर में !!

३-रात के सन्नाटे में
   उस लड़की के चीख
   जाने कोई कैसे सुन नहीं पाया???
   बड़ा शोर है शहर में
   रात के सन्नाटों में भी.....

४-सन्नाटा छा जाता है
   जब प्रश्न उठता है,
   कि  कौन कराएगा
   बूढ़े बाप का इलाज ??

आखरी दो क्षणिका......घाव पर मरहम सी.

५ -मौत सा सन्नाटा
   टूटता  है,
   एक नवजात शिशु के
   रुदन से.....

६-सन्नाटे  में कहीं
   खनकी चूड़ी....
   चोरी  छुपे मोहब्बत
   एक रोज तोड़ेगी
   मन के सभी सन्नाटे........

-अनु

आसान था तुझे भूल जाना......

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आसान था तुझे भूल जाना....
जैसे आसान था कभी,
रह रह कर तेरा याद आना...
भुला दिया तुझे मेरे दिल ने
बड़ी जल्दी,बड़ी आसानी से....

थे जो तेरी  मोहब्बत के दस्तावेज,
वो कॉफी के कुछ बिल जलाए
और खत खुशबुओं वाले,
फाड़े और हवा में उडाये..
मुस्कुरा कर कुछ गम चोरी चोरी
अश्कों में बहाए......
बंधे थे मन्नत के धागे जो
हर मंदिर और दरगाह में
बस उन्हें भी जाकर खोल आये.....
सब  किया धरा चाँद का था,सो
उसको भी अमावस कर आये....

अब ज़रा होशियारी बरतती हूँ.....
तेरे  नाम के किसी और शख्स से भी
अंजान बनी रहती हूँ.....
अपनी चाहतें और शौक बदल डाले है मैंने...
अब न सुनती हूँ गज़ल,न शोख रंग पहनती हूँ...

ऐ मेरी हंसीं के दीवाने! अब न मैं ,उन दिनों की तरह ,खिलखिला के कभी  हँसती हूँ.....
 -अनु

केतकी

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मेरी पहली  कहानी महामुक्ति  पर सकारात्मक टिप्पणी करने के पहले आप लोगों ने सोचा नहीं.....सो अब पेशे खिदमत है मेरी दूसरी कहानी...
इसके रंग और महक कुछ अलग हैं....ज्यादा वक्त नहीं लगेगा सो पूरी पढ़ें ज़रूर....जब भी वक्त मिले...

  केतकी
dainik bhaskar "मधुरिमा" में प्रकाशित 28/8/2013 
http://epaper.bhaskar.com/magazine/madhurima/213/28082013/mpcg/1/
केतकी  को आँच पर चढ़ाया मनोज जी ने,समीक्षक सलिल जी"बिहारी बाबू" http://manojiofs.blogspot.in/2012/08/17.html?showComment=1345686607932#c7815674356444140107

उसे ठहराव पसंद नहीं था,ज़रा भी नहीं! गज़ब की चंचलता थी उसके मन में,उसके मस्तिष्क में,तन में,पूरे व्यक्तित्व में ही...ठहरना उसकी फितरत में न था.अपार ऊर्जा से भरी थी वो,इतनी ऊर्जा कि किसी इंसान के जिस्म से सम्हाली न जाए. वो अतिरिक्त ऊर्जा,वो तेज उसके चारों और संचारित होता रहता जैसे चाँद के आस-पास का सा वलय उसके चारों और भी हो. बेहद आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी थी केतकी.जो देखता,सिर्फ देखता ही नहीं रह जाता बल्कि उसका ही हो जाता,खिंचा चला आता उसकी ओर. उसके प्रति ये एकतरफा आकर्षण सिर…

ख़्वाबों का आना और जाना....

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ख़्वाबों का आना
फिर चले जाना
एक दस्तूर है....

और इसे बा-काएदा
निभाते हैं ख्वाब..
आते हैं......चले जाते हैं.

इस दस्तूर को,
इस रिवाज़ को
तोड़ कर ये
ठहर क्यूँ नहीं जाते
कभी मेरी पलकों पर.....

गर ठहरें कुछ दिन
तो मुझे वक्त मिले
उन  ख़्वाबों को चुनने का,
उन्हें  सुलझा कर
सच के चरखे पर कातने का...

हां एक रोज ठहरा तो था...
पिछली रात का,
एक कसमसाया  सा ख्वाब...
ठहर  गया था
मेरी पलकों पर,
एक बूँद बन कर...

और सारा  दिन
आँखें भारी रहीं थीं...
और मन  भी.

शायद  अच्छा ही है
ख्वाब आते हैं,चले जाते हैं..
ठहरते नहीं !!

-अनु

मेरी डायरी का एक पन्ना....30/9/2011

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लिखा था किसी रोज..मगर ज़िक्र था कान्हा का, सो पढवाती हूँ आज....कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाओं सहित...

आज बेटे के स्कूल में
बैठी थी उसके इन्तज़ार में,
एक बड़े से ,फूलों से लदे
कदम्ब के पेड़ तले..
फैली शाखाएं..
मानो खुला आमन्त्रण  ..
ढेरों बच्चे दौड रहे थे
यहाँ वहाँ,
मगर एक ना था कदम्ब के नीचे..
शायद उन्हें पता भी न होगा
कि यहाँ कोई पेड़ है ऐसा,
जिसके नाम से ही
मन में  घुमड़ पड़ती है कविता !

मुझे मेरा बचपन याद आ गया
और वो "कदम्ब का पेड़" कविता..
कैसी छोटी छोटी आशाएं
और अभिलाषायें हुआ करती थी....
जब हम बच्चे थे....
जी भर खेलना ही मानो सब कुछ था.
अब है कि, किसी चीज़ से जी ही नहीं भरता...
तब  सब  कुछ मिल -बाँट  खाते....
कान्हा  सुदामा बन जाते..

तब कन्हैया बन
माँ को सताने में सुख था..
(सताना  अब भी नहीं छोड़ा है बच्चों ने )

तब दो पैसे की बांसुरी की  आस थी.....
कान्हा और राधा  सी  चाह थी...
अब जीवन में संगीत ही कहाँ??
न वैसा सात्विक प्रेम रहा..

कदम्ब के पीले फूल देख
मन में लड्डू फूटते कि
काश ये लड्डू होते...
अब  मॉल  में कहीं दिखते हैं लड्डू??

सच! कैसा सस्ता सुन्दर सा बचपन था...
काश ये टिकाऊ भी होता..
हम सदा बच…

ख्वाहिशें.....कभी मरती नहीं.

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भास्कर भूमि में प्रकाशित  http://bhaskarbhumi.com/epaper/index.php?d=2012-08-08&id=8&city=Rajnandgaon#
ख्वाहिशों के कभी कोई नाम नहीं होते ...
ये हैं दिल में फडफडाते हुए,कुछ परकटे तोते.....
कभी ऐसी ही जाने कितनी ख्वाहिशें दिल में पला करती थीं... इतनी कि गिनी न जा सकें....... ख्वाहिशों का कोई बोझ नहीं होता..
जितनी भी हों,दिल हल्का ही रहता..
मानों उड़ा जा सकता,पंखों के बिना ही..
और अब जाने क्या हुआ.....मर गयीं सब ख्वाहिशें..... शायद नाउम्मीदी ने घोंट दिया गला ... अब कोई ख्वाहिश नहीं......फिर भी जाने क्यूँ दिल भारी है.... उड़ना तो दूर,
बैठा बैठा जाता है दिल.
तुम्हारी मोहब्बत जो न रही.... जाने क्या रिश्ता था तेरी मोहब्बत और मेरी ख्वाहिशों का??? एक मरी तो दूजी भी मर गयी....गहरा रिश्ता रहा होगा. जैसे कभी तेरा मेरा था....अटूट....
फिर भी टूट ही गया...
अब कुछ भी पहले सा नहीं तुमनेहाथ जो छुडाया.... मेरे हाथों की लकीरें भी शायद साथ ले गए...
वो  ख़्वाबों,ख्वाहिशों वाली लकीरें!!!
तुम कहते हो तुम्हें मोहब्बत नहीं... यही इलज़ाम मैंने भी दिया तुमको.... (हमारी सोच भी मिलती है देखो...)
माना तुम्हें मोहब्बत नहीं 
ये सच है...…

कुछ लम्हे जो ठहर से गए......

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भास्कर  भूमि में प्रकाशित  http://bhaskarbhumi.com/epaper/index.php?d=2012-08-04&id=8&city=Rajnandgaon इब्तेदा  मोहब्बत की....
तुमने कहा था
मेरी आँखों में बसी हो तुम.....
मैंने कहा
कहाँ?? दिखती तो नहीं ...
तुमने कहा
दिल में उतर गयीं
अभी अभी...

इन्तेहा मोहब्बत की-
उस  रोज चाँद
आसमां  के पहलु से 
उतर कर,
झील के ठन्डे 
नर्म बिछौने में सो गया.
थक गया था वो,
उन दिनों  चाहतों का मौसम जो था.....

फिर बेइंतहा मोहब्बत-
दरवाज़े पर लगा गुलमोहर
जेठ में फूलता है जब
याद आता हैं मुझे वो दिन
जब तुम मुझे ब्याह लाये थे...
सुर्ख जोड़े में....

मोहब्बत अब भी है....
याद है तुम्हें?
उस रोज तुमने
कितनी कस के पकड़ी थी
कलाई मेरी..
चूड़ियाँ टूट कर चुभ गयीं थीं.
मेरी सूनी  कलाइयों पर
वो निशान अब भी  दिखते हैं.......

-अनु