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कहानी - मिष्टी

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पढ़िए मेरी लिखी कहानी -  "मिष्टी'
 जो मध्यप्रदेश जनसंदेश के साप्ताहिक "कल्याणी " में आज प्रकाशित हुई है |


 “ मिष्टी “
मुझे इसी घर में रहना है , इसी घर में...बस !! कहते हुए मिष्टी अमोल के गले से झूल गयी | अरे बाबा रुको तो ज़रा, देखने तो दो कि घर में कमरे कितने हैं, कैसे हैं , किराया कितना है , मकान मालिक कौन हैं , कैसे हैं ! कुछ देखे भाले बिना यूँ ही कैसे तय कर सकती हो तुम ? मैंने तय कर लिया है अमोल , मुझे इसी घर में रहना है... कितना प्यारा सा आँगन है , हरी दूब से ढंका हुआ और देखो किस तरह छितरे हुए हैं उस पर हरसिंगार ! ओ बाबा मुझे तो इश्क हो चला है इन फूलों से...... घर वाकई बहुत सुन्दर था | हरसिंगार के अलावा और भी मौसमी फूलों से क्यारियां भरी हुईं थीं | कोने में एक बांस का झूला लटका था , और सामने संगमरमर की कॉफ़ी टेबल | पीछे एक झरना सा बना हुआ था जिसमें से पानी बहने का मधुर स्वर जैसे आमंत्रण दे रहा हो |

 “अय्यर्स”
हाउस नंबर 44, न्यू मिनाक्षी एन्क्लेव घर के बाहर लगी नेम प्लेट पर लिखा हुआ था | अमोल ठिठक कर पढने लगा , तब तक दरवाज़ा खोल कर मिष्टी भीतर चली गयी और उसने कॉल बेल भी ब…