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अहा ! ज़िन्दगी

सितोलिया

बहुत दिनों से कविता या नज़्म लिखना जैसे बंद ही हो गया था.....कहानियाँ लिखते लिखते जैसे छंद रूठ गए हों मुझसे.....मन के सारे भाव गद्य बन कर ही निकलते....
मगर शायद मन को मनाना आता है......लिखी है एक कविता आज....
अच्छा लगा ब्लॉग पर आना भी.....


सितोलिया खेलने की उम्र थी
हाँ! तो?
खेल कर ही बिताई !!
पीले हाथों से रखती गयी
पत्थर के ऊपर पत्थर
अग्नि के हर फेरे का एक
जैसे सितोलिया के सात पत्थर|
खेल शुरू हुआ......
उम्मीद की एक गेंद पड़ी और बिखर गए सारे...
वो हाँफते दौड़ते भागते कोशिश करती उन्हें जमाने की...
जमा भी लेती.....
और जीत की घोषणा कर डालती
खुश होकर...
तभी एक और उम्मीद,कुछ और अपेक्षाएं.....
और एक और सीधी चोट
फिर से वही भागना दौड़ना और हांफना...
पत्थर पर पत्थर ज़माना....सितोलियाsss.....चिल्लाना.....
याने जीत की एक और घोषणा...
बस यूँही खेलते खेलते, तमगों को सहलाते उम्र गुज़रती है..........
और उसे लगता है वो जीत गयी !!

अनुलता