इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Saturday, June 30, 2012

अजनबी ,जो साथ चल रहा है....

कहते हैं हर रिश्ता मोहब्बत पर टिका होता है .....मगर कुछ रिश्तों की आदत पड़ जाती है........फिर उनमे प्यार हो न हो वे टूटते नहीं.......एक दूसरे की कोई खास ज़रूरत बेशक न हो मगर इक-दूजे बिना काम भी नहीं चलता.......बेशक ढेरों शिकायतें हो एक दूसरे से,मगर हैं संग संग.........
साथ रहने की कोई मजबूरी नहीं फिर भी साथ हैं,साथ की आदत जो है !!!!! 
कहीं ये आदत ही तो प्यार नहीं????
   
  कैसा अजीब शख्स है वो,  
        पुकारता है मुझे
          मेरे नाम से   
     और कहता है कि
      पहचानता नहीं !
        जानती हूँ कि
     वो जानता है मुझे,
    और ये भी सच है कि
      पहचानता नहीं...
          तभी तो 
     बेपरवाह है मुझसे
   कोई फ़िक्र नहीं मेरी...
         कहती हूँ
    छोड़ दे मेरा साथ...
          मगर
    ये बात भी मेरी
     वो कमबख्त
     मानता नहीं...                          

(भीतर ही भीतर डरती भी  हूँ कि कहीं मान न ले...)
       -अनु                                       

47 comments:

  1. सचमुच ऐसा होता है, कभी -कभी कुछ रिश्तों की आदत पड़ जाती है. सुन्दर रचना

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  2. इस रचना को कई अर्थो में एन्जॉय किया जा सकता है, मैं मानता हूँ की हो नहो यह अजनबी हमारा ही एक रूप हो -क्योंकि स्वयं से अधिक अनजानापन और किस से है हमारा...? सुन्दर रचना.

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  3. ये बात भी मेरी वो कमबख्त मानता नहीं...

    बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,

    MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: बहुत बहुत आभार ,,

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  4. Harek cheez hai apni zagah thikane par......it feels comfy and secured , if certains things , relations stay , as and how they were ! kai dino se shikayat nahi zamane se....! :)

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  5. Harek cheez hai apni zagah thikane par......it feels comfy and secured , if certains things , relations stay , as and how they were ! kai dino se shikayat nahi zamane se....! :)

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  6. साथ रहने की आदत पड़ चुकी है...फिर क्यूँकर मानेगा वो...

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  7. बहुत ही भावपूर्ण, हृदयस्पर्शी रचना !

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  8. very well expressed--even those close to us do not know us well.

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  9. ऐसे रिश्ते प्यार के रिश्ते ही होते हैं ... बस हमारा ईगो मानने कों तैयार नहीं होता ...
    सच के करीब है ये रचना ..

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  10. सुन्दर रचना अनु जी

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  11. वाह बहुत खूब ... आभार

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  12. यह कविता ऐसे है जैसे कोई फूल की पत्तियाँ तोड़ता हुआ कह रहा हो- he loves me....he loves me not....he loves me....he....और वह सिलसिला उस पंखुड़ी पर खत्म होता है जो कह डालती है- Hold. Love is the last word.

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  13. लगता तो है की यही प्यार है...
    आपकी बाते और रचना दोनों ही बहुत
    प्यारी है...बहुत सुन्दर......
    :-)

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  14. रिश्ते भी जिंदगी की तरह बड़े पेचीदे होते हैं .
    समझने की कोशिश भी करें तो कहाँ समझ आते हैं .

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  15. जानती हूँ कि
    वो जानता है मुझे,
    और ये भी सच है कि
    पहचानता नहीं...

    जानने और पहचानने के दरमियान कहीं कुछ तो है तभी तो 'भीतर ही भीतर डरती भी हूँ कि कहीं मान न ले'
    बहुत सुन्दर भावनात्मक रचना

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  16. वाह अनामिका ।।
    बधाई ।
    यही नाम होगा ।।

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  17. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (01-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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    1. आपका बहुत बहुत शुक्रिया शास्त्री जी.

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  18. रिश्तों की प्रमेय हल करना जटिल कार्य है . जो साथ रहते है उनमे भावनात्मक बंधन तो होता ही है भले ही वो अभिव्यक्त ना करें .शायद वो भी जानते है की आप ना जाने के लिए ही उन्हें जाने को बोलती हो .

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  19. दिल है कि मानता ही नहीं....

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  20. बेपरवाह है मुझसे
    कोई फ़िक्र नहीं मेरी...
    कहती हूँ
    छोड़ दे मेरा साथ...
    मगर
    ये बात भी मेरी
    वो कमबख्त
    मानता नहीं...

    रिश्तों की प्रमेय

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  21. अपने अपने अंदाज़ हैं ...
    शुभकामनायें !

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  22. मन की कोमल .. सुंदर अभिव्यक्ति ....!!
    शुभकामनायें अनु ...!

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  23. रिश्तों की अजीब कश्मकश पर बड़ी प्यारी
    सुंदर भाव रचे है रचना में,

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  24. बहुत प्यारी रचना अंतिम लाइन ने तो मन मोह लिया

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  25. यही तो अनामी रिश्तों की संजीदगी होती है।

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  26. शयद सभी की जिंदगी में ऐसा ही कोई अनाम जुड़ जाता है।
    अच्छी कविता।

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  27. भीतर भीतर ही डरती हूँ कि कहीं मान न ले ... :):)

    बहुत खूबसूरत रचना

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  28. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है.
    आभार इस प्रस्तुति के लिए
    और मेरे ब्लॉग पर आने के लिए भी.

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  29. अनु जी को सुंदर रचना के लिये बधाई....

    उहापोह मन में उठे, यही प्रेम संकेत
    ज्यों ज्यों मुट्ठी बाँधिये, त्यों त्यों फिसले रेत.

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  30. सुंदर रचना... वाह!
    रेखाएँ सब भिन्न हैं, भिन्न सभी हैं हाथ।
    जगत भले ये छोड़ दे, पर ना किस्मत साथ॥

    सादर।

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  31. फिकर नहीं...आपकी यह बात अक्भी मानी नहीं जायेगी :)
    बहुत सुन्दर कविता है.

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  32. सुन्दर भावपूर्ण कविता ...

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  33. डरता तो भीतर ही भीतर वह भी है |
    बहुत भाव पूर्ण अभिवयक्ति |

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  34. ये कैसा प्यार अनु जी ?.... जानता है पर पहचानता नहीं...... परन्तु समर्पण पूरा. ....
    चाहत दोनों ओर से बराबर है....... प्यार की ये अदा पसंद आई. सुन्दर ! आभार !!

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  35. भावनाओं से पूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति |

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  36. जटिल रिश्तों की सुंदर अभिव्यक्ति..

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  37. मगर
    ये बात भी मेरी
    वो कमबख्त
    मानता नहीं...

    कमाल की पंक्तियाँ है.. सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  38. wah annu ji khubsurat bhav.....badhai ho.

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  39. awsome di, beautifully told dil ki baat

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  40. यह डर ...साथ-साथ चलते हैं

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