इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Thursday, September 20, 2012

आश्रिता


   


कभी कभी प्रकृति
अजीब से सवालों में उलझा देती है,
सोच में डाल देती है...
जैसे आँगन की दीवार पर चिपक कर
चढ़ने वाली वो बेल
क्या उस खुरदुरी सूखी दीवार से
मोहब्बत करती होगी ?
या बिना उसके सहारे चढ़ जो नहीं सकती
आश्रित है उस पर
इसलिए उससे मोहब्बत का स्वांग रचती है ??
काश के सच्चे प्यार को पहचानना
इस कदर मुश्किल न होता.....
-अनु
 

79 comments:

  1. देखने में जो दीवार आपको खुरदुरी ,सूखी दिख रही है ...बेल को तो मिल ही रहा है वो सब कुछ जो वो चाहती है ,तभी तो कितना खूबसूरत हरा रंग है उसका देखिये ....खिल रही है ...न ..?यही तो सच्चा प्यार है ...!!
    बहुत सुन्दर रचना ...!!

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    1. अनुपमा जी आपकी सकारात्मकता को नमन.....
      ऐसे लोग कम होते हैं...
      :-)

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    2. जो अपने अँदर है, वही बाहर दिखाई पड़ता है!

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    3. खिल रही है ...न ..?यही तो सच्चा प्यार है ...!!May Be

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  2. क्या प्यार निष्काम भी होता है...?

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  3. I remember, this poem I have read on ur old blog;;;

    nice poem;;

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  4. प्रेम की परिभाषाएँ ,रंग ,रूप अनगिनत हैं ..ना जाने कौन सा रंग प्रेम को और गहरा बना देता है ...ये तो वो जाने जो प्रेम के उस रूप में रंगे हैं ......अच्छी लगी कविता !

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  5. कभी प्रेम,कभी सहारा लेने की मजबूरी,कभी सिर्फ स्वांग - कहाँ समझ पाता है मन

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  6. बहुत ही खूबसूरत कविता |

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  7. अनु जी प्रेम का दूसरा नाम ही दर्द है

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  8. mujhe lagta hai mohabbat aur mohabbat ke swang me jayda antar nahi:)
    dono dil se hi hota hai:)
    behtareen!

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  9. सच्चे प्यार ही क्यों, प्यार को ही पहचानना मुश्किल होता है अनु जी.
    छद्म वेशधारी सभी जगह है. इस मायावी दुनिया से कोई बच सके तो वही चमत्कार होगा.
    इस भावपूर्ण कविता के लिए आभार !

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  10. सच्चे प्यार ही क्यों, प्यार को ही पहचानना मुश्किल होता है अनु जी.
    छद्म वेशधारी सभी जगह है. इस मायावी दुनिया से कोई बच सके तो वही चमत्कार होगा.
    इस भावपूर्ण कविता के लिए आभार !

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  11. प्रश्न उठना स्वभाविक है...
    पर स्वांग रचने के लिए भी मुहब्बत तो करनी पड़गी नः)
    सस्नेह

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  12. वाह ... बेहतरीन अभिव्‍यक्ति आभार आपका

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  13. बहुत ही खूबसूरत कविता अनु जी

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  14. प्रेम बाहरी सुन्दरता नहीं देखता ये तो एक रिश्ता है आत्मा से आत्मा का देखिये न इस बेल और उस खुरदुरी दीवार का रिश्ता दोनों मिलकर कितने खुश हैं... बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति अनुजी

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  15. कल 21/09/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया यशवंत.
      :-)

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  16. mam,
    आप आपने आस - पास ही कविता को ढूंढ लेती हैं , वाकई काबिल-ए-तारीफ़ |

    -आकाश

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    1. वक्त कहाँ है किसी दूर के सफर का..
      आस-पास ही एहसासों ने उलझा सा रखा है....
      :-)

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  17. sach me anu ji yah swang hai ya majburi parantu prem sirf sundarta nahi dekhta , bel yadi khurduri jameen ko tham kar badhti hai to to wahan wah majbuti bhi hoti hai jo kabhi bhi girne nahi deti ..... majbuti se tham kar aage badhne deti hai ...

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  18. प्यार है बस एक सुविधा से जीने की ललक ..एक बार ऐसा ही कुछ लिखा था ..बहुत सुन्दर तरीके से तुमने लिखा है अनु

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    1. आपकी कविता भी ज़रूर पढ़वाइयेगा...

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  19. सहारा पाने के लिये प्रेम का स्वांग तो करना ही पडेगा,,,,लेकिन सच्चा प्रेम निस्वार्थ होता है,,,

    RECENT P0ST ,,,,, फिर मिलने का

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  20. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  21. सिम्बायोसिस -- भले ही प्यार न हो , एक समझौता ही है , लेकिन फायदा तो दोनों को होता है . :)
    कहीं इसीलिए तो आजकल लिव इन रिलेशनशिप के केस बढ़ने लगे हैं !

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  22. दीवार अगर अहंकार करे कि, मेरे कारण ही बेल सहारा पाती है
    या बेल ये सोचे कि मै क्यों दीवार पर आश्रित हूँ ?
    इसी भावना के चलते प्राकृतिक सौन्दर्य खो रहा है
    प्रकृति में सब कुछ एक दुसरे पर आश्रित ही तो है !

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  23. प्रभावी रचना ... लाजवाब

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  24. बहुत ही सुन्दर शब्द रचना !!

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  25. Beautiful ! Very Simple..But Deep Observation Anu !
    उस बेल को सहारा चाहिए.... चाहे वो उससे ज़्यादा मज़बूत पेड़ हो, या बाँस....या फिर कोई खुरदुरी दीवार ..~इसे समझौता भी कह सकते हैं.... जीवन का समझौता.....~कभी समझौते की मोहब्बत...कभी मोहब्बत का समझौता...... :)

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  26. काश के सच्चे प्यार को पहचानना
    इस कदर मुश्किल न होता.....sahi bat...

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  27. gr88 write di.....bel tho hum bhi dekhte hain , par aisa soch pana aur usay shabd dena mushkil hota hai.....

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  28. सतह खुरदरी सही
    पर आसरा तो देती है
    वो भी आश्रिता बनाकर नहीं
    आत्मविश्वास जगाकर
    यह कहते हुए कि
    मैंने तुम्हारी उंगली थाम रखी है
    और तुम्हारे सामने है एक विस्तृत आकाश
    ये मेरा खुरदरापन वो झुर्रियाँ हैं
    जो तुम्हारे सपनों को पंख देने
    और तुम्हें आकाश सौंपने की उम्मीद में
    उभर आयी हैं
    ऐ मेरी बिटिया रानी
    बढ़ा अपने हाथ
    और छू ले आसमाँ!!
    /
    मुझे तो प्यार का यही रूप दिखा!!! या 'यह भी' रूप!!!

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  29. अपने अपने हिसाब से व्याख्या की जा सकती है , लोग कर भी रहे है. आपकी कविता के मूल भाव के इतर भी. मै मूढमति बस इतना समझा की रूखे शरीर में प्रेम भरा दिल भी तो धडकता होगा. बढ़िया है जी .

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  30. प्रभावशाली रचना..

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  31. बेल ....हर उस दीवार से प्यार करती है जो उसे आसरा देती है .....

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    1. अंजु जी ये तो ट्विस्ट है कहानी में :-)

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  32. "जिन खोजा तिन पाईयां गहरे पानी पैठ " ....

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  33. सहारे तो स्वांग से ही मिलते हैं |

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  34. कुछ अलग...उम्दा भाव...|

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  35. बेहद खूबसूरत रचना
    कल्पना की उड़ान को मानना पड़ेगा |
    आशा

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  36. बहुत बढ़िया ....बिलकुल नया

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  37. प्यार घडी का भी बहुत है ,सच्चा झूंठा मत सोचा कर ,
    मर जाएगा मत सोचा कर ,तनहा तनहा मत सोचा कर .
    हर कोई ढूंढता है एक मुठ्ठी आसमां ,हर कोई चाहता है एक मुठ्ठी आसमा ,उस लतिका ने क्या बिगाड़ दिया ?क्या वह अमर वेळ थी ?जो आश्रय को ही नष्ट कर देती है .

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  38. आपका ये सवाल पढ़कर ज़हन से बस एक ही अल्फाज़ निकला - 'आह' ... काश हम जान पाते!! .. बहुत अच्छा लगा अनु दी!
    सादर
    मधुरेश

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  39. प्यार तो एक ऐसी पहेली है ...की कोई नहीं समझ पाया है ...क्यों लहरें आ आकर बार बार साहिल पर सर पटकती है ...उसे घायल करने के लिए ...या उस पर मर मिटने के लिए .....वैसे अनुजी..कहाँ से खोज कर लातीं हैं यह ख्याल...बहुत ही सुन्दर ..!

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  40. प्यार तो एक ऐसी पहेली है ...की कोई नहीं समझ पाया है ...क्यों लहरें आ आकर बार बार साहिल पर सर पटकती है ...उसे घायल करने के लिए ...या उस पर मर मिटने के लिए .....वैसे अनुजी..कहाँ से खोज कर लातीं हैं यह ख्याल...बहुत ही सुन्दर हैं ..!

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  41. बहुत सराहनीय प्रस्तुति.
    बहुत सुंदर बात कही है इन पंक्तियों में. दिल को छू गयी. आभार !

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  42. सच्चे प्यार को पहचानना मुश्किल है, तभी तो उसकी कीमत है..नहीं क्यूँ मारे-मारे फिरते लोग सच्चे प्यार की तलाश में...बहुत ही सुन्दर रचना..

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  43. अति सुन्दर अनु जी..प्यार सच्चा है या स्वांग है..ये पहचानना इतना आसान थोड़े है..आसान होता तो फिर प्यार को लेके इतनी कवितायेँ ही क्यों बनती..

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  44. सच्चे प्यार को अनुभूत करना वो भी इस युग में कठिन ही नहीं काफी कठिन होता है ..
    खुरदरी दीवार के आलंबन में पल्लवित होती बेल का प्रेम निष्काम तो नहीं किन्तु सकाम तो
    है ही जिसे भी आज के परिवेश में पाना दुष्कर है....आभार श्रेष्ठ रचना के लिए....

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  45. बहुत सुन्दर अनु दी...
    दिल को छु लेनेवाली रचना...
    काश सच्चे प्यार को पहचानना मुश्किल ना होता..
    और जिससे प्यार हो जाये..
    उसे भी हमसे सच्चा प्यार हो जाता.
    काश|

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  46. Love often needs such coarse and hard support to flourish!

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  47. बेहतरीन सार्थक रचना !
    आभार !

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  48. बेहतरीन पोस्ट बधाई

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  49. आपके ब्लॉग पर आकर कई रचनाएँ पढ़ीं. बहुत सहज और भावपूर्ण लिखती हैं आप.

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  50. शायद आज प्यार एक जीने का सहारा है...बहुत सार्थक चिंतन...सुन्दर प्रस्तुति

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  51. Kaash, nature teaches so much. loving without reason or not finding reasons to love...Very profound!

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  52. असली मुश्किल है- जब भी प्यार को पहचानने की कोशिश।

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  53. what you have written is an explosive..

    short and beautifully dangerous... Great work

    regards
    Sniel

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  54. प्यार का काम ही ...किसी पे आश्रित होना है ..??
    खुश रहो !

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  55. बहुत सुन्दर प्रभावशाली रचना!

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  56. सुन्दर रचना

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  57. पूरा संसार इसी नियम से चल रहा है सब को एक दुसरे का सहारा मिलता रहे. बिना सहारे के भी जीवन मुमकिन नहीं.

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  58. बहुत बढ़िया रचना ..

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  59. बहुत बढ़िया रचना .अहसासों के परिन्दें कहाँ तक उड़ान भर सकते है .....उसकी कोई थाह नहीं ......यह आपकी रचना से विदित होता है अनु .....

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  60. बहुत खूब रचना अनु जी।
    प्रतीक संचेती

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  61. pyar ko duniya ki najron se nahi
    premi ki najar se dekho....
    Ye sawal jawab to bemani hai..
    Pyaar to bas mahshhos hota hai..
    Or failta jata hai khushboo ki tarah.

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  62. Ye pyar hai ya kuch aur hai,na tujhe pata na mujhe pata......Wah Anulataji aapka jawab nahi.Man ki dharti par kitne tane bane bun leti hai....Aap

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