इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Saturday, September 21, 2013

“अमलतास की डाली”



फेनिल नदी में 
कंपकंपाते चाँद का प्रतिबिम्ब
बिंम्ब जो  
ठहरा हुआ है वहीं
बहता नहीं लहरों के साथ,
और उस पर झुकी वो 
अमलतास की डाली,
जिसने उतार फेंके थे
अपने सभी स्वर्ण आभूषण और
हरे रेशमी वस्त्र भी
लहरों संग बह जाने को... 
कि प्रेम में जोगन बन जाना सुहाता है
इसे पंखुड़ियों और पत्तों का झड़ना मत कहो
ये प्रेम है,विशुद्ध प्रेम....
ठूंठ हुई डाली अपना सर्वस्व तजना चाहती है  
प्रेम के लिए स्थान बनाने को.
संसार के आवागमन से परे
मन समर्पित हो जाना चाहता है !
हाँ ! प्रेम की पराकाष्ठा भी तथागत बना देती है.
-अनुलता-
19/9/2013

Friday, September 13, 2013

परफेक्शन


तुम परेशान थे  मेरी आदतों से......चाहते थे कि बदल जाऊं मैं !! हार कर, न चाहते हुए भी, सिर्फ तुम्हारी  खुशी के लिए मैंने भी अपना वजूद एक  लिबास की तरह उतार डाला...और उतारते हुए पलट गया मेरा "मैं",एक लिबास की तरह ही फिर पहन लिया मैंने उसे, उल्टा !!
नतीजतन , अब मेरी आदतें भी उलट गयी हैं, देखो बदल डाला है मैंने खुद को तुम्हारे लिए.......
अब मुझ में जो बुरा था वो भला हो गया और जो थोडा कुछ भला था बुरा हो गया.......

जानती हूँ !
तुम अब भी परेशां हो ??

बस परेशानी की वजहें बदल गयी हैं!!

(गलती तुम्हारी बस ये है कि तुम रिश्तों में परफेक्शन खोजते रहे,और मैं खोजती रहे प्रेम.....तुमने सिर्फ मुझे खोया और मैंने खोया सारा का सारा प्रेम....

[मन की सबसे ऊपरी परत और बक्से में सबसे नीचे दबी हुई  डायरी के पन्ने से.... ]
~अनु ~


Thursday, September 5, 2013

रोटी

भूख जगा देती है नींद से,
बेसुध कर देती है सपनों  को
फिर
उनमें आग लगा कर
जलते ख़्वाबों पर
सेकती है रोटियां ....

एक आधी रोटी का टुकड़ा
ढांक लेता है आकांक्षाओं और
उम्मीदों के बीज को,
सड़ा देता है उसे भीतर ही भीतर 
अंकुरण के पहले ही....

भूखा नहीं देखता इन्द्रधनुषी सपने
भूखे को नहीं दिखती रोटी पर लगी नीली हरी फफूंद
उसको नहीं दिखते रंग
उसकी आँख नहीं होती
भूखे के पास  होता है सिर्फ एक पेट...

~अनु ~

Thursday, August 29, 2013

स्मृतियाँ

माँ के ज़ेवरों की तरह
सम्हाल रखी हैं मैंने
तुम्हारी बातें,
सहेज रखा है हर महका लम्हा
रेशम की लाल पोटली में !

सम्हाला है
स्मृतियों को
एक विरासत की तरह
अगली पीढ़ी के लिए!

कभी खोल लेती हूँ वो पोटली
देखती हूँ चमकते गहने
और
आँखों में हौले से उतर आते हैं वो मोती...

ख़ालिस सोने की बनी-
सच!!
बुरे वक्त का सहारा  हैं वे स्मृतियाँ
माँ के ज़ेवरों की तरह......
~अनु~





Saturday, August 17, 2013

अकेलापन

अकेली राह मुश्किल नहीं
खुद का बोझ ढोना जायज़ है,
ज़रुरत है...
जब मौका मिला किसी पेड़ के नीचे सुस्ता लिए
खुद को अपने से परे रख कर !

ज़ख्मों को ख़ुद सीना सीख जाते हैं हम
यूँ अकेली राह में ज़ख्मों की गुन्जाइश कम होती है...
राह में कोई ठंडे पानी का सोता मिलता ही है ज़ख्म धोने को
प्यास बुझाने को.....

जीने की कोई वजह खोजने का वक्त नहीं मिलता
अकेलपन की अपनी मसरूफ़ियत है
और कट जाती है जिंदगियाँ यूँ ही अक्सर, बिना जिए ही.
धूप खुशबू हवाएं मिल ही जाती हैं सबको अपने अपने हिस्से की.....

(आप जब अकेले होते हैं तब ख्यालों की भीड़ लग जाती है,ऐसे ही....... )
~अनु ~

Monday, August 12, 2013

शब्द

कहा गया हर शब्द
स्थायी है
हर अक्षर होता है कालजयी...
शब्द के सृजन की प्रक्रिया अपरिवर्तनीय है...
एक बार बन जाने के बाद
शब्द भटकते हैं,
खोजते हैं ठौर...कहीं ठहर जाने को.

शब्द कभी मरते नहीं
शब्दों के दिए घाव कभी भरते नहीं....
मेरे कानों से टकराए हैं ऐसे कई शब्द
और उन्होंने स्थायी ठिकाना बना लिया
मेरे मन को...
एक के ऊपर एक
परत दर परत टिकते ये शब्द
रौंदते मेरी शिराओं को...
इनसे रिसता धीमा ज़हर फ़ैल रहा है पूरे बदन में

दर्द असह्य हुआ
तो नोच नोच कर शब्दों को उठा कर
सृजन किया एक नज़्म का...
चूंकि हर शब्द तेरा है
सो दर्द भरी इस नज़्म का सेहरा तेरे सर.....
~अनु~

Tuesday, July 30, 2013

औरत की आकांक्षा

बहुत तकलीफ देह था
ख़्वाबों का टूटना
उम्मीदों का मुरझाना
आकांक्षाओं का छिन्न-भिन्न होना

हर ख्वाब पूरे नहीं होते...
हर आशा और उम्मीद फूल नहीं बनती

सोच समझ कर देखे जाने चाहिए ख्वाब और पाली जानी चाहिये उम्मीदें....
सो अब तय कर दी है उसने
अपनी आकांक्षाओं की सीमा
और बाँध दी हैं हदें
ख़्वाबों की पतंग भी कच्ची और छोटी डोर से बांधी..

ऐसा कर देना आसान था बहुत
सीमाओं पर कंटीली बाड़ बिछाने में समाज के हर आदमी ने मदद की...
ख़्वाबों की पतंग थामने भी बहुत आये

औरत को अपना  आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली.....
३०/७/२०१३
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आभार....
~अनु~


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मौसम अपने संक्रमण काल में है|धीरे धीरे बादलों में पानी जमा हो रहा है पर बरसने को तैयार नहीं...शायद उनकी आसमान से यारी छूट नहीं रही ! मोह...