इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Tuesday, July 30, 2013

औरत की आकांक्षा

बहुत तकलीफ देह था
ख़्वाबों का टूटना
उम्मीदों का मुरझाना
आकांक्षाओं का छिन्न-भिन्न होना

हर ख्वाब पूरे नहीं होते...
हर आशा और उम्मीद फूल नहीं बनती

सोच समझ कर देखे जाने चाहिए ख्वाब और पाली जानी चाहिये उम्मीदें....
सो अब तय कर दी है उसने
अपनी आकांक्षाओं की सीमा
और बाँध दी हैं हदें
ख़्वाबों की पतंग भी कच्ची और छोटी डोर से बांधी..

ऐसा कर देना आसान था बहुत
सीमाओं पर कंटीली बाड़ बिछाने में समाज के हर आदमी ने मदद की...
ख़्वाबों की पतंग थामने भी बहुत आये

औरत को अपना  आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली.....
३०/७/२०१३
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आभार....
~अनु~


http://www.indiblogger.in/iba/entry.php?edition=1&entry=55522

59 comments:

  1. औरत को अपना आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली.....:( behtreen ..sacche shbad

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  2. सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति

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  3. अपनी आकांक्षाओं की सीमाएं
    और बाँध दी हैं हदें
    ख़्वाबों की पतंग भी कच्ची और छोटी डोर से बांधी..बहुत सुन्दर शब्दों में बाँधा है अपने मन के भावो को..बहुत खूब ,अनु..

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  4. सुन्दर रचना अनु |

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  5. सीमाओं पर कंटीली बाड़ बिछाने में समाज के हर आदमी ने मदद की...
    ख़्वाबों की पतंग थामने भी बहुत आये -
    बहत सुन्दर अभिव्यक्ति
    latest post हमारे नेताजी
    latest postअनुभूति : वर्षा ऋतु

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  6. .....जैसे आकाश छीन लिए जाने तक का सम्पूर्ण घटनाक्रम लिख गयी लेखनी!

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  7. बहुत ही प्रभावशाली रचना.

    रामराम.

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  8. क्या हुआ ??
    सभी औरत की एक ही कहानी
    इसलिए लगती जानी पहचानी
    हार्दिक शुभकामनायें !!

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  9. बहुत गहरी बात

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  10. "हर ख्वाब पूरे नहीं होते...
    हर आशा और उम्मीद फूल नहीं बनती"

    बिलकुल सही बात कही आपने।


    सादर

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  11. बहुत तकलीफदेह था
    ख़्वाबों का टूटना
    उम्मीदों का मुरझाना
    आकांक्षाओं का छिन्न-भिन्न होना

    हर ख्वाब पूरे नहीं होते...
    हर आशा और उम्मीद फूल नहीं बनती

    सही कहा.....
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....

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  12. सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति

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  13. औरत मन के ताने बाने ...बहुत सुन्दर अनु !!

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  14. औरत को अपना आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली.....
    ..मार्मिक सत्य को अभिव्यक्त करती कविता।

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  15. सशक्त रचना...
    बेहतरीन...
    :-)

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  16. बहुत मार्मिक ........ बहुत खूबसूरत
    औरत को अपना आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली
    ..... इतनी कि मन भीगा रहा उम्र-भर

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  17. हुआ तो यही है....बहुत खूब

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  18. समाज, परिवार और नारी मन ...
    सबके कल्याण हेतु एक स्त्री बहुत कुछ त्याग करती है
    और कभी कभी विवशता में भी

    बहुत सुन्दर, मार्मिक !

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  19. bahut sundar rachna ...........shubhkamnaayen anu ji

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  20. बहुत ही उत्तम कविता

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  21. अति उत्तम कविता

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  22. ऐसा कर देना आसान था बहुत
    सीमाओं पर कंटीली बाड़ बिछाने में समाज के हर आदमी ने मदद की...
    ख़्वाबों की पतंग थामने भी बहुत आये...यह तो होना ही था आखिर कैसे भूल गयी वो कि यह अधिकार तो समाज के ठेकेदारों ने औरत को दिया ही नहीं कभी...प्रभाविशाली प्रस्तुति...

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  23. ख्वाबो के टूटने से बहुत दर्द होता है , बिलकुल सही कहा


    यहाँ भी पधारे

    http://shoryamalik.blogspot.in/2013/07/blog-post_29.html

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  24. hridaya ko jhakjhorti hui aur behad hi sunder dhang se bhvnaon ki marmikta ko adhaar detihui ek sarthak rachna...abhar diii...

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  25. औरत को सिकुड़ें जाने पर मिलती रही प्रशंसा !
    सच कहा !

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  26. औरत को अपना आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली.....

    ऐसा ही होता है

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  27. औरत को अपना आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली.....

    कितनी बड़ी सच्चाई है इस एक पंक्ति में ...

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  28. ख़्वाबों की पतंग भी कच्ची और छोटी डोर से बांधी..


    यथार्थ से परिचित कराती हुई रचना।

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  29. bahut sundar rachna.............shubhkamnaye anuji.

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  30. पुरुष समाज और दे भी क्या सकता है छदम शाबासी के ... अपनी सत्ता का विस्तार दूसरे की सत्ता सिकोड़ के ही कर सकता है वो ...

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  31. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन होरी को हीरो बनाने वाले रचनाकार को ब्लॉग बुलेटिन का नमन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  32. अनु जी : जैसे कुशल योद्धा हर बार पैंतरा बदल कर प्रहार करता है वैसे इस बार आप ने अलग रीती से रचना रची है. इडियम सीधे लगते है पर बल खाते हुए आँख मिलाते है. वेदना सनातन है और शब्द पुरातन है फिर भी आप पीड़ा की आँच कन्वे कर पाए हो .....सीमा ओं पर कंटीली बाड़ बिछाने में समाज के हर आदमी ने मदद की...
    ख़्वाबों की पतंग थामने भी बहुत आये: यह दोषभावना कब्र तक का बोजा है.

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  33. औरत को अपना आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली.....

    bahut khoob ...!

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  34. अपनी आकांक्षाओं की सीमा
    और बाँध दी हैं हदें
    ख़्वाबों की पतंग भी कच्ची और छोटी डोर से बांधी।
    एक औरत के सिवा और कौन कर सकेगा ऐसा…

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  35. औरत को सीमाओं में बाँध कर आदमी ने सारी दुनिया अपने अधिकार में कर ली!

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  36. औरत को अपना आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली....
    नि:शब्‍द कर दिया आपने तो ... इस पंक्ति में गज़ब !!

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  37. औरत को अपना आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली.....
    अनु, इस एक पंक्ति में रचना का सारांश आ गया है
    बहुत सटीक बात कही है !

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  38. बहुत सुन्दर ..

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  39. बहुत सटीक और प्रभावी अभिव्यक्ति...

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  40. khababon ke patang thamne :)
    sundhar shabd chitra

    shubhkamnayen........Indiblogger award ke liye :)

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  41. The caged bird sings with a fearful trill
    of things unknown but longed for still
    and his tune is heard on the distant hill
    for the caged bird sings of freedom.

    The free bird thinks of another breeze
    and the trade winds soft through the sighing trees
    and the fat worms waiting on a dawn-bright lawn and he names the sky his own.

    But a caged bird stands on the grave of dreams
    his shadow shouts on a nightmare scream
    his wings are clipped and his feet are tied so he opens his throat to sing.

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    Replies
    1. beautiful and soulful words jyoti...
      thanks a lot!!

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  42. बेहद सशक्‍त पंक्तियां ... आभार इस उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति के लिए

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  43. This touches you, for you know it's the harsh reality.

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  44. सशक्त भावों से अंतर्पुरित अच्छी रचना ..

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  45. shreshth rchnaon men shreshth rrchna.
    kaash kuchh seemaye ant heen hoti.
    to ye bhrm n tootataa.

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  46. लाजबाव प्रस्तुति।।।

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  47. बहुत सुंदर कविता, अपनी हदें जब नारी ने तय कर ली तो उसे और भी समेटने के लिए पुरुष आगे आ गया। आपने इतने सुंदर और भावपूर्ण तरीके से इसे गूंथा है कि नारी की पूरी तस्वीर कुल पंक्तियों की कविता में समा गई है।

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  48. नारी मन की खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  49. सदियों से औरतों की यही नियति रही है ....खूब उकेरा इस दर्द को...अनु

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  50. औरत का संसार जितना सीमित कर देगा ,आदमी उतनी ही छूट पाता जाएगा !

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  51. सीमाओं पर कंटीली बाड़ बिछाने में समाज के हर आदमी ने मदद की...
    ख़्वाबों की पतंग थामने भी बहुत आये

    औरत को अपना आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली.....स्त्री की पीड़ा को अभिव्यक्त करती एक प्रभावशाली रचना!

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