इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Thursday, May 30, 2013

"आत्म""हत्या !!!!

कूद पड़ी वो
नीचे
चौथे माले से
(और ऊपर जाना शायद वश में न रहा होगा...)
लहुलुहान पड़ी काया से लिपट कर
रो पड़ा हत्यारा पिता
जानता था
उसकी महत्त्वाकांक्षाओं ने ही
धक्का दिया है उसे.
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पिता ने सम्बन्ध तोड़ लिए पुत्र से
नहीं चाहता कि मुखाग्नि भी दे बेटा
कि बेटा नालायक,निकम्मा, नाकारा है
कहा नहीं मानता....

गाँव के कूएं में
लाश मिली बेटे की
बेटा नहीं चाहता
कि मुखाग्नि दे पिता को
बेटा मानता है कहा !!
~अनु ~

माता-पिता की उम्मीदों पर खरा न उतर पाने का दुःख बच्चों को होता ही है,उस पर उलाहने देकर उनकी हत्या क्यूँ करते हैं वो....एक सवाल है पालकों से....स्वयं से भी !!!

49 comments:

  1. अन्तर्मन को उद्द्वेलित कर गयी तुम्हारी ये रचना अनु .. सही में माँ बाप कि महत्त्वाकांक्षाओं का मोल बच्चे अपनी जान देकर चुकाते हैं

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  2. हमारे पालकों को समझना चाहियें बच्चों की भावनाओं को,वो बस अपनी ही महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा होते देखना चाहते है.
    बहुत चिंताजनक विषय चुना आपने.
    धन्यवाद

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  3. But these dreams are fed by parents only. butthey should never ever force themselves on their children.

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  4. उसकी महत्त्वाकांक्षाओं ने ही
    धक्का दिया है उसे.
    गहन भाव लिये ... एक सच यह भी है
    सादर

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  5. क्या कहा जाये? सबःई दूर ऐसी ही स्थितियां नजर आती हैं.

    रामराम.

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  6. yah sawaal wakai bahut kathor hai .gahri abhiwaykti

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  7. सच है महत्वाकांक्षाएं कभी कभी नीचे धकेल देती हैं ....... माता पिता हमेशा बच्चों का भला ही चाहते हैं ..... जीवन से बेदखल करके भी उनकी यही कामना रहती है कि बच्चे अपने जीवन में खुश रहें ..... न जाने क्यों लोग अधिकार पर तो ध्यान देते हैं लेकिन कर्तव्य भूल जाते हैं ... यदि कर्तव्य करें तो अधिकार तो स्वयं ही मिल जाता है । अपेक्षाओं को सीमित करें तो उपेक्षाओं से बचा जा सकता है ।

    मार्मिक प्रस्तुति

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  8. माँ बाप और बच्चों को एक दूसरे की भावनाओं को समझना जरूरी है ,

    Recent post: ओ प्यारी लली,

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  9. संगीता स्वरुप ( गीत )May 30, 2013 at 11:44 AM
    सच है महत्वाकांक्षाएं कभी कभी नीचे धकेल देती हैं ....... माता पिता हमेशा बच्चों का भला ही चाहते हैं ..... जीवन से बेदखल करके भी उनकी यही कामना रहती है कि बच्चे अपने जीवन में खुश रहें ..... न जाने क्यों लोग अधिकार पर तो ध्यान देते हैं लेकिन कर्तव्य भूल जाते हैं ... यदि कर्तव्य करें तो अधिकार तो स्वयं ही मिल जाता है । अपेक्षाओं को सीमित करें तो उपेक्षाओं से बचा जा सकता है ।

    मार्मिक प्रस्तुति
    puri tarah se sahamat hoon .....

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  10. बच्चे कल के भविष्य है . उन्हें अपनी रूचि के अनुसार काम करने दें
    latest post बादल तु जल्दी आना रे (भाग २)
    अनुभूति : विविधा -2

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  11. उसकी महत्त्वाकांक्षाओं ने ही
    धक्का दिया है उसे.....सच है , अधिक महत्त्वाकांक्षा मनुष्य को ऊपर उठाने के बजाय नीचे भी गिरा देती है.. मार्मिक प्रस्तुति

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  12. ये अपेक्षाएं ही तो हर समस्या की जड़ हैं.

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  13. उलाहनों के बीच हम सकारात्मकता भूल जाते हैं ...

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  14. सब एक दूसरे से उम्मीदों की डोर में बंधे हैं... जब डोर टूटती है तो कुछ साँसों के तार भी टूट जाते हैं...

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  15. अपेक्षाएं बढ़ गयीं ...सहनशीलता कम हो गई ...उलाहने में छुपा प्यार दिखा नहीं ....!!
    मार्मिक रचना ...!!

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  16. behad gambhir sawal hai............puri tarah se sahamat hoon .....



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  17. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन विश्व तंबाकू निषेध दिवस - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  18. अत्यंत मार्मिक ..

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  19. दिल को भेदने वाला विषय उठाया ..और बस चंद शब्दों में बड़ी सरलता से वह सारा मर्म ..सारा दर्द उड़ेल दिया..जो हर पाठक के भीतर गहरे उतर गया...वाह अनु..!

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  20. अपनी महत्वकांक्षा बच्चों पर आरोपित करने के नतीजे हैं ....क्यूँ हम भूल जाते हैं कि बच्चों की अपनी भी कुछ इच्छायें हो सकती हैं ...जन्म देने भर से उन पर हमारा मालिकाना हक़ नहीं हो जाता ....बेहतरीन अभिव्यक्ति

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  21. आदरेया आपकी यह अप्रतिम रचना 'निर्झर टाइम्स' पर लिंक की गई है।
    कृपया http://nirjhar-times.blogspot.com पर पधारें,आपकी प्रतिक्रिया का सादर स्वागत् है।
    सादर

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  22. आत्महत्या का एक कारण यह भी होता है । यथार्थमय प्रस्तुति..।

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  23. व्यथा का कोलाज.

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  24. भावनाओं और संवेदनाओं की ऐसी परिणित बहुत करुण होती है.

    सुंदर मार्मिक प्रस्तुति.

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  25. उफ्फ..बहुत मार्मिक प्रस्तुति...

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  26. हला जाती है अंदर तक ये रचना ... ये समाज की विसंगति या हमारे सोचने का ढंग ...
    कौन सही कौन गलत ... क्या पता ...

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  27. kai bar kuchh paristhitiyan bhi aisee bn jati hai ..parents ko bolna to padega hi ...par jo bhi dukhi karti hai aisee ghatnaayen ...

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  28. संवेदनशील कविता।

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  29. आत्महत्या का कारण माता-पिता की महत्वकांक्षा हो सकती है, लेकिन महत्वकांक्षा बच्चे के जीवन से बड़ी कभी नहीं होती, शायद बच्चे उसके पीछे छिपे प्यार को देख नहीं पाते... बहुत गंभीर विषय है

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  30. अत्यंत मार्मिक प्रस्तुति
    आज आपके ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आना हुआ अल्प कालीन व्यस्तता के चलते मैं चाह कर भी आपकी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया. व्यस्तता अभी बनी हुई है लेकिन मात्रा कम हो गयी है...:-)

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  31. an issue which needs to be discussed more and more..
    sometimes bar of expectations is raised so so high that it's just beyond a normal heart to bear the failure..

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  32. jindagi ka ek bimb prastut kiya hai aapne...bahut bahut achhi abhivykti!

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  33. आँखें भर आयीं..खुद को आकलन करने को मजबूर करती रचना...

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  34. कभी कभी दूसरों की महत्वाकांक्षाएं खुद पर कितनी हावी हो जाती है
    बेहतरीन
    साभार!

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  35. सोचने पर मजबूर करती रचना बहुत मार्मिक प्रस्तुति !!

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  36. bachcho ko kdapi dosh n dein...jab palak hi munh pher lenge to vh baki logon ka samna kaise kar payenge...
    sunder abhivyakti !!
    sasneh

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  37. aksar dusro ki ichchhayo ko pura karne me apni ichchaye adhuri rah jati hai .
    sundar rachna anu ji .

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  38. Sawal Chintniya Hai.
    Dono Taraf Ke Samjhne Se Hi Baat Banegi,Ek-Dusre Pr Ungli Uthane Se Kabhi Nhi...

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  39. आत्म हत्या अनैतिक है.........पाप है........अपराध है............अच्छी बात उठाई आपने........मेरा निश्चित मानना है
    ''''''''''''''''कोई आशा की किरण सम्मुख न हो ॥
    दुःख भरा हो उसमें किंचित सुख न हो ॥
    कितना भी हो कष्टप्रद जीवन.... युवा ,
    आत्महत्या को कभी उन्मुख न हो ॥'''''''''''''''''''
    -डॉ. हीरालाल प्रजापति
    (..............''निःशब्द ''श्रद्धांजलि.....जिया ख़ान को )
    http://www.drhiralalprajapati.com/2013/06/241.html

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  40. बहुत दुखद स्थिति है -दो पीढ़ियों में संवाद की स्थिति और पारस्परिक समझ के
    बिना निस्तार नहीं !

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