इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Thursday, April 17, 2014

कसम

रख कर हाथ
नीले चाँद के सीने पर
हमने खायीं थीं जो कसमें
वो झूठी थीं |

मुझे लगा तुम सच्चे हो,
तुम्हें यकीन था मुझ पर....

इसलिए तो खाई जाती हैं कसमें

अपने अपने झूठ पर
सच की मोहर लगाने को !

~अनुलता ~

23 comments:

  1. अपने अपने झूठ की सच्ची कसमें :)
    सुंदर !!

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  2. इस नज़्म ने मुझे पैंतीस साल पीछे धकेल दिया... एक लघु-कथा पढ़ी थी कभी..
    नदी के पुल पर खड़े लड़के और लडकी ने एक दूसरे को गले लगाया और कहा - अगर दुनिया हमें साथ साथ जीने नहीं देगी, तो हम साथ-साथ मर तो सकते हैं. ऐसा कहकर दोनों ने नदी में छलाँग लगा दी! दूसरे दिन उन दोनों की लाशें मिलीं. पोस्ट-मार्टेम से पता चला लड़्का नपुंसक था और लड़की गर्भवती!!
    /
    और क्या कहूँ.. कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या!!

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  3. वाह अनु .....गज़ब...!!!

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  4. क्या चाँद था नीला सा :)
    बहुत खूब !

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  5. एक दूसरे के सच को स्वीकारते दो झूठ !

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  6. बहुत खूब ... कसमों का सच ... झूठ होते हुए भी कितना सच ...

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  7. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (18.04.2014) को "क्या पता था अदब को ही खाओगे" (चर्चा अंक-1586)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  8. झूठ पर सच्चाई की मोहर लगाना ...कसम खाना ...!
    RECENT POST - आज चली कुछ ऐसी बातें.

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  9. वाह ....बहुत खूब

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  10. शायद बुजुर्गों को एहसास था...कि वादे टूट जाते हैं और कोशिशें कामयाब होतीं हैं...इसीलिए कसमें खाने से वो मना करते थे...

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  11. फ़िराक़ साहब फ़रमाते है:

    इश्क़ मे सच ही का रोना है
    ना तुम झूठे, ना हम झूठे

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  12. अपने अपने झूठ पर
    सच की मोहर लगाने को !
    bahut khoob
    rachana

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  13. APANE APNE ZOOTH PAR SACHCHAI KI MUHAR , KYA BAT HAI.

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  14. कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा - सब बातें हैं, बातों का क्या! :)

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  15. sachmuch ye kasme wade kuchh hote hi nhi h... actually jaha sachcha pyar ho waha in sabki zarurrat hi nahi hoti....

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