Posts

Showing posts from May, 2013

"आत्म""हत्या !!!!

कूद पड़ी वो
नीचे
चौथे माले से
(और ऊपर जाना शायद वश में न रहा होगा...)
लहुलुहान पड़ी काया से लिपट कर
रो पड़ा हत्यारा पिता
जानता था
उसकी महत्त्वाकांक्षाओं ने ही
धक्का दिया है उसे.
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पिता ने सम्बन्ध तोड़ लिए पुत्र से
नहीं चाहता कि मुखाग्नि भी दे बेटा
कि बेटा नालायक,निकम्मा, नाकारा है
कहा नहीं मानता....

गाँव के कूएं में
लाश मिली बेटे की
बेटा नहीं चाहता
कि मुखाग्नि दे पिता को
बेटा मानता है कहा !!
~अनु ~

माता-पिता की उम्मीदों पर खरा न उतर पाने का दुःख बच्चों को होता ही है,उस पर उलाहने देकर उनकी हत्या क्यूँ करते हैं वो....एक सवाल है पालकों से....स्वयं से भी !!!

नदी

नदी
मांग रही है  मुझ से
मेरे आँसू
कि वो समंदर होना चाहती है
बिना समंदर से मिले.
नदी एक स्त्री है
हर स्त्री की तरह घायल
अपने जख्म खुद चाटती हुई...
जानती है जुटा लेगी
पर्याप्त खारापन
कई और स्त्रियों के साथ मिल कर,
जो बहा रहीं हैं अपने स्वेद और अश्रु

बाहरी आवरण के भीतर
सब की सब स्त्रियाँ खारी हैं
कि सबके दुःख और दर्द एक से है !!

निष्कंप बहती रही नदी
जब स्त्रियाँ डूबी नदी में,
और तट पर लगे वृक्ष कांप उठे
पुष्प वर्षा हुई!!

~अनु ~

नाकाम इश्क

एक तूफ़ान की तरह आया था तेरा इश्क
अपनी सारी हदें लांघता हुआ
डुबो डाला था मेरा सारा वजूद.
नामंजूर था मुझे खुद को खो देना
नामंजूर था मुझे तेरा नमक!
सो लौटा दिया मैंने वो तूफ़ान वापस समंदर को
बस रह गए कुछ मोती, अटके मेरी पलकों पर
जो लुढ़क आये गालों तक...

कि नाकाम इश्क की निशानियाँ भी कहीं सहेजी जाती हैं !!

~अनु ~


हैंडल विथ केयर

मैंने पहुंचाया था प्रेम तुम तक,
सम्हाल कर ,
एहतियात से पैक करके..
सभी आवश्यक निर्देशों के साथ
कि -
ये हिस्सा ऊपर (दिस साइड अप)
हैंडल विथ केयर
ब्रेकेबल
डु नॉट रोल और फोल्ड!!
मगर देखो न
आज छिन्न भिन्न है हमारा प्रेम...
बिखर गया कतरा कतरा
तुम्हारी लापरवाही से.

आज समझी कि
प्रेम के दिए जाने में कोई गलती नहीं
न ही प्रेम के किये जाने में है....
प्रेम को सही तरीके से स्वीकारा जाना,
इसे स्नेह से सहेजना भी ज़रूरी है.

रिश्तों के टूटने की जवाबदेही सिर्फ एक की नहीं...
सिर्फ मेरी नहीं...कतई नहीं !!!
~अनु ~



लाल स्कार्फ वाली लड़की

Image
वो देखता रहता उस पनीली आँखों वाली लडकी को,रेत के घरौंदे बनाते और बिगाड़ते.....उसे मोहब्बत हो चली थी थी इस अनजान,अजीब सी लडकी से...जो अक्सर लाल स्कार्फ बांधे रहती.....कभी कभी काला भी...

बरसों से समंदर किनारे रहते रहते इस मछुआरे को पहले कभी न इश्क हुआ था न कभी  ऐसी कोई लडकी दिखी थी.जाने कहाँ से आयी थी वो लडकी इस वीरान से टापू में....देखने में भली लगती थी मगर कुछ विक्षिप्त सी,खुद से बेपरवाह सी...(जाने लहरें उसे बहा कर लाई हैं  या किसी मछली के पेट से निकली राजकुमारी है वो...मछुआरा अपनी सोच के साथ बहा चला जाता था..)
लडकी को देखते रहना हर शाम का नियम था उसका.वो बिना कुछ कहे लड़की को समझने की नाकाम कोशिश करता था.
एक रोज़ वो लडकी के करीब पहुंचा....लडकी भी उसकी उपस्थिति से अभ्यस्त हो चुकी थी सो उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं की....बस अपना घरौंदा बनाती रही.....तोड़ देने के लिए...
तुम इतने  सुन्दर घरौंदे  क्यूँ बनाती हो ???और फिर उन्हें यूँ रेत में मिला देती हो??
कोई मिटाने के लिए भी बनाता है भला?? और ये लाल काला स्कार्फ क्यूँ बदलती हो??? एक साथ सारे सवाल दाग दिए उसने,मानों कहीं एक सवाल के बाद लडकी कोई रोक न…

मेरे कमरे का मौसम.....

मेरे कमरे में
दीवारें नहीं हैं.
बस खिड़कियाँ हैं,
खिड़कियाँ ही खिड़कियाँ ....
हर खिड़की एक मौसम की ओर खुलती
किसी खिड़की  से आतीं बारिश की मीठी बूँदें
तो किसी से जाड़े की कच्ची धूप भीतर झांकती
या कभी भीतर आकर धुंध मेरा अंतर्मन भिगोती....
एक खिड़की पर बसंत झूला करता है
(और उसकी ओट में छिपे रहते मन के सभी ज़र्द पत्ते )
फाल्गुन की खिड़की से दहकता पलाश भीतर आता
सोख लेता मन के सीलेपन को...

सारे मौसम एक साथ होते हैं जब ,
सब खिड़कियाँ बंद होतीं हैं और
मेरे कमरे में
तुम होते हो !

अहा !!
तुम, मैं और तुम्हारा बारामासी प्रेम !!!

~अनु ~