इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Thursday, July 11, 2013

मेरी नज़्म

सिमट गए जब
तुम्हारे कहे लफ्ज़ मेरे ज़ेहन में
तब दर्द की एक नज़्म फूटी..
तेरी खुशबु से महकती इस नज़्म को
धो डाला मैंने
जुलाई की तेज़ बारिश में
कि नज़्म अब तरोताज़ा है मिट्टी और घास की महक लिए...
उसे निचोड़ा कस कर
कि रह न जाए एक भी रिसता एहसास बाकी...
हटाने को यादों की सीलन
मिटाने को दर्द की सभी सिलवटें
फेर  दी  बेरुखी की गर्म इस्त्री उस नज़्म पर
पुरानी हर नज़्म की तरह  इस नज़्म का सेहरा तुम्हारे सर नहीं....
इस पर और मुझ पर तुम्हारा कोई हक नहीं, कोई निशाँ नहीं....
ये नज़्म मेरी है
और बाकी की ज़िन्दगी भी सिर्फ मेरी.......
~अनु ~

53 comments:

  1. बेरुखी की गर्म इस्त्री ...क्या खूब..

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  2. बहुत खूब ... गहरे एहसास से सजाया है इस नज़्म को ... पुरानी यादों को पौंचने पे क्या एकसास मिल जायगा ... यादें तो वैसे भी अपनी ही होती हैं उस पे किसी का अधिकार कहां ...

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  3. वाह . बहुत उम्दा

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  4. पुरानी हर नज़्म की तरह इस नज़्म का सेहरा तुम्हारे सर नहीं....
    इस पर और मुझ पर तुम्हारा कोई हक नहीं, कोई निशाँ नहीं....
    ये नज़्म मेरी है
    और बाकी की ज़िन्दगी भी सिर्फ मेरी.......बिलकुल ठीक अब जो भी है सिर्फ अपना है उसे पर किसी का कोई हक़ नहीं फिर वो चाहे गम हो या खुशी नज़म हो या गजल गीत हो या अभिव्यक्ति... :)

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  5. जिंदगी जीने का अलहदा फलसफा . बढ़िया .

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  6. जिंदगी जीने का अलहदा फलसफा . बढ़िया .

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  7. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  8. क्या बिम्ब है... बहुत ही बढ़िया. . और एक आक्रोश भी.
    अच्छी लगी नज़्म.

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  9. पुरानी हर नज़्म की तरह इस नज़्म का सेहरा तुम्हारे सर नहीं....
    इस पर और मुझ पर तुम्हारा कोई हक नहीं, कोई निशाँ नहीं....
    ये नज़्म मेरी है
    और बाकी की ज़िन्दगी भी सिर्फ मेरी.......

    बेहद खूबसूरत नज्म, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  10. मेरी नज़्म -- बहुत खूबसूरत।

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  11. बहुत खूब..........एक बेहतरीन रचना

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  12. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन जनसंख्या विस्फोट से लड़ता विश्व जनसंख्या दिवस - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  13. बहुत ही खुबसूरत नज़्म

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  14. मिटाने को दर्द की सभी सिलवटें
    फेर दी बेरुखी की गर्म इस्त्री उस नज़्म पर...अरे क्या बात कह दी अनु..बहुत सुन्दर..

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  15. दर्द की सिलवटें
    हटती नहीं हैं
    भले ही फेर दो तुम
    बेरुखी की गर्म इस्त्री
    न मानों कि इस नज़्म का सेहरा
    उसके ऊपर नहीं है
    पर उसके कहे लफ्जों पर ही तो
    बुन डाली है ये नज़्म .....

    बहुत सुंदर और मन के आक्रोश को व्यक्त करती नज़्म

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  16. तुम ऐसे पत्थर तो न थे...

    नज्म से रीसते मेरे आँसुओं को एक नजर तो डाला होता ।
    :)
    बहुत ही सुन्दर भाव!

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  17. मिटाने को दर्द की सभी सिलवटें
    फेर दी बेरुखी की गर्म इस्त्री उस नज़्म पर...

    कहाँ से लाती हैं आप ये बेहतरीन शब्द...बेहद प्रभावी।।।

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  18. वाह !!! बहुत उम्दा लाजबाब प्रस्तुति,,,

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  19. जुलाई की तेज़ बारिश में
    कि नज़्म अब तरोताज़ा है मिट्टी और घास की महक लिए...
    उसे निचोड़ा कस कर
    कि रह न जाए एक भी रिसता एहसास बाकी...

    बहुत सुंदर , शुभकामनाये

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  20. शानदार...एज युज्वल!

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  21. चलो इक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों .....:))

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  22. simply beautiful..
    the beauty and depth in your words are magnificent :)

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  23. bahut shandaar...... mam bahut hi sundar rachna...........

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  24. आक्रोश भरी सुन्दर अभिव्यक्ति !
    latest post केदारनाथ में प्रलय (२)

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  25. जब जज्बात चोट खाते हैं तो कुछ ऐसे ही नज्म बनते हैं
    लाजवाब
    साभार !

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  26. जुलाई की तेज़ बारिश में
    कि नज़्म अब तरोताज़ा है मिट्टी और घास की महक लिए...
    उसे निचोड़ा कस कर
    कि रह न जाए एक भी रिसता एहसास बाकी............. awesome..

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  27. दर्द से रिश्ता तोड़ लिया ….
    नाज़ुक सी नज़्म ..... बहुत सुंदर

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  28. बहुत ख़ूबसूरत अहसास...

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  29. नज़्म यहीं कहीं घूमती-फिरती मिलती है... अपने ही आस-पास... है ना अनु!
    <3

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  30. पुरानी हर नज़्म की तरह इस नज़्म का सेहरा तुम्हारे सर नहीं....
    इस पर और मुझ पर तुम्हारा कोई हक नहीं, कोई निशाँ नहीं....
    ये नज़्म मेरी है
    और बाकी की ज़िन्दगी भी सिर्फ मेरी.......

    आपकी हर रचना संग्रहणीय होती अनु जी

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  31. वाह, बहुत उम्दा

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  32. बहुत प्यारी नज्म है...इस पर और मुझ पर तुम्हारा कोई हक नहीं, कोई निशाँ नहीं....
    ये नज़्म मेरी है
    और बाकी की ज़िन्दगी भी सिर्फ मेरी....... वाह बहुत सुन्दर

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  33. बहुत ही बढ़िया नज़्म.....

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  34. नूतन प्रतीकों का सराहनीय प्रयोग, वाह !!!!!!!

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  35. नूतन प्रतीकों का सराहनीय प्रयोग, वाह !!!!!!!

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  36. सिमट गए जब
    तुम्हारे कहे लफ्ज़ मेरे ज़ेहन में
    तब दर्द की एक नज़्म फूटी..
    तेरी खुशबु से महकती इस नज़्म को
    धो डाला मैंने
    जुलाई की तेज़ बारिश में---------

    नयी अनुभूतियों का बहुत सुंदर प्रयोग
    बेहतरीन शिल्प
    उत्कृष्ट रचना

    सादर

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  37. अनु दी
    नमस्ते !

    क्या नज़्म लिखी है आपने !! हमेशा की तरह लाजवाब !!

    नई पोस्ट
    तेरी ज़रूरत है !!

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  38. एक रिसता अहसास...बहुत खूब!

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  39. Beautiful. Such reads make your day!

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  40. कोमल अहसास लिए भावपूर्ण रचना...

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  41. अपनी सत्ता के घमंड में,मेधा का अपमान न करना !
    हमने अक्सर,ब्रूटस द्वारा, घर में ,सीज़र मरते देखे !

    मंगल कामनाएं अनु !!

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  42. दर्द की एक नज़्म फूटी..
    तेरी खुशबु से महकती इस नज़्म को
    धो डाला मैंने
    जुलाई की तेज़ बारिश में
    कि नज़्म अब तरोताज़ा है मिट्टी और घास की महक लिए...:)

    !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!......!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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  43. गहन दर्द भरी अभिव्यक्ति ....

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  44. bahut hi sundar khyaalo ko bahut hi sundar vastra odha deti hain aap ... makhmali si lagti lagti hai bhale hi kitna bhi dard samete ho apne andar aapki najm ... kyuki dard se bhari najmo ko july ki tej baarish bhi kahan dho paati hai!!! badhai

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  45. फेर दी बेरुखी की गर्म इस्त्री उस नज़्म पर
    पुरानी हर नज़्म की तरह इस नज़्म का सेहरा तुम्हारे सर नहीं....
    इस पर और मुझ पर तुम्हारा कोई हक नहीं, कोई निशाँ नहीं....
    ये नज़्म मेरी है
    और बाकी की ज़िन्दगी भी सिर्फ मेरी.......
    अब सिर्फ और सिर्फ खालिस यह नज्म मेरी है ...
    वाकई बढ़िया रचना है अनु ,

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  46. अनु जी : आ..ह.....!! अनु द मेजिशीयन इज बेक....!! इस रचना में घरगुती रोजाना टास्क के हवाले अहसास के दौर को बयाँ करने का फॉर्म तो अनन्य है ही...पर एक और बात जो उत् स्फूर्त होती है और भाती है वो है स्वत्व... बहुत बहुत बधाई....

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