प्रेम में होने का अर्थ.....

मैं प्रेम में हूँ
इसका सीधा अर्थ है
मैं नहीं हूँ
कहीं और.

प्रेम स्वार्थी होता है
ये दीवारें खड़ी करता है
प्रेमियों और शेष दुनिया के बीच
और जब ये नहीं होता है
तब ये दीवार गिरती नहीं
बस,सरक कर
आ जाती है
दोनों प्रेमियों के बीच.


मैं प्रेम में हूँ
इसका अर्थ है
मैं उड़ रहा हूँ...

प्रेम पंख देता है
प्रेमी पतंग हो जाते हैं.
और जब ये नहीं रहता
तब लड़ जातें हैं पेंच...
कट जाती हैं पतंगें
आपस में ही उलझ कर.

मैं प्रेम में हूँ .....इसके कई अर्थ है.....और सभी निरर्थक.....
अनु


Comments

  1. मैं प्रेम में हूँ .....इसके कई अर्थ है.....और सभी निरर्थक.....

    सच है 'प्रेम में होना' पल भर में सार्थक बना देता है तो कभी निरर्थक. बहुत अच्छी रचना, बधाई.

    ReplyDelete
    Replies
    1. bahut acche rang anu ji , pre, tyag hai , samahit nahi hota par ek dor sadaiv judi rahatai hai prem ki

      Delete
  2. kya baat hai aaj prem ka ye rup mila padhne ko anu ji lekin to prem se pareshan ho gayi hu kyonki meri khidki ke baahar ek premi apni premika se itna baat karta ki meri nind haram ho gayi hai . shayad uske sir par vasant puri tarah sawar hai aur vo abhi bhi meri khidki ke baahar maujud hai

    ReplyDelete
    Replies
    1. संध्या जी...
      प्रेम दीवारें खड़ी करता है
      प्रेमियों और शेष दुनिया के बीच...
      उस प्रेमी युगल को आपके होने का भान ही नहीं होगा...माफ़ कर दीजिये उन्हें...जल्द ही वो पतंग बनेंगे...और आपकी समस्या हल होगी :-)

      Delete
  3. मैं प्रेम में हूँ
    इसका अर्थ है
    मैं उड़ रहा हूँ...........के बजाय आपने (मैं उड़ रही हूँ) क्‍यों नहीं लिखा? क्‍या आप पुरुष बन कर प्रेम महसूस कर रहे हैं?

    ..............वैसे गूढ़ दर्शन समेटे हुए है आपकी कविता। पंख, पंतग, पेंच और अन्‍त में उलझाव.....वास्‍तविक रुप में क्‍या यही है प्रेम?

    ReplyDelete
    Replies
    1. प्रेमी का मन उड़ रहा है....यहाँ मन के लिए "रहा" शब्द लिखा है...और प्रेम के अर्थ पुरुष और स्त्री के भिन्न कहाँ....

      Delete
    2. पुष्टि करने के लिए धन्‍यवाद।

      Delete
  4. मैं प्रेम में ज़रूर हूँ ...पर परिस्थितियों के वश में हूँ......वह परिस्थितियाँ जो मेरे प्रेम का हश्र तै करती हैं ..इसीलिए मेरा प्रेम में होना न होना निरर्थक है ....बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति अनु

    ReplyDelete
  5. प्रेम,बुखार है

    चढ़ता है,कभी उतरता है

    कभी नफरत ,कभी परहेज है।
    latestpost पिंजड़े की पंछी

    ReplyDelete
  6. बस,सरक कर
    आ जाती है
    दोनों प्रेमियों के बीच.
    ----------------------------
    प्रेम के नए फ्रेम...बढ़िया लगा
    बधाई आपको ...

    ReplyDelete
  7. बढ़िया है प्रेम-
    आभार आदरेया ||

    ReplyDelete
  8. प्रेम की बहुत ही सुन्दर विवेचना,सुन्दर कविता.

    ReplyDelete
  9. प्रेम की सटीक व्याख्या, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

    ReplyDelete
  10. और जब ये नहीं होता है
    तब ये दीवार गिरती नहीं
    बस,सरक कर
    आ जाती है
    दोनों प्रेमियों के बीच.

    सच्ची बात ...

    ReplyDelete
  11. प्रेम क्या है क्या नहीं ...प्रेमी ही जाने :)

    ReplyDelete
  12. प्रेम ही प्रेम को प्रेम बनाता है …………बहुत सुन्दर भाव संजोये हैं।

    ReplyDelete

  13. मैं प्रेम में हूँ
    इसका अर्थ है
    मैं उड़ रहा हूँ...

    बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना

    Recent Post दिन हौले-हौले ढलता है,

    ReplyDelete
  14. रोचक विश्लेषण अनु... :-)

    ~प्रेम में होना...
    एक ऐसी सुखद अनुभूति ...
    जिसमें प्रेम करने वाले के भीतर
    खुद एक दीवार खड़ी हो जाती है..
    वो अपने आप को भी भूल जाता है...~
    ऐसा हमें लगता है.. :-)
    <3

    ReplyDelete
  15. जय हो ... प्रेम मे तो होना ही चाहिए ... बहुत जरूरी है ज़िन्दगी मे !


    आज की ब्लॉग बुलेटिन १९ फरवरी, २ महान हस्तियाँ और कुछ ब्लॉग पोस्टें - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  16. Superb Anulata, the one who loves knows what is and what is not, being and not being, one or a separate entity, but still..... love remains.

    ReplyDelete
  17. Ye halki patang hi hai..
    Jo do Premiyon ko uda rahi hai...
    Dar lagta hai Anu ji...
    Kahi ye patang kat n jaaye...

    ReplyDelete
  18. वाह, प्रेम क्या है ये अब जाना . बढ़िया

    ReplyDelete
  19. प्रेम में होने का सीधा सा अर्थ है, प्रेम करने वाले पर उस परम पिता परमेश्वर की महती कृपा है ।

    ReplyDelete
  20. प्रेम है ही इतना ज़टिल कि समझ में आना मुश्किल है।

    ReplyDelete
  21. प्रेम सिर्फ एक स्वप्नलोक है जहाँ कुछ समय यथार्थ की दुनिया से दूर सब कुछ अच्छा लगता है पर अन्त में सब निरर्थक । बहुत अच्छी कविता अनु जी ।

    ReplyDelete
  22. प्रेम पंख देता है
    प्रेमी पतंग हो जाते हैं.
    और जब ये नहीं रहता
    तब लड़ जातें हैं पेंच...
    कट जाती हैं पतंगें
    आपस में ही उलझ कर.
    बिलकुल सही कहा है आपने अनुजी... बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  23. बहुत सुंदर..... भावपूर्ण अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  24. 'मैं प्रेम में हूँ' सिर्फ ये अहसास बहुत है :)

    ReplyDelete
  25. जो प्रेम में है , उसके लिए अर्थ क्या , निरर्थक क्या ...
    अच्छी कविता!

    ReplyDelete
  26. प्रेम में जो है ... वह मात्र प्रेम है और कुछ नहीं- कहीं नहीं

    ReplyDelete
  27. मैं प्रेम में हूँ .....इसके कई अर्थ है.....और सभी निरर्थक.....

    बहुत बढि़या, प्रेम अहसास (भाव) - कुछ विचारों की पुनरावृत्ति (अहसास), जो वि-िभन्न प्रेमियों के विचारों में उभयनिष्ठ विचारों का संग्रह हैं ।

    ReplyDelete
  28. मैं प्रेम में हूँ .....इसके कई अर्थ है.....और सभी निरर्थक.....
    philosophical yet romantic :)

    ReplyDelete
  29. kya baat kahi hai ....
    मैं प्रेम में हूँ .....इसके कई अर्थ है.....और सभी निरर्थक....
    superb..

    ReplyDelete
  30. मैं प्रेम में हूँ .....इसके कई अर्थ है.....और सभी निरर्थक....

    भाव पूर्ण अभिव्यक्ति अनु ........

    ReplyDelete
  31. प्रेम में होना ही सब कुछ है ... बाकी सब तो ओने आप ही होता है ...
    भावपूर्ण ...

    ReplyDelete
  32. प्रेम में रहना कभी निरर्थक नहीं हो सकता
    प्रेम रहे न रहे , ज़िन्दगी को एक अर्थ दे जाता है।
    सुन्दर कविता

    ReplyDelete
  33. प्रेम को नए अर्थ प्रदान करती सुन्दर कविता!

    ReplyDelete
  34. बहुत सुंदर रचना...
    प्रेम में होने को बहुत अच्छे से परिभाषित किया है...
    मानो तो अर्थ ही अर्थ...नहीं तो सब निरर्थक|
    सस्नेह

    ReplyDelete
  35. वाह वाह प्रेम और प्रेमियों की पतंगी पेंच मजेदार लगा.

    बधाई अनु जी.

    ReplyDelete
  36. प्रेम की उपस्थिति ही कुछ ऐसी होती है ...
    उम्दा लाजवाब ...
    सादर !

    ReplyDelete
  37. प्रेमी पतंग हो जाते हैं सचमुच रहिमन धागा प्रेम का पंक्तियाँ याद आती हैं... सुंदर कविता

    ReplyDelete
  38. मैं प्रेम में हूँ .....इसके कई अर्थ है.....और सभी निरर्थक.....
    सही कहा है अनु ,.....बस एक ही सार्थक है प्रेम अंत में मुक्त कर देता है !

    ReplyDelete
  39. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...

    ReplyDelete
  40. प्रेम में होना .... इसकी यही तो सार्थकता है
    आभार

    ReplyDelete
  41. प्रेम स्वार्थी होता है
    ये दीवारें खड़ी करता है
    प्रेमियों और शेष दुनिया के बीच
    और जब ये नहीं होता है
    तब ये दीवार गिरती नहीं
    बस,सरक कर
    आ जाती है
    दोनों प्रेमियों के बीच.


    आपकी रचनाएं कई बार मेरे कई प्रश्नों का जबाब दे जाती हैं...सुंदर प्रस्तुति।।।

    ReplyDelete
  42. anu ji aapki hausla afzayee ka... aabhar ,avm prem ke anek roopon ki sashkt abhivykti ki badhayee...sunder rchna

    ReplyDelete
  43. Love is such a complex feeling but love it is...

    Beautiful verse!

    ReplyDelete
  44. जब हम प्रेम में होते हैं, तो बस प्रेम में होते हैं, उसके कोई अन्य अर्थ ढूंढ़ने की कोशिश ही न किया जाए तो बेहतर है।

    ReplyDelete
  45. भाव पूर्ण सुंदर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  46. सुन्दर प्रस्तुति
    प्रेम रस जिसने पिया मन मंदिर सा होए
    सर्व जगत का स्वामी, फिर काहे का रोये.
    सादर
    नीरज'नीर'

    ReplyDelete
  47. मैं प्रेम में हूँ .....इसके कई अर्थ है.....और सभी निरर्थक.....

    अच्छी कविता अनु जी !..................

    ReplyDelete
  48. bahut badhiya prem ke wivin roopon ki badi acchi wyaakhya .....sundar rachna ...

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

प्रेमपत्र

मेरी लिखी कहानी "स्नेहा" - 92.7 big fm पर नीलेश मिश्रा की जादुई आवाज़ में................

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में मेरी किताब "इश्क तुम्हें हो जाएगा " की समीक्षा...............