इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Sunday, January 13, 2013

दुआ

प्रेम में
रख दिये थे उसने
दो तारे मेरी हथेली पर
और कस ली थी मैंने
अपनी मुट्ठियाँ....
भींच रखे थे तारे
तब भी ,जब न वो पास था न प्रेम....
जुदाई के बरसों बरस
उसकी  निशानी मान कर.

तब  कहाँ जानती थी
कि मुरादों के पूरा होने की दुआ
हथेलियाँ खोल कर
टूटते तारों से मांगनी होगी...
मगर
उस  आखरी निशानी की कुर्बानी
मुझे मंज़ूर नहीं थी,
किसी कीमत पर नहीं.....
मेरी लहुलुहान हथेलियों ने
अब भी समेट रखे हैं
वो दो नुकीले तारे...
अनु

47 comments:

  1. मेरी लहुलुहान हथेलियों ने
    अब भी समेट रखे हैं
    वो दो ....
    ------------------------
    बेहद ही सुन्दर

    ReplyDelete
  2. तब कहाँ जानती थी
    कि मुरादों के पूरा होने की दुआ
    हथेलियाँ खोल कर
    टूटते तारों से मांगनी होगी...बहुत उम्दा अभिव्यक्ति,,,

    recent post : जन-जन का सहयोग चाहिए...

    ReplyDelete
  3. असमंजस की स्थिति!

    --
    थर्टीन रेज़ोल्युशंस

    ReplyDelete
  4. पुराने प्रेम की निशानी कहाँ छूट पाती है। फिर चाहे हाथ दुखे या दिल लहू लुहान हो। यादों को झंझोड़ती सुन्दर रचना।

    ReplyDelete
  5. हाथों में बंद अगर उसकी निशानी साथ है... तो हर दुआ क़ुबूल हुई...
    <3

    ReplyDelete
  6. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 16/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

    ReplyDelete
  7. मुरादों के पूरा होने की दुआ
    हथेलियाँ खोल कर
    टूटते तारों से मांगनी होगी...
    बहुत सुन्दर , शुरुआत से अंत तक |

    सादर

    ReplyDelete
  8. मन के मन के भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

    ReplyDelete
  9. बहुत खूबसूरत रचना

    ReplyDelete
  10. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति सोमवार के चर्चा मंच पर ।। मंगल मंगल मकरसंक्रांति ।।

    ReplyDelete
  11. तब कहाँ जानती थी
    कि मुरादों के पूरा होने की दुआ
    हथेलियों को खोल कर
    टूटते तारों से माँगनी होगी ....
    नाजुक सी , खूबसूरत दर्द भरी रचना है आपकी , जो हौले से मन को छू गई .....आभार .

    ReplyDelete
  12. ...बंद मुठ्ठी में आपका भरोसा है उसे मत खोलना !

    ReplyDelete
  13. दुआओं से क्या मिलता?
    तारे भी छूट जाते
    तारे हैं
    मुट्ठी लहुलुहान हैं तो क्या!
    सितारे हैं
    और उम्मीद भी
    कि दुआ मांगी जा सकती है।

    ReplyDelete
  14. दर्द भी सहेजा जाता है .......गहरी अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  15. बहुत ही भावपूर्ण दिल को छू लेनेवाली रचना....
    :-)

    ReplyDelete

  16. बहुत ही मार्मिक, सुन्दर भावपूर्ण रचना ....
    लोहड़ी व मकरसंक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएँ !
    सादर !

    ReplyDelete
  17. मेरी लहुलुहान हथेलियों ने
    अब भी समेट रखे हैं
    वो दो नुकीले तारे...

    कभी कभी पीड़ा से भी लगाव हो जाता है।

    ReplyDelete
  18. कुछ दर्द भी बहुत अनमोल होते हैं ...लोहिड़ी व मकर संक्रांति पर्व की ढेरों शुभकामनाएँ

    ReplyDelete
  19. बहुत सुन्दर और भाव प्रबल है .

    ReplyDelete
  20. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    मकर संक्रान्ति के अवसर पर
    उत्तरायणी की बहुत-बहुत बधाई!

    ReplyDelete
  21. Very beautifully expressed.Have a great Pongal & Sankranti Anu Ji. Hope your dad is well & fine. Give him my regards.

    ReplyDelete
  22. मुरादों के पूरा होने की दुआ
    हथेलियाँ खोल कर
    टूटते तारों से मांगनी होगी....
    बहुत खूबसूरत। मकर सक्रांति की शुभकामनायें

    ReplyDelete
  23. तारे
    जो बंद हैं
    मुट्ठी में
    एक आस है कि
    कभी मांगी दुआ
    तो ज़रूर पूरी होगी ।

    बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  24. वाह बहुत सुन्दर भाव हैं इस रचना के ...सुन्दर पंक्तियाँ बुनी है अनु :)

    ReplyDelete
  25. दुआओं का एक रंग ... ये भी आपकी कलम से नि:शब्‍द कर गया
    सादर

    ReplyDelete
  26. ग़ालिब साहब ने कहा है...
    कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे नीमकश को,
    वो खलिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता!
    /
    यादों को समेटने का यह तरीका भी बेहतर है, जो चुभन याद दिलाए वो टूटन कहाँ... !!

    ReplyDelete
  27. तारा टूटने और तारों को जकड़ने के बीच सुंदर तार जोड़े हैं.

    ReplyDelete
  28. दिल को छूती बहुत सुन्दर रचना...

    ReplyDelete

  29. मन की गहन पीड़ा की बड़ी सशक्त अभिव्यक्ति हुई है इस रचना में विछोह का दर्द उभरा है यादों के समुन्दर की ओट लेके .

    ReplyDelete
  30. 'तब कहाँ जानती थी...!'
    बड़ी ही सूक्ष्म, गहन अनुभूति।
    बेहद सुन्दर रचना अनु दी।
    सादर
    मधुरेश

    ReplyDelete
  31. बहुत सुंदर रचना॥

    ReplyDelete
  32. मेरी लहुलुहान हथेलियों ने
    अब भी समेट रखे हैं
    वो दो नुकीले तारे...
    सुन्दर रचना !

    ReplyDelete
  33. तब कहाँ जानती थी
    कि मुरादों के पूरा होने की दुआ
    हथेलियाँ खोल कर
    टूटते तारों से मांगनी होगी
    बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ . सुंदर प्रस्तुति
    वाह .बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  34. बहुत ही भावपूर्ण प्रस्तुति..अनु...

    ReplyDelete
  35. तब कहाँ जानती थी
    कि मुरादों के पूरा होने की दुआ
    हथेलियों को खोल कर
    टूटते तारों से माँगनी होगी ....
    बहुत सुन्दर!
    आपकी कलम दिल को छूती है। यह कला सबमें नहीं होती। आपको ईश्वर ने दी है।

    ReplyDelete
  36. सच है प्रेम को भूलना आसान नहीं ... फिर निशानी ही तो याद होती है जाने के बाद ... उसे छोड़ के दुआ भी क्या मांगे पाएंगे ...

    ReplyDelete
  37. prem ki gahrayi ka yatharthpurn chitran...
    और कस ली थी मैंने
    अपनी मुट्ठियाँ....
    भींच रखे थे तारे
    तब भी ,जब न वो पास था न प्रेम....

    ReplyDelete
  38. प्रारम्भ से ही कविता मन को मोह लेती है |रम्य कविता |

    ReplyDelete
  39. हथेलियाँ खोल कर
    टूटते तारों से मांगनी होगी....
    बहुत खूबसूरत। मकर सक्रांति की शुभकामनायें !!!

    ReplyDelete
  40. जो था,जो होगा
    प्रेम में ही
    थी मैं,था वह
    प्रेम से ही!

    ReplyDelete
  41. :) :)
    वैसे ये तो फेसबुक पर पढ़ चुके थे, यहाँ फिर से पढ़ लिए :)

    ReplyDelete

नए पुराने मौसम

मौसम अपने संक्रमण काल में है|धीरे धीरे बादलों में पानी जमा हो रहा है पर बरसने को तैयार नहीं...शायद उनकी आसमान से यारी छूट नहीं रही ! मोह...