दुआ

प्रेम में
रख दिये थे उसने
दो तारे मेरी हथेली पर
और कस ली थी मैंने
अपनी मुट्ठियाँ....
भींच रखे थे तारे
तब भी ,जब न वो पास था न प्रेम....
जुदाई के बरसों बरस
उसकी  निशानी मान कर.

तब  कहाँ जानती थी
कि मुरादों के पूरा होने की दुआ
हथेलियाँ खोल कर
टूटते तारों से मांगनी होगी...
मगर
उस  आखरी निशानी की कुर्बानी
मुझे मंज़ूर नहीं थी,
किसी कीमत पर नहीं.....
मेरी लहुलुहान हथेलियों ने
अब भी समेट रखे हैं
वो दो नुकीले तारे...
अनु

Comments

  1. मेरी लहुलुहान हथेलियों ने
    अब भी समेट रखे हैं
    वो दो ....
    ------------------------
    बेहद ही सुन्दर

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  2. तब कहाँ जानती थी
    कि मुरादों के पूरा होने की दुआ
    हथेलियाँ खोल कर
    टूटते तारों से मांगनी होगी...बहुत उम्दा अभिव्यक्ति,,,

    recent post : जन-जन का सहयोग चाहिए...

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  3. असमंजस की स्थिति!

    --
    थर्टीन रेज़ोल्युशंस

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  4. पुराने प्रेम की निशानी कहाँ छूट पाती है। फिर चाहे हाथ दुखे या दिल लहू लुहान हो। यादों को झंझोड़ती सुन्दर रचना।

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  5. हाथों में बंद अगर उसकी निशानी साथ है... तो हर दुआ क़ुबूल हुई...
    <3

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  6. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 16/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  7. मुरादों के पूरा होने की दुआ
    हथेलियाँ खोल कर
    टूटते तारों से मांगनी होगी...
    बहुत सुन्दर , शुरुआत से अंत तक |

    सादर

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  8. मन के मन के भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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  9. बहुत खूबसूरत रचना

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  10. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति सोमवार के चर्चा मंच पर ।। मंगल मंगल मकरसंक्रांति ।।

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  11. तब कहाँ जानती थी
    कि मुरादों के पूरा होने की दुआ
    हथेलियों को खोल कर
    टूटते तारों से माँगनी होगी ....
    नाजुक सी , खूबसूरत दर्द भरी रचना है आपकी , जो हौले से मन को छू गई .....आभार .

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  12. ...बंद मुठ्ठी में आपका भरोसा है उसे मत खोलना !

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  13. दुआओं से क्या मिलता?
    तारे भी छूट जाते
    तारे हैं
    मुट्ठी लहुलुहान हैं तो क्या!
    सितारे हैं
    और उम्मीद भी
    कि दुआ मांगी जा सकती है।

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  14. दर्द भी सहेजा जाता है .......गहरी अभिव्यक्ति

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  15. बहुत ही भावपूर्ण दिल को छू लेनेवाली रचना....
    :-)

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  16. बहुत ही मार्मिक, सुन्दर भावपूर्ण रचना ....
    लोहड़ी व मकरसंक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएँ !
    सादर !

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  17. मेरी लहुलुहान हथेलियों ने
    अब भी समेट रखे हैं
    वो दो नुकीले तारे...

    कभी कभी पीड़ा से भी लगाव हो जाता है।

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  18. कुछ दर्द भी बहुत अनमोल होते हैं ...लोहिड़ी व मकर संक्रांति पर्व की ढेरों शुभकामनाएँ

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  19. बहुत सुन्दर और भाव प्रबल है .

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  20. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    मकर संक्रान्ति के अवसर पर
    उत्तरायणी की बहुत-बहुत बधाई!

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  21. Very beautifully expressed.Have a great Pongal & Sankranti Anu Ji. Hope your dad is well & fine. Give him my regards.

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  22. मुरादों के पूरा होने की दुआ
    हथेलियाँ खोल कर
    टूटते तारों से मांगनी होगी....
    बहुत खूबसूरत। मकर सक्रांति की शुभकामनायें

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  23. तारे
    जो बंद हैं
    मुट्ठी में
    एक आस है कि
    कभी मांगी दुआ
    तो ज़रूर पूरी होगी ।

    बहुत सुंदर

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  24. वाह बहुत सुन्दर भाव हैं इस रचना के ...सुन्दर पंक्तियाँ बुनी है अनु :)

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  25. दुआओं का एक रंग ... ये भी आपकी कलम से नि:शब्‍द कर गया
    सादर

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  26. बहुत बढ़िया दीदी

    सादर

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  27. ग़ालिब साहब ने कहा है...
    कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे नीमकश को,
    वो खलिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता!
    /
    यादों को समेटने का यह तरीका भी बेहतर है, जो चुभन याद दिलाए वो टूटन कहाँ... !!

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  28. तारा टूटने और तारों को जकड़ने के बीच सुंदर तार जोड़े हैं.

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  29. दिल को छूती बहुत सुन्दर रचना...

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  30. मन की गहन पीड़ा की बड़ी सशक्त अभिव्यक्ति हुई है इस रचना में विछोह का दर्द उभरा है यादों के समुन्दर की ओट लेके .

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  31. 'तब कहाँ जानती थी...!'
    बड़ी ही सूक्ष्म, गहन अनुभूति।
    बेहद सुन्दर रचना अनु दी।
    सादर
    मधुरेश

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  32. बहुत सुंदर रचना॥

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  33. मेरी लहुलुहान हथेलियों ने
    अब भी समेट रखे हैं
    वो दो नुकीले तारे...
    सुन्दर रचना !

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  34. तब कहाँ जानती थी
    कि मुरादों के पूरा होने की दुआ
    हथेलियाँ खोल कर
    टूटते तारों से मांगनी होगी
    बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ . सुंदर प्रस्तुति
    वाह .बहुत सुन्दर

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  35. बहुत ही भावपूर्ण प्रस्तुति..अनु...

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  36. तब कहाँ जानती थी
    कि मुरादों के पूरा होने की दुआ
    हथेलियों को खोल कर
    टूटते तारों से माँगनी होगी ....
    बहुत सुन्दर!
    आपकी कलम दिल को छूती है। यह कला सबमें नहीं होती। आपको ईश्वर ने दी है।

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  37. सच है प्रेम को भूलना आसान नहीं ... फिर निशानी ही तो याद होती है जाने के बाद ... उसे छोड़ के दुआ भी क्या मांगे पाएंगे ...

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  38. prem ki gahrayi ka yatharthpurn chitran...
    और कस ली थी मैंने
    अपनी मुट्ठियाँ....
    भींच रखे थे तारे
    तब भी ,जब न वो पास था न प्रेम....

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  39. प्रारम्भ से ही कविता मन को मोह लेती है |रम्य कविता |

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  40. हथेलियाँ खोल कर
    टूटते तारों से मांगनी होगी....
    बहुत खूबसूरत। मकर सक्रांति की शुभकामनायें !!!

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  41. जो था,जो होगा
    प्रेम में ही
    थी मैं,था वह
    प्रेम से ही!

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  42. :) :)
    वैसे ये तो फेसबुक पर पढ़ चुके थे, यहाँ फिर से पढ़ लिए :)

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