इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Tuesday, February 25, 2014

ओक में भर लिया था
तुम्हारा प्रेम
मैंने,
रिसता रहा बूँद-बूँद
उँगलियों की दरारों के बीच से |
बह ही जाना था उसे
प्रेम जो था !

रह गयी है नमी सी
हथेलियों पर
और एक भीनी
जानी पहचानी महक
प्रेम की |

ढांपती हूँ जब  कभी
हथेलियों से
अपना उदास चेहरा,
मुस्कुरा उठती हैं तुम्हारी स्मृतियाँ
और मैं भी !

कि लगता है
वक्त के साथ
रिस जाती हैं धीरे धीरे  
मन की दरारों से
पनीली उदासियाँ भी |
~अनुलता ~

Wednesday, February 19, 2014

~बातों बातों में प्यार हो जाएगा ~

टीना मुनीम अम्बानी कभी मेरी पसंदीदा अभिनेत्री नहीं रहीं | मगर उन पर एक आलेख लिखा | बस एक अनचाहा assignment मान कर उनके बारे में पढना शुरू किया तो लगा कि एक ठीक-ठाक सी अभिनेत्री होने के अलावा उन में कई खूबियाँ हैं .......आलेख के पूरा होते होते मुझे पसंद आने लगीं "टीना" :-) पढ़िए "आधी आबादी" पत्रिका में प्रकाशित मेरा आलेख !

~बातों बातों में प्यार हो जाएगा ~ 

मैं एक गृहणी हूँ, अस्पताल चलाती हूँ, और बहुत सारे सामाजिक कार्य करती हूँ...मेरा रिलायंस ADA ग्रुप से कोई सम्बन्ध नहीं, आप कभी आयें और देखिये कि हम कितने सारे सामाजिक दायित्वों को निभाते हैं| ये शब्द थे टीना मुनीम अम्बानी के,जब उन्हें 2G स्कैम के बाद अदालत में पेश किया गया और इसमें हैरानी की कोई बात नहीं कि माननीय अदालत ने उन्हें बिना किसी और पूछताछ के, बल्कि एक मुस्कराहट के साथ जाने की इजाज़त दे दी | उनके खूबसूरत व्यक्तित्व के आकर्षण से आखिर कोई भी अछूता कैसे रह सकता है |
आज आपको मिलवाती हूँ फिल्म इंडस्ट्री की बेहद खूबसूरत और आत्मविश्वासी नायिका से जिन्होंने अभिनय से इतर भी जीवन में कई मकाम हासिल किये और एक बेहद सार्थक जीवन की मिसाल पेश की|
1975 में एक अंतर्राष्ट्रीय सौन्दर्य प्रतियोगिता में जीत हासिल करने के बाद देवानंद साहब की नज़र उन पर पड़ी और “देस-परदेस” फिल्म से 1978 में टीना ने फिल्म जगत में अपना पहला कदम रखा | टीना एक ऐसे गुजराती परिवार थीं जिसका फिल्मों से दूर तक कोई नाता न था और न ही वो  खुद फिल्मों में दिलचस्पी रखती थीं, बल्कि पेड़ों के आस-पास चक्कर लगाते गाने गाना उन्हें खुद हास्यास्पद लगता था| मगर देवानंद जैसे महान अभिनेता का प्रस्ताव कोई कैसे ठुकरा सकता था और फिर उनका फ़िल्मी सफ़र बड़े सुन्दर मकाम हासिल करता 1987 तक चलता रहा जब तक कि वो कॉलेज अटेंड करने कैलिफ़ोर्निया नहीं चली गयीं | इस बीच उन्होंने 30-35 फिल्मों में काम किया जिनमें संजय दत्त के साथ रॉकी सुपर हिट रही | बासु चटर्जी के साथ उन्होंने दो सुन्दर फिल्में दीं- बातों-बातों में,और मनपसंद | हालाँकि वे खुद “अधिकार” को अभिनय की दृष्टि से सबसे बेहतरीन फिल्म मानती हैं |
टीना का फ़िल्मी करियर और भी बेहतर हो सकता था अगर वे समझदारी से फिल्मों का चयन करतीं मगर वे खुद को एक महत्त्वाकांक्षी अभिनेत्री नहीं मानती हैं | वे बचपन में डिज़ाइनर बनना चाहती थीं और उन्होंने कभी अपने अभिनय के कैरियर को संजीदगी से नहीं लिया...उनके भीतर शीर्ष पर पहुँचने की कोई तमन्ना नहीं थी | टीना विद्रोही स्वभाव की औरत हैं, उन्हें एक खींची हुई लकीर पर चलना पसंद नहीं | उन्होंने बहुत छोटी उम्र में अपना घर खरीदा और उसमें परिवार से अलग रहने लगीं | बेहद स्वाभिमानी स्वभाव की टीना दावा करती हैं कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में किसी का एहसान अपने सर नहीं लिया और इस बात के लिए उन्हें स्वयं पर गर्व है |
सिमी ग्रेवाल को दिए एक साक्षात्कार में टीना कहती हैं उन्होंने अपने पूरे जीवन में कभी किसी पर कोई इलज़ाम नहीं दिया | अपने हर सही गलत फैसले की पूरी ज़िम्मेदारी वो खुद लेती हैं और उन्हें अपने किसी भी फैसले पर आज तक अफ़सोस भी नहीं हुआ |
सकारात्मक सोच से भरी टीना ने कभी भविष्य के विषय में फ़िक्र नहीं की ,उन्हें यकीन था कि सही वक्त पर सब कुछ सही होगा खुद-ब-खुद | कर्म के सिद्धांतों पर चलने वाली इस बेहद आत्मविश्वासी युवती को पता था कि आप जिस चीज़,जिस जगह के लायक हों वो आपको मिल कर ही रहेगी | इसका सीधा सबूत उनकी ज़िन्दगी ने खुद उन्हें दिया जब देश के बड़े व्यवसायी अनिल अम्बानी उन पर मोहित हुए और दोनों ने मिलना शुरू किया पर टीना का फिल्मों से जुड़ा होना उनकी राह का रोड़ा बना क्यूंकि अम्बानी एक परम्पराओं को मानने वाला रूढीवादी परिवार कहा जा सकता था | इसके बाद करीब 3-4 साल तक वे आपस में मिले नहीं| कहते हैं ज़िन्दगी दूसरा मौका नहीं देती मगर टीना और अनिल को ज़िन्दगी ने दूसरा मौका
दिया अपनी मोहब्बतों को पाने का और वे एक हुए | कैलिफोर्निया से अनिल के बुलावे पर टीना भारत लौटीं और फिर उनको अम्बानी परिवार से मिलने बुलाया गया | टीना ने तब ज़रूर गुनगुनाया होगा कि- शायद मेरी शादी का ख़याल दिल में आया है,इसीलिए मम्मी ने तेरी मुझे चाय पे बुलाया है |
बिना किसी संवाद के इस लम्बे अंतराल में टीना ने अनिल को याद ज़रूर किया मगर कभी हताश नहीं हुईं, एक यकीन उन्हें ऊर्जा देता रहा होगा शायद !
रिचर्ड बेक ने कहा है कि अपने प्रेम को स्वछंद छोड़ दें, अगर वो आपका है तो आपके पास ही रहेगा वरना वो आपका कभी था ही नहीं...
दर्द के निशाँ मिट जाते हैं प्रेम के अंकुरित होते ही,
जैसे सूखे पत्तों से अच्छादित भूमि पर कभी झरती है रात की रानी !!
सुख आकर ही रहता है, यकीन मानिए !!
एक बात टीना की जो दिल को छू जाती है वो है उनका सरल और स्पष्ट स्वभाव, कि एक हिरोइन होते हुए भी उन्होंने अम्बानी परिवार में एक संयुक्त परिवार के रूप में खुशियाँ खोजी और निबाहा भी | 1991 में जब टीना 31 वर्ष की थीं तब उन्होंने अनिल अम्बानी से विवाह किया |
टीना के भीतर का कलाकार सिर्फ़ अभिनय में ही रुचि नहीं रखता बल्कि वे चित्रकारी की तरफ भी बड़ा रुझान रखती हैं | उनकी संस्था “हारमोनी आर्ट फाउंडेशन” समय समय पर “आर्ट इवेंट” का आयोजन करती रहती हैं जिसका मकसद कलाकारों को एक बेहतर मंच देने के अलावा सामाजिक सेवा भी होता है | इन कला प्रदर्शनियों में नीलामी से एकत्रित होने वाली धन राशि का उपयोग बेघर बच्चों और बुजुर्गों को आश्रय देने में किया जाता है | कुछ समय पहले ख्याति प्राप्त पेन्टर जोगेन चौधरी के साथ टीना ने एक पेंटिंग बनाई जो 95 लाख रूपए में नीलाम हुई और सारा पैसा सामाजिक कार्यों में खर्च किया गया | यूँ तो समाज सेवा ,चंदा उगाहना हर उच्चवर्गीय/रईस लोगों का पसंदीदा शगल होता है जिसमें समाज की सेवा कम और खुद की लोकप्रियता का मकसद ज्यादा होता है,मगर टीना के प्रयासों में निष्कपटता और गंभीरता साफ़ नज़र आती है | एक बेहद ईमानदार शख्सियत हैं टीना |
टीना को फोर्ब्स मैगज़ीन ने 2008 में “वाइफ्स ऑफ़ बिलियनेयर” में शामिल किया गया जिसकी कसौटी सिर्फ धनवान आदमी से शादी करना ही नहीं था बल्कि बाहरी और भीतरी सौन्दर्य का होना,बुद्धिमति होना और सार्थक कार्यों से जुड़े रहना था और टीना इन सभी शर्तों पर खरी उतरती थीं |
जय अनमोल और जय अंशुल के अलावा टीना का तीसरी संतान है – “कोकिलाबेन धीरुभाई अस्पताल” | ऐसा कहना है उनके पति अनिल धीरूभाई अम्बानी का |
इस अस्पताल को खोलना किसी और लोकोपकारी,सामाजिक कार्य की तरह आसान न था पर टीना के दृढ़ इरादों ने इसे सार्थक कर दिखाया | ये उनके दिवंगर श्वसुर धीरुभाई अम्बानी का सपना था जो उनके जीते जी पूर्ण न हो सका था | टीना अस्पताल में हर चीज़ का व्यक्तिगत रूप से ख्याल रखती हैं| चाहे वो कर्मचारियों पर नज़र रखना हो, दवाइयां, उपकरण,साफ़ सफाई से लेकर टिश्यू पेपर और साबुन तक का ध्यान उन्हें रहता है | ये अस्पताल उनके लिए व्यवसाय नहीं बल्कि मानवता की सेवा है |
इसी तरह “हारमोनी फॉर सिल्वर फाउंडेशन” रिलायंस ग्रुप द्वारा 2004 में स्थापित एक संस्था है जो बेघर,बेसहारा बुजुर्गों के लिए काम करती हैं | ये संस्था एक मासिक पत्रिका “हारमोनी” भी निकालती है जिसमें टीना अपना भरपूर योगदान देती हैं |
टीना के फ़िल्मी जीवन में बेशक उनके सम्बन्ध अभिनेताओं से जोड़े गए,ख़ास तौर पर राजेश खन्ना के साथ | पर विवाह के पश्चात टीना अम्बानी परिवार की बेहतरीन बहु, अच्छी पत्नी और माँ  साबित हुईं हैं | टीना एक सख्त माँ हैं, वे अपने बच्चों के दोस्तों से और उनके माता-पिता से बात करती रहती हैं, वे किस वक्त कहाँ हैं ये उन्हें पता होता है, और वे बच्चों को एक एक पैसे की कीमत से अवगत कराती रहती है जबकि टीना बार बार अपने साक्षात्कारों में ये कहती रही हैं कि उनके पति अनिल ने उन्हें आज तक किसी भी चीज़ के लिए मना नहीं किया और ऐसा कुछ भी नहीं उनके जीवन में जो वे पाना चाहती हों और पा न सकी हों | परियों की कथा सी है टीना की कहानी....सब कुछ सुनहरा...चमचमाता...चमत्कारी !!
टीना मुंबई की चमक-धमक से दूर रहना पसंद करती हैं, “शोभा डे” की पत्रिका “हेल्लो” के अप्रेल 2012 के संस्करण में टीना फिर लम्बे अंतराल के बाद कवर पेज पर दिखीं | इसी पत्रिका के लिए दिए एक साक्षात्कार में टीना ने शोभा डे को बताया कि आम सोशलाइट औरतों की तरह वे ब्रांडेड कपड़ों, ब्यूटी पार्लरों में अपना अपना वक्त ज़ाया नहीं करतीं,वे जब ज़रुरत पड़े कमर्शियल फ्लाइट का इस्तेमाल करती हैं, पति के चार्टर्ड प्लेन के होते हुए भी | बाहरी दिखावे से परे टीना के भीतर गज़ब का आत्मविश्वास है जो उन्हें सबसे अलग ,सबसे बेहतर बनाता है | भारत के सबसे रईस खानदान के होते हुए भी अपने पांव ज़मीन पर टिकाये रखना सबके बस की बात नहीं | मेरे कहने का ये कतई मतलब नहीं कि टीना ऐशोआराम की ज़िन्दगी नहीं जी रहीं, उनके पास वो सब कुछ है जो वे ख्वाब में भी पाना चाहती थीं | उनको अनिल अम्बानी ने एक 84 मिलियन डॉलर का शानदार “याट“ तोहफे में दिया जिसको उन्होंने नाम दिया “टियान” | इसे हम आप फिजूलखर्ची या दिखावा मानते हों तो मानते रहें |
वैसे टीना अम्बानी रिलायंस एंटरटेनमेंट, ड्रीम वर्क्स और आई.एम.ग्लोबल के ज़रिये अपनी जड़ें जो फिल्म इंडस्ट्री में दबी हैं,को सहारा दे रही हैं | इन फेस्टिवल्स के द्वारा ये फ़िल्मी दुनिया से जुड़े लोगों को सहयोग दे रही हैं और फिल्म उद्योग को अपना सहयोग और सलामी भी | अम्बानी के ड्रीम वर्क्स की वजह से अनिल और टीना को ऑस्कर समारोह के रेड कार्पेट में शिरकत करने का सुअवसर मिला वो भी स्टीवन स्पीलबर्ग के साथ | देस-परदेस से ऑस्कर तक का सफ़र टीना ने बेरोक टोक तय किया और हर मुकाम पर अपनी पहचान बनायी | देव साहब होते तो निस्संदेह अपनी खोज पर गर्व करते | उनके प्रशंसक शायद अब भी गुनगुनाते होंगे...हम तो आपके दीवाने हैं...बड़े मस्ताने हैं !!!
  
अनुलता राज नायर  

Tuesday, February 11, 2014


तुम्हारी याद का
हल्दी चन्दन
माथे पर लगाए
जोगन बन जाना
मेरे लिए
आसान नहीं....

कि सीले मौसम में
जब नदियाँ बदहवासी में
दौड़ रही होती हैं
समंदर की ओर,
प्रकृति उकेरती है
लुभावने चित्र,
और
बूंदें
हटा कर धूल की चादर,
निर्वस्त्र कर देतीं हैं पत्तों को......

भीगा होता बहिर् और अंतस !
तभी  
कहीं भीतर से
रिस आता है ललाट पर
वो अभ्रक वाला
लाल सिंदूर
और उसी क्षण
खंडित हो जाता है
मेरा जोग !
भंग हो जाती है
मेरी सारी तपस्या !

~अनुलता ~

Wednesday, February 5, 2014

वसंत

कच्ची हल्दी से रंगा तन,
लगा कर पांव में महावार
नव ब्याहता सी
आयी वासंती पवन !
शरमाती सकुचाती
झिझकती
आखिर हो ही गयी
आलिंगनबद्ध !!
(खुशियों के बड़े गहरे रहस्य थोड़ी न होते हैं.....)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
टेसू का खिलना
भौरों का गुनना
फूलती अमराइयाँ
कलियों की अंगडाइयाँ
कौन कहता है ये वसंत की दस्तक है ?
मेरे घर आता है वसंत
तुम्हारे तन से लिपटा हुआ
तुम्हारे मन में छिप कर!!
(प्रेम से प्यारा मौसम कोई न हुआ अब तक...)

~अनुलता ~
 

Sunday, February 2, 2014

अमृता शेरगिल - अपने कैनवस के रंगों सी....




(30 जनवरी 1913 – 5 दिसंबर 1941)

महान कलाकार माइकलेंजिलो ने कहा था-“ व्यक्ति अपने दिमाग से पेंट करता है हाथों से नहीं,शायद यही वजह है कि हर कलाकार की कलाकृति उसके हस्ताक्षर होते हैं | आज मैं आपको मिलवाती हूँ एक ऐसी महान कलाकार से जिन्होंने मात्र 28 वर्ष के छोटे से जीवन काल में एक इतिहास रंग डाला और रंगों से भावनाओं का ऐसा इन्द्रधनुष उकेरा कि लोगों ने दाँतों तले उँगलियाँ दबा लीं- मिलिए हिन्दुस्तान की “फ्रिडा काह्लो”, “अमृता शेरगिल” से |

कहते हैं कि एक महान कलाकार सदा समय से बहुत आगे या बहुत पीछे रहता है | अमृता शेरगिल अपनी वास्तविक ज़िन्दगी में और अपने आर्ट में भी अपने समकालीन कलाकारों से बहुत आगे थीं | उनकी सोच का दायरा असीमित था,वे परफेक्शनिस्ट नहीं थीं और यही उनकी खासियत थी|  
अमृता के पिता थे अभिजात्य कुल के सिख, संस्कृत और पारसी भाषा के विद्वान, उमराव सिंह शेर-गिल मजीठिया और माँ मेरी एन्तोनिएट, इटली की यहूदी ऑपेरा सिंगर थीं |अमृता का जन्म भी बुडापेस्ट,हंगरी में ही हुआ | अमृता के भीतर का कलाकार मात्र पांच वर्ष की उम्र से ही पंख फैलाने लगा था,जब वे अपनी माँ के द्वारा सुनायी कहानियों को बेहद ख़ूबसूरती से रेखांकित करने लगी थीं|

अमृता के जीवन का अधिकतर समय यूरोप में ही गुज़रा जहाँ वे अपने मामा “इरविन बकते” के करीब रह कर काफी कुछ सीख पायीं,जिन्होंने हंगरी में भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार में बहुत योगदान दिया था और स्वयं एक बेहतरीन कलाकार थे, और वे ही प्ररोक्ष रूप से अमृता के वापस भारत आने की वजह बने | उन्होंने ही अमृता को सुझाव दिया कि वे अपने आस पास की महिलाओं को अपना मॉडल बनायें |
1921 में अमृता भारत आयीं और वे शिमला में रहने लगे जहाँ उन्होंने इटालियन मूर्तिकार से प्रशिक्षण लेना आरम्भ किया,फिर उसी मूर्तीकार के वापस इटली चले जाने पर 1924 में वे वापस इटली आयीं और जहाँ उन्होंने चित्रकारी का प्रशिक्षण लिया | हालाँकि वे सिर्फ पाँच महीने के छोटे प्रवास के बाद ही अपनी माँ और बहन के साथ वापस हिन्दुस्तान लौट आईं | 1924 से 1929 तक अमृता शिमला में रहीं और समूचे हिन्दुस्तान में घूम कर अपनी कला को धार दी | हालाँकि ये देश भ्रमण उनकी माँ की नज़र से देखें तो सिर्फ सामाजिक संपर्क बढाने के मकसद से किया गया था | 1929 में अमृता को पेरिस में चित्रकला की बाकायदा ट्रेनिंग देने के लिहाज से उनका पूरा परिवार पेरिस आ गया,अमृता तब सिर्फ 16 वर्ष की थीं |
आने वाले 6 बरस इस प्रतिभाशाली,जोशपूर्ण और आकर्षक लड़की ने “कला के क्षेत्र के मक्का ” कहे जाने वाले शहर पेरिस में बिताये जहाँ उनके भीतर सोये चित्रकला के बीजों ने अंकुरण किया और कल्पनाएँ खूब फली-फूलीं और लहलहायीं | इन्हीं दिनों अमृता ने अपनी बहन के साथ पियानो और वायलिन भी सीखा |
यहाँ रह कर अमृता ने धाराप्रवाह फ्रेंच बोलना सीखी और ऊँचे तबके के फ्रेंच और अन्य यूरोपियन लोगों में उठने बैठने लगीं | उन्हें रूढ़ीमुक्त फ्रेंच लोगों की सोहबत में आनंद आने लगा और वे भारत से आयी सकुचाई और गंभीर लड़की के खोल से बाहर आयीं | अमृता अब एक खूबसूरत, बहिर्मुखी और पुरुषों के बीच लोकप्रिय लड़की थी |
पेरिस में अमृता ने ग्रैंड शेमेर इंस्टिट्यूट में दाखिला लिया,मगर उनके बनाए स्केच और पेंटिंग प्रभाववाद के मुताबिक नहीं थे,वे न्यूड मॉडल्स पेंट करतीं मगर वे यथार्थ से दूर होतीं | उन्हीं दिनों वे लुइ सिमोन के संपर्क में आयीं,जिन्होंने उसकी अनोखी प्रतिभा की वजह से अवयस्क होने के बावजूद अपने स्टूडियो में दाखिला दिया |सिमोन से सीखना अमृता को बहुत भाया | उनके उन्मुक्त तौर तरीके अमृता से मेल खाते थे और सिमोन से ही अमृता ने रंगों का महत्त्व और उनका सही इस्तेमाल सीखा|यहाँ उन्होंने तीन साल काम किया | लुई सिमोन ने तब ही कहा था “कि एक दिन मुझे गर्व होगा कि अमृता शेरगिल मेरी शिष्या थीं ”|
1930 से 1932 के बीच अमृता ने लगभग 60 पेंटिंग्स बनाईं जिनमें ज़्यादातर सेल्फ पोट्रेट,पोट्रेट,स्थिर वस्तु चित्र(स्टिल लाइफ)और लैंडस्केप्स बनाए.उन्होंने अपने कैनवस पर पेरिस की रंगीनियाँ नहीं उकेरी बल्कि वहाँ के जीवन के घिनौने और श्याम पक्ष को उजागर किया| लाल और सफ़ेद रंग उनके ख़ास पसंदीदा थे.सफ़ेद रंग उन्हें रहस्यमयी लगता था |
1933 में उन्होंने एक प्रसिद्ध पेंटिंग बनायी – “द प्रोफेशनल मॉडल” जिसमें उन्होंने एक उम्रदराज़ मॉडल ली जिनके कंधे झुके,चेहरा झुर्रियों से भरा और शरीर अनाकर्षक था मगर आँखों में अब भी जीने की ललक और चमक बाकी थी. इसी थीम पर उन्होंने दो और पेंटिंग्स बनायी जो बहुत प्रसिद्द हुईं|
1930 में उन्होंने “पोट्रेट ऑफ़ ए यंग मैन” बनायी जिसके लिए उन्हें “एकोल” पुरूस्कार मिला(नेशनल स्कूल ऑफ़ फाइन आर्ट्स इन पेरिस द्वारा )|1932 में अमृता शेर-गिल ने ”यंग गर्ल्स” नाम से पहली महत्त्वपूर्ण पेंटिंग बनाई जिसके फलस्वरूप 1933 में उन्हें पेरिस में “एसोसिएट ऑफ़ दी ग्रैंड सलून ” के लिए चयनित किया गया| ये सम्मान पाने वाली वे सबसे कम उम्र की और पहली एशिआयी थीं |
उन दिनों कलाकारों में परंपरा के विरुद्ध जाना एक चलन बन गया था,जैसे कोई फैशन या स्टेटस सिम्बल| उसी लीक पर चलते अमृता ने कई नग्न पेंटिंग्स बनायीं और समलैंगिकता को भी दर्शाया | अमृता शेरगिल का व्यक्तिगत जीवन भी इसी तरह के विवादों और आक्षेपों से घिरा रहा |उनके जीवन में असफल प्रेम-प्रसंगों की भरमार रही | एक अंग्रेज़ पत्रकार,लेखक और व्यंगकार मेल्कॉम की मानें तो अमृता शेरगिल अपने कई प्रेम प्रसंगों के होते हुए भी मन से सदा कुंवारी रहीं, क्यूंकि उन्हें स्वयं से प्यार था,उन्हें नार्सीसिस्ट (आत्ममुग्ध) कहा जाता था और ये बात उनके सेल्फ़ पोट्रेट्स देख कर सच भी लगती है |

वे बचपन से अपने रिश्ते के एक भाई, विक्टर के बेहद करीब थीं और उनसे शादी करना चाहती थीं मगर उनकी माँ उन्हें किसी रईस और रसूखदार घर में ब्याहना चाहती थीं इसलिए उनकी सगाई अकबरपुर ताल्लुका के रईस युसूफ अली खान से कर दी | मगर इस सगाई ने उन्हें अनचाहा गर्भ और कई रोग दिए| अमृता ने विक्टर  से सलाह ली जो एक डॉक्टर भी था, और गर्भपात के बाद युसूफ से रिश्ता तोड़ लिया | इसके बाद के दिन अमृता ने बेहद अनियमित जीवन जिया और अपने मन और तन दोनों को काफी हद तक बर्बाद कर लिया,उन्होंने खुद लिखा कि “मैं एक एप्पल(सेव फल) की तरह हूँ,जो बाहर से सुर्ख लाल दिखता है मगर भीतर से सड़ा हुआ है” |  
1934 में अमृता को भारत लौटने की तलब लगने लगी,उन्हें आश्चर्जनक रूप से ये महसूस होने लगा कि एक कलाकार के रूप में उनका भाग्योदय भारत में ही लिखा है,शायद वे जानती थीं कि उनके पास अब ज़्यादा ज़िन्दगी बाकी नहीं है | भारत लौटने के पश्चात अमृता पूरी तरह कला के लिए समर्पित हो गयीं | उन्होंने भारतीय संस्कृति,इतिहास और कला के विभिन्न आयामों को बारीकी से समझा, सीखा और यहाँ की फिज़ाओं में बिखरे रंगों का उन्होंने अपनी कला में बखूबी इस्तेमाल किया |
भारत आने के बाद अमृता ने यहाँ के आम लोगों को अपने कैनवस पर उतारना शुरू किया | दुबले पतले शरीर,उदास आँखों वाली मजदूर पहाड़ी औरतें उन्हें आकर्षित करतीं | 1937 में उन्होंने “थ्री गर्ल्स” पेंटिंग बनाई जिसके लिए उन्हें कई बड़े पुरूस्कार मिले और पहचान भी | शिमला की फाइन आर्ट सोसाइटी में हुई प्रदर्शनी में अमृता की कुछ पेंटिंग्स को सराहा गया और ज़्यादातर को आलोचना का शिकार होना बड़ा जिसका अमृता ने कड़े शब्दों में लिखित रूप से विरोध किया और आर्ट सोसाइटी का बहिष्कार भी किया |

1935 में उन्होंने “मदर इंडिया ” बनायी जो उनकी पसंदीदा थी |
आल इंडिया फाइन आर्ट्स सोसाइटी के द्वारा उन्हें उनके “सेल्फ पोट्रेट” के लिए पुरुस्कृत किया गया इस पर उन्होंने कहा कि आर्ट सोसाइटी ने मेरी बकवास चित्रकारी को पुरूस्कार दिया |कला के लिए उनकी अपनी परिभाषाएं थीं, अपने मापदंड थे | वे शायद समय से बहुत आगे चल रही थीं | उनके बनाये चित्रों और कंसेप्ट को अखबारों और कला आलोचकों ने “बदसूरत” तक कह डाला | 20 नवम्बर 1936 को अमृता शेरगिल ने बम्बई में एक कला प्रदर्शनी में हिस्सा लिया जहाँ बड़े बड़े अखबारों और कला समीक्षकों ने अमृता के काम की खूब सराहना की| टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने उन्हें भारत के सबसे बेहतरीन युवा कलाकार का दर्ज़ा दिया | अमृता आम लोगों के पोट्रेट्स बनाना पसंद करती थीं,गाँव के लोग,आदिवासी,गरीब ,बूढ़े लोग उनके मॉडल होते | वे कहती, इनमें मुझे सच्चाई और निष्ठा दिखती हैं | पैसे देकर अपना पोर्ट्रेट बनवाने वालों से उन्हें नफरत थी | बोम्बे आर्ट सोसाइटी ने उन्हें “थ्री गर्ल्स” के लिए स्वर्ण पदक से नवाज़ा | अब अमृता पर सबकी नज़र थी और लोग उनमें आने वाले दिनों की सबसे उम्दा कलाकार की छवि देखते थे | अमृता शेरगिल अब सफ़ल कलाकार थीं |
उनके प्रशंसकों में पंडित नेहरू भी एक थे,वे अपना पोर्ट्रेट अमृता से बनवाना चाहते थे मगर अमृता को लगा कि उनका चेहरा इतना सुन्दर है कि कैनवस पर नहीं उतारा जा सकता |
1937 में उन्होंने हैदराबाद में प्रदर्शिनी लगाईं| वहां वे नवाब सालारजंग को अपनी कृतियाँ बेचना चाहती थीं | नवाब साहब ने उन्हें अपना कलेक्शन दिखा कर पूछा –कैसा लगा ? तब अमृता ने जवाब दिया “करोड़ों रुपये का कबाड़” | ज़ाहिर है नवाब ने अमृता की कोई पेंटिंग नहीं ली | अमृता कला के प्रति समर्पित थीं उनके भीतर कोई दिखावा नहीं था न ही वे दूसरों की शर्तों पर झुकने वाली औरत थीं |
कला समीक्षकों का कहना था कि शेरगिल की कला को पहली बार देखने पर हम भौचक्के रह जाते हैं क्यूंकि हम अभ्यस्त नहीं हैं उस तरह की पेंटिंग देखने के | आप अमृता की कला को या तो बेहद पसंद कर सकते हैं या उनसे घृणा कर सकते हैं मगर आप उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते |
1938 में विक्टर से शादी का ख्याल लेकर अमृता फिर हंगरी गयीं | वहां विक्टर विश्व युद्ध में व्यस्त रहा और अमृता ने अपने जीवन के कुछ बेहतरीन चित्र बनाए जिनमें “हंगेरियन मार्केट सीन”,”टू गर्ल्स” और “न्यूड” प्रमुख हैं |
अमृता और विक्टर भारत आ गए | उन दिनों अमृता को अपनी कृतियों के लिए कई अस्वीकृतियाँ झेलनी पड़ी जिससे वे मानसिक अवसाद से घिर गयीं| 1940 के शुरुआती दौर में उन्होंने खुद को उबारा और फिर से चित्रकारी शुरू की और कुछ बेहतरीन चित्र ”एन्शिएनट स्टोरी टेल्लर” और “स्विंग”(झूला) बनाए | परन्तु उनकी तूलिका के रंग मन के भीतर की स्याह दीवारों को रंग न सके| उन्होंने अपनी बहन को बड़े दुःख भरे पत्र लिखे| उन्होंने लिखा मैं स्वयं को अनचाहा,चिडचिडा और असंतुष्ट महसूस करती हूँ पर फिर भी रो सकने में असमर्थ हूँ | कलाकार बड़े भावुक और नर्मदिल होते हैं,उन्हें क्या व्यथित कर देता है वे स्वयं नहीं समझ पाते |
सितम्बर 1940 में अमृता और विक्टर लाहौर आ गए आर्थिक तंगी के होते हुए भी ज़िन्दगी ने थोडा रफ़्तार पकड़ी, मगर 3 दिसम्बर को सुबह से अमृता की तबियत खराब हुई और विक्टर और दो अन्य डॉक्टर के प्रयास के बाद भी अमृता नहीं बचीं |
उनके जीवन के कैनवस पर बनायी जाने वाली तस्वीर अधूरी रह गयी | रावी नदी के तट पर अमृता का रंगीन जीवन धूसर रंग में बदल गया | वे एक आख़री चित्र “दाहसंस्कार” बनाने की आस लिए ही चली गयीं मगर कैनवस पर उनके दिए रंग आज भी उतने ही चमकदार और जिंदा है जितना वे खुद थीं और उनकी कला आज राष्ट्रीय धरोहर के रूप में नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट, दिल्ली में सहेज कर रखी गयी है|
(2006 में अमृता की एक पेंटिंग “विलेज सीन”, नीलामी में 6.9 करोड़ रूपए में बिकी जो भारत में किसी चित्रकारी के लिए दी गयी सबसे बड़ी रकम थी|)    
(सभी पेंटिंग्स गूगल से साभार !) 
-अनुलता-