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Showing posts from July, 2013

औरत की आकांक्षा

बहुत तकलीफ देह था
ख़्वाबों का टूटना
उम्मीदों का मुरझाना
आकांक्षाओं का छिन्न-भिन्न होना

हर ख्वाब पूरे नहीं होते...
हर आशा और उम्मीद फूल नहीं बनती

सोच समझ कर देखे जाने चाहिए ख्वाब और पाली जानी चाहिये उम्मीदें....
सो अब तय कर दी है उसने
अपनी आकांक्षाओं की सीमा
और बाँध दी हैं हदें
ख़्वाबों की पतंग भी कच्ची और छोटी डोर से बांधी..

ऐसा कर देना आसान था बहुत
सीमाओं पर कंटीली बाड़ बिछाने में समाज के हर आदमी ने मदद की...
ख़्वाबों की पतंग थामने भी बहुत आये

औरत को अपना  आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली.....
३०/७/२०१३
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आभार....
~अनु~


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रूह

तुम्हारी गुलामी मैंने स्वीकारी
क्यूंकि तुम्हारी ख़ुशी इसी में थी....
और इसमें मेरा कुछ जाता नहीं था
बेशक बेड़ियों ने मुझे जकड़ रखा था मगर
रूह आज़ाद थी मेरी
और वक्त भी आज़ाद था...

पीछे छूट रहा था वक्त और आगे बढ़ती जा रही थी मैं
बीच में तुम खड़े थे स्थिर ,गतिहीन,संतुष्ट
बेड़ियों में जकड़े मेरे शरीर को देखते !!

ज़ाहिर है
इस कहानी में प्रेम ने कोई किरदार नहीं निभाया !!
~अनु ~

मेरी नज़्म

सिमट गए जब
तुम्हारे कहे लफ्ज़ मेरे ज़ेहन में
तब दर्द की एक नज़्म फूटी..
तेरी खुशबु से महकती इस नज़्म को
धो डाला मैंने
जुलाई की तेज़ बारिश में
कि नज़्म अब तरोताज़ा है मिट्टी और घास की महक लिए...
उसे निचोड़ा कस कर
कि रह न जाए एक भी रिसता एहसास बाकी...
हटाने को यादों की सीलन
मिटाने को दर्द की सभी सिलवटें
फेर  दी  बेरुखी की गर्म इस्त्री उस नज़्म पर
पुरानी हर नज़्म की तरह  इस नज़्म का सेहरा तुम्हारे सर नहीं....
इस पर और मुझ पर तुम्हारा कोई हक नहीं, कोई निशाँ नहीं....
ये नज़्म मेरी है
और बाकी की ज़िन्दगी भी सिर्फ मेरी.......
~अनु ~

स्पर्श.........................

चेहरे पर पड़ती बूँदें बारिश की
मानों एक बोसा
संग हवा के सरसराता
छू कर निकला हो गालों को....
और उस रेशमी स्पर्श ने
बेवक्त ही
खोल दिया पिटारा खुरदुरी यादों का
जिन्हें समेटते सहेजते छिले जाते हैं
पोर मेरी उँगलियों के..

बूँदे चाहे बादलों से टपकी हों
या मन के घावों से रिसी हों,
अपने पास रखती हैं चोर चाभी
यादों की संदूकची की.....

(जाने हम क्यूँ सहेजे रखते हैं इन पिटारोंको/संदूकों को...और हर पल डरते हैं उनके खोले जाने से...मेरे ख़याल से कुछ एहसास ऐसे होते हैं जिनसे दिल कभी पूरी तरह आज़ाद नहीं हो सकता या शायद होना ही नहीं चाहता.....)
~अनु ~