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Showing posts from March, 2014

बुझती आँखों के वास्ते........

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“शेल सिल्वरस्टीन” की एक प्रसिद्द कविता है – जो संवाद है एक बच्चे और बुज़ुर्ग के बीच |
बच्चा कहता है – मैं खाते वक्त कभी चम्मच गिरा देता हूँ|
बुज़ुर्ग कहता है - मैं भी
बच्चा फुसफुसाता है - मैं कभी अपनी पैंट गीली कर देता हूँ |
बुज़ुर्ग- मैं भी
बच्चा- मैं रोता हूँ
बुज़ुर्ग- मैं भी
बच्चा- मगर बड़े मुझ पर ध्यान नहीं देते
बुज़ुर्ग अपना झुर्रियों वाला हाथ बच्चे के हाथ में रख कहता है- हाँ मैं समझ सकता हूँ तुम क्या कहना चाहते हो |
“बुढ़ापा बचपन की पुनरावृत्ति होता है” मगर ये ऐसा बचपन है जिसमें ऊर्जा नहीं है,सकारात्मक सोच का अभाव है और असुरक्षा का भाव बच्चों से कई गुना अधिक | इसलिए इन्हें बच्चों से कहीं ज्यादा देखभाल और स्नेह ही आवश्यकता है | अक्सर बुजुर्गों को ये कहते सुना जा सकता है कि अब हमें क्या चाहिए- बस दो वक्त की रोटी ! पर यकीन मानिए कि वृद्धावस्था में इन्हें दो रोटी भले एक मिले पर दो पल स्नेह के मिल जाएँ तो इनका जीवन आसान हो जाय| मगर ये गिने चुने दो पल भी कहाँ हैं आज बच्चों के पास ? और यही है सबसे बड़ी समस्या आजकल बुजुर्गों की | यूँ तो हमारा समाज माँ-बाप को ईश्वर का दर्ज़ा देता है मगर हमारे द…

अंगूरी बादल.............

अंगूरी हो रक्खे थे बादल
उस रोज़,
गहरे नीले आकाश में
गुच्छा गुच्छा छितरे
जमुनी गुलाबी रंगत लिए
धूसर बादल....

तुमने कहा
ये बादल
तुम्हारे आंसुओं की वाष्प से बने हैं !
मैंने मान लिया था उस रोज़
कि तुम दुनिया की
सबसे दुखी लडकी थी |

वो बड़ी स्याह रात थी
तूफानी,
खूब बरसे थे वो बादल
गुलाबी जमुनी रंगत वाले
काले बादल....

तुम्हारा कहा परखने को
चखी थी मैंने
कुछ बूँदें...
सचमुच खारी थीं|

तुमने सही कहा था
कि मैं दुनिया का सबसे बुरा आदमी हूँ !
मैंने मान लिया था उस रोज़
बिना ख़ुद को परखे हुए !
~अनुलता ~






~संवेदनाएं खोलतीं सुख के द्वार~

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आज एक उदास दिन था.....
 कि मन की उदासियों को ज़रा आराम मिला....जब शाम को मार्च की अहा ! ज़िन्दगी हाथ में आयी!
इस बार की अहा! ज़िन्दगी की थीम थी जीवन में सुख की सीढियाँ !
और एक सूत्र "संवेदना" की बागडोर पत्रिका ने  हमारे हाथ में सौपीं.
आप भी पढ़िए अहा! ज़िन्दगी में प्रकाशित मेरा आलेख !!
~संवेदनाएं खोलतीं सुख के द्वार~
महान कवि "एडगर एलन पो " के मुताबिक सौन्दर्य जब अपने चरमोत्कर्ष पर होता है तब हर संवेदनशील आत्मा,निरपवाद रूप से उत्तेजित और भावुक होकर रो पड़ती है | और इसका सीधा कारण है सुख की पराकाष्ठा का अनुभव !
अर्थात संवेदना हमारे जीवन में सुख का सहज कारण बनती है और हमें रूहानी तृप्ति प्रदान करती है | जैसे रंग और खुशबू के प्रति संवेदनशील तितली फूल से मधु पीकर तृप्त होती है | संवेदनाएं मनुष्य को सुन्दर और सरल बनाती हैं,प्रेम करने का अवसर देती है जो स्वतः सुख का कारण है | मिसाल के तौर पर यदि हम प्रकृति की ओर संवेदनशील हैं तो अपने आस पास वृक्ष लगायेंगे,वाटिका में फूल रोपेंगे,और पर्यावरण की रक्षा करेंगे,और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ये हमें ही सुखी करेगा | मन की ये संव…