इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Tuesday, February 28, 2012

जड़ें........

जाने क्या सोच कर चली आई थी गाँव ...और यहीं की होकर रह गयी...शहर की समस्त सुविधाओं को छोड  इस छोटे से मकान में रहना बहुत  भला लगा..ये घर कब से खड़ा है इस सुदूर सुन्दर पहाड़ी पर...अकेला...


मेरे बाबा का जन्म हुआ था इस घर में...हम जब भी गाँव जाते पिताजी वहाँ हमें अवश्य ले जाते...पहाड़ी चढ़ते हम कभी थकते नहीं थे..किवाड की सांकल खुलते  ही बाबा भी चहक उठते थे...
कितना कलपा होगा उनका मन,अपने घर अपनी मिट्टी को छोड़ते  हुए...जब आखरी बार उन्हें गाँव की ज़मीन  बेचनी पड़ी तब वे मुट्ठी भर मिट्टी ले आये थे अपने साथ.....और जब तब चोरी-चोरी उसकी खुशबु  उसका स्पर्श महसूस करते रहे....
तब से सोचा करती थी कि जीवन के किसी पड़ाव पर एकाकी महसूस करुँगी तो यहाँ अपने पैतृक घर में चली आउंगी...जिसकी चौखट पर आज भी दादाजी के हाथ से लिखी मेरे बाबा की जन्म तिथि मुझे यादों के उपवन में ले जाती है...
जानती हूँ कि यहाँ मैं खुद को कभी अकेला नहीं पाऊँगी ..
अकेली हूँ भी कहाँ....बुजुर्गों की याद ,उनके आशीर्वाद की भीड़ मुझे घेरे रहती है...


शहर की भीड़  में जो अकेलापन था वो अब नहीं....
आखिर कब तक बनावटी  फूलों की महक से जी बहलाती...

-अनु 




19 comments:

  1. अपनी जड़ों में लौट के आना ही तो जीवन का सबसे सुखी पल है ...

    ReplyDelete
  2. खूबसूरत अहसास ,खूबसूरत मन !
    ब्लॉग जगत में स्वागत है !
    शुभकामनाएँ!
    खुश और स्वस्थ रहें !

    ReplyDelete
  3. ब्लॉग जगत में स्वागत है !

    ReplyDelete
  4. एक मधुर याद.....काश हम समय को पकड़ पाते !

    ReplyDelete
  5. मैंने तो गाँव कभी जाना ही नहीं क्या होता है ॥पर जब लोगों को पढ़ती हूँ तो लगता है कि उसकी मिट्टी की खूशबू मदहोश कर देती होगी ...

    ReplyDelete
  6. कल 31/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपका बहुत शुक्रिया यशवंत...

      Delete
  7. अपनी मिट्टी की खुशबू ... अपनापन की खुशबू... वाकई इस कृत्रिमता में धुंधलाता जा रहा है..

    ReplyDelete
  8. बहुत सुकून है आपकी इन पंक्तियों में...
    सादर।

    ReplyDelete
  9. अनुजी सुन्दर कोमल अहसासों की महक थी आपकी रचना में ....बहुत सुन्दर !

    ReplyDelete
  10. अनुजी सुन्दर कोमल अहसासों की महक थी आपकी रचना में ....बहुत सुन्दर !

    ReplyDelete
  11. अपनी मिट्टी की खुशबू..यादों के पिटारे...सच में मन पकडना चाहता है एक बार फ़िर से...बहुत संवेदनशील प्रस्तुति..

    ReplyDelete
  12. जड़ों को तलाशती मार्मिक रचना.. बहुत खूब !!

    ReplyDelete
  13. mujhe bhi bahut accha lgta hai ...bahut acchi prastuti anu jee.

    ReplyDelete
  14. हम अपनी जड़ों से सदा ही जुड़े रहते ....
    .वापस लौट सकें या न भी लौट सकें.......
    तब भी मन के हर कोने में बसी रहती है उनकी यादें ..

    आप का लेखन मन को बाँध लेता है
    अच्छा लगता है आपको पढ़ना .......यूँ ही लिखती रहें ..बधाई

    ReplyDelete
  15. सच है ..बनावटी फूलों की खुशबू मन नहीं बहलाती ....बुजुर्गों के आशीर्वाद की भीड़ आपको घेरे रहती है ..इस बात ने मन मोह लिया

    ReplyDelete
  16. जाने क्यूँ आपका लिखा बहुत अपना सा लगता है

    ReplyDelete
  17. आज फिर बरसात हुई मद्धम सी ,
    मेरे गाँव से सोंधी सी महक आती है |

    सादर
    -आकाश

    ReplyDelete

नए पुराने मौसम

मौसम अपने संक्रमण काल में है|धीरे धीरे बादलों में पानी जमा हो रहा है पर बरसने को तैयार नहीं...शायद उनकी आसमान से यारी छूट नहीं रही ! मोह...