इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Sunday, April 27, 2014

रूपांतरण

स्त्री के भीतर
उग आती हैं और एक स्त्री
या अनेक स्त्रियाँ.....
जब वो अकेली होती है
और दर्द असह्य हो जाता है |
फिर सब मिल कर बाँट लेती हैं दुःख !

औरत अपने भीतर उगा लेती है एक बच्चा
और खेलती हैं बच्चों के साथ
खिलखिलाती है,तुतलाती है 
घुलमिल कर !
रूपांतरण की ये कला ईश्वर प्रदत्त है |

कभी कभी
एक पुरुष भी उग आया करता है
स्त्री के भीतर
जब बाहर के पुरुषों द्वारा
तिरस्कृत की जाती है |
तब वो सशक्त होती  है उनकी तरह !

सदियों से
इस तरह कायम  है
स्त्रियों का अस्तित्व !
कि उनके भीतर की उपजाऊ मिट्टी में
उम्मीद के बीज हैं बहुत
और नमी है काफी !
~अनुलता ~

Tuesday, April 22, 2014

एक कहानी यह भी.......मन्नू भंडारी

"मेरी प्रिय लेखिका मन्नू भंडारी जी पर लिखा मेरा ये आलेख आधी आबादी पत्रिका के ताज़ा अंक में प्रकाशित"

जन्म- 3 अप्रैल 1931

“एक कहानी यह भी” के पन्ने पलटते-पलटते मैं डूबती जा रही थी हिन्दी की एक बेहद लोकप्रिय कथाकार महेंद्र कुमारी - ”मन्नू भंडारी” की जीवन सरिता में | मन्नू जी की यह आत्मकथा पढ़ते हुए मैंने जाना कि एक मीठे पानी की नदी सा मालूम पड़ने वाला उनका जीवन दरअसल तटबंध किये हुए खारे सागर के जैसा था मगर मन्नू के भीतर अथाह क्षमता थी,डूब कर मोती खोज लाने की | एक बेहद ईमानदार व्यक्तित्व और उतनी ही सच्ची,बेबाक और स्पष्ट लेखन शैली वाली लेखिका,जिनके करीब जाने पर आप एक बेहद आम सी औरत को पायेंगे जो स्वंय को हीनता ग्रंथि से ग्रस्त मानती हैं पर उनके भीतर झांकते ही या उनकी रचनाएं पढ़ते ही एहसास होता है कि कितनी विनम्र , निर्मल हृदया और गंभीर लेखिका हैं मन्नू भंडारी |
मन्नू जी के लिए लेखन एक अनवरत यात्रा है जिसका न कोई अंत है न मंज़िल| बस,निरंतर चलते जाना ही जिसकी अनिवार्यता है,शायद नियति भी | इसीलिये पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों का बखूबी निर्वाह करते हुए भी उनकी लेखनी चलती रही अनवरत और फलस्वरूप हमें मिला उच्च कोटि का साहित्य | आपका बंटी और महाभोज इसके प्रमाण हैं |
मध्यप्रदेश के भानपुरा में जन्मीं मन्नू ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर किया | 1964 से 1991 तक उन्होंने प्रतिष्ठित मिरांडा कॉलेज में अध्यापन का कार्य किया | और ये नौकरी उनके जीवनयापन के लिए आवश्यक भी थी क्यूंकि उनके पति स्वर्गीय राजेन्द्र यादव जो स्वयं एक ख्यातिप्राप्त लेखक और संपादक थे, अपनी साहित्यिक गतिविधियों के चलते घर गृहस्थी में अपना योगदान नहीं दे पाते थे | राजेन्द्र जी से अपने रिश्तों के और उनसे अपने वैचारिक मतभेदों के विषय में भी मन्नू जी ने बड़े खुले शब्दों में बात की है | वे पति-पत्नी बने भी तो लेखन की वजह से ही थे मगर मन्नू को एहसास हुआ कि उनके लेखकीय व्यक्तित्व को तो राजेन्द्र जी ने बहुत सराहा और प्रोत्साहित किया मगर उनके भीतर की स्त्री सदा आहत रही | राजेन्द्र जी ने “सामानांतर ज़िन्दगी” का हवाला देकर उनसे भावनात्मक दूरी बनाये रखी जिसे वे कभी सहन नहीं कर पायीं और इसी संदर्भ में उनकी स्वयं के कटुभाषी होने की स्वीकारोक्ति उनके ईमानदार व्यक्तित्व का एक और प्रमाण है | एक बात और कि उन्होंने अपनी बिटिया "रचना" की ख़ातिर सहनशक्ति की सीमाओं तक जाकर अपने दाम्पत्य का निर्वाह किया और रचना को "बंटी" बनने से बचाए रखा | इसे मैं उनके भीतर की लेखिका और एक पत्नी के ऊपर उनके मातृत्व की विजय कहूंगी |   
मन्नू जी को पढ़ना कुछ यूँ है जैसे आप स्वयं को पढ़ रहे हों | ख़ास तौर पर एक स्त्री के मन को उन्होंने बहुत गहराई से पढ़ा और उतनी ही संवेदना के साथ पन्नों पर उतारा | जैसे उनकी कहानी “त्रिशंकु” जो उन्हें भी बहुत प्रिय है, में उन्होंने ऐसे चरित्र का निर्माण किया है जो आज के समाज में एक त्रिशंकु की तरह लटका है ,यानि एक ओर तो वो आधुनिक होने का प्रयास करती है वहीं अपने संस्कारों को तोड़ने का साहस नहीं कर पाती | क्या हम आप भी इसी रस्साकशी के शिकार नहीं हैं ? वहीं “आपका बंटी” की “शकुन” जो मातृत्व और स्त्रीत्व के द्वंद्व के त्रास को झेलती है |  
मन्नू भंडारी की कहानियां भावनाप्रधान हैं क्यूंकि उन्होंने ज़िन्दगी को नंगी आँखों से देखा है और खुले दिल से स्वीकारा भी है मगर लेखिका मन्नू कभी उनके भीतर की स्त्री को परास्त नहीं कर पायी | शायद तभी वे अपने पिता की गरिमा,उनकी करुणा और उनके बहुआयामी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर भी कभी उन पर लिख नहीं पायीं क्यूंकि अपनी माँ के प्रति उनके दोयम दर्ज़े के व्यवहार से वे सदा आहत रहीं और उनका विरोध करती रहीं | इसलिए उनकी पिता से कभी बनी नहीं और उन्हें लगता रहा कि उनकी लेखनी पिता के व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं कर पायेगी |
लेखिका की अधिकतर कहानियां और उनके भीतर की घटनाएं व पात्र उनके अजमेर के ब्रह्मपुरी मोहल्ले से जुडी हुई हैं और ये सहज और स्वाभाविक ही है कि लेखक अपने जीवन के इर्द-गिर्द घुमते लोगों को और किस्सों को कहानियों का ताना बाना देता है | यहाँ कुछ कहानियों का उल्लेख करना ठीक होगा जैसे- “अकेली” ,जिससे मन्नू जी को खूब ख्याति मिली और इस पर दूरदर्शन ने टेलीफिल्म भी बनाई| ये एक परित्यक्ता औरत की कहानी है जो अकेलेपन के साथ पति के द्वारा छोड़े जाने के अपमान का दंश भी भोग रही है और साथ ही उपेक्षा भी |
मन्नू की कहानियाँ सीधी,सहज और पारदर्शी हैं और पाठकों के मन से सीधा सम्बन्ध बनाती हैं | उनकी एक कहानी जो ग्राम्य और शहरी जीवन के बीच तुलनात्मक तौर पर लिखी है और इस पर बासु चटर्जी ने “जीना यहाँ” नाम से फ़ीचर फ़िल्म भी बनाई |
मन्नू की कहानियों में सर्वाधिक चर्चित रही – यही सच है ! और इस पर फ़िल्म बनी “रजनीगंधा” | जिसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म (1974) का पुरस्कार प्राप्त हुआ | ये उनकी एकमात्र कहानी है जो डायरी फॉर्म में लिखी गयी है,उन्हें लगा कि नायिका के अंतर्द्वंद्व को इस तरह बेहतर तरीके से उजागर किया जा सकता है |
मन्नू का ज़िक्र हो और “आपका बंटी” की बात न हो ये संभव नहीं | ये उनकी कालजयी रचना है जिसमें उन्होंने विवाह विच्छेद की त्रासदी में पिस रहे एक बच्चे को केंद्र में रख कर कहानी बुनी है | बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ-बूझ के लिए चर्चित और प्रशंसित इस उपन्यास का हर पृष्ठ मर्मस्पर्शी और विचारोत्तेजक है | हिन्दी कथा साहित्य के लिए मन्नू की ये अनमोल भेंट है | 
ये कहानी “धर्मयुग” में धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुई थी और इसके बाद लेखिका के पास ढेरों प्रशंसा पत्र आये मगर कुछ पत्र धिक्कार भरी भर्त्सना के भी थे जिसमें उन्हें शकुन जैसी औरत के पात्र की रचना करने पर उलाहने दिए गए | याने हमारे संस्कारों की जड़ें इतनी गहरी हैं कि त्याग,सेवा,और परिवार के लिए खुद को होम कर देना ही स्त्री के गुण और उनकी महानता की कसौटी समझे जाते हैं | स्त्री की महत्त्वाकांक्षा और आत्मनिर्भरता की चाह पुरुष के लिए चुनौती बन जाते हैं |
उनका दूसरा सबसे प्रसिद्ध लेखन है “महाभोज” जिसमें लेखिका ने गहरे व्यंग,अद्भुत बिम्बों और प्रतीकों का इस्तेमाल किया है | हालाँकि इस उपन्यास का मूल विषय सामाजिक है मगर राजनैतिक विन्यास पर लिखा गया है |
इसमें सामंती व्यवस्था और किसानों की दुर्दशा का मार्मिक चित्रण किया है | दरअसल ये बिहार के बेलछी ग्राम में 11 दलित किसानों को जिंदा जलाये जाने की घटना से आहत होकर लिखा गया है| इस उपन्यास का बाद में उन्होंने नाट्य-रूपांतर किया और जिसका सफल मंचन नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के रंगमंडल ने द्वारा कई बार किया गया | मन्नू जी ने ये उपन्यास शिमला के एक गेस्ट हाउस में रह कर मात्र 25 दिन में पूरा किया था | “महेश” का चरित्र भी उन्होंने मिरांडा हाउस के एक रिसर्च स्कॉलर से प्रेरित होकर लिखा था |
मन्नू जी के लेखन से यूँ लगता है मानों वे सर्वव्यापी हों ,समाज का हर पहलु, हर दृष्टिकोण से देख रही हों ,परख रही हों और समझ भी रही हों |
मन्नू अपने व्यक्तिगत जीवन में भी उतनी ही सच्ची और निष्कपट है जितना कि उनका लेखन | यही वजह रही कि उन्हें आरम्भ से ही दिग्गज लेखकों और क़रीबी दोस्तों का मार्गदर्शन, सहयोग और स्नेह मिलता रहा | वक्त बेवक्त काम आने वाले दोस्तों के लिए मन्नू कहती हैं कि – बिना प्रतिदान के भी कितना कुछ मिलता रहा है मुझे लोगों से ! दुनिया आज भी सुन्दर है....रहने योग्य | मैं तो कहूंगी जाकि रही भावना जैसी.........
बासु चटर्जी के आग्रह पर मन्नू ने शरतचंद्र के उपन्यास “स्वामी ” का पुनर्लेखन किया और जिस पर फ़िल्म भी बनी जिसने सिल्वर जुबली मनाई और उसका श्रेय मन्नू बासु दा के उत्कृष्ट निर्देशन के अलावा शबाना आजमी और गिरीश कर्नाड के बेहतरीन अभिनय को देना नहीं भूलतीं | दरअसल उनकी भाषाशैली इतनी सहज और पारदर्शी है कि आसानी से मन में घर कर लेती है| वे न तो कोई उद्वेगकारी ढंग से लिखती हैं न तड़क-भड़क वाली भाषा का प्रयोग करती हैं ,संभवतः इसीलिये उनकी कहानियों में अपनापन लगता है | शायद हर स्त्री को लगे कि अगर वो लेखिका होती तो कुछ यूँ ही लिखती |
बाहरी और भीतरी दिखावे से परे मन्नू सीधी और सरल औरत हैं मगर अपने देश और देश की परिस्थितियों पर उनके विचार सुदृढ़ और सशक्त हैं | अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि फ्रैंकफ़र्ट में एक पुस्तक मेले में, जो भारतीय साहित्य को केंद्र में रखकर आयोजित किया गया था, विख्यात लेखिका महाश्वेता जी मीडिया से रूबरू थीं | वे बड़े नाटकीय ढंग से भारतीय समाज की विकृतियों को पेश कर रही थीं, मन्नू जी ने उनसे बाद में कहा कि आप हमारे समाज की अच्छाइयों को भी तो उजागर कर सकती थीं,खासकर दूसरे देश के सामने ! अपने देश और समाज के प्रति ये भावुकता मन्नू जी के लेखन से भी झलकती है |
देश की आज़ादी के वक्त से लेकर,इमरजेंसी का समय,या चीनी आक्रमण के बाद का भारत हो या फिर इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद फैले दंगों के बाद की स्थिति, मन्नू भंडारी अपने स्तर पर समाज और देश के लिए अपना योगदान देती रही हैं |
अपनी लेखन शैली को लेकर मन्नू बड़ी सजग और सचेत हैं, उनका कहना है कि अपनी सीमाओं को समझते हुए वे भावभीनी कहानियां लिखती रहीं हैं और अपनी सामर्थ्य से बाहर जाकर उन्होंने कभी कुछ अनर्गल रचने की हिमाकत नहीं की | कुछ नया करने की चाह में उन्होंने अपनी कहानियों की शैली में थोड़ा बदलाव करके व्यंग का पुट दिया | त्रिशंकु, तीसरा हिस्सा और स्त्री सुबोधिनी इसी शैली की कहानियां हैं जिसे पाठकों ने स्वीकारा और भरपूर स्नेह दिया |
आखिर में “एक इंच मुस्कान” – जो साझा लेखन है राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी का | इसका पहला परिच्छेद राजेन्द्र जी ने लिखा तो दूसरा मन्नू जी ने,ये अपनी तरह का अनूठा प्रयोग था जो बेहद सफल रहा | ये आधुनिक लोगों की एक दुखांत प्रेम कथा है |
जहाँ इमरजेंसी के चलते मन्नू भंडारी ने पद्मश्री सम्मान ठुकराया वहीं उन्हें हिन्दी अकादमी  दिल्ली का शिखर सम्मान, बिहार सरकार, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, व्यास सम्मान और उत्तर-प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा पुरस्कृत किया गया, मगर उनके लिए शायद सबसे बड़ा पुरस्कार होगा पाठकों द्वारा मिला स्नेह और सम्मान और एक अनूठी पहचान |
किसी भी वाद या पंथ से बिना जुड़े,अपने आस पास की दुनिया को पन्नों पर उतरती,बहुमुखी प्रतिभा की धनी यह सशक्त और संयमी स्त्री लेखकों और संपादकों बीच चलती राजनीति को करीब से देख कर भी खिन्न अवश्य हुई मगर रहीं उससे अछूती ही | सभी पाठकों और लेखकों की ओर से मैं ईश्वर से कामना करती हूँ कि मन्नू जी स्वस्थ रहें , दीर्घायु हों और अपनी सुन्दर लेखनी से हमारे लिए और भी अनमोल सृजन करती रहेंगी |

अनुलता राज नायर
भोपाल


प्रकाशित कृतियाँ
कहानी-संग्रह :- एक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, तीन निगाहों की एक तस्वीर, यही सच है, त्रिशंकु, श्रेष्ठ कहानियाँ, आँखों देखा झूठ, नायक खलनायक विदूषक।
उपन्यास :- आपका बंटी, महाभोज, स्वामी, एक इंच मुस्कान और कलवा, एक कहानी यह भी
पटकथाएँ :- रजनी, निर्मला, स्वामी, दर्पण।
नाटक :- बिना दीवारों का घर।

Saturday, April 19, 2014

चिड़िया

बीती रात ख्वाब में
मैं एक चिड़िया थी........
चिडे ने
चिड़िया से
मांगे पंख,
प्रेम के एवज में.
और
पकड़ा दिया प्यार
चिड़िया की चोंच में !
चिड़िया चहचहाना  चाहती थी
उड़ना चाहती थी...
मगर मजबूर थी,
मौन रहना उसकी मजबूरी थी
या शर्त थी चिडे की,
पता नहीं....

नींद टूटी,
ख्वाब टूटा,
सुबह हुई......

मैं एक चिड़िया हूँ
सुबह भी
अब भी....

~अनु ~

Thursday, April 17, 2014

कसम

रख कर हाथ
नीले चाँद के सीने पर
हमने खायीं थीं जो कसमें
वो झूठी थीं |

मुझे लगा तुम सच्चे हो,
तुम्हें यकीन था मुझ पर....

इसलिए तो खाई जाती हैं कसमें

अपने अपने झूठ पर
सच की मोहर लगाने को !

~अनुलता ~

Wednesday, April 9, 2014

चुप्पी

चुप थे तुम
जब पूछा था लोगों ने
मेरा तुम्हारा रिश्ता...

चुप लगा जाते हैं लोग
अक्सर यूँ ही
कि वो एक सुरक्षा कवच है उनका !

गूंगी हो जाती है रात
जब चीखती है कोई बेबस..
चुप रहता है समाज
सिसकियाँ सुन कर भी !

बादलों के फट जाने पर
सवाल करती हैं लाशें...
और मौन रहता है आसमान |

खामोश रहते वृक्ष
पत्तों को तजने के बाद,
अनसुना करते हैं
चरमराते,सरसराते सूखे पत्तों की  चीख |

रिश्तों पर लगी घुन है
ख़ामोशी |
चुप्पी लील जाती है
मन का विश्वास !

चुप रह जाता है प्रेम...
जब वो प्रेम नहीं रहता !!
~अनुलता ~


Friday, April 4, 2014

वो पूरे चाँद सा चेहरा

जिसे मैं छू सकती थी

हाथ बढ़ा कर कभी भी....

और महसूस कर सकती थी

अपनी उँगलियों पर

उन गालों की नरमाई,

नर्म जैसे बादल !

और वो मुस्कराहट

खनकती हंसीं......

जैसे किसी ने खोल दी हो

अपनी अशर्फियों भरी पोटली

या बिखर गयें हो किसी के हाथ से पूजा के फूल....

वो कोमल स्पर्श, आवाज़ की खनक और स्नेह की सौंधी महक का एहसास अब भी जिंदा है.....

बस बिखेर रही हूँ आज

ढेर सा हरसिंगार

तुम्हारी तस्वीर के आगे.

अनु

(दुःख कभी बीतता नहीं....दिन बीतते हैं, और दुःख शायद उनकी परतों के नीचे कहीं पलता रहता है ख़ामोशी से.....)
अंजलि दीदी के जन्मदिन पर ...उनको याद करते हुए !!
4/4/2013

Saturday, March 15, 2014

बुझती आँखों के वास्ते........

“शेल सिल्वरस्टीन” की एक प्रसिद्द कविता है – जो संवाद है एक बच्चे और बुज़ुर्ग के बीच |
बच्चा कहता है – मैं खाते वक्त कभी चम्मच गिरा देता हूँ|
बुज़ुर्ग कहता है - मैं भी
बच्चा फुसफुसाता है - मैं कभी अपनी पैंट गीली कर देता हूँ |
बुज़ुर्ग- मैं भी
बच्चा- मैं रोता हूँ
बुज़ुर्ग- मैं भी
बच्चा- मगर बड़े मुझ पर ध्यान नहीं देते
बुज़ुर्ग अपना झुर्रियों वाला हाथ बच्चे के हाथ में रख कहता है- हाँ मैं समझ सकता हूँ तुम क्या कहना चाहते हो |

“बुढ़ापा बचपन की पुनरावृत्ति होता है” मगर ये ऐसा बचपन है जिसमें ऊर्जा नहीं है,सकारात्मक सोच का अभाव है और असुरक्षा का भाव बच्चों से कई गुना अधिक | इसलिए इन्हें बच्चों से कहीं ज्यादा देखभाल और स्नेह ही आवश्यकता है | अक्सर बुजुर्गों को ये कहते सुना जा सकता है कि अब हमें क्या चाहिए- बस दो वक्त की रोटी ! पर यकीन मानिए कि वृद्धावस्था में इन्हें दो रोटी भले एक मिले पर दो पल स्नेह के मिल जाएँ तो इनका जीवन आसान हो जाय| मगर ये गिने चुने दो पल भी कहाँ हैं आज बच्चों के पास ? और यही है सबसे बड़ी समस्या आजकल बुजुर्गों की | यूँ तो हमारा समाज माँ-बाप को ईश्वर का दर्ज़ा देता है मगर हमारे देश में ही सबसे अधिक बुज़ुर्ग तिरस्कृत और एकाकी जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हैं ,विशेषकर बुज़ुर्ग औरतें |
जीवन के चौथे पहर में अकेलापन सबसे बड़ा अभिशाप है विशेषकर महिलाओं के लिए,क्यूंकि एक तो वे स्वभाव से ही संवेदनशील हैं और आरम्भ से उन्हें किसी न किसी पुरुष पर निर्भर रहने की आदत होती है| पहले पिता फिर भाई,पति और अंत में बेटों के बिना वे जीवन की कल्पना नहीं कर सकतीं,खासतौर पर मध्यमवर्गीय परिवारों में | अशिक्षित महिलाओं की हालत तो और भी बद्तर है |
हमारे समाज में शुरू से स्त्रियों को दोयम दर्ज़ा दिया गया है और अगर वे नौकरीपेशा हैं तब भी परिवार की ज़िम्मेदारी का बोझ उन पर डाल कर उन्हें केयर-टेकर बना दिया जाता है| और जब वे खुद दूसरों पर निर्भर रहने की स्थिति में आती हैं तब अपनों के द्वारा ही बोझ समझ ली जाती हैं |

आसान नहीं है एक औरत का अकेले रहना | बाज़ार हाट से सामान लाना,अस्पताल के चक्कर,बिजली पानी के बिल जमा करना ऐसी कई समस्याएं हैं जिनका उन्हें सामना करना पड़ता है| ऐसी औरतें अपराधियों के लिए भी आसान टार्गेट होती हैं | इसके अलावा जो भावनात्मक समस्या है वो सबसे बड़ी है | परिवार को जोड़े रखने वाली कड़ी को जब स्वयं एकाकी जीवन जीना पड़े तो उसका अवसाद में घिर जाना स्वाभाविक है | औरतें माँ बनते ही नानी दादी बनने के ख्वाब भी देखने लगती हैं और ऐसे में नाती पोतों से दूरियाँ उन्हें दुःख देती हैं | कभी दादी नानी से किस्से-कहानियां सुनकर उनकी गोद में सोने वाले बच्चे आज हेड-फोन लगाए सीने पर मोबाइल रख कर सोते हैं तो फिर आखिर बुजुर्गों की आवश्यकता ही क्या हुई घर में |
एक सर्वे के मुताबिक़ हमारे देश में शहरी इलाके में रहने वाले हर छः में से एक वृद्ध को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता है और हर तीन में एक को दवाइयां और चिकित्सा सेवा उपलब्ध नहीं है| और 21.2% वृद्ध महिलायें अकेले रहने पर मजबूर हैं | स्थिति बेहद शर्मनाक और चिंतनीय है और जिसके ज़िम्मेदार आज की युवा पीढ़ी है | एक समाचार में पढने में आया कि अकेले रहने वाली वृद्धा एक सुबह अचेतन अवस्था में पायी गयीं और कोमा में चली गयी | वजह सिर्फ इतनी थी कि परिजनों द्वारा उनकी डाइबिटीज़ की दवाई की पूर्ती समय पर नहीं की गयी थी | क्या ऐसी उपेक्षा और लापरवाही झेलने के लिए ही माँ बच्चों को जन्म देती है,पालती पोसती है ? 

ढलती उम्र में अकेले रहने में एक सबसे बड़ी समस्या है स्वास्थ की | महिलायें परिवार की देखभाल करते करते अपने पोषण का ध्यान नहीं करती और फिर आर्थराइटिस ,हाइपरटेंशन,स्तन कैंसर ,एनीमिया आदि बीमारियों से अकेले जूझती हैं | तो सबसे आवश्यक है कि औरतें वक्त रहते चेतें और अपना ख्याल रखें |
बेशक अकेले रहना आसान नहीं है मगर अगर औरतें शुरू से जागरूक रहें तो आनेवाली कई समस्याओं से उबर सकती हैं | पहले तो यदि औरत स्वयं नहीं कमाती हैं तो उनके पति या पिता का फ़र्ज़ है कि उनके नाम पर पैसा जमा किया जाय,यथासंभव ज़मीन,मकान और गहने उनके नाम किये जाएँ जिससे उनका भविष्य सुनिश्चित हो सके | महिलाओं को भी चाहिए कि वे बैंकिंग सीखें,अपना लॉकर ऑपरेट करना ,एटीम से पैसे निकालना आदि काम स्वयं,बिना किसी की मदद के करना सीखें | इस तरह वे अपने साथ होने वाली धोखाधड़ी से बची रह सकेंगी |
युवा पीढ़ी को समझाइश दी जानी चाहिए कि बुजुर्गों को स्नेह और सामान दिया जाय मगर औरतों को भी उनके अधिकारों का ज्ञान होना चाहिए और उनके भीतर आत्मनिर्भर होने की हिम्मत जगनी चाहिए | आस-पास की सभी ऐसी औरतें जो अकेली हैं, एकजुट होकर एक दूसरे का ख्याल रखें, मिलकर वे नियमित रूप से डॉक्टरी चेकअप के लिए और किसी धार्मिक स्थल की यात्रा पर भी जा सकती हैं | साथ मिल कर वे किसी पुस्तकालय की सदस्य बन जाएँ ,ये एक स्वास्थ और सस्ता मनोरंजन होगा और उनका वक्त भी आसानी से कट जाएगा |
सरकार के पास भी अकेली रहने वाली औरतों ,निराश्रित विधवाओं के लिए योजनाएं हैं जिनका लाभ वे ले सकती हैं | कई किस्म की रियायतें और सुविधाएं भी सरकार देती है | बच्चों के द्वारा देखभाल पाना माता-पिता का हक़ है | मगर हमारे देश में तकरीबन छः करोड़ वृद्ध महिलायें हैं जिनमें से कई एकाकी जीवन जीने को बाध्य हैं |
घर में अकेले रहने से बेहतर है कि महिलायें वृद्धाश्रमों में रहें | वहां उनका ध्यान रखने वाले लोग होंगें,बातचीत करने को संगी साथी और वहां वे सुरक्षित भी होंगी |  
सबसे ज्यादा आवश्यक है उनका स्वयं के प्रति विश्वास और जीवन जीने की ललक , फिर क्या संभव नहीं | एक बुज़ुर्ग शिक्षिका को मैं व्यक्तिगत रूप से जानती थी जो अतिसंपन्न परिवार से थीं पर अकेली रहती थीं और उनका एक हाथ भी नहीं था| यदाकदा कभी बिजली का मीटर देखने जैसे अटपटे कामों के अलावा उन्होंने कभी किसी से मदद नहीं ली | स्वयं पर विश्वास ही उनका संबल रहा होगा |
वर्तमान स्थिती बेहद कष्टदायी है | समाज से और युवावर्ग से एक अपील है कि वे समझें कि स्त्रियाँ दैहिक रूप से ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी पुरुषों से भिन्न हैं | उन्हें ज्यादा प्रेम और साथ की आवश्यकता है | बच्चों को इस बात का एहसास हो कि जड़ों को सिंचित किये बिना वृक्ष कैसे हरा रहेगा,कैसे पल्लवित और पुष्पित होगा | अपने बुजुर्गों के टिमटिमाते दिए की लौ को अपनी हथेलियों की आड़ दीजिये , जिससे सदा रोशन रहे आपका आँगन भी |  

-अनुलता- 

  

नए पुराने मौसम

मौसम अपने संक्रमण काल में है|धीरे धीरे बादलों में पानी जमा हो रहा है पर बरसने को तैयार नहीं...शायद उनकी आसमान से यारी छूट नहीं रही ! मोह...