इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Saturday, March 15, 2014

बुझती आँखों के वास्ते........

“शेल सिल्वरस्टीन” की एक प्रसिद्द कविता है – जो संवाद है एक बच्चे और बुज़ुर्ग के बीच |
बच्चा कहता है – मैं खाते वक्त कभी चम्मच गिरा देता हूँ|
बुज़ुर्ग कहता है - मैं भी
बच्चा फुसफुसाता है - मैं कभी अपनी पैंट गीली कर देता हूँ |
बुज़ुर्ग- मैं भी
बच्चा- मैं रोता हूँ
बुज़ुर्ग- मैं भी
बच्चा- मगर बड़े मुझ पर ध्यान नहीं देते
बुज़ुर्ग अपना झुर्रियों वाला हाथ बच्चे के हाथ में रख कहता है- हाँ मैं समझ सकता हूँ तुम क्या कहना चाहते हो |

“बुढ़ापा बचपन की पुनरावृत्ति होता है” मगर ये ऐसा बचपन है जिसमें ऊर्जा नहीं है,सकारात्मक सोच का अभाव है और असुरक्षा का भाव बच्चों से कई गुना अधिक | इसलिए इन्हें बच्चों से कहीं ज्यादा देखभाल और स्नेह ही आवश्यकता है | अक्सर बुजुर्गों को ये कहते सुना जा सकता है कि अब हमें क्या चाहिए- बस दो वक्त की रोटी ! पर यकीन मानिए कि वृद्धावस्था में इन्हें दो रोटी भले एक मिले पर दो पल स्नेह के मिल जाएँ तो इनका जीवन आसान हो जाय| मगर ये गिने चुने दो पल भी कहाँ हैं आज बच्चों के पास ? और यही है सबसे बड़ी समस्या आजकल बुजुर्गों की | यूँ तो हमारा समाज माँ-बाप को ईश्वर का दर्ज़ा देता है मगर हमारे देश में ही सबसे अधिक बुज़ुर्ग तिरस्कृत और एकाकी जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हैं ,विशेषकर बुज़ुर्ग औरतें |
जीवन के चौथे पहर में अकेलापन सबसे बड़ा अभिशाप है विशेषकर महिलाओं के लिए,क्यूंकि एक तो वे स्वभाव से ही संवेदनशील हैं और आरम्भ से उन्हें किसी न किसी पुरुष पर निर्भर रहने की आदत होती है| पहले पिता फिर भाई,पति और अंत में बेटों के बिना वे जीवन की कल्पना नहीं कर सकतीं,खासतौर पर मध्यमवर्गीय परिवारों में | अशिक्षित महिलाओं की हालत तो और भी बद्तर है |
हमारे समाज में शुरू से स्त्रियों को दोयम दर्ज़ा दिया गया है और अगर वे नौकरीपेशा हैं तब भी परिवार की ज़िम्मेदारी का बोझ उन पर डाल कर उन्हें केयर-टेकर बना दिया जाता है| और जब वे खुद दूसरों पर निर्भर रहने की स्थिति में आती हैं तब अपनों के द्वारा ही बोझ समझ ली जाती हैं |

आसान नहीं है एक औरत का अकेले रहना | बाज़ार हाट से सामान लाना,अस्पताल के चक्कर,बिजली पानी के बिल जमा करना ऐसी कई समस्याएं हैं जिनका उन्हें सामना करना पड़ता है| ऐसी औरतें अपराधियों के लिए भी आसान टार्गेट होती हैं | इसके अलावा जो भावनात्मक समस्या है वो सबसे बड़ी है | परिवार को जोड़े रखने वाली कड़ी को जब स्वयं एकाकी जीवन जीना पड़े तो उसका अवसाद में घिर जाना स्वाभाविक है | औरतें माँ बनते ही नानी दादी बनने के ख्वाब भी देखने लगती हैं और ऐसे में नाती पोतों से दूरियाँ उन्हें दुःख देती हैं | कभी दादी नानी से किस्से-कहानियां सुनकर उनकी गोद में सोने वाले बच्चे आज हेड-फोन लगाए सीने पर मोबाइल रख कर सोते हैं तो फिर आखिर बुजुर्गों की आवश्यकता ही क्या हुई घर में |
एक सर्वे के मुताबिक़ हमारे देश में शहरी इलाके में रहने वाले हर छः में से एक वृद्ध को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता है और हर तीन में एक को दवाइयां और चिकित्सा सेवा उपलब्ध नहीं है| और 21.2% वृद्ध महिलायें अकेले रहने पर मजबूर हैं | स्थिति बेहद शर्मनाक और चिंतनीय है और जिसके ज़िम्मेदार आज की युवा पीढ़ी है | एक समाचार में पढने में आया कि अकेले रहने वाली वृद्धा एक सुबह अचेतन अवस्था में पायी गयीं और कोमा में चली गयी | वजह सिर्फ इतनी थी कि परिजनों द्वारा उनकी डाइबिटीज़ की दवाई की पूर्ती समय पर नहीं की गयी थी | क्या ऐसी उपेक्षा और लापरवाही झेलने के लिए ही माँ बच्चों को जन्म देती है,पालती पोसती है ? 

ढलती उम्र में अकेले रहने में एक सबसे बड़ी समस्या है स्वास्थ की | महिलायें परिवार की देखभाल करते करते अपने पोषण का ध्यान नहीं करती और फिर आर्थराइटिस ,हाइपरटेंशन,स्तन कैंसर ,एनीमिया आदि बीमारियों से अकेले जूझती हैं | तो सबसे आवश्यक है कि औरतें वक्त रहते चेतें और अपना ख्याल रखें |
बेशक अकेले रहना आसान नहीं है मगर अगर औरतें शुरू से जागरूक रहें तो आनेवाली कई समस्याओं से उबर सकती हैं | पहले तो यदि औरत स्वयं नहीं कमाती हैं तो उनके पति या पिता का फ़र्ज़ है कि उनके नाम पर पैसा जमा किया जाय,यथासंभव ज़मीन,मकान और गहने उनके नाम किये जाएँ जिससे उनका भविष्य सुनिश्चित हो सके | महिलाओं को भी चाहिए कि वे बैंकिंग सीखें,अपना लॉकर ऑपरेट करना ,एटीम से पैसे निकालना आदि काम स्वयं,बिना किसी की मदद के करना सीखें | इस तरह वे अपने साथ होने वाली धोखाधड़ी से बची रह सकेंगी |
युवा पीढ़ी को समझाइश दी जानी चाहिए कि बुजुर्गों को स्नेह और सामान दिया जाय मगर औरतों को भी उनके अधिकारों का ज्ञान होना चाहिए और उनके भीतर आत्मनिर्भर होने की हिम्मत जगनी चाहिए | आस-पास की सभी ऐसी औरतें जो अकेली हैं, एकजुट होकर एक दूसरे का ख्याल रखें, मिलकर वे नियमित रूप से डॉक्टरी चेकअप के लिए और किसी धार्मिक स्थल की यात्रा पर भी जा सकती हैं | साथ मिल कर वे किसी पुस्तकालय की सदस्य बन जाएँ ,ये एक स्वास्थ और सस्ता मनोरंजन होगा और उनका वक्त भी आसानी से कट जाएगा |
सरकार के पास भी अकेली रहने वाली औरतों ,निराश्रित विधवाओं के लिए योजनाएं हैं जिनका लाभ वे ले सकती हैं | कई किस्म की रियायतें और सुविधाएं भी सरकार देती है | बच्चों के द्वारा देखभाल पाना माता-पिता का हक़ है | मगर हमारे देश में तकरीबन छः करोड़ वृद्ध महिलायें हैं जिनमें से कई एकाकी जीवन जीने को बाध्य हैं |
घर में अकेले रहने से बेहतर है कि महिलायें वृद्धाश्रमों में रहें | वहां उनका ध्यान रखने वाले लोग होंगें,बातचीत करने को संगी साथी और वहां वे सुरक्षित भी होंगी |  
सबसे ज्यादा आवश्यक है उनका स्वयं के प्रति विश्वास और जीवन जीने की ललक , फिर क्या संभव नहीं | एक बुज़ुर्ग शिक्षिका को मैं व्यक्तिगत रूप से जानती थी जो अतिसंपन्न परिवार से थीं पर अकेली रहती थीं और उनका एक हाथ भी नहीं था| यदाकदा कभी बिजली का मीटर देखने जैसे अटपटे कामों के अलावा उन्होंने कभी किसी से मदद नहीं ली | स्वयं पर विश्वास ही उनका संबल रहा होगा |
वर्तमान स्थिती बेहद कष्टदायी है | समाज से और युवावर्ग से एक अपील है कि वे समझें कि स्त्रियाँ दैहिक रूप से ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी पुरुषों से भिन्न हैं | उन्हें ज्यादा प्रेम और साथ की आवश्यकता है | बच्चों को इस बात का एहसास हो कि जड़ों को सिंचित किये बिना वृक्ष कैसे हरा रहेगा,कैसे पल्लवित और पुष्पित होगा | अपने बुजुर्गों के टिमटिमाते दिए की लौ को अपनी हथेलियों की आड़ दीजिये , जिससे सदा रोशन रहे आपका आँगन भी |  

-अनुलता- 

  

Wednesday, March 12, 2014

अंगूरी बादल.............

अंगूरी हो रक्खे थे बादल
उस रोज़,
गहरे नीले आकाश में
गुच्छा गुच्छा छितरे
जमुनी गुलाबी रंगत लिए
धूसर बादल....

तुमने कहा
ये बादल
तुम्हारे आंसुओं की वाष्प से बने हैं !
मैंने मान लिया था उस रोज़
कि तुम दुनिया की
सबसे दुखी लडकी थी |

वो बड़ी स्याह रात थी
तूफानी,
खूब बरसे थे वो बादल
गुलाबी जमुनी रंगत वाले
काले बादल....

तुम्हारा कहा परखने को
चखी थी मैंने
कुछ बूँदें...
सचमुच खारी थीं|

तुमने सही कहा था
कि मैं दुनिया का सबसे बुरा आदमी हूँ !
मैंने मान लिया था उस रोज़
बिना ख़ुद को परखे हुए !
~अनुलता ~






Wednesday, March 5, 2014

~संवेदनाएं खोलतीं सुख के द्वार~

आज एक उदास दिन था.....
 कि मन की उदासियों को ज़रा आराम मिला....जब शाम को मार्च की अहा ! ज़िन्दगी हाथ में आयी!
इस बार की अहा! ज़िन्दगी की थीम थी जीवन में सुख की सीढियाँ !
और एक सूत्र "संवेदना" की बागडोर पत्रिका ने  हमारे हाथ में सौपीं.
आप भी पढ़िए अहा! ज़िन्दगी में प्रकाशित मेरा आलेख !!
~संवेदनाएं खोलतीं सुख के द्वार~
महान कवि "एडगर एलन पो " के मुताबिक सौन्दर्य जब अपने चरमोत्कर्ष पर होता है तब हर संवेदनशील आत्मा,निरपवाद रूप से उत्तेजित और भावुक होकर रो पड़ती है | और इसका सीधा कारण है सुख की पराकाष्ठा का अनुभव !
अर्थात संवेदना हमारे जीवन में सुख का सहज कारण बनती है और हमें रूहानी तृप्ति प्रदान करती है | जैसे रंग और खुशबू के प्रति संवेदनशील तितली फूल से मधु पीकर तृप्त होती है |
संवेदनाएं मनुष्य को सुन्दर और सरल बनाती हैं,प्रेम करने का अवसर देती है जो स्वतः सुख का कारण है |
मिसाल के तौर पर यदि हम प्रकृति की ओर संवेदनशील हैं तो अपने आस पास वृक्ष लगायेंगे,वाटिका में फूल रोपेंगे,और पर्यावरण की रक्षा करेंगे,और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ये हमें ही सुखी करेगा | मन की ये संवेदना हमें आसमान की ओर तकने का,तारे गिनने का, चाँद और हरसिंगार पर कविता रचने का सुख देती है |

इसी तरह समाज के प्रति संवेदना हमें सभ्य बनाती है | किसी सामाजिक कार्य को करके,वृद्धाश्रमों और अनाथालयों में अपनी सेवाएँ देकर मनुष्य अपार सुख पाता है और इस सुख की लालसा उसे बेहतर इंसान बनाती है | इस बात को मदर टेरेसा या बाबा आमटे के जीवन से समझा जा सकता है |
मानव में संवेदना का गुण ही  उसे परिवार की ओर अग्रसर है, वो संतानोत्पत्ती करता है और जीवन भर बच्चों के पालन-पोषण,उनके भविष्य को सुरक्षित करके सुख पाता है | यहाँ उसका कोई स्वार्थ नहीं होता | वैसे ही पशुओं में भी यही प्रवृत्ति देखी जा सकती है |नेह के पुष्प संवेदना की डोर से ही जुड़ कर रिश्तों की माला बनाते हैं |

संगीत एक ऐसी विधा है जो सबको अपनी ओर खींचती है, मगर जो संगीत के प्रति संवेदनशील हैं वही महान संगीतज्ञ बने और इसकी साधना कर सुखी हुए | जैसे बाँस की पोली नली को फूंक कर आग तो कोई भी प्रज्वलित कर सकता है मगर इसी पोले बाँस को बांसुरी के रूप में विकसित कर अद्भुत तान छेड़ कर अपनी आत्मा को सुख के सागर में डुबोने की संवेदना और क्षमता सबमें नहीं होती | हर कलाकार का संवेदनशील होना बहुत ज़रूरी है | कला निश्चित तौर पर रूहानी और जज़्बाती सुख देती है | 
महान संगीतकार "जैसन मरज़ " के कहा है- दुःख की लड़ाई में संगीत सबसे बड़ा हथियार है,और संवेदनाएं ही मनुष्य को कला की ओर झुकाती हैं और अंततोगत्वा सुखी करती हैं | 

कुछ लोग स्वयं के प्रति भी संवेदनशील होते है और दूसरे उनके बारे में क्या सोचते हैं,क्या कहते हैं इसकी उन्हें फ़िक्र रहती हैं इसलिए वे  अपने बाहरी रंग-रूप,सेहत और बोल-चाल भाषा का बहुत ख़याल रखते हैं | ऐसे लोग आत्म-मुग्ध या नार्सिसिस्ट कहे जा सकते हैं मगर ये अपने आप में सुखी और संतुष्ट होते हैं |
इसी तरह मनुष्य अपनी संस्कृति के प्रति संवेदनशील रहता है विशेष रूप से हम भारतीय,जो अपनी संस्कृति को पूर्वजों की धरोहर के रूप में सहेजे रखना चाहते हैं | हम आज भी हमारे शास्त्रों के मुताबिक कार्य करते हैं ,जैसे बीमार व्यक्ति के लिए क्या पथ्य है क्या अपथ्य, कौन से कार्य कब किये जाएँ, ये घर में नानी- दादी तय करतीं हैं और जो फायदेमंद भी है और सुखकर भी | वैसे ही हमारी ईश्वर के प्रति आस्था, हमारा तीज- त्योहारों को मनाना आदि भी हमारी संवेदनशीलता का प्रतीक है और ये हमारे नीरस जीवन को विभिन्न रंगों से भरता है | दूसरे धर्मों के प्रति संवेदनशीलता हमें एक दूसरे के करीब लाती है और एक बेहतर इंसान होने का गर्व हम स्वयं पर कर सकते हैं | 

इस मिथ्याबोध को हटाना होगा कि संवेदनशीलता मानसिक दुर्बलता है | दरअसल ये प्रेम,दया,आदर और खुशी जैसे भावों को लेने और देने का एक दोतरफ़ा मार्ग है |
चार्ल्स डिकेंस कहते हैं "मैं सहृदय और संवेदनशील लोगों के बारे में इतना सोचता हूँ कि उन्हें कभी आहत नहीं कर सकता |" और सचमुच ये बहुत सुखद अनुभूति है |
अनुलता राज नायर

Tuesday, February 25, 2014

ओक में भर लिया था
तुम्हारा प्रेम
मैंने,
रिसता रहा बूँद-बूँद
उँगलियों की दरारों के बीच से |
बह ही जाना था उसे
प्रेम जो था !

रह गयी है नमी सी
हथेलियों पर
और एक भीनी
जानी पहचानी महक
प्रेम की |

ढांपती हूँ जब  कभी
हथेलियों से
अपना उदास चेहरा,
मुस्कुरा उठती हैं तुम्हारी स्मृतियाँ
और मैं भी !

कि लगता है
वक्त के साथ
रिस जाती हैं धीरे धीरे  
मन की दरारों से
पनीली उदासियाँ भी |
~अनुलता ~

Wednesday, February 19, 2014

~बातों बातों में प्यार हो जाएगा ~

टीना मुनीम अम्बानी कभी मेरी पसंदीदा अभिनेत्री नहीं रहीं | मगर उन पर एक आलेख लिखा | बस एक अनचाहा assignment मान कर उनके बारे में पढना शुरू किया तो लगा कि एक ठीक-ठाक सी अभिनेत्री होने के अलावा उन में कई खूबियाँ हैं .......आलेख के पूरा होते होते मुझे पसंद आने लगीं "टीना" :-) पढ़िए "आधी आबादी" पत्रिका में प्रकाशित मेरा आलेख !

~बातों बातों में प्यार हो जाएगा ~ 

मैं एक गृहणी हूँ, अस्पताल चलाती हूँ, और बहुत सारे सामाजिक कार्य करती हूँ...मेरा रिलायंस ADA ग्रुप से कोई सम्बन्ध नहीं, आप कभी आयें और देखिये कि हम कितने सारे सामाजिक दायित्वों को निभाते हैं| ये शब्द थे टीना मुनीम अम्बानी के,जब उन्हें 2G स्कैम के बाद अदालत में पेश किया गया और इसमें हैरानी की कोई बात नहीं कि माननीय अदालत ने उन्हें बिना किसी और पूछताछ के, बल्कि एक मुस्कराहट के साथ जाने की इजाज़त दे दी | उनके खूबसूरत व्यक्तित्व के आकर्षण से आखिर कोई भी अछूता कैसे रह सकता है |
आज आपको मिलवाती हूँ फिल्म इंडस्ट्री की बेहद खूबसूरत और आत्मविश्वासी नायिका से जिन्होंने अभिनय से इतर भी जीवन में कई मकाम हासिल किये और एक बेहद सार्थक जीवन की मिसाल पेश की|
1975 में एक अंतर्राष्ट्रीय सौन्दर्य प्रतियोगिता में जीत हासिल करने के बाद देवानंद साहब की नज़र उन पर पड़ी और “देस-परदेस” फिल्म से 1978 में टीना ने फिल्म जगत में अपना पहला कदम रखा | टीना एक ऐसे गुजराती परिवार थीं जिसका फिल्मों से दूर तक कोई नाता न था और न ही वो  खुद फिल्मों में दिलचस्पी रखती थीं, बल्कि पेड़ों के आस-पास चक्कर लगाते गाने गाना उन्हें खुद हास्यास्पद लगता था| मगर देवानंद जैसे महान अभिनेता का प्रस्ताव कोई कैसे ठुकरा सकता था और फिर उनका फ़िल्मी सफ़र बड़े सुन्दर मकाम हासिल करता 1987 तक चलता रहा जब तक कि वो कॉलेज अटेंड करने कैलिफ़ोर्निया नहीं चली गयीं | इस बीच उन्होंने 30-35 फिल्मों में काम किया जिनमें संजय दत्त के साथ रॉकी सुपर हिट रही | बासु चटर्जी के साथ उन्होंने दो सुन्दर फिल्में दीं- बातों-बातों में,और मनपसंद | हालाँकि वे खुद “अधिकार” को अभिनय की दृष्टि से सबसे बेहतरीन फिल्म मानती हैं |
टीना का फ़िल्मी करियर और भी बेहतर हो सकता था अगर वे समझदारी से फिल्मों का चयन करतीं मगर वे खुद को एक महत्त्वाकांक्षी अभिनेत्री नहीं मानती हैं | वे बचपन में डिज़ाइनर बनना चाहती थीं और उन्होंने कभी अपने अभिनय के कैरियर को संजीदगी से नहीं लिया...उनके भीतर शीर्ष पर पहुँचने की कोई तमन्ना नहीं थी | टीना विद्रोही स्वभाव की औरत हैं, उन्हें एक खींची हुई लकीर पर चलना पसंद नहीं | उन्होंने बहुत छोटी उम्र में अपना घर खरीदा और उसमें परिवार से अलग रहने लगीं | बेहद स्वाभिमानी स्वभाव की टीना दावा करती हैं कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में किसी का एहसान अपने सर नहीं लिया और इस बात के लिए उन्हें स्वयं पर गर्व है |
सिमी ग्रेवाल को दिए एक साक्षात्कार में टीना कहती हैं उन्होंने अपने पूरे जीवन में कभी किसी पर कोई इलज़ाम नहीं दिया | अपने हर सही गलत फैसले की पूरी ज़िम्मेदारी वो खुद लेती हैं और उन्हें अपने किसी भी फैसले पर आज तक अफ़सोस भी नहीं हुआ |
सकारात्मक सोच से भरी टीना ने कभी भविष्य के विषय में फ़िक्र नहीं की ,उन्हें यकीन था कि सही वक्त पर सब कुछ सही होगा खुद-ब-खुद | कर्म के सिद्धांतों पर चलने वाली इस बेहद आत्मविश्वासी युवती को पता था कि आप जिस चीज़,जिस जगह के लायक हों वो आपको मिल कर ही रहेगी | इसका सीधा सबूत उनकी ज़िन्दगी ने खुद उन्हें दिया जब देश के बड़े व्यवसायी अनिल अम्बानी उन पर मोहित हुए और दोनों ने मिलना शुरू किया पर टीना का फिल्मों से जुड़ा होना उनकी राह का रोड़ा बना क्यूंकि अम्बानी एक परम्पराओं को मानने वाला रूढीवादी परिवार कहा जा सकता था | इसके बाद करीब 3-4 साल तक वे आपस में मिले नहीं| कहते हैं ज़िन्दगी दूसरा मौका नहीं देती मगर टीना और अनिल को ज़िन्दगी ने दूसरा मौका
दिया अपनी मोहब्बतों को पाने का और वे एक हुए | कैलिफोर्निया से अनिल के बुलावे पर टीना भारत लौटीं और फिर उनको अम्बानी परिवार से मिलने बुलाया गया | टीना ने तब ज़रूर गुनगुनाया होगा कि- शायद मेरी शादी का ख़याल दिल में आया है,इसीलिए मम्मी ने तेरी मुझे चाय पे बुलाया है |
बिना किसी संवाद के इस लम्बे अंतराल में टीना ने अनिल को याद ज़रूर किया मगर कभी हताश नहीं हुईं, एक यकीन उन्हें ऊर्जा देता रहा होगा शायद !
रिचर्ड बेक ने कहा है कि अपने प्रेम को स्वछंद छोड़ दें, अगर वो आपका है तो आपके पास ही रहेगा वरना वो आपका कभी था ही नहीं...
दर्द के निशाँ मिट जाते हैं प्रेम के अंकुरित होते ही,
जैसे सूखे पत्तों से अच्छादित भूमि पर कभी झरती है रात की रानी !!
सुख आकर ही रहता है, यकीन मानिए !!
एक बात टीना की जो दिल को छू जाती है वो है उनका सरल और स्पष्ट स्वभाव, कि एक हिरोइन होते हुए भी उन्होंने अम्बानी परिवार में एक संयुक्त परिवार के रूप में खुशियाँ खोजी और निबाहा भी | 1991 में जब टीना 31 वर्ष की थीं तब उन्होंने अनिल अम्बानी से विवाह किया |
टीना के भीतर का कलाकार सिर्फ़ अभिनय में ही रुचि नहीं रखता बल्कि वे चित्रकारी की तरफ भी बड़ा रुझान रखती हैं | उनकी संस्था “हारमोनी आर्ट फाउंडेशन” समय समय पर “आर्ट इवेंट” का आयोजन करती रहती हैं जिसका मकसद कलाकारों को एक बेहतर मंच देने के अलावा सामाजिक सेवा भी होता है | इन कला प्रदर्शनियों में नीलामी से एकत्रित होने वाली धन राशि का उपयोग बेघर बच्चों और बुजुर्गों को आश्रय देने में किया जाता है | कुछ समय पहले ख्याति प्राप्त पेन्टर जोगेन चौधरी के साथ टीना ने एक पेंटिंग बनाई जो 95 लाख रूपए में नीलाम हुई और सारा पैसा सामाजिक कार्यों में खर्च किया गया | यूँ तो समाज सेवा ,चंदा उगाहना हर उच्चवर्गीय/रईस लोगों का पसंदीदा शगल होता है जिसमें समाज की सेवा कम और खुद की लोकप्रियता का मकसद ज्यादा होता है,मगर टीना के प्रयासों में निष्कपटता और गंभीरता साफ़ नज़र आती है | एक बेहद ईमानदार शख्सियत हैं टीना |
टीना को फोर्ब्स मैगज़ीन ने 2008 में “वाइफ्स ऑफ़ बिलियनेयर” में शामिल किया गया जिसकी कसौटी सिर्फ धनवान आदमी से शादी करना ही नहीं था बल्कि बाहरी और भीतरी सौन्दर्य का होना,बुद्धिमति होना और सार्थक कार्यों से जुड़े रहना था और टीना इन सभी शर्तों पर खरी उतरती थीं |
जय अनमोल और जय अंशुल के अलावा टीना का तीसरी संतान है – “कोकिलाबेन धीरुभाई अस्पताल” | ऐसा कहना है उनके पति अनिल धीरूभाई अम्बानी का |
इस अस्पताल को खोलना किसी और लोकोपकारी,सामाजिक कार्य की तरह आसान न था पर टीना के दृढ़ इरादों ने इसे सार्थक कर दिखाया | ये उनके दिवंगर श्वसुर धीरुभाई अम्बानी का सपना था जो उनके जीते जी पूर्ण न हो सका था | टीना अस्पताल में हर चीज़ का व्यक्तिगत रूप से ख्याल रखती हैं| चाहे वो कर्मचारियों पर नज़र रखना हो, दवाइयां, उपकरण,साफ़ सफाई से लेकर टिश्यू पेपर और साबुन तक का ध्यान उन्हें रहता है | ये अस्पताल उनके लिए व्यवसाय नहीं बल्कि मानवता की सेवा है |
इसी तरह “हारमोनी फॉर सिल्वर फाउंडेशन” रिलायंस ग्रुप द्वारा 2004 में स्थापित एक संस्था है जो बेघर,बेसहारा बुजुर्गों के लिए काम करती हैं | ये संस्था एक मासिक पत्रिका “हारमोनी” भी निकालती है जिसमें टीना अपना भरपूर योगदान देती हैं |
टीना के फ़िल्मी जीवन में बेशक उनके सम्बन्ध अभिनेताओं से जोड़े गए,ख़ास तौर पर राजेश खन्ना के साथ | पर विवाह के पश्चात टीना अम्बानी परिवार की बेहतरीन बहु, अच्छी पत्नी और माँ  साबित हुईं हैं | टीना एक सख्त माँ हैं, वे अपने बच्चों के दोस्तों से और उनके माता-पिता से बात करती रहती हैं, वे किस वक्त कहाँ हैं ये उन्हें पता होता है, और वे बच्चों को एक एक पैसे की कीमत से अवगत कराती रहती है जबकि टीना बार बार अपने साक्षात्कारों में ये कहती रही हैं कि उनके पति अनिल ने उन्हें आज तक किसी भी चीज़ के लिए मना नहीं किया और ऐसा कुछ भी नहीं उनके जीवन में जो वे पाना चाहती हों और पा न सकी हों | परियों की कथा सी है टीना की कहानी....सब कुछ सुनहरा...चमचमाता...चमत्कारी !!
टीना मुंबई की चमक-धमक से दूर रहना पसंद करती हैं, “शोभा डे” की पत्रिका “हेल्लो” के अप्रेल 2012 के संस्करण में टीना फिर लम्बे अंतराल के बाद कवर पेज पर दिखीं | इसी पत्रिका के लिए दिए एक साक्षात्कार में टीना ने शोभा डे को बताया कि आम सोशलाइट औरतों की तरह वे ब्रांडेड कपड़ों, ब्यूटी पार्लरों में अपना अपना वक्त ज़ाया नहीं करतीं,वे जब ज़रुरत पड़े कमर्शियल फ्लाइट का इस्तेमाल करती हैं, पति के चार्टर्ड प्लेन के होते हुए भी | बाहरी दिखावे से परे टीना के भीतर गज़ब का आत्मविश्वास है जो उन्हें सबसे अलग ,सबसे बेहतर बनाता है | भारत के सबसे रईस खानदान के होते हुए भी अपने पांव ज़मीन पर टिकाये रखना सबके बस की बात नहीं | मेरे कहने का ये कतई मतलब नहीं कि टीना ऐशोआराम की ज़िन्दगी नहीं जी रहीं, उनके पास वो सब कुछ है जो वे ख्वाब में भी पाना चाहती थीं | उनको अनिल अम्बानी ने एक 84 मिलियन डॉलर का शानदार “याट“ तोहफे में दिया जिसको उन्होंने नाम दिया “टियान” | इसे हम आप फिजूलखर्ची या दिखावा मानते हों तो मानते रहें |
वैसे टीना अम्बानी रिलायंस एंटरटेनमेंट, ड्रीम वर्क्स और आई.एम.ग्लोबल के ज़रिये अपनी जड़ें जो फिल्म इंडस्ट्री में दबी हैं,को सहारा दे रही हैं | इन फेस्टिवल्स के द्वारा ये फ़िल्मी दुनिया से जुड़े लोगों को सहयोग दे रही हैं और फिल्म उद्योग को अपना सहयोग और सलामी भी | अम्बानी के ड्रीम वर्क्स की वजह से अनिल और टीना को ऑस्कर समारोह के रेड कार्पेट में शिरकत करने का सुअवसर मिला वो भी स्टीवन स्पीलबर्ग के साथ | देस-परदेस से ऑस्कर तक का सफ़र टीना ने बेरोक टोक तय किया और हर मुकाम पर अपनी पहचान बनायी | देव साहब होते तो निस्संदेह अपनी खोज पर गर्व करते | उनके प्रशंसक शायद अब भी गुनगुनाते होंगे...हम तो आपके दीवाने हैं...बड़े मस्ताने हैं !!!
  
अनुलता राज नायर  

Tuesday, February 11, 2014


तुम्हारी याद का
हल्दी चन्दन
माथे पर लगाए
जोगन बन जाना
मेरे लिए
आसान नहीं....

कि सीले मौसम में
जब नदियाँ बदहवासी में
दौड़ रही होती हैं
समंदर की ओर,
प्रकृति उकेरती है
लुभावने चित्र,
और
बूंदें
हटा कर धूल की चादर,
निर्वस्त्र कर देतीं हैं पत्तों को......

भीगा होता बहिर् और अंतस !
तभी  
कहीं भीतर से
रिस आता है ललाट पर
वो अभ्रक वाला
लाल सिंदूर
और उसी क्षण
खंडित हो जाता है
मेरा जोग !
भंग हो जाती है
मेरी सारी तपस्या !

~अनुलता ~

Wednesday, February 5, 2014

वसंत

कच्ची हल्दी से रंगा तन,
लगा कर पांव में महावार
नव ब्याहता सी
आयी वासंती पवन !
शरमाती सकुचाती
झिझकती
आखिर हो ही गयी
आलिंगनबद्ध !!
(खुशियों के बड़े गहरे रहस्य थोड़ी न होते हैं.....)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
टेसू का खिलना
भौरों का गुनना
फूलती अमराइयाँ
कलियों की अंगडाइयाँ
कौन कहता है ये वसंत की दस्तक है ?
मेरे घर आता है वसंत
तुम्हारे तन से लिपटा हुआ
तुम्हारे मन में छिप कर!!
(प्रेम से प्यारा मौसम कोई न हुआ अब तक...)

~अनुलता ~
 

नए पुराने मौसम

मौसम अपने संक्रमण काल में है|धीरे धीरे बादलों में पानी जमा हो रहा है पर बरसने को तैयार नहीं...शायद उनकी आसमान से यारी छूट नहीं रही ! मोह...