इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Showing posts with label कहानी. Show all posts
Showing posts with label कहानी. Show all posts

Friday, May 10, 2013

लाल स्कार्फ वाली लड़की


वो देखता रहता उस पनीली आँखों वाली लडकी को,रेत के घरौंदे बनाते और बिगाड़ते.....उसे मोहब्बत हो चली थी थी इस अनजान,अजीब सी लडकी से...जो अक्सर लाल स्कार्फ बांधे रहती.....कभी कभी काला भी...

बरसों से समंदर किनारे रहते रहते इस मछुआरे को पहले कभी न इश्क हुआ था न कभी  ऐसी कोई लडकी दिखी थी.जाने कहाँ से आयी थी वो लडकी इस वीरान से टापू में....देखने में भली लगती थी मगर कुछ विक्षिप्त सी,खुद से बेपरवाह सी...(जाने लहरें उसे बहा कर लाई हैं  या किसी मछली के पेट से निकली राजकुमारी है वो...मछुआरा अपनी सोच के साथ बहा चला जाता था..)
लडकी को देखते रहना हर शाम का नियम था उसका.वो बिना कुछ कहे लड़की को समझने की नाकाम कोशिश करता था.
एक रोज़ वो लडकी के करीब पहुंचा....लडकी भी उसकी उपस्थिति से अभ्यस्त हो चुकी थी सो उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं की....बस अपना घरौंदा बनाती रही.....तोड़ देने के लिए...
तुम इतने  सुन्दर घरौंदे  क्यूँ बनाती हो ???और फिर उन्हें यूँ रेत में मिला देती हो??
कोई मिटाने के लिए भी बनाता है भला?? और ये लाल काला स्कार्फ क्यूँ बदलती हो??? एक साथ सारे सवाल दाग दिए उसने,मानों कहीं एक सवाल के बाद लडकी कोई रोक न लगा दे उसके बोलने पर.

बिना अपना चेहरा उठाये वो लड़की  बोली ,जब मैं घरौंदे बनाती हूँ तब प्रेम में होती हूँ और तब ये लाल स्कार्फ पहन लेती हूँ,घर के बनते ही मैं नफरत हो जाती हूँ और काला स्कार्फ पहन लेती हूँ और फिर मुझे घरौंदा तोडना अच्छा लगता है.
उसकी आवाज़ जैसे किसी शंख के भीतर से निकली ध्वनि हो.... 
खुद को सम्मोहित होने से रोकते हुए लड़के ने कहा-
तो तुम्हारे भीतर दो व्यक्तित्व हैं...एक भला एक बुरा !! आखिर कैसे जी लेती हो ये दोहरा जीवन?
लड़की ने पहली दफा पलकें ऊपर उठायी......सागर की गहराई मानों कम पड़ गयी उसकी आखों के आगे...और चेहरे की लुनाई मानों कोई तराशा हुआ सीप....
सच कहा तुमने मछुआरे....थक गयी हूँ ये दोहरा जीवन जीते जीते....कहो क्या तुम जियोगे मेरा एक जीवन???
लड़के की हाँ और न को सुने बिना ही उसने काला स्कार्फ लड़के की गर्दन में लपेट दिया और कहा अब इस घरोंदे को तुम तोड़ो.....मेरे भीतर की बुरे को तुम जियो.....
भीगी आँखों से लड़के ने घरौंदा तोड़ दिया और लड़की के गालों पर भी लुढ़क आये आँसू......
इसके पहले कभी एक सीप में दो मोती उसने न सुने न देखे थे  .

अब तो ये नियम बन गया...लडकी साहिल से दूर सुन्दर घरौंदा बनाती,लहरों से बचाती और फिर खुद लड़के से तोड़ डालने को कहती फिर जाने क्यूँ उन दोनों की आँखों से आँसू निकल आते...
लडकी के साथ एक सुन्दर सपनों का घर बनाने का ख्वाब देखने वाले लड़के के लिए ये एक यातना से कम न था,मगर बावली लडकी से इश्क की कीमत तो उसको चुकानी ही थी.
लड़का कहता तुम्हें घर तोडना ही है तो साहिल के नज़दीक क्यूँ नहीं बनाती,लहरें खुद-ब-खुद बहा ले जायेंगी,मगर लडकी कहाँ सुनती,कहती तुम तो हो तोड़ने के लिए,सागर की लहर ही तो हो न तुम......और उसका ये अनोखा क्रूर खेल चलता रहता.
लड़का थक गया उसे मनाते,समझाते......मगर वो नहीं मानी...लड़के ने खुद ही सोच लिया कि शायद किसी पहले प्यार की नाकामी ने ही उसको पागल बना दिया होगा,और अब उसके दिल में प्यार के लिए कोई गुंजाइश न थी....हाँ,मगर वो हर शाम सागर किनारे  इंतज़ार करती मछुआरे का और उसकी कश्ती किनारे लगते ही वो घरौंदा बनाने जुट जाती.
उस शाम सूरज ढल गया,मछुआरा नहीं लौटा.लड़की साहिल पर इंतज़ार करती रही और तारे निकल आये मगर कोई कश्ती किनारे नहीं लगी.
उस रोज़ समंदर लील गया था लड़के को...कौन जाने लहरों ने उसे डुबोया या उसने खुद जल समाधी ली !!
लड़की तो पहले ही बावली थी....
वो अब भी घरौंदे बनाती थी साहिल से दूर.......मगर घरौंदा बनते ही एक लहर जाने कहाँ से अपने तटबंध तोड़ती वहां तक आती और साथ ले जाती घरौंदा,और लड़की के दो बूँद आँसू भी.
लोग कहते हैं इसके पहले न समंदर इतना खारा था न ही सीप के भीतर मोती निकला करते थे.

~अनु ~




Friday, August 17, 2012

केतकी

मेरी पहली  कहानी महामुक्ति  पर सकारात्मक टिप्पणी करने के पहले आप लोगों ने सोचा नहीं.....सो अब पेशे खिदमत है मेरी दूसरी कहानी...
इसके रंग और महक कुछ अलग हैं....ज्यादा वक्त नहीं लगेगा सो पूरी पढ़ें ज़रूर....जब भी वक्त मिले...

                                                      केतकी
dainik bhaskar "मधुरिमा" में प्रकाशित 28/8/2013 

http://epaper.bhaskar.com/magazine/madhurima/213/28082013/mpcg/1/
केतकी  को आँच पर चढ़ाया मनोज जी ने,समीक्षक सलिल जी"बिहारी बाबू"
http://manojiofs.blogspot.in/2012/08/17.html?showComment=1345686607932#c7815674356444140107

उसे ठहराव पसंद नहीं था,ज़रा भी नहीं! गज़ब की चंचलता थी उसके मन में,उसके मस्तिष्क में,तन में,पूरे व्यक्तित्व में ही...ठहरना उसकी फितरत में न था.अपार ऊर्जा से भरी थी वो,इतनी ऊर्जा कि किसी इंसान के जिस्म से सम्हाली न जाए. वो अतिरिक्त ऊर्जा,वो तेज उसके चारों और संचारित होता रहता जैसे चाँद के आस-पास का सा वलय उसके चारों और भी हो. बेहद आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी थी केतकी.जो देखता,सिर्फ देखता ही नहीं रह जाता बल्कि उसका ही हो जाता,खिंचा चला आता उसकी ओर. उसके प्रति ये एकतरफा आकर्षण सिर्फ पुरुषों में ही नहीं था बल्कि लड़कियाँ, औरतें,बच्चे बूढ़े,कोई ऐसा न था जो उसके प्रति खिंचाव महसूस न करता. मानों एक चुम्बकीय शक्ति हो उसके भीतर.

केतकी गेहुएं रंग की सुगढ़ कद काठी वाली लड़की थी.नैन नक्श एकदम तीखे,तराशे हुए.चेहरा नापा तुला.आँखें बेहद आकर्षक और चंचल,ढेरों सवाल लिए हुए.सवाल तो सदा उसके होंठों पर भी रहते थे.जिसके साथ रहती उसी के आगे सवालों के ढेर लगा देती.उसका ज्ञान भी असीमित था इसलिए उसके सवाल बहुत बौद्धिक और रोचक होते.वैसे बेवकूफी भरे सवालों की भी कमी न थी उसके पास,मसलन वो अकसर अपने पुरुष साथियों से पूछ बैठती, कि जब वे जानते हैं कि केतकी उनकी हो नहीं सकती तो वो क्यूँ उस पर अपना वक्त और पैसा बर्बाद करते हैं? अब ऐसे सवाल के बाद किसी काफी शॉप में बैठा वो आशिक न जाने कैसे बिल अदा कर पाता होगा उसकी कॉफी का और हां साथ में चॉकलेट आइसक्रीम का भी तो.मनमौजी सी लड़की थी वो.

मैं केतकी को स्कूल के समय से जानता था.वो स्कूल में भी सबकी “हीरो” थी,और मेरे बहुत करीब...वैसे सहपाठी से लेकर टीचर्स,लैब असिस्टेंट,बस ड्राईवर,चौकीदार सभी उसका नाम जपते.वो भी कभी बस ड्राईवर के साथ ड्राइविंग के गुर सीखती कभी लेब में दो केमिकल मिला कर धमाका करती और लेब असिस्टेंट के साथ मिलकर खूब हँसती. एक बार मैंने देखा उसने एक बैग भर अपने नए पुराने कपडे उस लैब असिस्टेंट को दे डाले,उसकी बहन के लिए..मेरे पूछने पर बोली अरे सब पुराने फैशन के थे.साथ ही बडबडाती भी जाती थी-करमजला रोतली सूरत बनाये फिरता है,नफरत है मुझे उससे..मैं हैरान सा उसको ताकता रह जाता.उसका मन पढ़ना असंभव था.कुछ टिकता ही नहीं था बीस सेकेण्ड से ज्यादा ,तो कोई कैसे पढ़े??

केतकी का जीवन एक खुली किताब था.बिन माँ बाप की लड़की थी.मौसा मौसी ने पाला था.संपन्न परिवार से थी.उसके बारे में सबको सब कुछ पता होता था,बोलती इतना जो थी.मगर मुझे वो सदा रहस्यमयी सी लगती थी.ऐसा लगता मानो उसकी इस खुली किताब के पन्नों पर कुछ लिखा हुआ है एक अदृश्य स्याही से,जो कोई देख नहीं सकता...
मैं कहता भी उससे कि तुम्हारी तलछटी में जाकर फिर और गहरा खोद कर देखना है मुझे,वो मुस्कुरा कर कहती-मैं नदी हूँ अंश,सिवा पानी के कुछ नहीं...बहता पानी...साफ़ और पारदर्शी...जो चाहे देख लो...अपना अक्स भी...जितना गहरा खोदोगे उतना ज्यादा पानी पाओगे.और मत भूलना कि मोती सागर में मिलते हैं, नदियों में नहीं....वो बोलती चली जाती...बिना रुके...मैं सुनता रहता बिना कुछ समझे...... देखना एक दिन मैं भी सागर में मिल जाउंगी और पा जाउंगी एक मोती...जड़ लूंगी उसको अपनी अंगूठी में....

कितना शौक था उसे अंगूठियों का..हर उँगली में एक अंगूठी....पतली,मोटी,असली,नकली...
चाहे जैसी.....अंगूठा तक खाली नहीं था उसका.....सचमुच नदी थी वो...पागल नदी.

एक रोज वो बड़ी सी एक सिन्दूरी बिंदी लगा कर आई.......उसके मासूम से चेहरे के हिसाब से बहुत बड़ी.....फिर खुद ही हँस के बोली,ओल्ड फैशन लगती है न??? मैंने सोचा क्षितिज से उगता सूरज कभी ओल्ड फैशन हो सकता है भला.....मुस्कुरा दिया मैं.

उस दिन मेरे हाथ की रेखाएं देखने लगी......कहती है उसको सब आता है...उसके हिसाब से मेरा प्यार कोई और होगा और ब्याह मैं किसी और से करूँगा.....वाकई उसको सब पता है.....मैंने कहा लाओ तुम्हारा हाथ देखूं.....तो उसने मुट्ठी कस ली....नहीं अंश,मेरे हाथ में कोई लकीर नहीं....सब बह गयी पानी में.     

कभी कभी मुझे लगता केतकी एक माया मृग सी है.....जिसको देखो उसका दीवाना हुआ जाता है...भटकता है उसको पाने को...जबकि वास्तव में वो है ही नहीं....वो सिर्फ एक भ्रम है.....तभी उसकी हँसी मुझे ख्यालों से वापस ले आती......और मैं देखता उसको अपने एकदम करीब.
उसको जब कॉलेज में दाखिला लेना था तब मेरे पीछे चक्कर काटती फिरी कि अंश हम और तुम एक ही साथ पढेंगे.मैं भी छेड़ता उसको-क्यों भाई,क्या सारी उम्र मेरे पीछे लगी रहोगी,तुम साथ रहती हो तो कोई लड़की मेरे पास नहीं आती कि तुम हो मेरी और तुम मेरी होती नहीं.... 
उस रोज उसने बड़ी संजीदगी से कहा था-अंश मैं तुम्हारी ही हूँ,बस खुद को समझ सकूँ तुम्हारे काबिल, तो तुम्हें सुपुर्द कर दूँ स्वयं को.उसकी अटपटी बातें मुझे समझ नहीं आतीं मगर वक्त के साथ इतना ज़रूर समझ गया था कि उसके साथ मेरा लगाव मुझे तकलीफ ज़रूर देगा मगर मुझे मंज़ूर था.

हम कॉलेज साथ जाते,वहाँ ढेरों लड़के उसके आगे पीछे मंडराते और वो किसी से नोट्स बनवाती किसी को बाइक में पेट्रोल भरवाने भेजती...और सबसे कहती तुम्हारी नेकी मुझ पर उधार.....जाने कितने इसी उधारी के पटने के इंतज़ार में फिर रहे थे.मैं उसको समझाता भी कि ये क्या तरीका है,क्यूँ खिलवाड़ करती है सबके दिल के साथ और शायद अपने भी दिल के साथ? वो मेरा हाथ अपने सीने पर रख कर कहती देख,कहीं धडकन है क्या??पागल मेरे सीने में दिल ही नहीं है....फिर क्या है??कभी मैं भी बिफर जाता......वो बड़ी मासूमियत से कहती किडनी है- एक एक्स्ट्रा.....भगवान न करे कभी तुम्हे ज़रूरत पड़े तो दे दूँगी...एकदम मुफ्त....तुमने जो मुझे कल बर्गर खिलाया था न, वो चुकता समझ लेना....मैं सर पीट कर रह जाता.

कभी मुझे लगता केतकी मानसिक रूप से कुछ बीमार है.वो नोर्मल तो नहीं थी.हालांकि पढ़ने में वो बहुत अच्छी थी और बेहतरीन कलाकार भी थी.पेंटिंग में उसको महारत हासिल थी और गाती भी बड़ा सुराला थी.उसके कमरे में हमेशा संगीत बजता रहता...सारा दिन और सारी रात भी.मुझे उसकी पसंद कभी समझ नहीं आई.कभी वो गज़ल सुनती और कहती मैं गुलाम अली साहब पर मर मिटी हूँ अंश,सच्ची!!! कभी जिमी हेंड्रिक्स या जिम मोरिसन को सुन कर कहती,यार क्या नशा है इनमे,कभी कोई नशा करके मैं भी देखूँगी.मैं डर जाता उसकी बातें सुन कर.कभी वो सूफी संगीत पर झूमती कभी पंडित रविशंकर को सुनते हुए पेंट करती....अनबूझ पहेली थी केतकी....

हां उसकी पेंटिंग्स हमेशा एक सी होतीं,वो सिर्फ नदियाँ पेंट करती थी.अलग अलग किस्म की नदियाँ...अलग अलग वक्त के दृश्य.कहती ये सब मेरे सेल्फ़ पोट्रेट हैं अंश! मैं खुद इतनी सुन्दर हूँ तो कुछ और क्यूँ बनाऊं भला.ठीक है न??? मैं मुँह ताकता रह जाता उसका...वो उकसाती मुझे...कहो न...कुछ तो कहो...मैंने कह दिया- “नार्सीसिस्ट कहीं की”.... ठठा कर हँस पडी वो ....मुझे लगा सचमुच वो बहुत सुन्दर है ,बहुत सुन्दर नदी.निर्मल,शीतल सी....एक बहुत गहरी और शांत नदी.

एक रोज हम शहर के बाहर दूर एक मंदिर गए,उसे भगवान पर कोई विशेष आस्था नहीं थी,बस मंदिर एक नदी के किनारे था सो उसने प्लान बना डाला.वहाँ सीढ़ियों पर बैठे हम सूर्यास्त देखते रहे.नदी में उसका अक्स बड़ा प्यारा लग रहा था.वो अचानक बोली,अंश तुम अगर सूरज होते तो देखो हर शाम मुझ में ढल जाते...समां जाते मुझ में,है न?? कहो न???
उसके इस तरह के अकस्मात सवालों की मुझे आदत थी मगर फिर भी मैं विचलित हो जाता.उस रोज सोचने लगा था कि कहीं इसे भी तो मोहब्बत नहीं हो गयी मुझसे !!! तभी वो बोली कि मुझे लगता है मुझे किसी सागर नाम के लड़के से इश्क होगा,क्योंकि नदी सागर में ही तो जा मिलती है न ! वहीँ तो उसे पनाह मिलती है,मुक्ति मिलती है. मैं बोल पड़ा ,तुझे कभी इश्क नहीं हो सकता केतकी,किसी से भी नहीं...जब मुझसे नहीं हुआ तो किसी और से क्या होगा? अच्छा !! वो पास खिसक कर बोली...ऐसा क्या खास है तुममे??? मैं भी उसके पास खिसका और कहा –क्यूँ लंबा-चौड़ा हूँ,गोरा रंग है,आँखें नीली नहीं तो पनीली तो हैं,बाल घने, बिखरे ,मुस्कराहट के साथ तेरे पसंदीदा डिम्पल...और क्या चाहिए??? वो मुस्कुराई और बोली- “ नार्सीसिस्ट कहीं के”- और हम दोनों हँसते रहे देर तक......

जब वो इस तरह हँसती तो मुझे उसकी आँखों में अपने लिए कुछ प्यार सा दिखता....मुझे लगता भी कि उसे प्रेम है मुझसे,थोड़ा नहीं बल्कि बेइंतहा.....जितना कि कोई बिंदास नदी कर सकती है समंदर से......नदी जो बावली होकर बहती है उस समंदर की ओर....उसमें समां जाने को....उसमें समां कर अस्तित्वविहीन हो जाने को.....अपनी मिठास खो कर स्वेच्छा से खारी हो जाने को...अपनी स्वतंत्रता भूल कर ठहर जाने को.....

ऐसे ही ख्यालों ने मुझे उस दिन हिम्मत दी,जब हम फिल्म देख कर लौट रहे थे.उसने बाइक में मुझे कस कर पकड़ रखा था,उसका स्पर्श मुझे विचलित कर रहा था.ऐसा नहीं कि उसने कभी छुआ न हो मुझे...हम सालों से साथ थे और बहुत करीब भी,सो जाने अनजाने सहज भाव से किया स्पर्श कोई नयी बात न थी.मगर आज शायद मेरा मन ही मेरे वश में न था....मैंने बाइक उसके घर के सामने रोकी,उसने मेरा हाथ पकड़ा और बोली अंश शुक्रिया, मेरा दिन खूबसूरत गुज़रा तुम्हारी वजह से.वो जाने को मुडी तो मैंने उसकी ठंडी उंगलियां अपनी उँगलियों के बीच कस लीं. अरे अब क्या??? जाओ रात हो गयी है सब फ़िक्र करते होंगे घर में.मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और बिना सोचे कह गया- तुम्हारे दिन,तुम्हारी रातें,तुम्हारी पूरी ज़िन्दगी मैं खूबसूरत बना देना चाहता हूँ ,जीना चाहता हूँ तुम्हारे साथ...तुम्हारा होकर...केतकी, मैं प्यार करता हूँ तुमसे बेइन्तहा!!!

अब बारी केतकी की थी.उसने दो पल मेरी आँखों में देखा,वही जाने पहचाने अटपटे भाव,जिन्हें मैं कभी न पढ़ सका था......फिर उसने दूसरे हाथ से अपनी उंगलियाँ छुडाईं और बोली- एक दिन खूबसूरत गुजरा है जनाब,ये खूबसूरती और ताजगी सदा रहने वाली नहीं. चलो जाओ अब, आहिस्ता चलाना बाइक और घर पहुँच कर मैसेज कर देना.उसने पलट कर भी नहीं देखा और चली गयी.मैंने बदहवास सी बाइक दौड़ा दी.....वो रात शायद कुछ ज्यादा ही अँधेरी थी,या मेरी आँखें ओस से धुंधला गयीं थी.....जाने कैसे मेरी बाइक फुटपाथ पर चढ़ गयी.होश आया तो अस्पताल में था. सर पर ७ टाँके थे.बस कोई अंदरूनी चोट नहीं थी सो अगली सुबह घर भी आ गया.

दो रोज हुए केतकी का कोई पता नहीं था.न मिलने आई न कोई खबर ली.फोन भी बंद था उसका.तीसरे दिन आई तो मैंने सहज शिकायती लहजे में कहा कि बड़ी जल्दी फुर्सत मिली??? उसने अपनी जानी पहचानी अदा से जवाब दिया अरे तुम्हारा सर जिस फुटपाथ पर टकराया था उसकी मरम्मत में ज़रा व्यस्त हो गयी थी. मैं उसका चेहरा और लाल सूजी हुई आँखें देखता रहा,सोचता रहा और उसे  समझने की नाकाम कोशिशें करता रहा....
जब तक मेरे टाँके नहीं खुले वो रोज मिलने आती रही. खूब बोलती,बतियाती. उस रात का ज़िक्र हमने फिर कभी न किया मगर मुझे कुछ दरका सा महसूस होता रहा हमारे बीच.शायद मैंने अपने प्यार का इज़हार करके गलती कर दी थी.

खैर वक्त के साथ सब सामान्य हो जाएगा इस उम्मीद के साथ हम दिन काटने लगे. नौकरी मिलने के साथ ही घर में सभी और केतकी भी मेरी शादी के लिए जोर देने लगे.परिवार के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए मैं भी आखिरकार इस रस्मअदायगी के लिए तैयार हो गया....मुझे लगा केतकी का भ्रम अब तोडना ही होगा............उसके मायाजाल से बाहर आना ही होगा. 

उस रात अचानक फोन की घंटी बजी और उधर से केतकी का स्वर सुनाई पड़ा.....सुनो आखिरकार मुझे इश्क हो ही गया सागर से...तुम सुन रहे हो न???
हां,सुन रहा हूँ और जानता हूँ..गोवा के समुद्रतट है ही सुन्दर.किसे इश्क न होगा !

धत् तेरे की !!! तुम मुझे ज्यादा ही समझने लगे हो अंश,और मुझे ये बात ज़रा पसंद नहीं...अच्छा किया तुमने शादी कर ली,मेरा पीछा छोड़ दिया...अब उसको समझो और जानो जो पल्ले बंधी है तुम्हारे...और फोन रख दिया उसने.

मेरी शादी के बाद ये पहली रात थी और मैं उस पागल केतकी से बात कर रहा था...मगर शायद आखरी बार.मैंने तय कर लिया था कि अब कभी उससे कोई संवाद न रखूंगा....कभी नहीं.

मगर हर बार की तरह ये फैसला भी उसने ही लिया था.

अगले दिन तड़के गोवा के होटल से फोन आया कि केतकी अपने कमरे में एक नोट छोड़ गयी है कि- जा रही हूँ ...मुझे खोजना मत.....किसी मछुआरे को या गोताखोर को तंग न करना....मुझे पूरी तरह डूब जाने दो सागर के प्रेम में....उसकी तलछटी छूने निकली हूँ मैं.

और एक चिट्ठी मेरे नाम भी थी-

अंश तुम्हारा नाम सागर होता या सूरज...मैं कभी तुमसे प्यार न करती.जानते हो जिस रोज मैं पैदा हुई उसी रोज मेरे माँ बाप दोनों की मौत हुई.माँ डिलिवरी टेबल पर और पापा रोड एक्सीडेंट में.मौसी मौसा ने आसरा दिया तो बेचारे बेऔलाद रह गए.ये संयोग नहीं है अंश...ये इशारा था भगवान का. मैं बहुत अभागी हूँ अंश,हम अगर एक हुए होते तो तुम कभी खुश न होते....याद है तुम्हारे एक्सीडेंट वाली रात.....तुमने सिर्फ अपने प्यार का इज़हार किया था...और देखा था नतीजा ??

अंश मैं “केतकी” हूँ......मैं शापित हूँ शिवजी के द्वारा.जानते हो,केतकी के फूलों को पूजा में चढाना वर्जित है....

सुनो,तुम अगले जन्म में भी अंश ही बनना......और मैं बनूंगी तुम्हारी,सिर्फ तुम्हारी....झरूंगी तुम पर हरसिंगार बन कर...

हर जन्म में केतकी बनूँ ,इतनी भी अभागी नहीं हूँ !!!

-अनु 14/8/2012 

Tuesday, July 31, 2012

मेरी पहली कहानी.....

ये मेरी पहली कहानी है इसलिए कमियां लाज़मी हैं......कृपया पढ़ें और बेबाक टिप्पणियां दें.

महामुक्ति
भटक रही थी वो रूह,उस भव्य शामियाने के ऊपर,जहाँ सभी के चेहरे गमज़दा थे और सबने उजले कपडे पहन रखे थे.एक शानदार मंच सजा था जिस पर उसकी एक बड़ी सी तस्वीर,और तस्वीर पर ताज़े गुलाबों की माला थी और उसके आगे दीपक जल रहा था .
अनायास हंस पड़ी ललिता की रूह.....जीते जी वो कभी एक फूल या गजरा न सजा पायी अपने बालों में.जाने कितने तीज-त्यौहार यूँ ही निकल गए,कोरे....बिना साज सिंगार किये.शायद ये सब उसे मौत के बाद ही नसीब होना था.
आज ललिता की आत्मा की शांति के लिए पूजा-पाठ का आयोजन किया गया है,जिसमे उसके परिवार- जनों के अलावा साहित्य मण्डली के लोग भी शरीक हैं.सभी बारी बारी मंच पर आकर उसके गुणों का बखान कर रहे हैं और उसका असमय जाना  साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व  क्षति बता रहे हैं.
हैरान है वो अपनी ही उपलब्धियां सुन कर.जिसने सारी उम्र  नर्म स्वर में कहा गया एक वाक्य न सुना हो उसके लिए तो ये अजूबा ही है.उसकी प्रशंसा में कसीदे पढ़े जाने वालों की होड सी लगी  है.....जाने कहाँ थे ये लोग जब वो जिंदा थी.हमारे समाज की यही तो खासियत है,ढकोसलों से ऊपर आज तक नहीं उठ पाया.अपने दुखों का सार्वजनिक प्रदर्शन करना आदमी को आत्मसंतोष देता है.या शायद कभी कभी किसी ग्लानि भाव से मुक्ति भी दिलाता है.

ललिता की रूह बेचैन हो गयी.....तन तजने के बाद भी भारीपन अब तक नहीं गया था....क्यूँ मुक्त नहीं हुई वो???? किसी किसी को शायद मौत के बाद भी मुक्ति नहीं मिलती.जीते जी कुछ भी उसकी इच्छा के अनुरूप नहीं हुआ...अपना पूरा जीवन उसने दूसरों के इशारों पर जिया.अब मौत के बाद तो उसे मुक्ति का अधिकार मिलना चाहिए था.

तभी मंच पर उसका पति मदन आया....ललिता का जी मिचलाने लगा....ज़िन्दा होती तो शायद दिल धड़कने भी लगता ज़ोरों से. मदन ने भी ललिता को सरस्वती का अवतार बता डाला.....उसके मुख से अपनी प्रसंशा सुन कर भी ललिता को घृणा हो आई...पति का दोगला व्यवहार उस सहृदया को नागवार गुज़रा,मगर जब जीवित होते हुए उसने कभी किसी बात का विरोध नहीं किया तो अब क्या करती.सिसक के रह गयी उसकी रूह....
ललिता जब ब्याह कर आई थी तो हर नवयौवना की तरह अपने आँचल में ढेरो ख्वाब टांक कर लायी थी......दहेज के साथ अरमानों की पोटलियां भी थी......और उसके पिता ने सौंप दिया उसको एक ऐसे पुरुष के हाथों जिसने उसका आँचल तार तार कर दिया....दहेज की पोटली तो सम्हाल ली गयी मगर अरमानों को कुचल कर फेक दिया गया.
ललिता एक मध्यमवर्गीय सुसंस्कृत परवार की बेटी थी.वो दो बहने थीं, जिन्हें शिक्षक माता-पिता ने बड़े स्नेह से पाला था.उनकी हर उपलब्धि पर माँ उन्हें एक पुस्तक उपहार में  दिया करतीं जो उनके लिए किसी स्वर्णाभूषण से कम न थीं.दोनों बहने सुन्दर सुघड़ और संस्कारी थीं.
और ससुराल में माहौल एकदम उलट.....यहाँ अखबार में चटपटी खबर  पढ़ने के सिवा किसी को उसने पढते नहीं देखा,और तो और उसके पठन-पाठन पर भी उन्हें ऐतराज़ होता,ताना मारते हुए कहते -माँ शारदा,पहले काम तो निपटा लो...आहत मन से वो जुट जाती अपने काम में.घर में ससुर और पति के सिवा कोई था नहीं सो ज्यादा काम भी नहीं रहता था.अशिक्षित होने भर से क्या आदमी को पशुवत व्यवहार करने का अधिकार मिल जाता है ? ऐसे प्रश्न ललिता के मन में अकसर उठते  रहते.....मगर किससे मांगती उत्तर ??
आरम्भ में वो अपने अपमान को गटक नहीं पाती थी और मदन से जिरह करती...मगर मदन उसे "कुतर्क न कर" कह कर चुप करा देता........जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला हिसाब था यहाँ. सो धीरे धीरे उसने शिकायत करना भी छोड़ दिया...और खुद में मगन रहने लगी.मदन एक ऐसा पति था जो उसको न कभी हंसाता,न रिझाता न प्रेम जताता.........बस इस्तेमाल करता....ललिता हांड-मांस की बनी गुडिया सी हो गयी थी.. .... वक्त बेवक्त गुस्सा करना और उसके काम में मीन मेख निकालना बाप बेटा के स्वभाव में शामिल था.....मगर जो भी तमाशा होता वो आमतौर पर घर की चारदीवारी के अंदर ही होता सो आस पड़ोस में उसकी इज्ज़त अभी बनी हुई थी.मध्यमवर्गीय लोग ही तो ख़याल करते हैं समाज का,पास-पड़ोस का....वरना निम्न और उच्चवर्गीय लोगों में कहाँ कोई लिहाज या पर्दा रहता हैं...... ललिता लोगों से मेलजोल कम ही रखती थी,फिर भी जाने कैसे वो शांत और संतुष्ट दिखाई पड़ती थी. शायद भगवान ने उसको तरस खाकर ये वरदान दिया हो....
स्नेह का अभाव और वक्त-बेवत के ताने उसको तोड़ रहे थे भीतर ही भीतर ,अकेले में वो अपने तार तार हुए मन को सीती रहती..और किसी तरह जीती रहती....कभी कभी सोचती, कौन जाने,इनके ऐसे व्यवहार की वजह सी ही शायद उसकी सास असमय दुनिया छोड़ गयीं हों ?? काश वो जीवित होतीं तो एक स्त्री के होने से उसको कुछ सहारा मिलता शायद....शायद उनका नारी मन उसकी पीड़ा को समझता.मगर जो चला गया उसको वापस तो लाया नहीं जा सकता....जीवन के पन्ने कभी पीछे पलटे जा सकते हैं भला??
ऐसे ही माहौल में ललिता गर्भवती हुई.उसको लगा शायद अब दिन फिर जायेंगे,पितृत्व बदलाव अवश्य लाएगा मदन में.मगर उसके हाथों की लकीरें इतनी अच्छी न थीं........लिंग जांच के बाद उसका गर्भ गिरवा दिया गया......और ऐसा ३ सालों में २ बार हुआ...उनका कहना था कि उन्हें एक और ललिता नहीं जाहिए...कितना बोझा ढोयेंगे हम आखिर,उसके ससुर ने बुदबुदाया था उस रोज. ललिता का आहत मन चीख पड़ा था...मगर नक्कारखाने में तूती की तरह उसकी आवाज़ भी दीवारों से टकरा कर गुम हो गयी......वो कहना चाहती थी मुझे भी नहीं चाहिए बेटा...नहीं चाहिए एक और मदन.मगर उसका चाहना न चाहना मायने कहाँ रखता था.....आखिर उसने एक बेटे को जन्म दिया.सूखी छाती निचोड़ कर ललिता बेटे को बड़ा करने लगी, इस आस में कि उसके अँधेरे जीवन में दिया बन टिमटिमायेगा उसका बेटा.वो अपना पूरा वक्त बेटे को देती,उसे अच्छी कहानियाँ  सुनाती, दुनियादारी की सीख देती, मगर वो अकसर उसके हाथ ही न आता.भाग कर अपने दादा या बाप के पास चला जाता और वे उसको ही खदेड़ देते कि बच्चे को क्या प्रवचन देती रहती हो...सन्यासी बनाना है क्या?
बबूल के बीज  से कभी आम का पेड़ उगा है क्या???? नीम से निम्बोली ही झरेगी,हरसिंगार नहीं....

 पूत के पाँव पालने में दिखने लगते हैं सो इस कपूत के लक्षण भी १०-१२ साल से ही दिखने लगे.माँ को वो अपने पाँव की जूती समझता...पढ़ना लिखना छोड़ बारहवीं के बाद से ही बाप दादा के धंधे में लग गया.अब तीन तीन मर्दों के बीच ललिता स्वयं को बेहद असहाय महसूस करती.....अपना दोष खोजती रहती मगर सिवा उसके नसीब के उसमें कुछ खोट न था.बेटी का दुःख उसके माता-पिता की मृत्यु का कारण भी बना.अब इस दुनिया में एक बहन के सिवा उसका अपना कहने को कोई न था. वो अकसर उसको ढाढस बंधाती,और प्रेरित करती लिखते रहने को..सबसे पहले ललिता ने एक छोटी सी कविता लिखी,जो उसके अपने मन के उद्गार थे.
आज मैं
तुमसे
अपना हक मांग रही हूँ..
इतने वर्षों
समर्पित रही... बिना किसी अपेक्षा के..
बिना किसी आशा के..
कभी कुछ माँगा नहीं
और तुमने
बिना मांगे
दिया भी नहीं...
अब जाकर
ना जाने क्यूँ
मेरा स्त्री मन
विद्रोही हो चला है
बेटी/बहिन/बहु/पत्नी/माँ
इन सभी अधिकारों को
तुम्हे सौंप कर
एक स्त्री होने का हक
मांगती हूँ तुमसे...
कहो
क्या मंज़ूर है ये सौदा तुम्हे???

कविता उसकी बहन को इतनी पसंद आई कि उसने एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशन हेतु भेजने की बात की.ललिता सरल स्वभाव की थी सो उसने अपने पति से इजाज़त मांगी.मगर मदन तो सरल नहीं था न...वो भड़क गया और चेतावनी दे डाली कि खबरदार जो रचना भेजी...बहुत उड़ रही हो...तुम्हारे पर क़तर दूंगा ..जाने क्या क्या अनर्गल बक डाला उसने.
मगर इस दफा ललिता की बहन ने उसने लिए एक उपनाम चुना "गौरी" और रचना भेज दी.ललिता को उस रचना के लिए ढेरों बधाई पत्र और मानदेय भी मिला,जो उसकी बहन के पते पर आया.अब तो ललिता के मानों सचमुच पंख निकल आये..वो अकसर अपना लिखा भिन्न-भिन्न पत्रिकाओं में भेजती और प्रशंसा,मानदेय के साथ अभूतपूर्व संतुष्टि पाती...बरसों से सोयी उसके भीतर की कला और आत्मविश्वास अब जाग गया था.
एक बहुत बड़े प्रकाशक ने उसको उपन्यास लिखने का सुझाव दिया. रचनात्मकता की कोई कमी तो थी नहीं और उत्साह भी उबाल पर था.कुछ ही दिनो में उसने उपन्यास पूरा कर डाला और पुस्तक प्रकाशित होकर बाजार में भी आ गयी.ललिता ने एक बार फिर प्रयास किया कि मदन को बता कर विमोचन में जा सके मगर उसने साफ़ मना कर दिया.खूब लताड़ा भी ...साथ ही धमका भी दिया कि यहाँ अगर एक प्रति भी दिखी तो जला डालूँगा.ललिता कभी समझ नहीं पायी कि आखिर उसका गुनाह क्या था और उसकी इस प्रतिभा से मदन को क्या कष्ट था.शायद उसके अंदर की हीनभावना उससे ये सब करवा रही थी.ललिता सदा  मौन का कवच पहने रहती.और उसका मौन मुखर होता सिर्फ उसकी डायरी  के पन्नों पर....
ललिता का उपन्यास बहुत ज्यादा पसंद किया गया.प्रकाशक तो मानो बावला सा हो गया था.दूसरे उपन्यास के लिए उतावला हुआ जा रहा था...ललिता भी बहुत खुश थी मगर परिवार का असहयोग उसको खाए जा रहा था.मन बीमार हो तो तन भी कब तक साथ देता...ललिता अकसर बीमार रहने लगी.और जब भी वो अस्वस्थ महसूस करती या असमय लेट जाती तो पति या ससुर ताना मार देते कि सारी ऊर्जा पन्ने काले करने में क्यूँ गवां देती हो! पति चीखता,एक घर का काम ही तो करने के लायक थीं वो नहीं कर सकती तो तुम्हें पालें  क्यूँ???? ललिता को एहसास हो चला था कि इनके लिए मेरा कोई मोल नहीं.
सो एक दिन उसने सम्बंधित संस्थानों से संपर्क करके अपने नेत्र दान किये और अपनी देह भी मेडिकल कॉलेज को दान कर दी.उसको बड़ा संतोष मिला, संभवतः ऐसा करने से उसके आहत स्वाभिमान को थोड़ा सुकून मिला होगा . शायद मौत भी उसके इसी कदम का इन्तेज़ार कर रही थी.एक सुबह उसने इस नर्क से विदाई ले ली.......मुक्त हो ली वो पल-पल की घुटन से.
सुबह आठ बजे तक ललिता उठी नहीं तो पति ,ससुर, बेटा सभी चीखने लगे,मगर अब ललिता किसी की चीख पुकार सुनने वाली न थी....वो बहुत दूर चली गयी थी इन निर्मोहियों से....
अखबारों के माध्यम से ललिता का बहुत नाम हो गया था,सो खबर शहर भर में आग की तरह फ़ैल गयी.लोगों का तांता लग गया मदन के घर.अंतिम संस्कार की तैयारियाँ होने लगी.
तभी ललिता के तकिये के नीचे से एक कागज का पुर्जा निकला .मदन ने पढ़ा तो उसे पता लगा कि उसकी स्वाभिमानी पत्नि ने अपने नेत्र के साथ देह भी दान कर दी है.मुखाग्नि का अधिकार भी छीन लिया था उसने.मदन ने दो पल को  सोचा फिर  कागज फाड़ के फेंक दिया और शवयात्रा निकालने की तैयारी में जुट गया.मौत के बाद भी वो ललिता को मनमर्जी करने कैसे दे सकता था.
पूरे साजो श्रृंगार  के साथ ललिता की शवयात्रा निकली,और उसकी सुन्दर सी मासूम काया पंचतत्व में विलीन हो गयी.....जाने कितने ग़मगीन चेहरे उसकी चिता को घेरे थे.मौत के बाद ही सही उसको कुछ सम्मान तो मिला.

आज उसकी तेरहवीं है...और उसकी रूह देख रही है अपने परिजनों को,अपने लिए दुखी होते.ललिता की रूह परेशान सी यहाँ वहाँ भटकती रही......पूरे कर्मकांड किये गए उसकी आत्मा की शान्ति के लिए.मदन और उसका बेटा हरिद्वार हो आये ,उसकी अस्थियाँ गंगा जी में विसर्जित करने.पूजापाठ,प्रार्थना सभा क्या नहीं हुआ. मगर ललिता की रूह को मुक्ति नहीं मिली....भटकती फिर रही थी वो....न जीते जी चैन था न मर कर चैन पाया उस बेचारी ने.
उसकी मौत को आज पूरा एक माह हो गया था.उसने देखा मदन सुबह सुबह उठ कर नहा  धोकर कहीं निकल गया. ललिता की रूह उसका पीछा करने लगी...
मदन चलता चलता शहर के बाहर एक पुराने मंदिर की ड्योढ़ी पर बैठ गया.उसके हाथ में ललिता का लिखा हुआ उपन्यास था "महामुक्ति". वो अपलक उसे देखता रहा फिर पढ़ने लगा वह आखरी पन्ना जहाँ ललिता ने चंद पंक्तियों में अपने उपन्यास का सार लिखा था..मदन के बुदबुदाते स्वर को सुन सकती थी ललिता की रूह.....फिर रूह तो मन की आवाज़ भी सुन लेती हैं.
हे प्रभु!
मुक्ति दो मुझे
जीवन की आपधापी से
बावला कर दो मुझे
बिसरा दूँ सबको...
सूझे ना कुछ मुझे..
सिवा तेरे..

डाल दो बेडियाँ
मेरे पांव में..
कुछ अवरोध  लगे
इस  द्रुतगामी जीवन पर..
और दे दो मुझे तुम पंख...
कि मैं उड़ कर
पहुँच सकूँ तुम तक...
शांत करो ये अनबुझ क्षुधा
ये लालसा,मोह माया..

हे प्रभु!
मन चैतन्य कर दो..
मुझे अपने होने का 
बोध करा दो..
मुझे मुक्त करा दो.... 

मदन की आँखों से आंसू झरने लगे...पुस्तक के भीतर मुँह छुपाकर वो रोने लगा....
हैरान थी ललिता की रूह......मदन की आँख में आंसू !! वो भी ललिता के लिए ? मदन बहुत देर तक सिसकियाँ लेता रहा और फिर किताब को सीने से लगाये चला गया.....
ललिता की रूह को एक अजीब सा हल्कापन महसूस हुआ...उसको लगा उसे कोई खींच रहा है ऊपर......
गुरुत्वाकर्षण से परे वो चली जा रही थी ऊपर...बहुत
ऊपर......पा गयी थी वो "महामुक्ति" ..आज देह के साथ उसकी आत्मा भी मुक्त हो गयी थी.
ढेरों कर्म-कांड,हवन कुंड की आहुतियाँ और गंगा जी  का पानी उसकी आत्मा को मुक्त न कर सके थे, मगर मदन की आँख से गिरी दो बूंदों ने ललिता की आत्मा को शांत कर दिया...उसकी भटकन को राह दे दी.उसका जीवन भले व्यर्थ चला गया हो किन्तु उसकी मौत सार्थक हुई.
-अनुलता

नए पुराने मौसम

मौसम अपने संक्रमण काल में है|धीरे धीरे बादलों में पानी जमा हो रहा है पर बरसने को तैयार नहीं...शायद उनकी आसमान से यारी छूट नहीं रही ! मोह...