इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

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Saturday, March 15, 2014

बुझती आँखों के वास्ते........

“शेल सिल्वरस्टीन” की एक प्रसिद्द कविता है – जो संवाद है एक बच्चे और बुज़ुर्ग के बीच |
बच्चा कहता है – मैं खाते वक्त कभी चम्मच गिरा देता हूँ|
बुज़ुर्ग कहता है - मैं भी
बच्चा फुसफुसाता है - मैं कभी अपनी पैंट गीली कर देता हूँ |
बुज़ुर्ग- मैं भी
बच्चा- मैं रोता हूँ
बुज़ुर्ग- मैं भी
बच्चा- मगर बड़े मुझ पर ध्यान नहीं देते
बुज़ुर्ग अपना झुर्रियों वाला हाथ बच्चे के हाथ में रख कहता है- हाँ मैं समझ सकता हूँ तुम क्या कहना चाहते हो |

“बुढ़ापा बचपन की पुनरावृत्ति होता है” मगर ये ऐसा बचपन है जिसमें ऊर्जा नहीं है,सकारात्मक सोच का अभाव है और असुरक्षा का भाव बच्चों से कई गुना अधिक | इसलिए इन्हें बच्चों से कहीं ज्यादा देखभाल और स्नेह ही आवश्यकता है | अक्सर बुजुर्गों को ये कहते सुना जा सकता है कि अब हमें क्या चाहिए- बस दो वक्त की रोटी ! पर यकीन मानिए कि वृद्धावस्था में इन्हें दो रोटी भले एक मिले पर दो पल स्नेह के मिल जाएँ तो इनका जीवन आसान हो जाय| मगर ये गिने चुने दो पल भी कहाँ हैं आज बच्चों के पास ? और यही है सबसे बड़ी समस्या आजकल बुजुर्गों की | यूँ तो हमारा समाज माँ-बाप को ईश्वर का दर्ज़ा देता है मगर हमारे देश में ही सबसे अधिक बुज़ुर्ग तिरस्कृत और एकाकी जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हैं ,विशेषकर बुज़ुर्ग औरतें |
जीवन के चौथे पहर में अकेलापन सबसे बड़ा अभिशाप है विशेषकर महिलाओं के लिए,क्यूंकि एक तो वे स्वभाव से ही संवेदनशील हैं और आरम्भ से उन्हें किसी न किसी पुरुष पर निर्भर रहने की आदत होती है| पहले पिता फिर भाई,पति और अंत में बेटों के बिना वे जीवन की कल्पना नहीं कर सकतीं,खासतौर पर मध्यमवर्गीय परिवारों में | अशिक्षित महिलाओं की हालत तो और भी बद्तर है |
हमारे समाज में शुरू से स्त्रियों को दोयम दर्ज़ा दिया गया है और अगर वे नौकरीपेशा हैं तब भी परिवार की ज़िम्मेदारी का बोझ उन पर डाल कर उन्हें केयर-टेकर बना दिया जाता है| और जब वे खुद दूसरों पर निर्भर रहने की स्थिति में आती हैं तब अपनों के द्वारा ही बोझ समझ ली जाती हैं |

आसान नहीं है एक औरत का अकेले रहना | बाज़ार हाट से सामान लाना,अस्पताल के चक्कर,बिजली पानी के बिल जमा करना ऐसी कई समस्याएं हैं जिनका उन्हें सामना करना पड़ता है| ऐसी औरतें अपराधियों के लिए भी आसान टार्गेट होती हैं | इसके अलावा जो भावनात्मक समस्या है वो सबसे बड़ी है | परिवार को जोड़े रखने वाली कड़ी को जब स्वयं एकाकी जीवन जीना पड़े तो उसका अवसाद में घिर जाना स्वाभाविक है | औरतें माँ बनते ही नानी दादी बनने के ख्वाब भी देखने लगती हैं और ऐसे में नाती पोतों से दूरियाँ उन्हें दुःख देती हैं | कभी दादी नानी से किस्से-कहानियां सुनकर उनकी गोद में सोने वाले बच्चे आज हेड-फोन लगाए सीने पर मोबाइल रख कर सोते हैं तो फिर आखिर बुजुर्गों की आवश्यकता ही क्या हुई घर में |
एक सर्वे के मुताबिक़ हमारे देश में शहरी इलाके में रहने वाले हर छः में से एक वृद्ध को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता है और हर तीन में एक को दवाइयां और चिकित्सा सेवा उपलब्ध नहीं है| और 21.2% वृद्ध महिलायें अकेले रहने पर मजबूर हैं | स्थिति बेहद शर्मनाक और चिंतनीय है और जिसके ज़िम्मेदार आज की युवा पीढ़ी है | एक समाचार में पढने में आया कि अकेले रहने वाली वृद्धा एक सुबह अचेतन अवस्था में पायी गयीं और कोमा में चली गयी | वजह सिर्फ इतनी थी कि परिजनों द्वारा उनकी डाइबिटीज़ की दवाई की पूर्ती समय पर नहीं की गयी थी | क्या ऐसी उपेक्षा और लापरवाही झेलने के लिए ही माँ बच्चों को जन्म देती है,पालती पोसती है ? 

ढलती उम्र में अकेले रहने में एक सबसे बड़ी समस्या है स्वास्थ की | महिलायें परिवार की देखभाल करते करते अपने पोषण का ध्यान नहीं करती और फिर आर्थराइटिस ,हाइपरटेंशन,स्तन कैंसर ,एनीमिया आदि बीमारियों से अकेले जूझती हैं | तो सबसे आवश्यक है कि औरतें वक्त रहते चेतें और अपना ख्याल रखें |
बेशक अकेले रहना आसान नहीं है मगर अगर औरतें शुरू से जागरूक रहें तो आनेवाली कई समस्याओं से उबर सकती हैं | पहले तो यदि औरत स्वयं नहीं कमाती हैं तो उनके पति या पिता का फ़र्ज़ है कि उनके नाम पर पैसा जमा किया जाय,यथासंभव ज़मीन,मकान और गहने उनके नाम किये जाएँ जिससे उनका भविष्य सुनिश्चित हो सके | महिलाओं को भी चाहिए कि वे बैंकिंग सीखें,अपना लॉकर ऑपरेट करना ,एटीम से पैसे निकालना आदि काम स्वयं,बिना किसी की मदद के करना सीखें | इस तरह वे अपने साथ होने वाली धोखाधड़ी से बची रह सकेंगी |
युवा पीढ़ी को समझाइश दी जानी चाहिए कि बुजुर्गों को स्नेह और सामान दिया जाय मगर औरतों को भी उनके अधिकारों का ज्ञान होना चाहिए और उनके भीतर आत्मनिर्भर होने की हिम्मत जगनी चाहिए | आस-पास की सभी ऐसी औरतें जो अकेली हैं, एकजुट होकर एक दूसरे का ख्याल रखें, मिलकर वे नियमित रूप से डॉक्टरी चेकअप के लिए और किसी धार्मिक स्थल की यात्रा पर भी जा सकती हैं | साथ मिल कर वे किसी पुस्तकालय की सदस्य बन जाएँ ,ये एक स्वास्थ और सस्ता मनोरंजन होगा और उनका वक्त भी आसानी से कट जाएगा |
सरकार के पास भी अकेली रहने वाली औरतों ,निराश्रित विधवाओं के लिए योजनाएं हैं जिनका लाभ वे ले सकती हैं | कई किस्म की रियायतें और सुविधाएं भी सरकार देती है | बच्चों के द्वारा देखभाल पाना माता-पिता का हक़ है | मगर हमारे देश में तकरीबन छः करोड़ वृद्ध महिलायें हैं जिनमें से कई एकाकी जीवन जीने को बाध्य हैं |
घर में अकेले रहने से बेहतर है कि महिलायें वृद्धाश्रमों में रहें | वहां उनका ध्यान रखने वाले लोग होंगें,बातचीत करने को संगी साथी और वहां वे सुरक्षित भी होंगी |  
सबसे ज्यादा आवश्यक है उनका स्वयं के प्रति विश्वास और जीवन जीने की ललक , फिर क्या संभव नहीं | एक बुज़ुर्ग शिक्षिका को मैं व्यक्तिगत रूप से जानती थी जो अतिसंपन्न परिवार से थीं पर अकेली रहती थीं और उनका एक हाथ भी नहीं था| यदाकदा कभी बिजली का मीटर देखने जैसे अटपटे कामों के अलावा उन्होंने कभी किसी से मदद नहीं ली | स्वयं पर विश्वास ही उनका संबल रहा होगा |
वर्तमान स्थिती बेहद कष्टदायी है | समाज से और युवावर्ग से एक अपील है कि वे समझें कि स्त्रियाँ दैहिक रूप से ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी पुरुषों से भिन्न हैं | उन्हें ज्यादा प्रेम और साथ की आवश्यकता है | बच्चों को इस बात का एहसास हो कि जड़ों को सिंचित किये बिना वृक्ष कैसे हरा रहेगा,कैसे पल्लवित और पुष्पित होगा | अपने बुजुर्गों के टिमटिमाते दिए की लौ को अपनी हथेलियों की आड़ दीजिये , जिससे सदा रोशन रहे आपका आँगन भी |  

-अनुलता- 

  

Wednesday, March 5, 2014

~संवेदनाएं खोलतीं सुख के द्वार~

आज एक उदास दिन था.....
 कि मन की उदासियों को ज़रा आराम मिला....जब शाम को मार्च की अहा ! ज़िन्दगी हाथ में आयी!
इस बार की अहा! ज़िन्दगी की थीम थी जीवन में सुख की सीढियाँ !
और एक सूत्र "संवेदना" की बागडोर पत्रिका ने  हमारे हाथ में सौपीं.
आप भी पढ़िए अहा! ज़िन्दगी में प्रकाशित मेरा आलेख !!
~संवेदनाएं खोलतीं सुख के द्वार~
महान कवि "एडगर एलन पो " के मुताबिक सौन्दर्य जब अपने चरमोत्कर्ष पर होता है तब हर संवेदनशील आत्मा,निरपवाद रूप से उत्तेजित और भावुक होकर रो पड़ती है | और इसका सीधा कारण है सुख की पराकाष्ठा का अनुभव !
अर्थात संवेदना हमारे जीवन में सुख का सहज कारण बनती है और हमें रूहानी तृप्ति प्रदान करती है | जैसे रंग और खुशबू के प्रति संवेदनशील तितली फूल से मधु पीकर तृप्त होती है |
संवेदनाएं मनुष्य को सुन्दर और सरल बनाती हैं,प्रेम करने का अवसर देती है जो स्वतः सुख का कारण है |
मिसाल के तौर पर यदि हम प्रकृति की ओर संवेदनशील हैं तो अपने आस पास वृक्ष लगायेंगे,वाटिका में फूल रोपेंगे,और पर्यावरण की रक्षा करेंगे,और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ये हमें ही सुखी करेगा | मन की ये संवेदना हमें आसमान की ओर तकने का,तारे गिनने का, चाँद और हरसिंगार पर कविता रचने का सुख देती है |

इसी तरह समाज के प्रति संवेदना हमें सभ्य बनाती है | किसी सामाजिक कार्य को करके,वृद्धाश्रमों और अनाथालयों में अपनी सेवाएँ देकर मनुष्य अपार सुख पाता है और इस सुख की लालसा उसे बेहतर इंसान बनाती है | इस बात को मदर टेरेसा या बाबा आमटे के जीवन से समझा जा सकता है |
मानव में संवेदना का गुण ही  उसे परिवार की ओर अग्रसर है, वो संतानोत्पत्ती करता है और जीवन भर बच्चों के पालन-पोषण,उनके भविष्य को सुरक्षित करके सुख पाता है | यहाँ उसका कोई स्वार्थ नहीं होता | वैसे ही पशुओं में भी यही प्रवृत्ति देखी जा सकती है |नेह के पुष्प संवेदना की डोर से ही जुड़ कर रिश्तों की माला बनाते हैं |

संगीत एक ऐसी विधा है जो सबको अपनी ओर खींचती है, मगर जो संगीत के प्रति संवेदनशील हैं वही महान संगीतज्ञ बने और इसकी साधना कर सुखी हुए | जैसे बाँस की पोली नली को फूंक कर आग तो कोई भी प्रज्वलित कर सकता है मगर इसी पोले बाँस को बांसुरी के रूप में विकसित कर अद्भुत तान छेड़ कर अपनी आत्मा को सुख के सागर में डुबोने की संवेदना और क्षमता सबमें नहीं होती | हर कलाकार का संवेदनशील होना बहुत ज़रूरी है | कला निश्चित तौर पर रूहानी और जज़्बाती सुख देती है | 
महान संगीतकार "जैसन मरज़ " के कहा है- दुःख की लड़ाई में संगीत सबसे बड़ा हथियार है,और संवेदनाएं ही मनुष्य को कला की ओर झुकाती हैं और अंततोगत्वा सुखी करती हैं | 

कुछ लोग स्वयं के प्रति भी संवेदनशील होते है और दूसरे उनके बारे में क्या सोचते हैं,क्या कहते हैं इसकी उन्हें फ़िक्र रहती हैं इसलिए वे  अपने बाहरी रंग-रूप,सेहत और बोल-चाल भाषा का बहुत ख़याल रखते हैं | ऐसे लोग आत्म-मुग्ध या नार्सिसिस्ट कहे जा सकते हैं मगर ये अपने आप में सुखी और संतुष्ट होते हैं |
इसी तरह मनुष्य अपनी संस्कृति के प्रति संवेदनशील रहता है विशेष रूप से हम भारतीय,जो अपनी संस्कृति को पूर्वजों की धरोहर के रूप में सहेजे रखना चाहते हैं | हम आज भी हमारे शास्त्रों के मुताबिक कार्य करते हैं ,जैसे बीमार व्यक्ति के लिए क्या पथ्य है क्या अपथ्य, कौन से कार्य कब किये जाएँ, ये घर में नानी- दादी तय करतीं हैं और जो फायदेमंद भी है और सुखकर भी | वैसे ही हमारी ईश्वर के प्रति आस्था, हमारा तीज- त्योहारों को मनाना आदि भी हमारी संवेदनशीलता का प्रतीक है और ये हमारे नीरस जीवन को विभिन्न रंगों से भरता है | दूसरे धर्मों के प्रति संवेदनशीलता हमें एक दूसरे के करीब लाती है और एक बेहतर इंसान होने का गर्व हम स्वयं पर कर सकते हैं | 

इस मिथ्याबोध को हटाना होगा कि संवेदनशीलता मानसिक दुर्बलता है | दरअसल ये प्रेम,दया,आदर और खुशी जैसे भावों को लेने और देने का एक दोतरफ़ा मार्ग है |
चार्ल्स डिकेंस कहते हैं "मैं सहृदय और संवेदनशील लोगों के बारे में इतना सोचता हूँ कि उन्हें कभी आहत नहीं कर सकता |" और सचमुच ये बहुत सुखद अनुभूति है |
अनुलता राज नायर

Wednesday, February 19, 2014

~बातों बातों में प्यार हो जाएगा ~

टीना मुनीम अम्बानी कभी मेरी पसंदीदा अभिनेत्री नहीं रहीं | मगर उन पर एक आलेख लिखा | बस एक अनचाहा assignment मान कर उनके बारे में पढना शुरू किया तो लगा कि एक ठीक-ठाक सी अभिनेत्री होने के अलावा उन में कई खूबियाँ हैं .......आलेख के पूरा होते होते मुझे पसंद आने लगीं "टीना" :-) पढ़िए "आधी आबादी" पत्रिका में प्रकाशित मेरा आलेख !

~बातों बातों में प्यार हो जाएगा ~ 

मैं एक गृहणी हूँ, अस्पताल चलाती हूँ, और बहुत सारे सामाजिक कार्य करती हूँ...मेरा रिलायंस ADA ग्रुप से कोई सम्बन्ध नहीं, आप कभी आयें और देखिये कि हम कितने सारे सामाजिक दायित्वों को निभाते हैं| ये शब्द थे टीना मुनीम अम्बानी के,जब उन्हें 2G स्कैम के बाद अदालत में पेश किया गया और इसमें हैरानी की कोई बात नहीं कि माननीय अदालत ने उन्हें बिना किसी और पूछताछ के, बल्कि एक मुस्कराहट के साथ जाने की इजाज़त दे दी | उनके खूबसूरत व्यक्तित्व के आकर्षण से आखिर कोई भी अछूता कैसे रह सकता है |
आज आपको मिलवाती हूँ फिल्म इंडस्ट्री की बेहद खूबसूरत और आत्मविश्वासी नायिका से जिन्होंने अभिनय से इतर भी जीवन में कई मकाम हासिल किये और एक बेहद सार्थक जीवन की मिसाल पेश की|
1975 में एक अंतर्राष्ट्रीय सौन्दर्य प्रतियोगिता में जीत हासिल करने के बाद देवानंद साहब की नज़र उन पर पड़ी और “देस-परदेस” फिल्म से 1978 में टीना ने फिल्म जगत में अपना पहला कदम रखा | टीना एक ऐसे गुजराती परिवार थीं जिसका फिल्मों से दूर तक कोई नाता न था और न ही वो  खुद फिल्मों में दिलचस्पी रखती थीं, बल्कि पेड़ों के आस-पास चक्कर लगाते गाने गाना उन्हें खुद हास्यास्पद लगता था| मगर देवानंद जैसे महान अभिनेता का प्रस्ताव कोई कैसे ठुकरा सकता था और फिर उनका फ़िल्मी सफ़र बड़े सुन्दर मकाम हासिल करता 1987 तक चलता रहा जब तक कि वो कॉलेज अटेंड करने कैलिफ़ोर्निया नहीं चली गयीं | इस बीच उन्होंने 30-35 फिल्मों में काम किया जिनमें संजय दत्त के साथ रॉकी सुपर हिट रही | बासु चटर्जी के साथ उन्होंने दो सुन्दर फिल्में दीं- बातों-बातों में,और मनपसंद | हालाँकि वे खुद “अधिकार” को अभिनय की दृष्टि से सबसे बेहतरीन फिल्म मानती हैं |
टीना का फ़िल्मी करियर और भी बेहतर हो सकता था अगर वे समझदारी से फिल्मों का चयन करतीं मगर वे खुद को एक महत्त्वाकांक्षी अभिनेत्री नहीं मानती हैं | वे बचपन में डिज़ाइनर बनना चाहती थीं और उन्होंने कभी अपने अभिनय के कैरियर को संजीदगी से नहीं लिया...उनके भीतर शीर्ष पर पहुँचने की कोई तमन्ना नहीं थी | टीना विद्रोही स्वभाव की औरत हैं, उन्हें एक खींची हुई लकीर पर चलना पसंद नहीं | उन्होंने बहुत छोटी उम्र में अपना घर खरीदा और उसमें परिवार से अलग रहने लगीं | बेहद स्वाभिमानी स्वभाव की टीना दावा करती हैं कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में किसी का एहसान अपने सर नहीं लिया और इस बात के लिए उन्हें स्वयं पर गर्व है |
सिमी ग्रेवाल को दिए एक साक्षात्कार में टीना कहती हैं उन्होंने अपने पूरे जीवन में कभी किसी पर कोई इलज़ाम नहीं दिया | अपने हर सही गलत फैसले की पूरी ज़िम्मेदारी वो खुद लेती हैं और उन्हें अपने किसी भी फैसले पर आज तक अफ़सोस भी नहीं हुआ |
सकारात्मक सोच से भरी टीना ने कभी भविष्य के विषय में फ़िक्र नहीं की ,उन्हें यकीन था कि सही वक्त पर सब कुछ सही होगा खुद-ब-खुद | कर्म के सिद्धांतों पर चलने वाली इस बेहद आत्मविश्वासी युवती को पता था कि आप जिस चीज़,जिस जगह के लायक हों वो आपको मिल कर ही रहेगी | इसका सीधा सबूत उनकी ज़िन्दगी ने खुद उन्हें दिया जब देश के बड़े व्यवसायी अनिल अम्बानी उन पर मोहित हुए और दोनों ने मिलना शुरू किया पर टीना का फिल्मों से जुड़ा होना उनकी राह का रोड़ा बना क्यूंकि अम्बानी एक परम्पराओं को मानने वाला रूढीवादी परिवार कहा जा सकता था | इसके बाद करीब 3-4 साल तक वे आपस में मिले नहीं| कहते हैं ज़िन्दगी दूसरा मौका नहीं देती मगर टीना और अनिल को ज़िन्दगी ने दूसरा मौका
दिया अपनी मोहब्बतों को पाने का और वे एक हुए | कैलिफोर्निया से अनिल के बुलावे पर टीना भारत लौटीं और फिर उनको अम्बानी परिवार से मिलने बुलाया गया | टीना ने तब ज़रूर गुनगुनाया होगा कि- शायद मेरी शादी का ख़याल दिल में आया है,इसीलिए मम्मी ने तेरी मुझे चाय पे बुलाया है |
बिना किसी संवाद के इस लम्बे अंतराल में टीना ने अनिल को याद ज़रूर किया मगर कभी हताश नहीं हुईं, एक यकीन उन्हें ऊर्जा देता रहा होगा शायद !
रिचर्ड बेक ने कहा है कि अपने प्रेम को स्वछंद छोड़ दें, अगर वो आपका है तो आपके पास ही रहेगा वरना वो आपका कभी था ही नहीं...
दर्द के निशाँ मिट जाते हैं प्रेम के अंकुरित होते ही,
जैसे सूखे पत्तों से अच्छादित भूमि पर कभी झरती है रात की रानी !!
सुख आकर ही रहता है, यकीन मानिए !!
एक बात टीना की जो दिल को छू जाती है वो है उनका सरल और स्पष्ट स्वभाव, कि एक हिरोइन होते हुए भी उन्होंने अम्बानी परिवार में एक संयुक्त परिवार के रूप में खुशियाँ खोजी और निबाहा भी | 1991 में जब टीना 31 वर्ष की थीं तब उन्होंने अनिल अम्बानी से विवाह किया |
टीना के भीतर का कलाकार सिर्फ़ अभिनय में ही रुचि नहीं रखता बल्कि वे चित्रकारी की तरफ भी बड़ा रुझान रखती हैं | उनकी संस्था “हारमोनी आर्ट फाउंडेशन” समय समय पर “आर्ट इवेंट” का आयोजन करती रहती हैं जिसका मकसद कलाकारों को एक बेहतर मंच देने के अलावा सामाजिक सेवा भी होता है | इन कला प्रदर्शनियों में नीलामी से एकत्रित होने वाली धन राशि का उपयोग बेघर बच्चों और बुजुर्गों को आश्रय देने में किया जाता है | कुछ समय पहले ख्याति प्राप्त पेन्टर जोगेन चौधरी के साथ टीना ने एक पेंटिंग बनाई जो 95 लाख रूपए में नीलाम हुई और सारा पैसा सामाजिक कार्यों में खर्च किया गया | यूँ तो समाज सेवा ,चंदा उगाहना हर उच्चवर्गीय/रईस लोगों का पसंदीदा शगल होता है जिसमें समाज की सेवा कम और खुद की लोकप्रियता का मकसद ज्यादा होता है,मगर टीना के प्रयासों में निष्कपटता और गंभीरता साफ़ नज़र आती है | एक बेहद ईमानदार शख्सियत हैं टीना |
टीना को फोर्ब्स मैगज़ीन ने 2008 में “वाइफ्स ऑफ़ बिलियनेयर” में शामिल किया गया जिसकी कसौटी सिर्फ धनवान आदमी से शादी करना ही नहीं था बल्कि बाहरी और भीतरी सौन्दर्य का होना,बुद्धिमति होना और सार्थक कार्यों से जुड़े रहना था और टीना इन सभी शर्तों पर खरी उतरती थीं |
जय अनमोल और जय अंशुल के अलावा टीना का तीसरी संतान है – “कोकिलाबेन धीरुभाई अस्पताल” | ऐसा कहना है उनके पति अनिल धीरूभाई अम्बानी का |
इस अस्पताल को खोलना किसी और लोकोपकारी,सामाजिक कार्य की तरह आसान न था पर टीना के दृढ़ इरादों ने इसे सार्थक कर दिखाया | ये उनके दिवंगर श्वसुर धीरुभाई अम्बानी का सपना था जो उनके जीते जी पूर्ण न हो सका था | टीना अस्पताल में हर चीज़ का व्यक्तिगत रूप से ख्याल रखती हैं| चाहे वो कर्मचारियों पर नज़र रखना हो, दवाइयां, उपकरण,साफ़ सफाई से लेकर टिश्यू पेपर और साबुन तक का ध्यान उन्हें रहता है | ये अस्पताल उनके लिए व्यवसाय नहीं बल्कि मानवता की सेवा है |
इसी तरह “हारमोनी फॉर सिल्वर फाउंडेशन” रिलायंस ग्रुप द्वारा 2004 में स्थापित एक संस्था है जो बेघर,बेसहारा बुजुर्गों के लिए काम करती हैं | ये संस्था एक मासिक पत्रिका “हारमोनी” भी निकालती है जिसमें टीना अपना भरपूर योगदान देती हैं |
टीना के फ़िल्मी जीवन में बेशक उनके सम्बन्ध अभिनेताओं से जोड़े गए,ख़ास तौर पर राजेश खन्ना के साथ | पर विवाह के पश्चात टीना अम्बानी परिवार की बेहतरीन बहु, अच्छी पत्नी और माँ  साबित हुईं हैं | टीना एक सख्त माँ हैं, वे अपने बच्चों के दोस्तों से और उनके माता-पिता से बात करती रहती हैं, वे किस वक्त कहाँ हैं ये उन्हें पता होता है, और वे बच्चों को एक एक पैसे की कीमत से अवगत कराती रहती है जबकि टीना बार बार अपने साक्षात्कारों में ये कहती रही हैं कि उनके पति अनिल ने उन्हें आज तक किसी भी चीज़ के लिए मना नहीं किया और ऐसा कुछ भी नहीं उनके जीवन में जो वे पाना चाहती हों और पा न सकी हों | परियों की कथा सी है टीना की कहानी....सब कुछ सुनहरा...चमचमाता...चमत्कारी !!
टीना मुंबई की चमक-धमक से दूर रहना पसंद करती हैं, “शोभा डे” की पत्रिका “हेल्लो” के अप्रेल 2012 के संस्करण में टीना फिर लम्बे अंतराल के बाद कवर पेज पर दिखीं | इसी पत्रिका के लिए दिए एक साक्षात्कार में टीना ने शोभा डे को बताया कि आम सोशलाइट औरतों की तरह वे ब्रांडेड कपड़ों, ब्यूटी पार्लरों में अपना अपना वक्त ज़ाया नहीं करतीं,वे जब ज़रुरत पड़े कमर्शियल फ्लाइट का इस्तेमाल करती हैं, पति के चार्टर्ड प्लेन के होते हुए भी | बाहरी दिखावे से परे टीना के भीतर गज़ब का आत्मविश्वास है जो उन्हें सबसे अलग ,सबसे बेहतर बनाता है | भारत के सबसे रईस खानदान के होते हुए भी अपने पांव ज़मीन पर टिकाये रखना सबके बस की बात नहीं | मेरे कहने का ये कतई मतलब नहीं कि टीना ऐशोआराम की ज़िन्दगी नहीं जी रहीं, उनके पास वो सब कुछ है जो वे ख्वाब में भी पाना चाहती थीं | उनको अनिल अम्बानी ने एक 84 मिलियन डॉलर का शानदार “याट“ तोहफे में दिया जिसको उन्होंने नाम दिया “टियान” | इसे हम आप फिजूलखर्ची या दिखावा मानते हों तो मानते रहें |
वैसे टीना अम्बानी रिलायंस एंटरटेनमेंट, ड्रीम वर्क्स और आई.एम.ग्लोबल के ज़रिये अपनी जड़ें जो फिल्म इंडस्ट्री में दबी हैं,को सहारा दे रही हैं | इन फेस्टिवल्स के द्वारा ये फ़िल्मी दुनिया से जुड़े लोगों को सहयोग दे रही हैं और फिल्म उद्योग को अपना सहयोग और सलामी भी | अम्बानी के ड्रीम वर्क्स की वजह से अनिल और टीना को ऑस्कर समारोह के रेड कार्पेट में शिरकत करने का सुअवसर मिला वो भी स्टीवन स्पीलबर्ग के साथ | देस-परदेस से ऑस्कर तक का सफ़र टीना ने बेरोक टोक तय किया और हर मुकाम पर अपनी पहचान बनायी | देव साहब होते तो निस्संदेह अपनी खोज पर गर्व करते | उनके प्रशंसक शायद अब भी गुनगुनाते होंगे...हम तो आपके दीवाने हैं...बड़े मस्ताने हैं !!!
  
अनुलता राज नायर  

Sunday, February 2, 2014

अमृता शेरगिल - अपने कैनवस के रंगों सी....




(30 जनवरी 1913 – 5 दिसंबर 1941)

महान कलाकार माइकलेंजिलो ने कहा था-“ व्यक्ति अपने दिमाग से पेंट करता है हाथों से नहीं,शायद यही वजह है कि हर कलाकार की कलाकृति उसके हस्ताक्षर होते हैं | आज मैं आपको मिलवाती हूँ एक ऐसी महान कलाकार से जिन्होंने मात्र 28 वर्ष के छोटे से जीवन काल में एक इतिहास रंग डाला और रंगों से भावनाओं का ऐसा इन्द्रधनुष उकेरा कि लोगों ने दाँतों तले उँगलियाँ दबा लीं- मिलिए हिन्दुस्तान की “फ्रिडा काह्लो”, “अमृता शेरगिल” से |

कहते हैं कि एक महान कलाकार सदा समय से बहुत आगे या बहुत पीछे रहता है | अमृता शेरगिल अपनी वास्तविक ज़िन्दगी में और अपने आर्ट में भी अपने समकालीन कलाकारों से बहुत आगे थीं | उनकी सोच का दायरा असीमित था,वे परफेक्शनिस्ट नहीं थीं और यही उनकी खासियत थी|  
अमृता के पिता थे अभिजात्य कुल के सिख, संस्कृत और पारसी भाषा के विद्वान, उमराव सिंह शेर-गिल मजीठिया और माँ मेरी एन्तोनिएट, इटली की यहूदी ऑपेरा सिंगर थीं |अमृता का जन्म भी बुडापेस्ट,हंगरी में ही हुआ | अमृता के भीतर का कलाकार मात्र पांच वर्ष की उम्र से ही पंख फैलाने लगा था,जब वे अपनी माँ के द्वारा सुनायी कहानियों को बेहद ख़ूबसूरती से रेखांकित करने लगी थीं|

अमृता के जीवन का अधिकतर समय यूरोप में ही गुज़रा जहाँ वे अपने मामा “इरविन बकते” के करीब रह कर काफी कुछ सीख पायीं,जिन्होंने हंगरी में भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार में बहुत योगदान दिया था और स्वयं एक बेहतरीन कलाकार थे, और वे ही प्ररोक्ष रूप से अमृता के वापस भारत आने की वजह बने | उन्होंने ही अमृता को सुझाव दिया कि वे अपने आस पास की महिलाओं को अपना मॉडल बनायें |
1921 में अमृता भारत आयीं और वे शिमला में रहने लगे जहाँ उन्होंने इटालियन मूर्तिकार से प्रशिक्षण लेना आरम्भ किया,फिर उसी मूर्तीकार के वापस इटली चले जाने पर 1924 में वे वापस इटली आयीं और जहाँ उन्होंने चित्रकारी का प्रशिक्षण लिया | हालाँकि वे सिर्फ पाँच महीने के छोटे प्रवास के बाद ही अपनी माँ और बहन के साथ वापस हिन्दुस्तान लौट आईं | 1924 से 1929 तक अमृता शिमला में रहीं और समूचे हिन्दुस्तान में घूम कर अपनी कला को धार दी | हालाँकि ये देश भ्रमण उनकी माँ की नज़र से देखें तो सिर्फ सामाजिक संपर्क बढाने के मकसद से किया गया था | 1929 में अमृता को पेरिस में चित्रकला की बाकायदा ट्रेनिंग देने के लिहाज से उनका पूरा परिवार पेरिस आ गया,अमृता तब सिर्फ 16 वर्ष की थीं |
आने वाले 6 बरस इस प्रतिभाशाली,जोशपूर्ण और आकर्षक लड़की ने “कला के क्षेत्र के मक्का ” कहे जाने वाले शहर पेरिस में बिताये जहाँ उनके भीतर सोये चित्रकला के बीजों ने अंकुरण किया और कल्पनाएँ खूब फली-फूलीं और लहलहायीं | इन्हीं दिनों अमृता ने अपनी बहन के साथ पियानो और वायलिन भी सीखा |
यहाँ रह कर अमृता ने धाराप्रवाह फ्रेंच बोलना सीखी और ऊँचे तबके के फ्रेंच और अन्य यूरोपियन लोगों में उठने बैठने लगीं | उन्हें रूढ़ीमुक्त फ्रेंच लोगों की सोहबत में आनंद आने लगा और वे भारत से आयी सकुचाई और गंभीर लड़की के खोल से बाहर आयीं | अमृता अब एक खूबसूरत, बहिर्मुखी और पुरुषों के बीच लोकप्रिय लड़की थी |
पेरिस में अमृता ने ग्रैंड शेमेर इंस्टिट्यूट में दाखिला लिया,मगर उनके बनाए स्केच और पेंटिंग प्रभाववाद के मुताबिक नहीं थे,वे न्यूड मॉडल्स पेंट करतीं मगर वे यथार्थ से दूर होतीं | उन्हीं दिनों वे लुइ सिमोन के संपर्क में आयीं,जिन्होंने उसकी अनोखी प्रतिभा की वजह से अवयस्क होने के बावजूद अपने स्टूडियो में दाखिला दिया |सिमोन से सीखना अमृता को बहुत भाया | उनके उन्मुक्त तौर तरीके अमृता से मेल खाते थे और सिमोन से ही अमृता ने रंगों का महत्त्व और उनका सही इस्तेमाल सीखा|यहाँ उन्होंने तीन साल काम किया | लुई सिमोन ने तब ही कहा था “कि एक दिन मुझे गर्व होगा कि अमृता शेरगिल मेरी शिष्या थीं ”|
1930 से 1932 के बीच अमृता ने लगभग 60 पेंटिंग्स बनाईं जिनमें ज़्यादातर सेल्फ पोट्रेट,पोट्रेट,स्थिर वस्तु चित्र(स्टिल लाइफ)और लैंडस्केप्स बनाए.उन्होंने अपने कैनवस पर पेरिस की रंगीनियाँ नहीं उकेरी बल्कि वहाँ के जीवन के घिनौने और श्याम पक्ष को उजागर किया| लाल और सफ़ेद रंग उनके ख़ास पसंदीदा थे.सफ़ेद रंग उन्हें रहस्यमयी लगता था |
1933 में उन्होंने एक प्रसिद्ध पेंटिंग बनायी – “द प्रोफेशनल मॉडल” जिसमें उन्होंने एक उम्रदराज़ मॉडल ली जिनके कंधे झुके,चेहरा झुर्रियों से भरा और शरीर अनाकर्षक था मगर आँखों में अब भी जीने की ललक और चमक बाकी थी. इसी थीम पर उन्होंने दो और पेंटिंग्स बनायी जो बहुत प्रसिद्द हुईं|
1930 में उन्होंने “पोट्रेट ऑफ़ ए यंग मैन” बनायी जिसके लिए उन्हें “एकोल” पुरूस्कार मिला(नेशनल स्कूल ऑफ़ फाइन आर्ट्स इन पेरिस द्वारा )|1932 में अमृता शेर-गिल ने ”यंग गर्ल्स” नाम से पहली महत्त्वपूर्ण पेंटिंग बनाई जिसके फलस्वरूप 1933 में उन्हें पेरिस में “एसोसिएट ऑफ़ दी ग्रैंड सलून ” के लिए चयनित किया गया| ये सम्मान पाने वाली वे सबसे कम उम्र की और पहली एशिआयी थीं |
उन दिनों कलाकारों में परंपरा के विरुद्ध जाना एक चलन बन गया था,जैसे कोई फैशन या स्टेटस सिम्बल| उसी लीक पर चलते अमृता ने कई नग्न पेंटिंग्स बनायीं और समलैंगिकता को भी दर्शाया | अमृता शेरगिल का व्यक्तिगत जीवन भी इसी तरह के विवादों और आक्षेपों से घिरा रहा |उनके जीवन में असफल प्रेम-प्रसंगों की भरमार रही | एक अंग्रेज़ पत्रकार,लेखक और व्यंगकार मेल्कॉम की मानें तो अमृता शेरगिल अपने कई प्रेम प्रसंगों के होते हुए भी मन से सदा कुंवारी रहीं, क्यूंकि उन्हें स्वयं से प्यार था,उन्हें नार्सीसिस्ट (आत्ममुग्ध) कहा जाता था और ये बात उनके सेल्फ़ पोट्रेट्स देख कर सच भी लगती है |

वे बचपन से अपने रिश्ते के एक भाई, विक्टर के बेहद करीब थीं और उनसे शादी करना चाहती थीं मगर उनकी माँ उन्हें किसी रईस और रसूखदार घर में ब्याहना चाहती थीं इसलिए उनकी सगाई अकबरपुर ताल्लुका के रईस युसूफ अली खान से कर दी | मगर इस सगाई ने उन्हें अनचाहा गर्भ और कई रोग दिए| अमृता ने विक्टर  से सलाह ली जो एक डॉक्टर भी था, और गर्भपात के बाद युसूफ से रिश्ता तोड़ लिया | इसके बाद के दिन अमृता ने बेहद अनियमित जीवन जिया और अपने मन और तन दोनों को काफी हद तक बर्बाद कर लिया,उन्होंने खुद लिखा कि “मैं एक एप्पल(सेव फल) की तरह हूँ,जो बाहर से सुर्ख लाल दिखता है मगर भीतर से सड़ा हुआ है” |  
1934 में अमृता को भारत लौटने की तलब लगने लगी,उन्हें आश्चर्जनक रूप से ये महसूस होने लगा कि एक कलाकार के रूप में उनका भाग्योदय भारत में ही लिखा है,शायद वे जानती थीं कि उनके पास अब ज़्यादा ज़िन्दगी बाकी नहीं है | भारत लौटने के पश्चात अमृता पूरी तरह कला के लिए समर्पित हो गयीं | उन्होंने भारतीय संस्कृति,इतिहास और कला के विभिन्न आयामों को बारीकी से समझा, सीखा और यहाँ की फिज़ाओं में बिखरे रंगों का उन्होंने अपनी कला में बखूबी इस्तेमाल किया |
भारत आने के बाद अमृता ने यहाँ के आम लोगों को अपने कैनवस पर उतारना शुरू किया | दुबले पतले शरीर,उदास आँखों वाली मजदूर पहाड़ी औरतें उन्हें आकर्षित करतीं | 1937 में उन्होंने “थ्री गर्ल्स” पेंटिंग बनाई जिसके लिए उन्हें कई बड़े पुरूस्कार मिले और पहचान भी | शिमला की फाइन आर्ट सोसाइटी में हुई प्रदर्शनी में अमृता की कुछ पेंटिंग्स को सराहा गया और ज़्यादातर को आलोचना का शिकार होना बड़ा जिसका अमृता ने कड़े शब्दों में लिखित रूप से विरोध किया और आर्ट सोसाइटी का बहिष्कार भी किया |

1935 में उन्होंने “मदर इंडिया ” बनायी जो उनकी पसंदीदा थी |
आल इंडिया फाइन आर्ट्स सोसाइटी के द्वारा उन्हें उनके “सेल्फ पोट्रेट” के लिए पुरुस्कृत किया गया इस पर उन्होंने कहा कि आर्ट सोसाइटी ने मेरी बकवास चित्रकारी को पुरूस्कार दिया |कला के लिए उनकी अपनी परिभाषाएं थीं, अपने मापदंड थे | वे शायद समय से बहुत आगे चल रही थीं | उनके बनाये चित्रों और कंसेप्ट को अखबारों और कला आलोचकों ने “बदसूरत” तक कह डाला | 20 नवम्बर 1936 को अमृता शेरगिल ने बम्बई में एक कला प्रदर्शनी में हिस्सा लिया जहाँ बड़े बड़े अखबारों और कला समीक्षकों ने अमृता के काम की खूब सराहना की| टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने उन्हें भारत के सबसे बेहतरीन युवा कलाकार का दर्ज़ा दिया | अमृता आम लोगों के पोट्रेट्स बनाना पसंद करती थीं,गाँव के लोग,आदिवासी,गरीब ,बूढ़े लोग उनके मॉडल होते | वे कहती, इनमें मुझे सच्चाई और निष्ठा दिखती हैं | पैसे देकर अपना पोर्ट्रेट बनवाने वालों से उन्हें नफरत थी | बोम्बे आर्ट सोसाइटी ने उन्हें “थ्री गर्ल्स” के लिए स्वर्ण पदक से नवाज़ा | अब अमृता पर सबकी नज़र थी और लोग उनमें आने वाले दिनों की सबसे उम्दा कलाकार की छवि देखते थे | अमृता शेरगिल अब सफ़ल कलाकार थीं |
उनके प्रशंसकों में पंडित नेहरू भी एक थे,वे अपना पोर्ट्रेट अमृता से बनवाना चाहते थे मगर अमृता को लगा कि उनका चेहरा इतना सुन्दर है कि कैनवस पर नहीं उतारा जा सकता |
1937 में उन्होंने हैदराबाद में प्रदर्शिनी लगाईं| वहां वे नवाब सालारजंग को अपनी कृतियाँ बेचना चाहती थीं | नवाब साहब ने उन्हें अपना कलेक्शन दिखा कर पूछा –कैसा लगा ? तब अमृता ने जवाब दिया “करोड़ों रुपये का कबाड़” | ज़ाहिर है नवाब ने अमृता की कोई पेंटिंग नहीं ली | अमृता कला के प्रति समर्पित थीं उनके भीतर कोई दिखावा नहीं था न ही वे दूसरों की शर्तों पर झुकने वाली औरत थीं |
कला समीक्षकों का कहना था कि शेरगिल की कला को पहली बार देखने पर हम भौचक्के रह जाते हैं क्यूंकि हम अभ्यस्त नहीं हैं उस तरह की पेंटिंग देखने के | आप अमृता की कला को या तो बेहद पसंद कर सकते हैं या उनसे घृणा कर सकते हैं मगर आप उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते |
1938 में विक्टर से शादी का ख्याल लेकर अमृता फिर हंगरी गयीं | वहां विक्टर विश्व युद्ध में व्यस्त रहा और अमृता ने अपने जीवन के कुछ बेहतरीन चित्र बनाए जिनमें “हंगेरियन मार्केट सीन”,”टू गर्ल्स” और “न्यूड” प्रमुख हैं |
अमृता और विक्टर भारत आ गए | उन दिनों अमृता को अपनी कृतियों के लिए कई अस्वीकृतियाँ झेलनी पड़ी जिससे वे मानसिक अवसाद से घिर गयीं| 1940 के शुरुआती दौर में उन्होंने खुद को उबारा और फिर से चित्रकारी शुरू की और कुछ बेहतरीन चित्र ”एन्शिएनट स्टोरी टेल्लर” और “स्विंग”(झूला) बनाए | परन्तु उनकी तूलिका के रंग मन के भीतर की स्याह दीवारों को रंग न सके| उन्होंने अपनी बहन को बड़े दुःख भरे पत्र लिखे| उन्होंने लिखा मैं स्वयं को अनचाहा,चिडचिडा और असंतुष्ट महसूस करती हूँ पर फिर भी रो सकने में असमर्थ हूँ | कलाकार बड़े भावुक और नर्मदिल होते हैं,उन्हें क्या व्यथित कर देता है वे स्वयं नहीं समझ पाते |
सितम्बर 1940 में अमृता और विक्टर लाहौर आ गए आर्थिक तंगी के होते हुए भी ज़िन्दगी ने थोडा रफ़्तार पकड़ी, मगर 3 दिसम्बर को सुबह से अमृता की तबियत खराब हुई और विक्टर और दो अन्य डॉक्टर के प्रयास के बाद भी अमृता नहीं बचीं |
उनके जीवन के कैनवस पर बनायी जाने वाली तस्वीर अधूरी रह गयी | रावी नदी के तट पर अमृता का रंगीन जीवन धूसर रंग में बदल गया | वे एक आख़री चित्र “दाहसंस्कार” बनाने की आस लिए ही चली गयीं मगर कैनवस पर उनके दिए रंग आज भी उतने ही चमकदार और जिंदा है जितना वे खुद थीं और उनकी कला आज राष्ट्रीय धरोहर के रूप में नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट, दिल्ली में सहेज कर रखी गयी है|
(2006 में अमृता की एक पेंटिंग “विलेज सीन”, नीलामी में 6.9 करोड़ रूपए में बिकी जो भारत में किसी चित्रकारी के लिए दी गयी सबसे बड़ी रकम थी|)    
(सभी पेंटिंग्स गूगल से साभार !) 
-अनुलता-  
              


                                                 

Thursday, October 24, 2013

इंदिरा -आधी आबादी पत्रिका में प्रकाशित मेरा आलेख.

लेख लिखना न मेरे बस का था न शौक में शामिल था ....एक प्रतिष्ठित पत्रिका "आधी आबादी " के लिए पहली बार लेख लिखा "अमृता प्रीतम "पर | भरपूर सराहना मिलने पर अब "आधी आबादी" के लिए हर माह एक आलेख लिख रही हूँ और लिखते लिखते खुद से सीख रही हूँ |
राजनीति और नेता कभी मेरी पसंद नहीं रहे मगर फिर भी पत्रिका की मांग पर अक्टूबर अंक के लिए इंदिरा गाँधी  पर लिखा | वे इकलौती राजनेता थीं जिनके व्यक्तित्व ने मुझे प्रभावित किया था | 
आशा है आलेख आपको पसंद आएगा -


इंदिरा प्रियदर्शिनी
(19 नवम्बर 1917- 31अक्टूबर 1984)

छोटी सी थी मैं,कोई 14-15 बरस की जब अपने पिता की उँगलियाँ थामे भोपाल शहर की एक सुन्दर सड़क के किनारे खड़ी इंदिरा जी की रैली का इंतज़ार कर रही थी. खुली जीप में , पीली साड़ी में हाथ हिलाती उस गरिमामयी छवि ने मेरे मन में तब से ही घर कर लिया था. उन्होंने अमलतास के फूलों का एक गुच्छा मेरी ओर फेंका, एक पल को उनकी नज़र मुझ पर भी पड़ी थी. बस तब से इंदिरा गाँधी कई और लाखों लोगों की तरह मेरी भी पसंदीदा राजनेत्री बन गयीं.
बेहद आकर्षक और चुम्बकीय व्यक्तित्व की स्वामिनी इंदिरा जी को मैंने पहली बार जाना उनके पिता श्री जवाहल लाल नेहरु के द्वारा लिखे पत्रों के संकलन से, जो मेरे पिताजी ने मुझे एक पुस्तक के रूप में उपहार स्वरुप दिए थे. ये पत्र नेहरु जी ने इंदिरा को 1928 में लिखे थे जब वे मसूरी में पढ़ रही थीं और सिर्फ 10-11 वर्ष की थीं. इन पत्रों को उनके पिता ने  दूरी की वजह से उपजी संवादहीनता की स्थिति से बचने के लिए लिखा था, जिनमें उन्होंने उन सभी प्रश्नों के उत्तर  लिखे जो एक बालसुलभ मन में पैदा होते होंगे. उन्होंने पत्रों के माध्यम से पृथ्वी के बनने से लेकर सभ्यताओं और संस्कृतियों के विषय में भी समझाया. ज्ञान और समझदारी का पहला पाठ इंदिरा को इन पत्रों से मिला. नींव सुदृढ़ हो तो इमारत का बुलंद होना स्वाभाविक है.
नेहरु परिवार में सबसे बड़ा बदलाव आया जब १९१९ में महात्मा गाँधी साउथ अफीका से लौटने के बाद उनसे मिले और जिनके प्रभाव में आकर इंदिरा के माता पिता,पंडित जवाहर लाल नेहरु और कमला नेहरु स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़े. इंदिरा अपने दादा मोतीलाल नेहरु के बेहद करीब थीं पर फिर भी माता पिता के जेल जाने और लगातार अनुपस्थिति ने छोटी उम्र में ही उन्हें गंभीर बना दिया और एक परिपक्व सोच दी. बचपन में उनके खेल भी ब्रिटिश सेना को मार भगाने जैसे विषयों को लेकर होते. मात्र 11 बरस में उन्होंने वानर सेना बनायी जो रामायण के पात्र हनुमान और लंका दहन के लिए बनाई उनकी वानर सेना से प्रेरित थी. वे 13 बरस की थीं जब में अपने स्कूल में उन्होंने कहा “गाँधी जी सदा से मेरे जीवन का हिस्सा हैं”. बचपन से ही उनमें स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने की ललक और जज़्बा था,एक किस्सा बार बार पढने में आता है कि उन्हीं दिनों अपने पिता के पास से किसी क्रांतिकारी मिशन के बेहद गोपनीय दस्तावेज उन्होंने ब्रिटिश पुलिस की नज़र से बचाकर निकाले थे.माँ की मृत्यु के बाद वे पढने इंग्लैंड चली गयी, और 1930  के दशक के अन्तिम चरण में ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय, इंग्लैंड के समरविल्ले कॉलेज में अपनी पढ़ाई के दौरान वे लन्दन में आधारित स्वतंत्रता के प्रति कट्टर समर्थक भारतीय लीग की सदस्य बनीं।
1934-35  में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के पश्चात, इन्दिरा ने शान्तिनिकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा निर्मित विश्व-भारती विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। जहाँ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ही इन्हे "प्रियदर्शिनी" नाम दिया .
महाद्वीप यूरोप और ब्रिटेन में रहते समय उनकी मुलाक़ात एक
पारसी कांग्रेस कार्यकर्ता, फिरोज़ गाँधी से हुई जिनसे 16 मार्च 1942 को आनंद भवन इलाहाबाद में एक सादे समारोह में उनका  विवाह हुआ और इसके ठीक बाद वे भारत छोड़ो आन्दोलन से जुडीं और कांग्रेस पार्टी द्वारा पुरजोर राष्ट्रीय विद्रोह की शुरुआत की गयी। सितम्बर 1942 में वे ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार की गयीं और बिना कोई आरोप के हिरासत में डाल दी गयीं.अंततः 243 दिनों से अधिक जेल में बिताने के बाद उन्हें १३ मई 1943 को रिहा किया गया।
1944 में राजीव गांधी और इसके दो साल के बाद संजय गाँधी का जन्म हुआ.
सन् 1947 के भारत विभाजन अराजकता के दौरान उन्होंने शरणार्थी शिविरों को संगठित करने तथा पाकिस्तान से आये लाखों शरणार्थियों के लिए चिकित्सा सम्बन्धी देखभाल प्रदान करने में मदद की। उनके लिए प्रमुख सार्वजनिक सेवा का यह पहला मौका था।
उन्होंने कहीं लिखा है- मेरे  दादा जी  ने  एक  बार  मुझसे  कहा  था  कि  दुनिया  में  दो  तरह  के  लोग  होते  हैं एक वो  जो  काम  करते  हैं  और दूसरे वो  जो  श्रेय  लेते  हैं ,उन्होंने  मुझसे  कहा  था  कि  पहले  समूह  में  रहने  की  कोशिश  करो , वहां  बहुत  कम  प्रतिस्पर्धा  है.”
नेहरु जी के प्रधानमन्त्री बनने के बाद इंदिरा जी उनके साथ दिल्ली आ गयी और उनकी निजी सचिव,नर्स,राजनैतिक सलाहकार और स्नेहिल बेटी के किरदारों को निभाने में जुट गयीं.तब से ही उनके और फ़िरोज़ गाँधी के बीच दूरियाँ पनपीं.
इंदिरा जी के औपचारिक राजनैतिक जीवन की शुरुआत तब हुई जब 1959 और 1960 के दौरान वे  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयीं। हालांकि उनका कार्यकाल घटनाविहीन था। वो सिर्फ अपने पिता के कर्मचारियों के प्रमुख की भूमिका निभा रहीं थीं।
27 मई 1964  को नेहरू जी के देहांत के बाद इंदिरा राज्यसभा की सदस्य चुनीं गयीं और सूचना और प्रसारण मंत्री के लिए नियुक्त हो, लाल बहादुर शास्त्री जी की सरकार में शामिल हुईं ,उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.
सन् 1966  में जब श्रीमती गांधी प्रधानमंत्री बनीं, कांग्रेस दो गुटों में विभाजित हो चुकी थी - श्रीमती गांधी के नेतृत्व में समाजवादी और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में रूढीवादी। 1967  के चुनाव में कई आंतरिक समस्याएँ उभरी जहां कांग्रेस लगभग 60 सीटें खोकर 545 सीटोंवाली लोक सभा में 297 आसन प्राप्त किए। मजबूरन उन्हें मोरारजी भाई को भारत के भारत के उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के रूप में लेना पड़ा। 1969 में देसाई के साथ अनेक मुददों पर असहमति के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विभाजित हो गयी। उन्होंने समाजवादियों एवं साम्यवादी दलों से समर्थन पाकर अगले दो वर्षों तक शासन चलाई। उसी वर्ष उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयीकरण किया.
1971 में उन्होंने पकिस्तान की भीतरी लड़ाई में हस्तक्षेप किया और बांग्लादेश का निर्माण हुआ,शेख़ मुजीबुर्रहमान प्रधानमन्त्री बनाये गए.यहाँ अमेरिका ने पकिस्तान की मदद की और सोवियत संघ ने भारत की. ये इंदिरा जी की बहुत बड़ी राजनैतिक  सफलता थी. उनकी इस सक्रिय भूमिका से वह पूरी दुनिया में दृढ़ इरादों वाली महिला के रूप में जानी जाने लगीं और अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें दुर्गा की संज्ञा दी।
1974 में “स्माइलिंग बुद्धा” नामक सीक्रेट मिशन के तहत अपने साहसिक फैसलों के लिए मशहूर इंदिरा गांधी ने 1974 में पोखरण में परमाणु विस्फोट कर जहां चीन की सैन्य शक्ति को चुनौती दी, वहीं अमेरिका जैसे देशों की नाराजगी की कोई परवाह नहीं की।
इसी तरह 1975 में सिक्किम का भारत में विलय भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी,हालांकि चीन ने इसे एक घिनौना कार्य बताया.
इंदिरा कहती थीं : कुछ  करने  में  पूर्वाग्रह  है - चलिए  अभी  कुछ  होते  हुए  देखते  हैं .  आप  उस  बड़ी  योजना  को  छोटे -छोटे  चरणों  में  बाँट  सकते  हैं  और  पहला  कदम  तुरंत  ही  उठा  सकते  हैं .
रजवाड़ों का प्रीवीपर्स समाप्त करना भी उनकी एक बहुत बड़ी राजनैतिक उपलब्धि थी.
1975 का साल इंदिरा जी के राजनैतिक जीवन में एक धब्बा सा लगा गया. उन दिनों विरोधी दलों और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय संस्थानों ने इंदिरा सरकार की तीव्र आलोचना और विरोध शुरू किया.उन पर आर्थिक मंदी,मुद्रास्फीति और भ्रष्टाचार जैसे आरोप लगाए जाने लगे.और तभी इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1971 चुनाव में धांधली की बात भी उजागर की और उन्हें पद त्याग का आदेश हुआ. जिससे राजनैतिक माहौल गरम हो गया और 26 जून, 1975 को इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लागू कर दिया. आपात स्थिति के दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक दुश्मनों के साथ सख्ती बरती, संवैधानिक अधिकारों को निराकृत किया गया कई राजनेता जेल में भर दिए गए और प्रेस की आज़ादी छीन कर उन्हें सख्त सेंसरशिप के अंतर्गत रखा गया. इसी दौरान पांचवी “पञ्च वर्षीय योजना” और “बीस सूत्रीय कार्यक्रम” भी लागू किये गए,जिसमें गरीबी हटाओ योजना पर प्रमुखता से काम किया जाना तय हुआ.
इसके बाद 1977 में छटवें लोकसभा चुनाव में इंदिरा गाँधी की पार्टी को जनता पार्टी के द्वारा करारी मात का सामना करना पड़ा यहाँ तक उनकी और संजय गाँधी की सीट भी जाती रही. 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई देश के नए प्रधानमन्त्री बने.
शायद ये इंदिरा का भाग्य ही था जो जनता दल एकजुट होकर काम न कर सका वहां आतंरिक सिर फुटव्वल होती रही नतीजतन लोक सभा भंग हुई और 1980 में फिर चुनाव हुआ और इंदिरा गाँधी अपनी पार्टी के साथ फिर सत्ता में आयीं. इंदिरा जी की कही एक पंक्ति यहाँ याद आती है- आपको  गतिविधि  के  समय  स्थिर  रहना  और  विश्राम  के  समय  क्रियाशील  रहना  सीख  लेना  चाहिए” .
ये भारत के इतिहास में सबसे अधिक मंदी का दौर था.इंदिरा गाँधी ने जनता पार्टी सरकार की पंचवर्षीय योजना को रद्द किया और छटवी पंचवर्षीय योजना का आगाज़ हुआ.
इंदिरा अपार क्षमता और विलक्षण शक्ति का संचार करने वाली महिला थीं. उन्हें भारत की “आयरन लेडी” कहा गया उनकी प्रतिभा का गुणगान विरोधी भी किया करते थे.जयप्रकाश नारायण,हेमवती नंदन बहुगुणा,राजनारायण,मधु लिमये और वाय.बी.चौहान उनकी खुले आम प्रशंसा करते थे.
गुटनिरपेक्ष सम्मलेन और कॉमन वेल्थ का आयोजन कर उन्होंने भारत को विश्व मानचित्र में एक अलग पहचान दी.
ऑपेरशन ब्लू स्टार जैसा साहसी कदम इंदिरा जैसी बुलंद इरादे वाली लौह महिला ही उठा सकती थीं हालांकि इसका खामियाजा उन्हें अपनी जान देकर भरना पड़ा,मगर उन्हें मौत का डर था ही कब?
उन्होंने अपने आख़री भाषण में कहा था - यदि  मैं  इस  देश  की  सेवा  करते  हुए  मर  भी  जाऊं , मुझे  इसका  गर्व  होगा . मेरे  खून  की  हर एक  बूँद  …..इस  देश  की  तरक्की  में  और इसे   मजबूत  और  गतिशील  बनाने  में  योगदान  देगी .संभवतः उन्हें आभास था अपनी मौत का.
इंदिरा को उनके सलाहकारों ने अपने अंगरक्षक बदलने की सलाह भी दी थी मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. जातिगत भेदभाव करना उन्हें पसंद नहीं था.उन्हें लोग सचेत करते रहे परन्तु जवाब में उन्होंने कहा - अगर  मैं  एक  हिंसक  मौत  मरती  हूँ , जैसा  कि  कुछ  लोग  डर  रहे   हैं  और  कुछ  षड्यंत्र   कर  रहे  हैं , मुझे  पता  है  कि हिंसा  हत्यारों  के  विचार  और  कर्म  में  होगी , मेरे  मरने  में  नहीं .....
“भारतरत्न इंदिरा प्रियदर्शिनी” ने राजनीति जैसे क्षेत्र में होते हुए भी आम जनता का भरपूर सम्मान और स्नेह पाया और इसका श्रेय उनके शानदार व्यक्तिव और सहज व्यवहार और प्रगतिशील विचारधारा  को जाता है.
वे हर आम और ख़ास से पूरी आत्मीयता और खुले दिल से मिलतीं, अपना हाथ आगे बढाती. फिर उनकी कही बात दुहराती हूँ-  कि आप  बंद  मुट्ठी  से  हाथ  नहीं  मिला  सकते .
इंदिरागांधी जैसा निर्भीक और प्रगतिशील व्यक्तित्व देश के राजनैतिक रंगमंच पर निस्संदेह अब तक नहीं आया है.वे हिमालय सी दृढ़ और समुद्र सी गहरी और गंभीर थीं. इंदिरा जी के सन्दर्भ में खुशवंत सिंह की कही बात से पूर्णतया सहमत हूँ – कि इंदिरा एक ऐसी शख्सियत थीं जिनसे मोहब्बत की जा सके, जिसकी प्रशंसा की जाय और जिनसे डरा जाय.....
-अनुलता राज नायर-



नए पुराने मौसम

मौसम अपने संक्रमण काल में है|धीरे धीरे बादलों में पानी जमा हो रहा है पर बरसने को तैयार नहीं...शायद उनकी आसमान से यारी छूट नहीं रही ! मोह...