इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

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Tuesday, February 25, 2014

ओक में भर लिया था
तुम्हारा प्रेम
मैंने,
रिसता रहा बूँद-बूँद
उँगलियों की दरारों के बीच से |
बह ही जाना था उसे
प्रेम जो था !

रह गयी है नमी सी
हथेलियों पर
और एक भीनी
जानी पहचानी महक
प्रेम की |

ढांपती हूँ जब  कभी
हथेलियों से
अपना उदास चेहरा,
मुस्कुरा उठती हैं तुम्हारी स्मृतियाँ
और मैं भी !

कि लगता है
वक्त के साथ
रिस जाती हैं धीरे धीरे  
मन की दरारों से
पनीली उदासियाँ भी |
~अनुलता ~

Thursday, January 16, 2014

सफ़र

मुश्किल था
एक दिन से
दूसरे दिन तक का सफ़र |
एक दिन
जब तुमने कहा विदा !
और दूसरा दिन
जब तुम चले गए....

फिर आसान था 
हर एक दिन से
दूसरे दिन का सफ़र,
कि तुम्हारे बिना तेज़ थी
क़दमों की रफ़्तार,
कि कोई मुझे पीछे
अब खींचता न था....

~अनुलता ~

Saturday, December 28, 2013

"विदा 2013" एक नज़्म.........


दिसम्बर के आते ही
सुनाई देने लगती है नए साल की दस्तक
जो तेज़ होती जाती है हर दिन
मानों आगंतुक अधीर हो उठा हो !

मेरा मन भी अधीर हो उठता है
जाते वर्ष की रूंधी आवाज़ और सीली पलकें देख....
बिसरा दिए जाने का दुःख खूब जानती हूँ मैं |

तसल्ली दी मैंने बीते साल को कि
वो रहेगा सदा मेरी स्मृतियों में !
सो जमा कर रही हूँ एक संदूक में
बीते वर्ष की हर बात
जिसने मुझे सहलाया/रुलाया/बहकाया/सिखाया...
...

संदूक में सबसे नीचे रखीं मैंने
अधूरे स्वप्नों की टीस,अनकही बातों की कसक
और कहे - सुने कसैले शब्द !
भटकनों को दबा रही हूँ तली में, अखबार के नीचे......

फिर रखे खट्टे मीठे ,इमली के बूटों जैसे दिन.....
कि उन्हें देख कभी मुस्कुराऊँगी,सीली आँखों से !

इसके ऊपर रखे मैंने मोरपंखी दिन
साथ में तुम्हारी हंसी,होशियारी और मेरा प्रेम |

सबसे ऊपर रखूँगी मेरी डायरी का पन्ना
जिस पर लिखा होगा
विदा
तुमसे ही सुना था ये शब्द......
विदा !!!!
-अनुलता -

नए पुराने मौसम

मौसम अपने संक्रमण काल में है|धीरे धीरे बादलों में पानी जमा हो रहा है पर बरसने को तैयार नहीं...शायद उनकी आसमान से यारी छूट नहीं रही ! मोह...