इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Tuesday, July 29, 2014

दीदी की ईदी .......................

आप सभी को ईद मुबारक.....

साथ ही एक तोहफ़ा, मेरी तरफ से ईदी :-)
सुनिए मेरी लिखी कहानी "दीदी की ईदी" नीलेश मिश्रा की ज़बानी ! 92.7 big fm यादों का इडियट बॉक्स में.

बस इस लिंक पर क्लिक करें.....
https://www.youtube.com/watch?v=SRh9qcmgV7g&list=PLRknjC5MPHa0ORz6ublg_ll9OciXprAjA&index=1










दीदी की ईदी  

नाज़ , नगमा, और आलिया के बाद पैदा हुआ था अनवार | ज़ाहिर है , वो सबकी आँखों का तारा था | माँ - बाप के अलावा बहनों का भी लाड़ला था वो , याने पूरे घर का केंद्र बिंदु |
अनवार की अम्मी को उसके अब्बा गाँव से ब्याह कर लाये थे | उन्होंने किसी स्कूल या मदरसे का कभी मुँह तक नहीं देखा था मगर देखने में बड़ी खूबसूरत थीं सो स्कूल मास्टर कुरैशी साहब को उन्हें घर लाकर कोई अफ़सोस न था | यूँ भी उनकी दकियानूसी सोच के हिसाब से पूरी तरह फिट थीं उनकी बेग़म | याने परदे में रहकर पूरी उम्र काट देना और कभी किसी बात पर अपनी राय न देना |
क़ुरैशी साहब यूँ तो क़स्बे के मिडिल स्कूल में मास्टर थे मगर मोहल्ले के तकरीबन सारे बच्चे उनसे ट्यूशन पढ़ने आते थे सो उनका गुज़ारा किसी तरह चल जाता था | महीने की आखिर में खींचतान होने पर थोड़ा बहुत उधारी करके उनका सात लोगों का परिवार किसी तरह चल रहा था |
बच्चियाँ जब तक छोटी थीं तब तक तो कोई ख़ास दिक्कत नहीं हुई मगर उनके बड़े होने के बाद उनके कपड़े – लत्ते , चूड़ियाँ , दुपट्टे वगैरह की माँग मास्साब को तोड़ डालती थी |
बच्चियों को उन्होंने कभी स्कूल नहीं भेजा | इसकी दो वजहें थीं.....एक तो हाथ तंग और दूसरे तंग मानसिकता | स्कूल में बेशक वे स्त्री शिक्षा और उनकी आज़ादी से जुड़े कार्यक्रमों में धड़ल्ले से बोलते मगर अपनी खुद की ज़िन्दगी में उनके अलग कायदे, अलग ही नियम कानून थे | याने “औरों को नसीहत खुद मियां फजीहत ” वाला सिद्धांत था उनका |
तीनों बच्चियाँ तकरीबन दो-दो बरस के अंतर से पैदा हुई होंगी | मास्साब के मन में बेटे की बड़ी लालसा थी और ये इच्छा इतनी प्रबल थी कि छः बरस में एक के बाद एक तीनों लड़कियों ने जन्म ले लिया | चौथी बार बच्चा बीवी के गर्भ में ही मर गया और दाई ने बताया कि लड़का था , तब तो कुरैशी साहब का दिमाग ही घूम गया | जब पाँचवी बार बीवी उम्मीद से हुईं तो क़ुरैशी साहब ने उनकी देखभाल में कोई कसर न छोड़ी | निकाह के बाद पहली बार बीवी को तरह तरह के मेवे, मिठाई ,फल-फूल और दूध मलाई नसीब हुए | वे उनका बड़ा ख़याल रखते जिससे जच्चा- बच्चा स्वस्थ रहें |
पूरे नौ महीने वे हर जुमे याने शुक्रवार को पास की दरगाह पर चादर चढ़ाने जाते | पाँचों वक्त की नमाज़ पढ़ते | और जाने कहाँ कहाँ मन्नत के धागे बाँध आये थे |
खैर अल्लाह ने उनकी सुन ली और घर में अनवार का आगमन हुआ | क़ुरैशी साहब बेहद खुश थे और बेटे की वजह से बीवी का सम्मान बढ़ गया था सो वो भी खुश थीं | घर का माहौल अच्छा था, खाने को मिठाइयाँ थीं इसलिए बच्चियाँ भी खुश थीं |

अम्मी को घर के काम काज से फुर्सत मिलती नहीं थी इसलिए अनवार की परवरिश का ज़िम्मा बहनों के सर था | ये अलग बात है कि उसको पालने में वे अपना बचपन भूल चुकी थीं | अनवार के खिलौने, लड़कियों के खिलौने थे , अनवार की हंसी , लड़कियों की खुशी थी | अपना बचपन वो भाई के बचपन पर न्योछावर कर चुकीं थीं | और ये कुर्बानी उनके स्वभाव में थी क्यूंकि पीढ़ियों से लड़कियों के भीतर कूट कूट कर यही नसीहत तो भरी जा रही है | ये वो आँखें थीं जिन्हें दो रोटियाँ खाकर नींद तो नसीब हो जाती थी मगर ख़्वाबों की इजाज़त नहीं थी |
हाँ एक बात ज़रूर लड़कियों के हक़ में थी कि भले वे स्कूल न जाती हों मगर कुरआन शरीफ़ की तालीम उन्हें बाकायदा दी जा रही थी | हर शाम मौलाना साहब आते और लड़कियों को कुरआन की आयतें पढ़ाते | बड़ी दोनों लड़कियाँ तो सिर्फ रस्म अदायगी के लिए पढ़ती थीं मगर आलिया एक एक शब्द गौर से पढ़ती, उनके अर्थ समझती | इसीलिये वो मौलाना साहब को बहुत प्रिय भी थी | वो पढ़ते पढ़ते लिखना भी सीखने लगी थी |
उसकी लगन देख कर एक बार क़ुरैशी साहब की बीवी ने उनसे गुज़ारिश भी की थी कि - बच्चियों को क्यूँ न हम पास के गर्ल्स स्कूल में पढने भेज दें | ख़ासतौर से आलिया का तो बहुत ज्यादा रुझान है पढने लिखने में | मौलाना साहब भी कह रहे थे – “बड़ी होशियार बच्ची है ” |
क्या फ़िज़ूल की बातें करती हो बीवी , क़ुरैशी साहब भड़क गए | लड़कियाँ परदे में रहें वही अच्छा है | पढ़ना लिखना उनके हक़ में नहीं |
बीवी ने फिर कोशिश की....
“बड़े शहरों में तो गरीब से गरीब भी अपनी बच्चियों को पढ़ा रहे हैं फिर वो चाहे किसी भी धर्म के हों | ज़माना बदल गया है अब....”
हाँ ज़माना बदल गया है...तभी तो....क़ुरैशी साहब भुनभुनाये |
कितने हादसे होने लगे हैं दिन दहाड़े, औरतों की आज़ादी की आड़ में कितने अपराध जन्में हैं तुम्हें क्या पता....अखबार भरे होते हैं रोज़ ऐसी खौफ़नाक ख़बरों से | तुम पढो तो जानो !
कैसे पढूं ? – पढ़ी लिखी होती तब ना जानती समझती दुनियादारी की बातें ...बीवी ने आह भरते हुए कहा...
हाँ हाँ ठीक है अब बहस न बढ़ा | तीन तीन लड़कियों की माँ हो , तुझे तो शुक्र अदा करना चाहिए कि लड़कियाँ देहरी के भीतर हैं वरना तेरा ही चैन हराम रहता |
अब्बा की दलीलें और अम्मी के पस्त हौसले देख लड़कियाँ भी भीतर जाकर दुबक गयीं और साथ ही कहीं दुबक कर सो गए उनके ख्वाब भी, उनकी उम्मीदें भी |
बीवी उदास हो गयी थी | सारी ज़िन्दगी में पहली बार उन्हें खुद के अनपढ़ होने का दुःख हुआ |


तीनों बहनें अपनी माँ की छाया में बड़ी हो रही थीं | उन्हें शिक्षा की कीमत भले न समझाई गयी मगर पैसे की कीमत वे खूब समझती थीं | माँ उन्हें घर के काम काज के अलावा कशीदाकारी, क्रोशिये का काम, सिलाई वगैरह भी सिखाती रहीं |
तीनों बहनों में आलिया अक्सर इन कामों से जी चुराती और भीतर कमरे में जाकर कोई किताब पढ़ती रहती | कुछ नहीं तो अखबार के पन्नों से ही अक्षरों को समझती और उनकी नक़ल कॉपी में उतारती | वो खुद ही अपनी गुरु बन गयी थी | ये काम वो अपने अब्बा से छुप कर ही करती थी , हाँ माँ और बहनें जरूर देख कर भी अनदेखा कर देती थीं |
आलिया की उम्र की सभी लड़कियों ने स्कूल जाना शुरू कर दिया था | सिर्फ वो लड़कियाँ ही घर बैठी थीं जिन्हें पढने का मन ही नहीं था | एक आलिया ही अपवाद थी , जो पढ़ना चाह कर भी घर बैठी थी |
अनवार अब छः सात बरस का हो गया था और उसको स्कूल भेजने की तैयारियाँ घर में हो रही थी | हालाँकि स्कूल जाने की उम्र तो चार साल होती है मगर अब्बा के हिसाब से अनवार छोटे थे और मासूम भी इसलिए उनकी पढ़ाई शुरू करने के लिए सात बरस की उम्र तय की गयी |
खैर पास के प्राइवेट स्कूल में उसका दाख़िला करवाया गया | उसके लिए नया बस्ता, कम्पास बॉक्स ,लंच बॉक्स , कपड़े और किताबें लाई गयीं |
अनवार मचल रहा था कि उसे स्कूल नहीं जाना और उधर आलिया का मन मचल रहा था स्कूल जाने को | आलिया अब नौ बरस की थी और वो जानती थी कि उसे स्कूल नहीं भेजा जायगा...कभी नहीं | जबकि कायदे से उसे अब दूसरी या तीसरी कक्षा में होना चाहिए था | उसकी बड़ी बहनों ने तो पिता के इस पक्षपात को स्वीकार लिया था मगर आलिया का मन मानता ही नहीं था |
भाई का रोना सुनकर उसने हुलस कर अपने पिता से कहा ....
“अब्बा अनवार न जाना चाहे तो मत जाने दो...उसकी जगह मुझे भेज दो न स्कूल | मैं बड़ी होकर टीचर बनूंगी फिर पढ़ा दूंगी अनवार को , और हाँ अम्मी को और नाज़ और नगमा बाजी को भी “ !
वो उनका कुरता पकड़ कर लगभग लटक ही गयी |
पिता ने झिड़क कर उसे अलग किया....”फ़ालतू बकवास न कर......जाओ जाकर मना कर ले आओ अपने भाई को...वैसे भी वो तुमसे हिला हुआ है सबसे ज्यादा , तुम्हारी बात मान जाएगा.....हाँ , उसे टॉफियों और आइसक्रीम का लालच भी दे देना , तब तो रोना ज़रूर बंद हो जाएगा...”
पिता ने नेताओं की तरह  मुस्कुराते हुए कहा | बुझा सा मन लेकर आलिया चल दी भाई को मनाने |
मुझे नहीं जाना स्कूल....आलिया को देख अनवार और भी मचल गया |
इत्ता शौक है तो तुम खुद क्यूँ नहीं चली जातीं, उसने चिढ़ते हुआ आलिया से कहा |
अब्बा के लाडले तो तुम हो छोटे मियाँ......सारी मेहरबानियाँ तुम पर ही तो हैं - आलिया ने हँसते हुए कहा और भाई को यूनिफार्म पहनाने लगी |
मासूम अनवार अपनी बहन की हँसी में छुपी उदासी कहाँ पढ़ पाया.....

ऐसे ही रोज़ न जाने कितनी मासूम बच्चियों के दिल टूटते हैं और उनकी आवाज़ें वहीं घरों के भीतर, पर्दों के पीछे दब के रह जाती है | ज़माना बदल गया है....देश तरक्की कर रहा है मगर क़ुरैशी साहब की तरह कुछ लोग अब भी वही के वहीं हैं, उन्हीं मान्यताओं से जकड़े , वही लकीर के फ़कीर.......


अनवार अब रोज़ स्कूल जाने लगा था | अब्बा बड़ी शान से उसे अपनी खटारा स्कूटर पर बैठा कर स्कूल छोड़ने जाते , और बुझे मन से लौटते | मानों किसी सैनिक को सरहद पर छोड़ आये हों दुश्मनों की सेना के आगे | खैर ये उनका स्नेह था अपने इकलौते लाडले बेटे के प्रति और इस पर किसी को ऐतराज़ न था |
हाँ उसे स्कूल से वापस लाने का काम बहनों का था और ये ज़िम्मेदारी आलिया ने बाखुशी उठा ली थी | वो रोज़ घंटा भर पहले ही स्कूल पहुँच जाती और अनवार की कक्षा के बाहर कान लगा कर बैठ जाती | बड़े ध्यान से वो टीचर की हर बात सुनती , कई बार सवाल पूछे जाने पर वो खुद भी हाथ उठा देती फिर खुद ही शरमा जाती | वाकई बड़ी तेज़ बुद्धि थी उसकी या पढ़ने की चाह ने उसको इतना अक्लमंद बना दिया था |
घर पहुँचते ही वो भाई का बस्ता खोल कर बैठ जाती और जो दिन भर जो कुछ भी टीचर ने पढाया होता उसको अपनी कॉपी में नोट करती | कुछ समझ नहीं आता तो अनवार से पूछ लेती | अनवार को भी अपनी बहन को समझाने में मज़ा आता |
अनवार तुम स्कूल में रोज़ ‘जनगणमन ’ गाते हो ? आलिया उत्सुकता से पूछती !
हाँ रोज़.....ये हमारा नेशनल एंथम है ! इसे रबिन्द्रनाथ टैगोर जी ने लिखा है , अनवार ने अपनी बहन का ज्ञान बढाते हुए कहा |
आलिया उसकी कॉपी के पन्ने पलटती रहती, जो मन को भाता वो पढ़ती......
“खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.....” कितनी अच्छी कविता है न भाई ? आलिया अपने भाई से पूछने लगी !
“ हाँ बहुत अच्छी है , और जानते हैं अब्बा -  वो कविता एक लड़की ने लिखी है – ‘सुभद्रा कुमारी चौहान ने’! – अनवार ने मासूमियत से अपने अब्बा से कहा |
“देखना ये भी लिखेगी बड़ी होकर !” अनवार हँसते हुए आलिया की चोटी खींच के भाग गया |
अब्बा अनमने होकर वहां से उठकर चले गए |

कभी कभार जब मन न होता तो आलिया ही उसका होमवर्क भी कर देती | याने इस तरह अनवार के साथ साथ आलिया की पढ़ाई भी चुपके चुपके चलने लगी |
रोज़ रोज़ स्कूल जाने से स्कूल की कई टीचर्स आलिया को पहचानने लगी थीं | इस तरह 2-3 बरस में आलिया पूरी तरह साक्षर ही नहीं बल्कि बहुत समझदार हो चुकी थी | वो अखबार का लगभग हर पन्ना पढ़ डालती जिससे उसका सामान्य ज्ञान भी बहुत अच्छा हो गया था | वो अनवार को निबंध ,कवितायें  और छोटी-छोटी कहानियां लिख कर देतीं जिनके लिए उसको कई पुरस्कार मिले | पिता को बड़ा गर्व था अपने बेटे पर और वे सारे पुरस्कार बड़े करीने से ड्राइंग रूम में सजा कर रखते | आलिया को इस बात से कोई ऐतराज़ न था कि उसकी मेहनत का श्रेय उसके भाई को मिल रहा है | वो तो बस पढ़-लिख पा रही है इस बात से ही खुश थी |

“आलिया, तुम मेरी क्लास में होतीं तो तुम ही फर्स्ट आतीं हमेशा !” अनवार भी अपनी बहन का हुनर समझने लगा था |
हाँ ! अगर अब्बा मुझे स्कूल भेजते तो मैं तुमसे दो क्लास आगे ही होती , आलिया ने बुझी आवाज़ में कहा |  
अनवार अब पाँचवी में आ चुका था और उतने ही स्तर का ज्ञान आलिया को भी था , बल्कि ज्यादा ही | इस बीच बच्चियों और उनकी अम्मी ने क़ुरैशी साहब से कई बार आलिया की कॉपी दिखाते हुए उसे स्कूल में दाखिल करने की सिफ़ारिश की मगर वे टस से मस न हुए.......वही घिसे पिटे तर्क , वही पुराने बहाने !
अब तो अनवार भी अपनी बहन की सिफ़ारिश करने लगा था |
“अब्बा - अब्बा मेरे स्कूल की सभी टीचर्स कहती हैं कि हमें आलिया को भी स्कूल भेजना चाहिए , ये बड़ा नाम रोशन करेगी आपका |”
वो 10-11 बरस का बच्चा अपनी टीचर्स की रटी रटाई बातें दोहराता मगर कोई फायदा न होता |

“अपनी टीचर्स से कहना मैं काफी हूँ अपने बाप का नाम रोशन करने के लिए...लड़कियाँ तो यूँ भी पराई अमानत हैं...कल को उनका तो नाम और खानदान भी दूसरा हो जाने वाला है |”
अब्बा की बातें अनवार के पल्ले तो नहीं पडीं मगर वो समझ गया कि उसकी बहन के नसीब में स्कूल जाना नहीं लिखा है |  
बढ़ते खर्चे देख कर अम्मी और बहनें आस पड़ोस की औरतों के कपड़े सिलने का काम करने लगीं थीं | रुमाल पर कढ़ाई, दुपट्टों के किनारों पर क्रोशिया की लेस लगाने जैसे काम वे बड़ी खूबसूरती और सफाई से करती थीं | इस तरह थोड़ा बहुत पैसा भी घर में आ जाता था | कुछ तो घर खर्च में चला जाता और कुछ अम्मी अपने संदूक की तली में दबा कर रख देतीं |
कहाँ छुपा छुपा कर रखती हो अम्मी पैसे ? कभी ज़रुरत पड़ी तो खोजने से तुम्हें ही नहीं मिलेंगे |
लड़कियाँ उनका मज़ाक उड़ाती |
मगर हर औरत की तरह शायद वो भी कुछ पैसे छुपा कर ख़ुद को सुरक्षित महसूस करती थीं |


उस रोज़ अनवार के स्कूल में एनुअल फंक्शन था | अनवार ने नाटक में हिस्सा लिया था | उसको तैयार करके अब्बा स्कूल छोड़ आये थे , साथ ही आलिया को भी भेज दिया गया कि उसके सामान और ड्रेस की सम्हाल वो करेगी | अब्बा को उस रोज़ कहीं काम था सो वो चले गए |
आलिया स्टेज के पीछे तैयारियों में सबकी मदद करने लगी | टीचर्स के लिए उसका चेहरा जाना पहचाना था तो किसी ने रोक टोक नहीं की | हर एक परफॉरमेंस के बाद पर्दा गिरता और दूसरे की तैयारी होती |
तभी बीच में एक बच्चा जिसे कोई गीत गाना था उसकी तबियत ख़राब हो गयी | दर्शकों में हलचल होने लगी....
स्टेज सूना पड़ा देख अनवार की टीचर ने आलिया से कह दिया – “ जाओ तुम परदे के आगे माइक लगा है उस पर कोई कविता सुना दो |
आलिया के भीतर आत्मविश्वास तो था ही | फट से उसने माइक सम्हाला और अपनी प्यारी सी आवाज़ में एक कविता पढने लगी –
छोटे से हैं ख्वाब हमारे, बड़ी बड़ी उम्मीदें
जेब में हों गर पैसे थोड़े, तो हम चाँद खरीदें .......
छोटे से हैं ख्वाब हमारे......
आलिया की कविता पूरी होते ही उस छोटे से स्कूल का हाल तालियों से गूँज गया | सभी शोर करने लगे की और सुनाओ, और सुनाओ.....
आलिया ने और भी कवितायें सुना कर सबका मन जीत लिया | नन्हा अनवार भी अपनी बहन के लिए बहुत खुश था |
उम्र में छोटा था मगर समझता ज़रूर था कि आलिया का कितना मन है स्कूल में पढने का और कितनी काबिलियत है उसमें ये भी जानता था मगर वो आखिर कर भी क्या सकता था |
आलिया वापस स्टेज के पीछे आ गई तब तक अगले कार्यक्रम की तैयारी हो गयी थी |
टीचर भी बहुत खुश थीं आलिया से | उन्होंने उसे गले लगा कर कहा, “तुम्हें ज़रूर आगे पढ़ना चाहिए आलिया ... खूब आगे बढ़ना चाहिए.....”
क़ुरैशी मास्साब के ख़यालों से अनजान टीचर ने ज़िद्द करते हुए कहा – “आलिया तुम आया करो न स्कूल , तुम्हारे जैसी प्रतिभा घर में पड़ी पड़ी ज़ंग खा जायेगी | स्कूल आओगी तो तुम्हारा व्यक्तिव निखर जाएगा और तुम्हारा भविष्य भी |”
अनवार ने रुंधे गले से बहन का हाथ पकड़ लिया –
मैं अब्बा से खूब ज़िद्द करूंगा कि तुम्हें पढ़ाएं | काश मैं तुमसे बड़ा होता तो खुद कमाता और तुम्हें ज़रूर पढ़ाता |
आलिया हँस पड़ी....छोटे हो तो क्या.....बड़े हो जाओगे तब कमाना ,फिर पढ़ा देना....पढने की कोई उम्र थोड़ी न होती है |
अनवार अपनी बहन के हँसते चेहरे पर उदास आँखें देख सकता था , वो भी उदास हो गया.....उसको बहुत दुःख हुआ अपने गरीब होने पर...अपने छोटा होने पर और सबसे ज्यादा अपने पिता के पुराने दकियानूसी ख्यालों पर उसको दुःख हुआ |
अचानक अनवार बड़ा हो गया था..........अपनी उम्र से बहुत बड़ा...अपनी बड़ी बहन से भी बड़ा.....


उस रोज़ जब अब्बा उनको स्कूल लेने आये तो उसकी टीचर ने उन्हें आलिया के बारे में बताया |
“क़ुरैशी साहब आपकी बच्ची बहुत होनहार है और बेहद मेहनती भी | बच्चों में पढने और सीखने की ऐसी लगन आजकल कहाँ देखने मिलती है | आप उसका दाख़िला हमारे स्कूल में करवा दें जिससे वो नियमित विद्यार्थी की तरह पढ़ाई कर सके | “
“देखिएगा आपको अपनी इस बेटी पर फ़ख्र होगा एक दिन | मगर उसके लिए आपको आगे आना होगा |” टीचर ने जोर देते हुए कहा.....
अनवार और आलिया उम्मीद भरी नज़रों से अपने अब्बा का मुँह ताक रहे थे कि जाने क्या जवाब होगा उनका...
कम से कम टीचर से तो उल्टी सीधी बात वे कर नहीं सकते |
उन्होंने सिर्फ इतना कहा - जी , आपका बेहद शुक्रिया |  और चुप हो गए | दोनों बच्चे हैरानी से अपने अब्बा का चेहरा देखते रहे |
तभी टीचर ने अपनी मेज़ से एक फॉर्म उठाया और उन्हें पकड़ा दिया |
ये लीजिये ,एडमिशन फॉर्म है , हम सीधे पाँचवी में दाख़िल कर रहे हैं आलिया को | आप इसे भर कर , अपने दस्तखत के साथ आलिया के हाथों भिजवा दीजिये...बाकी औपचारिकतायें हम पूरी कर लेंगे |
अब्बा ने चुपचाप फॉर्म लिया| टीचर को खुदाहाफिज़ कहा और बाहर निकल आये |
रास्ते भर किसी ने कोई बात नहीं की |
घर पहुँचते ही अब्बा ने फरमान ज़ारी किया कि कल से अनवार को स्कूल लाने ले जाने का ज़िम्मा उनका |
कड़कती आवाज़ में वे बोले - हम न जा सके तो फिर बड़ी बहनों में से कोई जायगा | और आलिया को घर के काम सिखाये जाएँ , अब उसकी नादानियों की उम्र नहीं रही |
अनवार बोल पड़ा...”अब्बा कैसी नादानियाँ ?? आलिया को तो सब कितना समझदार कहते हैं | आप प्लीस फॉर्म पर दस्तखत ज़रूर करें |”
“आप ज्यादा सयाने न बनें अनवार मियाँ” ...अब्बा ने ज़रा सख्त लहजे में कहा तो नन्हा अनवार चुप रह गया |
रात भर अनवार को नींद नहीं आयी....और वो सुनता रहा आलिया की दबी-दबी सिसकियाँ |
दो दिन बाद ईद थी | घर में खुशियों का माहौल था | पूरे साल में यही तो एक मौका होता था जब उन्हें मनचाहे तोहफे नसीब होते थे, “ईदी” के रूप में |
पिछले दिन की तल्खियाँ भूल कर सब खुश थे...मगन थे इस सोच में कि अपने लिए ईदी क्या माँगी जाय |
बड़ी दोनों बहनों ने सलवार कमीज़ के कपड़े और दर्ज़न भर चूड़ियाँ लीं | माँ के लिए भी ज़रुरत के दुपट्टे लाये गए | आलिया ने किताबों की छोटी सी फ़ेहरिस्त दी थी जिसके लिए अब्बा इनकार न कर सके | आखिर वो उसकी ईदी, उसका हक़ था |
अनवार से पूछा गया कि उन्हें क्या चाहिए तो उसने टाल दिया....
अभी मैं सोच रहा हूँ अब्बा | क्या मैं कोई बड़ी चीज़ मांग सकता हूँ ? उसने मासूमियत से कहा |
अब्बा ने निहाल होकर कहा.....हाँ बेशक ! आखिर आप हमारे खानदान के चिराग हैं | आपसे ही तो रोशन है हमारा नाम, हमारा घर |
ठीक है फिर ईद की सुबह मैं आपको बताऊंगा |
क्यूँ रे क्या मांगेगा अपने अब्बा से ? माँ और बहनें उत्सुक थीं |
“कोई बहुत बड़ी चीज़.....” अनवार ने सस्पेंस को बढ़ाया !
क्या कंप्यूटर मांगेगा? या मोबाइल ? लड़कियों ने छेड़ा |
सबके सब हँसने लगे , क्यूंकि ये सब उनकी हैसियत से परे था ,वे जानती थीं |
ईद की सुबह सबने नए कपड़े पहने |
अब्बा अनवार को लेकर ईदगाह चले गए ,नमाज़ पढने |
अम्मी और लड़कियों ने घर में नमाज़ अदा की |
ईदगाह में नमाज़ पढने के बाद अब्बा ने अनवार को गले लगा लिया |
अनवार ने हाथ बढ़ाया.....अब्बा मेरी ईदी ?
हाँ क्यूँ नहीं...उन्होंने अपने कुरते में हाथ डाला , कई दिनों ने पैसे बचा रखे थे इस दिन के लिए |
अनवार ने उनका हाथ पकड़ लिया |
अब्बा आप चाहते हैं न कि हम आपका नाम रोशन करें ?
हाँ बेटा, हर बाप यही चाहता है |
फिर आप “अपना नाम” एक दफ़ा मेरे लिए यहाँ लिख दें, वही मेरी “ईदी” होगी !! .......फिर एक दिन आपको गर्व होगा अपने नाम पर , अपने बच्चों पर |
कहते हुए उसने आलिया का एडमिशन फॉर्म निकाला और दस्तख़त की जगह अपनी नन्हीं उँगलियाँ रख दीं.......
अब्बा उसका चेहरा देखते रह गए.....इतना छोटा बच्चा और ऐसी समझ |
ज़िन्दगी में पहली दफ़ा उन्हें शर्मिंदगी हुई खुद पर......
उनकी पलकें भीग गयीं | उन्होंने पेन निकाला और चुपचाप दस्तखत कर दिए |

अनवार उनके गले में झूल गया |
ईद मुबारक अब्बा | ईद मुबारक.......................  
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Saturday, July 12, 2014

मेरा पहला काव्य संग्रह....."इश्क़ तुम्हें हो जाएगा "

आप सभी के स्नेह और आशीर्वाद से मेरा पहला काव्य संग्रह प्रकाशित हो गया है....
                                         ~ "इश्क़ तुम्हें हो जाएगा "~
बड़े अरमानों से ये पहला कदम बढ़ाया है......आप सभी के स्नेह और आशीर्वाद के आकांक्षी हूँ...
अगर आप मेरी लिखी कवितायें पढ़ना चाहें तो दिए लिंक पर click करके किताब अपने घर मंगवा सकते हैं !

दिल से शुक्रिया !!
अनुलता

 http://www.infibeam.com/Books/ishq-tumhen-ho-jayega-hindi-anulata-raj-nair/9789381394861.html?utm_term=anulata_1_2

और यहाँ भी.....

http://www.homeshop18.com/ishq-tumhen-ho-jayega/author:anulata-raj-nair/isbn:9789381394861/books/fiction/product:32370001/cid:10916/







Thursday, July 3, 2014

निरर्थक है
लिखा जाना
प्रेम कविताओं का  |
कि जो लिखते हैं
उन्होंने भोगा नहीं होता प्रेम !
और जो भोगते हैं
उन्हें व्यर्थ लगता है
उसे यूँ
व्यक्त करना....

मनगढ़ंत किस्से,
काल्पनिक बातें
और कोरी बयानबाजियां हैं
प्रेम कवितायें |

प्रेमी नहीं करते बातें
चाँद तारों की
नदी पहाड़ों की
लहरों किनारों की या
झड़ते चनारों की.....

प्रेमी नहीं करते बातें
ऐसी -वैसी
कैसी भी !

वे नहीं करते प्रेम से इतर
कुछ भी....

~अनुलता ~

Tuesday, June 17, 2014

याद गुज़री.......

सरसराती ,फन उठाती
बिन बुलाये ,
अनचाही  एक
याद गुज़री.....
जाने कब की
बीती बितायी
बासी पड़ी
एक बात गुज़री...
ले गयी वो
चैन मन का
आंसुओं में
रात गुज़री.....

भीगे भीगे ख्वाब सारे
भीगे थे हर सू नज़ारे
बादलों में भीगती
बारात गुज़री.....
महके गुलाबी
कागजों में
झूठी एक
सौगात गुज़री....

बंद करके
रख दिए थे
मैंने माज़ी के दरीचे
सेंध करके
छुप-छुपाती
याद वो बलात गुज़री....
सच का चेहरा
मुझको दिखाती
आइना ले साथ गुज़री !

सरसराती फनफनाती
विष भरी
एक याद गुज़री...............

~अनुलता~




Friday, June 6, 2014

झील

गुनगुना रही थी झील
एक बंदिश राग भैरवी की
कि पानी में झलक रहा था अक्स
उसके ललाट की बिंदी का |

उसके डूबे हुए तलवों ने
पवित्र कर दिया था पानी
कि घुल रही थी पायलों की चांदी
धीरे धीरे.....

झील की सतह पर
उँगलियों से अपनी
वो लिखती रही
प्रेम !!

पढ़ा था झील ने ,
और उसको
फ़रिश्ता करार दिया |

~अनुलता~

Sunday, May 25, 2014

मेरी लिखी कहानी "स्नेहा" - 92.7 big fm पर नीलेश मिश्रा की जादुई आवाज़ में................

 दुनिया में सबसे सुन्दर रिश्ता माँ और उसके बच्चे के बीच होता है......इस रिश्ते की वजह से जीवन में कई खट्टे मीठे अनुभव होते हैं.....सुनिए मेरी कहानी "स्नेहा " Neelesh Misra की जादुई आवाज़ में.......जिसे सुनकर आपकी पलकें भीगेंगी मगर होंठ मुस्कुराएंगे......
ये कहानी मैंने "यादों का इडियट बॉक्स विथ नीलेश मिश्रा " के लिए लिखी थी जिसका प्रसारण 12 मई को 92.7 big fm पर हुआ | आप भी सुनिए :-)

click the you tube link and enjoy.............


https://www.youtube.com/watch?v=xp2UuRoHF8I&index=2&list=PLRknjC5MPHa0ORz6ublg_ll9OciXprAjA

जैसे हर गृहणी की दिनचर्या होती है वैसी ही स्नेहा की भी थी |  सुबह के सब काम निपटाए, बच्ची और पति को विदा किया, घर समेटा, अखबार पढ़ा ,अपने छोटे से बगीचे को निहारा और पानी दिया | अब तो बिटिया सोनल के घर आने का वक्त भी होने वाला है, और बस स्टॉप तक जाना होता है उसको लेने | क्यूंकि एक तो बस मेन रोड पर आती है और दूसरा लेने न जाने पर उसकी लाडली नाराज़ भी हो जाती है |
ज़रा सुस्ताने की नियत से स्नेहा बिस्तर पर निढाल होकर पड़ गयी | आसान कहाँ होती है एक गृहणी की ज़िन्दगी |   
छोटी सी, प्यारी सी दुनिया है स्नेहा की | बेहद प्यार करने वाला पति समीर है, जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पद पर है , और एक ये नन्हीं परी ,सोनल |
स्नेहा अपने परिवार की खुशी के लिए सभी जतन करती | घर सम्हालना
, बाज़ार के काम, बिटिया की पढ़ाई, मेहमानों की आवभगत और इन सबके बाद मुस्कुराता चेहरा और मधुर व्यवहार | कौन नहीं चाहेगा ऐसी पत्नी |
इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद भी स्नेहा ने घर में ही रहने का फैसला किया | ये पूरी तरह से उसका अपना निर्णय था जो उसने अपने परिवार के हित में लिया था |
मुझे ये ठीक नहीं लग रहा स्नेहा कि तुम इतना अच्छा ऑफर ठुकरा रही हो....अभी तो तुम्हारा करियर शुरू भी नहीं हुआ है, समीर ने हैरान होते हुए कहा था......
देखो समीर मैंने पढ़ाई लिखाई की है अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए, पैसा कमाना अभी मेरी प्रायोरिटी नहीं है, और न ज़रुरत है | तुम्हारी आय से हमारा ये घर कितने मज़े से तो चल रहा है ,
है न ? 
अभी तो सिर्फ मुझे अपने आने वाले बच्चे के लिए सोचना है | बस एक बार बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाय फिर मैं अपना करियर अपने शौक सभी कुछ पूरे करूंगी | स्नेहा ने पति को समझाते हुए कहा...
समीर भी मुस्कुरा दिया,उसे गर्व था अपनी इस सुलझी सोच वाली समझदार पत्नी पर |
याने बिटिया के बड़े होते ही वो अपना काम शुरू करेगी ऐसा दोनों पति-पत्नी ने मिल कर तय किया था , किसी भी किस्म का खिचाव ,कोई मतभेद दोनों के रिश्ते में नहीं था | दोनों ही अच्छे दोस्त की तरह एक दूसरे को समझते थे और साथ देते थे | एक खूबसूरत रिश्ते के लिए और चाहिए भी क्या होता है |  

तभी स्नेहा के चेहरे पर पानी के छींटे पड़े तो वो ख्यालों के झुरमुट से बाहर निकली, देखा बिटिया मुंह हाथ धोकर उसके पास आ बैठी है |
क्या हुआ माँ, आज लेने नहीं आयीं ? सर दुःख रहा है क्या ?
सोनल ने अपनी नन्हीं सी कोमल हथेली स्नेहा के माथे पर धर दी.....
कितना सुखद स्पर्श है ये स्नेह का !
स्नेहा ने उसको गले से भींच लिया | न बेटा, जाने किस सोच में थी और आँख लग गयी |
सॉरी बिटिया रानी, तुझे लेने भी नहीं आयी बस स्टॉप |
कोई बात नहीं माँ, अब मैं समझदार हो गयी हूँ , बस मुझे अच्छा लगता है बस से उतरते ही तुम्हारा चेहरा देखना |
हंस पड़ी स्नेहा | 
तभी सोनल उससे लिपटते हुए बोली
माँ , मैं खाना खाने बड़ी माँ के पास जा रही हूँ, उन्होंने मेरे लिए पूरनपोली बनाई है इतना कह कर वो गायब हो गयी मानों दौड़ कर नहीं उड़ कर गयी हो उसकी नन्हीं परी |
कितना सुन्दर
,सरल और निष्पाप होता है बचपन सच !! और बच्चे से सुन्दर दुनिया में क्या होता है ? भगवान का दिया हुआ सबसे प्यारा गिफ्ट यही तो होता है | 

स्नेहा का मन फिर ख्यालों में उलझने लगा |
सोनल की बड़ी माँ, याने स्नेहा की जेठानी “चित्रा” बहुत स्नेही स्वभाव की सरल और समझदार स्त्री हैं |  उनके पति संजय भी बेहद सुलझे स्वभाव ने गम्भीर पुरुष हैं जो स्नेहा को छोटी बहन का प्यार देते हैं | दुर्भाग्य से चित्रा और संजय के विवाह के कई वर्ष बीत जाने पर भी कोई संतान न थी, शायद इसी वजह से सोनल को वे दोनों दिलोजान से चाहते थे | सोनल भी अपने बड़े पापा और माँ को भरपूर मान और प्यार देती, उनका खूब ख़याल भी रखती |  
स्नेहा की जेठानी उसके घर के नीचे के हिस्से में ही रहती थी और उसकी सास ज़्यादातर जेठानी के साथ रहती थीं क्यूंकि चित्रा नौकरी करती थी इसलिए माँ के होने से उनको आराम हो जाता था | समीर और संजय भाई साहब ने आपसी रज़ामंदी से अलग अलग रहने का निर्णय लिया था | जिससे रिश्तों में खटास न पड़े|
साथ रहने से बर्तन खड़कते ही हैं समीर....और एक बार दरार आयी तो दूरियाँ बनी रहेंगी इसलिए अभी खुशी से अलग रहने लगें, वही अच्छा , संजय भैया ने बड़प्पन दिखाते हुए कहा था |

आजकल सबको रिश्तों में स्पेस चाहिए रहता है, एक दूसरे की जिंदगियों में दख़ल न कोई देता है न दिये जाना पसंद करता है |  और एक बार दरार आकर फिर अलग होने से प्रेम नहीं रहता इसलिए दोनों भाइयों का फैसला माँ सहित सभी को मंज़ूर था |
स्नेहा अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी | अच्छे खाते पीते परिवार से होने के कारण उसकी सभी इच्छाएँ बिना कहे पूरी होती थीं | मगर उसके शिक्षित माँ-बाप ने उसे बहुत अच्छे संस्कार दिए थे | इसलिए वो ससुराल में भी सबकी चहेती थी |
ब्याह के बाद सास ने पूरे घर की ज़िम्मेदारी स्नेहा के कन्धों पर ये कहते हुए डाल दी थी, कि चित्रा तो दफ्तर जाती है इसलिए घर गृहस्थी का बोझ अब तेरे सर | मगर स्नेहा ने  इसे कभी बोझ नहीं समझा और हँसते गुनगुनाते हुए सभी काम किये | ज़ाहिर है उसकी इन खूबियों की वजह से समीर भी उसका दीवाना था |
वो अक्सर कहता –“ इस सुन्दर चेहरे के साथ प्यारा सा दिल भी मुझे मिलेगा ये नहीं जानता था...स्नेहा आई एम रियली लकी |”
और स्नेहा निहाल हो जाती......
 
सुबह से कब शाम हो जाती स्नेहा को पता ही नहीं लगता और जब सब दफ्तर से लौटते तो वो ताज़ा खिले फूल की तरह नाश्ते-चाय के साथ स्वागत में खड़ी होती, ये तब की बात है जब वे एक संयुक्त परिवार की तरह रहते थे |  उसने कभी अपनी सास को या जेठानी को काम करने नहीं दिया |

समीर भी कहते कि
माँ ने बड़ी मुश्किल से हमें अकेले पाला है स्नेहा, अब उनके आराम के दिन हैं और भाभी तो नौकरी करती हैं और फिर बच्चे के न होने से वे यूँ भी थोड़ा उदास और निराश रहती हैं , इसलिए उनका ख़याल रखना हम दोनों का फ़र्ज़ है |और स्नेहा मुस्कुरा कर अपनी सहमति जताती |
कुछ छोटी छोटी बातें कभी कभार होती रहती जिनसे स्नेहा का दिल टूटने लगता, मगर वो ऐसी नेगेटिव बातों को मन में आने नहीं देती थी | वो जानती थी जब अलग अलग विचारधारा के लोग साथ रहें तो थोड़े बहुत मतभेद होते हैं | बस दिलों में दूरियां न आयें इसका उसने हमेशा ख़याल रखा |
जैसे उस रोज़ स्नेहा का जन्मदिन था | सबने सुबह सुबह उसे बधाई दी, माँ मंदिर जाकर प्रसाद ले आयीं फिर शाम को बाहर जाने का वादा करके सब काम पर चले गए | शाम को समीर के हाथ में तोहफा था| खुशी से उछलते हुए उसने पैकेट खोला तो उसमें दो साड़ियाँ थीं | एक उसके लिए और एक ज़ाहिर है भाभी के लिए | स्नेहा का मन थोड़ा बुझा, कि साल में सिर्फ एक दिन तो उसको ख़ास ट्रीटमेंट दिया जाता |
ये मन भी न ,कभी कभी बच्चों जैसी ज़िद्द करने लगता है | स्नेहा रूठी तो नहीं थी मगर ज़रा सी उदास हो गयी |
प्यार आपको कभी कभी स्वार्थी बना देता है
, और हर इंसान गुज़रता है ऐसे दौर से | जो समझदार होते हैं वो सम्हल जाते हैं वरना टकराहट होती हैं और मन आहत हो जाते हैं |
कुछ माह बाद चित्रा भाभी का जन्मदिन था और भैया ने उन्हें सुन्दर अंगूठी दी | तब स्नेहा ने समीर को हल्का सा ताना दिया कि अरे मेरे लिए नहीं लाये भैया अंगूठी |
मेरी बीवी समझदार है ये सब जानते हैं न इसलिए समीर ने मुस्कुरा कर कहा.....स्नेहा भी हंस दी |
स्नेहा को किसी चीज़ का लालच नहीं था बस उसको लगता कि कभी उसको भी ख़ासहोने का एहसास कराया जाय | कभी उसकी भी फ़िक्र की जाय कभी कोई उसकी भी पीठ थपथपाए |  सभी के लिए चित्रा भाभी ही महत्वपूर्ण थीं ये बात वो जानती थी और इस सच को उसने काफी हद तक स्वीकार भी लिया था और अपनी जेठानी का वो दिल से सम्मान करती थी |
उसकी शादी को दो बरस होने को थे और सोनल के आने की दस्तक उसने अपने गर्भ में महसूस की |  समीर दौरे पर गया था, आते ही उसने ये खबर उसको सुनाई और वो खुशी से पगला से गया , वाह स्नेहा ! आज तुमने मुझे जीवन की सबसे बड़ी खुशी दी है....

शुक्रिया शुक्रिया और स्नेहा को गोद में उठा कर नाचने लगा | 
फिर अचानक एकदम संजीदा हो गया |
स्नेहा, भैया भाभी को ये खबर हम कैसे देंगे ?
तुम फ़िक्र न करो मैं बताउंगी भाभी को, स्नेहा ने चहकते हुए कहा |
नहीं वो बात नहीं है, दरअसल उनके विवाह को इतने साल हो चुके हैं और भाभी की गोद अब भी सूनी हैं तो पता नहीं उन्हें ये सुन कर कैसा लगे....समीर मानों स्नेहा से नहीं खुद से बात कर रहा था |
स्नेहा का मन रो पड़ा ये बात सुन कर कि माँ का ओहदा उसे भाभी से श्रेष्ठ बना देगा इसलिए क्या उसे माँ बनने से भी रोका जाएगा?
फिर भी मन को समझा कर उसने समीर से कहा
इसमें दुःख होने जैसा क्या है समीर, वो अपना प्यार हमारे बच्चे पर भी लुटा सकते हैं, बच्चा रहेगा तो इसी घर में न, हम सबके साथ पलेगा वो |
स्नेहा की बात से समीर खुश हो गया और स्नेहा के लिए उसके दिल में मान और बढ़ गया | बच्चे के आने की ख़बर से घर में मानों इन्द्रधनुषी खुशियाँ खिल आयी हों | सबने स्नेहा को हाथों हाथ लिया और फिर नन्हीं सोनल का आगमन हुआ |
अब स्नेहा की ज़िम्मेदारियाँ और बढ़ गयी थीं | सारा दिन बच्ची को सम्हालना और घर के बाकी काम उसे थका डालते थे |  
थक कर वो निढ़ाल होकर पलंग पर पड़ जाती तो पास ही सोती मासूम सी बच्ची का चेहरा उसमें एक नयी ऊर्जा भर देता....वो सोचती, सच माँ होने से बड़ा कोई सुख नहीं |

तभी सोनल नीचे बड़ी माँ के पास से लौट आयी और साथ लेकर आयी उनकी तारीफों पुलिंदा | माँ , बड़ी माँ बहुत प्यारी हैं न ? फिर वो सहमति के लिए अपनी माँ का चेहरा ताकने लगी |
हाँ बेटा ,बहुत प्यारी हैं... बड़ी माँ हैं न इसलिए तो बड़ी प्यारी हैं वो |
सोनल यही सुनना चाहती थी शायद |
खिल गया उसका चेहरा |
बस माँ एक बात बड़ी माँ की मुझे अच्छी नहीं लगती कि वो मुझे सहेलियों के पास खेलने नहीं देतीं | बस “यहीं रह, मेरे साथ खेल” की रट लगाती हैं...
माँ तुम उन्हें समझाओ न....
स्नेहा सोच में पड़ गयी....मगर उसके उत्तर की प्रतीक्षा किसे थी....सोनल तो सीढियाँ उतरकर बाहर पार्क में जा चुकी थी |
उसे एहसास हुआ सोनल अब बड़ी होने लगी और स्कूल जाने लगी है इसलिए उसके दोस्त भी बन गए हैं| अब वो घर के बड़ों के साथ नहीं बल्कि अपने हमउम्र  बच्चों के बीच रहना पसंद करती है | घर के पांच बड़ों के बीच उसकी उकताहट को स्नेहा महसूस कर रही थी इन दिनों |   
स्नेहा को लगा अब वक्त आ गया है जब उन्हें दूसरे बच्चे के लिए सोचना चाहिए |  उसने तय किया कि आज रात को स्नेह के सो जाने पर समीर से बात करेगी |

रात को वो समीर के सीने पर सर रख लेट गयी...समीर उसके बालों में उँगलियाँ फिरता रहा.....उसने धीरे से कहा, समीर आजकल सोनल चिडचिडी हो गयी है.....
हाँ मुझे भी लगता है, मैं सोच रहा था उसकी स्कूल टीचर से पूछूँ |
“ इसमें उसकी टीचर क्या करेंगी ! हमें ही सोचना है | समीर हमें सोनल के लिए छोटा भाई या बहन ले आना चाहिए |”
स्नेहा की बात सुन कर समीर थोडा चौंक गया |
स्नेहा बोली, “दो बच्चे तो होने ही चाहिए न? कल को हम न होंगे तो सोनल के पास अपना कहने को आखिर कोई तो होगा कि नहीं | 
बात एकदम पते की थी मगर समीर न जाने किस सोच में डूबा हुआ था |
अगली सुबह स्नेहा पूजा करके बाहर आयी तो चित्रा भाभी ,भैया और माँ भी बरामदे में बैठे थे | सबके चेहरों पर कोई ऐसे भाव थे कि स्नेहा पढ़ न सकी | सब के सब उसे किसी दूसरे ग्रह से आये प्राणियों की तरह लग रहे थे |
कुछ तो बात है वरना इतनी सुबह सब एक साथ यहाँ ? स्नेहा को थोड़ी हैरानी हुई ...
तभी माँ ने उसको पास बुलाया, सर पर हाथ फिराते हुए पूछा कि तू दूसरा बच्चा प्लान कर रही है ? स्नेहा ने शरमाते हुए हाँ में सर हिलाया |

स्नेहा खुश हुई कि चलो समीर ने खुद ही ये बात सबको बता दी, उसने समीर की ओर देखा मगर वो सर झुकाए नीचे पड़े कालीन को नाखूनों से कुरेद रहा था |
माँ ने बिना किसी ज्यादा भूमिका के कहा स्नेहा हम सबने तय किया है कि इस आने वाले बच्चे को चित्रा और संजय गोद लेंगे, बच्चा तेरे पास ही रहेगा और चित्रा की गोद भी भर जायेगी |
स्नेह का कलेजा धक् से रह गया |
माँ का फरमान सुन हमेशा मुस्कुराकर बात मान लेने वाली स्नेहा शेरनी की तरह खडी हो गयी, और बिना कुछ सोचे उसने कह डाला कि मेरे बच्चे के बारे में निर्णय आप सबने अकेले मिल कर कैसे ले लिया ? और मैं अपना बच्चा हर्गिज किसी को नहीं दूंगी | भाभी चाहें तो अनाथ आश्रम से बच्चा गोद ले सकती हैं | और आप सबने मुझसे पूछे बिना, सहमति लिए बिना ये निर्णय लिया कैसे ?
और समीर आप भी ?  
सब अवाक स्नेहा को देखते रहे क्यूंकि इतने सालों में उसका ये रूप सबने पहली बार देखा था | इसके पहले आज तक उसने किसी का अपमान तो दूर तेज़ आवाज़ में बात नहीं की थी |
सब थोड़ा सहम से गए थे सो उसके इस तीखे लहजे पर किसी ने कुछ कहा नहीं |

फिर माँ ने हिचकते हुए धीरे से कहा,
“किसी अनजान बच्चे को कैसे गोद ले लें...अपना प्यार क्या ऐसे किसी सड़क छाप पर लुटा दें
? जाने किसका पाप हो, किसका गन्दा खून बह रहा हो उसकी रगों में |
भाभी ने भी उनकी हाँ में हाँ मिलाई |
शिक्षित और समझदार होकर भी कैसी बातें कर रहे हैं आप लोग ,स्नेहा भड़क गयी.

बच्चा किसी का पाप कैसे हो सकता है माँ.....
हाँ उसको जन्म देने वाली माँ या उसने जन्म का कारण बनने वाला पिता पापी हो सकता है और किसी का पाप अगली पीढ़ी तक नहीं जाता माँ | बच्चा तो ईश्वर का रूप माना जाता है न
? फिर पाप की जगह कहाँ है उसमें ? और खून तो जिसकी रगों में भी बह रहा हो ,लाल ही होता है न भाभी ?

स्नेह ने सवाल पर सवाल दाग दिए मगर किसी ने कोई उत्तर न दिया |
 
स्नेहा ने थोड़ा शांति से फिर समझाने की कोशिश की -

भाभी बच्चा बड़ा होकर जब जानेगा कि उसकी असली माँ मैं हूँ तब
??

और क्या मैं अपने भीतर की माँ को उसके बड़ा होने तक मारती रहूंगी |  आप लोगों को नहीं लगता कि दो माओं की खींचतान में एक नन्हा सा दिल छलनी होता रहेगा |

ढेरों समस्याएं जन्म लेंगी
, आप लोग समझने की कोशिश तो करें....
इस फैसले से हमारे सम्बन्ध भी कडवाहट से भर जायेंगे भैया ,स्नेह ने जेठ की ओर आशा से देखा |
मगर उन्होंने भी स्नेहा को अनसुना कर दिया , मानों सब उसका बच्चा छुड़ा लेने की साज़िश किये बैठे हों |
और अनाथ आश्रम से बच्चा  गोद लेने पर वो पूरी तरह से आपका होगा और किसी मासूम की ज़िन्दगी संवारने का पुण्य भी पायेंगे आप | और वो सड़क छाप नहीं माँ, आपका पोता कहलायेगा | स्नेहा ने समझाने की एक आख़री कोशिश की |
मगर किसी ने स्नेहा की बात का कोई उत्तर नहीं दिया...और स्नेहा चुपचाप अपने कमरे में चली गयी |

उस रोज़ पहली बार समीर उससे ज़रा नाराज़ दिखा और भीतर ही भीतर वो भी नाराज़ थी सभी से और समाज में फ़ैली इन ओछी मान्यताओं से भी |
रात भर स्नेहा को नींद नहीं आयी, उसका मन इसी उधेड़बुन में लगा रहा कि इस समस्या का हल कैसे करे.......
हे प्रभु कोई राह दिखाओ, कि परिवार भी न टूटे और मेरी गोद भी न उजड़े ,वो मन ही मन प्रार्थना करती रही |
समीर भी करवटें बदलता रहा मगर उसने कोई बात नहीं की | ज़ाहिर है वो भी स्नेहा के इंकार से व्यथित था |
सुबह का सूरज एक नया चमचमाता दिन लेकर आया था |  शायद ईश्वर ने हर दुविधा का हल बना रखा है | स्नेहा ने रात भर जाग कर पूरी प्लानिंग कर डाली थी , और अपने फैसले से बहुत खुश थी |
रोज़ के काम से फुर्सत पाकर स्नेहा अपनी सहेली के साथ एक अनाथाश्रम गयी | यहाँ वो पहले भी कई बार आयी है अपनी किटी पार्टी के सदस्यों के साथ , सामाजिक सेवा के उद्देश्य से |
वहाँ कितने ही ऐसे बच्चे थे जिन्हें देख किसी का भी मन भीग जाये | एक छोटी सी छः माह की स्वस्थ बच्ची को स्नेहा ने गोद में उठा लिया और भींच लिया सीने से |
कुछ फॉर्मेलिटी  पूरी  करने के बाद वो बच्ची को घर ले आयी | उसने बच्ची का झूला सजाया, उसको साफ़ सुन्दर कपड़े पहनाये और समीर के घर आने का इंतज़ार करने लगी |
समीर ने बच्ची को देखा तो चौंक गया...ये नन्हीं परी कौन हैं भई ?
और जवाब दिया सोनल ने, - पापा ये मेरी छोटी बहन है, अब मैं इसके साथ खेलूंगी |
कित्ती प्यारी है न पापा ?
इसका नाम मैंने “साक्षी” रखा है पापा...अच्छा नाम है न ?
...मेरी बेस्ट फ्रेंड का नाम है |

सोनल की खुशी और उसका उत्साह देखते ही बनता था....
समीर ने स्नेहा की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा,
स्नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा - मैंने ये बच्चा गोद लिया है, अब न मैं बच्चा पैदा करूंगी न मुझे उससे बिछड़ने का दर्द सहना होगा |
और ये फ़ैसला मैं बदलूंगी नहीं समीर, तुम ज़िद्द न करना |
समीर कुछ कह नहीं सका
, कुछ कह सकने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी स्नेहा ने |
भाभी भैया और माँ को न उसका ये फैसला पसंद आया न बच्ची |
बच्ची बहुत प्यारी थी और सोनल के साथ अब समीर भी उसको खिलाने लगा था |
माँ और भैया भाभी उसे देखते मगर कभी खुल कर प्यार जताने की कोशिश न करते |
एक माह हो गया था साक्षी को आये हुए,और अब वो परिवार का हिस्सा थी |
एक दिन स्नेहा नहा रही थी तो बच्ची के लगातार रोने की आवाज़ सुन भाभी ऊपर आ गयी |
साक्षी को उन्होंने गोद में उठा लिया
, प्यार भरी गोद पाते ही बच्ची चुप हो गयी और भाभी से चिपक गयी |
स्नेहा छिप कर भाभी की प्रतिक्रिया देखती रही |
उन्होंने बच्ची को कस के अपने सीने से भींच लिया था
, स्नेहा महसूस कर रही थी उनके मन में उमड़ते प्रेम को और देख रही थी उनकी भीगी पलकें |
पीछे खडी माँ भी भाभी का मन पढ़ने का प्रयास कर रही थीं |
स्नेहा ने आकर उनसे बच्ची लेने की कोशिश की तो चित्रा ने उसे और कस के भींच लिया और स्नेहा का हाथ पकड़कर बोलीं, स्नेहा मुझे भी ले चलो अनाथाश्रम |
मुझे भी एक
साक्षीकी माँ बना दो प्लीस......
स्नेहा जानती थी कि स्नेह कड़ी से कड़ी चट्टानों को भी पिघला देता है | लावा बनकर बहता प्रेम फिर रोके से नहीं रुकता | फिर बच्चे के लिए माँ का प्रेम तो अनोखा ही होता है |
स्नेहा ने साक्षी को भाभी की गोद से ले लिया और फिर वापस उन्हें थमाते हुए बोली- भाभी ये लीजिये आपकी साक्षी, बन जाइए इसकी माँ |
समीर ,भैया, माँ और भाभी सभी हैरानी से उसका चेहरा देखने लगे |
स्नेहा ने भरे गले से कहा, भाभी साक्षी को मैं आपके लिए ही लाई थी | जब तर्कों  से आप सबको नहीं समझा पायी तब मैंने ये मीठी सी साजिश रच डाली |  
देखिये जो काम मैं न कर सकी इस नन्हीं सी बच्ची ने कर दिखाया |
आपको बहुत बहुत बधाई हो भाभी
, आप माँ बन गयीं !!!
सब मुस्कुरा उठे और एक बार फिर स्नेह की जीत हुई |
अनुलता राज नायर ( for याद शहर )


    
      
   
     
    


नए पुराने मौसम

मौसम अपने संक्रमण काल में है|धीरे धीरे बादलों में पानी जमा हो रहा है पर बरसने को तैयार नहीं...शायद उनकी आसमान से यारी छूट नहीं रही ! मोह...