इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Tuesday, July 30, 2013

औरत की आकांक्षा

बहुत तकलीफ देह था
ख़्वाबों का टूटना
उम्मीदों का मुरझाना
आकांक्षाओं का छिन्न-भिन्न होना

हर ख्वाब पूरे नहीं होते...
हर आशा और उम्मीद फूल नहीं बनती

सोच समझ कर देखे जाने चाहिए ख्वाब और पाली जानी चाहिये उम्मीदें....
सो अब तय कर दी है उसने
अपनी आकांक्षाओं की सीमा
और बाँध दी हैं हदें
ख़्वाबों की पतंग भी कच्ची और छोटी डोर से बांधी..

ऐसा कर देना आसान था बहुत
सीमाओं पर कंटीली बाड़ बिछाने में समाज के हर आदमी ने मदद की...
ख़्वाबों की पतंग थामने भी बहुत आये

औरत को अपना  आकाश सिकोड़ने की बहुत शाबाशी मिली.....
३०/७/२०१३
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आभार....
~अनु~


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Thursday, July 18, 2013

रूह

तुम्हारी गुलामी मैंने स्वीकारी
क्यूंकि तुम्हारी ख़ुशी इसी में थी....
और इसमें मेरा कुछ जाता नहीं था
बेशक बेड़ियों ने मुझे जकड़ रखा था मगर
रूह आज़ाद थी मेरी
और वक्त भी आज़ाद था...

पीछे छूट रहा था वक्त और आगे बढ़ती जा रही थी मैं
बीच में तुम खड़े थे स्थिर ,गतिहीन,संतुष्ट
बेड़ियों में जकड़े मेरे शरीर को देखते !!

ज़ाहिर है
इस कहानी में प्रेम ने कोई किरदार नहीं निभाया !!
~अनु ~

Thursday, July 11, 2013

मेरी नज़्म

सिमट गए जब
तुम्हारे कहे लफ्ज़ मेरे ज़ेहन में
तब दर्द की एक नज़्म फूटी..
तेरी खुशबु से महकती इस नज़्म को
धो डाला मैंने
जुलाई की तेज़ बारिश में
कि नज़्म अब तरोताज़ा है मिट्टी और घास की महक लिए...
उसे निचोड़ा कस कर
कि रह न जाए एक भी रिसता एहसास बाकी...
हटाने को यादों की सीलन
मिटाने को दर्द की सभी सिलवटें
फेर  दी  बेरुखी की गर्म इस्त्री उस नज़्म पर
पुरानी हर नज़्म की तरह  इस नज़्म का सेहरा तुम्हारे सर नहीं....
इस पर और मुझ पर तुम्हारा कोई हक नहीं, कोई निशाँ नहीं....
ये नज़्म मेरी है
और बाकी की ज़िन्दगी भी सिर्फ मेरी.......
~अनु ~

Friday, July 5, 2013

स्पर्श.........................

चेहरे पर पड़ती बूँदें बारिश की
मानों एक बोसा
संग हवा के सरसराता
छू कर निकला हो गालों को....
और उस रेशमी स्पर्श ने
बेवक्त ही
खोल दिया पिटारा खुरदुरी यादों का
जिन्हें समेटते सहेजते छिले जाते हैं
पोर मेरी उँगलियों के..

बूँदे चाहे बादलों से टपकी हों
या मन के घावों से रिसी हों,
अपने पास रखती हैं चोर चाभी
यादों की संदूकची की.....

(जाने हम क्यूँ सहेजे रखते हैं इन पिटारोंको/संदूकों को...और हर पल डरते हैं उनके खोले जाने से...मेरे ख़याल से कुछ एहसास ऐसे होते हैं जिनसे दिल कभी पूरी तरह आज़ाद नहीं हो सकता या शायद होना ही नहीं चाहता.....)
~अनु ~


Thursday, June 20, 2013

उदासी

उदासियाँ घर कर लेती हैं मन के कोनों में बिना शोर शराबे के..
उदासियों की आमद होती है बड़े चुपके से,क्यूंकि इनके पैरों की आहट नहीं होती.
उदासियाँ अपने पैरों पर चिपका लेती हैं मोहब्बत के पंख,मोहब्बत के मर जाने के बाद.....
अपने नर्म पंजों के भीतर छिपाए रखती हैं कई दंश,ये उदासियाँ.....
उदासियों को आदत होती है बिन बुलाये आने की और अनाधिकृत कब्ज़ा जमाने की.....एक बार आने के बाद ये पैर पसारती हैं और फैल जाती हैं हर जगह...दीवारों पर टंगी सुन्दर तस्वीरों में,बारिश की बूंदों में,बिस्तर की सलवटों पर,संगीत की धुनों पर और डायरियों के पन्नों पर भी....
उदासी छा जाती है आसमान पर कुहासा बन कर....चेहरे पर झुर्रियाँ बन कर....रिश्तों की दरारों में भर जाती हैं उदासियाँ......
तन्हाई और उदासियों में बड़ी यारियां हैं...
उदासियाँ बात नहीं करतीं.....उदासियाँ अपने साथ लाती हैं खामोशियाँ !!!

उदासियाँ बन जाती हैं , कुछ न लिख पाने की वजह और कभी अनवरत लिखते जाने की...................
~अनु ~

Tuesday, June 11, 2013

राग-विराग

मेरे आँगन में
पसरा एक वृक्ष
वृक्ष तुम्हारे प्रेम का
आलिंगन सा करतीं शाखें
नेह बरसाते
देह सहलाते
संदली गंध से महकाते पुष्प
कानों में घुलता सरसराते पत्तों का संगीत,
जड़ें इतनी गहरी
मानों पाताल तक जा पहुंची हों
सम्हाल रखा हो घर को अपने कांधों पर.

मगर ये तब की बात थी.....

अब आँगन में बिखरे हैं सूखे पत्ते
जिनकी चरमराहट ही एकमात्र संवाद है मेरा वृक्ष से
तने खोखले हैं
खुरदुरा स्पर्श ...
जड़ों ने दीवारों में दरार कर दी है

ऐसा नहीं कि प्रेम के अभाव में जीवन नहीं
मगर
बड़ा त्रासद है
प्रेम का होना और फिर न होना ....
~अनु ~


Wednesday, June 5, 2013

कि व्यर्थ न जाए एक भी आहुति......(विश्व पर्यावरण दिवस )

एक आकाशवाणी
और बीज अंकुरित हुआ
गर्भ धारण किया माँ ने
नेह सिंचित उस बीज की
पौध हूँ मैं!
मेरी नसों की नीलाई पर
तुम्हारा अधिकार है माँ
मेरे ह्रदय का हर एक  स्पंदन
तुम्हारे व्रत और अनुष्ठानों का प्रतिफल है.
तुम्हारे ओज से ही
मेरा अस्तित्व है
घने अन्धकार भरे इस संसार में...
माँ !
आभारी हूँ तुम्हारी
इस जीवन को पाकर
कृतज्ञ हूँ
वचनबद्ध हूँ सदा के लिए
कि व्यर्थ न जाए तुम्हारी एक भी आहुति ....
करबद्ध हूँ
कर्तव्यों के निर्वाह के लिए,
प्रसन्न रहने के लिए,
जीते रहने के लिए,
कि अब तुम्हारे जीवनदीप की बाती का तेल
मैं हूँ !!!

[सृष्टिकर्ता ने हमें ये हरी भरी पृथ्वी सौंपी जैसे पिता बच्चों के सुपुर्द कर जाते हैं उनकी माँ....जिससे वे चुका सकें सभी ऋण.....]
~अनु ~

नए पुराने मौसम

मौसम अपने संक्रमण काल में है|धीरे धीरे बादलों में पानी जमा हो रहा है पर बरसने को तैयार नहीं...शायद उनकी आसमान से यारी छूट नहीं रही ! मोह...