डायरी में सिर्फ इश्क मोहब्बत नहीं होता........बनिए का हिसाब भी होता है :-)
और मेरी डायरी का हर पन्ना भी प्यार की वकालत नहीं करता..................
जैसे पढ़िए ये पन्ना ........................शायद आप रज़ामंद हों इस फलसफे से..............या ना भी हों !!!!!
मेरा तो ये मानना है कि मोहब्बत करने के लिए मूर्ख होना ज़रूरी है..................
चलिए साबित करने की कोशिश करती हूँ.
मुझे लगता है जिसके पास ज़रा भी अक्ल होगी वो कभी इश्क-मोहब्ब्त के फेर में नहीं पड़ेगा.................बेशक वो प्रेम कर सकता है-ईश्वर से प्रेम,फूल पौधों से प्रेम,मूक जानवरों से,सृष्टि से,चाँद तारों से ..किसी से भी........मगर मैं बात कर रही हूँ रूहानी प्रेम की जो एक लड़की/स्त्री करती है एक लड़के/पुरुष से...........
प्यार भरा दिल एक "मोमबत्ती" की तरह होता है.........सोचिये किसी हंसीन,रूमानी शाम को पाँच सितारा होटल में कैसे रांझे का "दिल" जलता है और हीर लुत्फ़ उठाती है कैंडल लाइट डिनर का.................
परवाने को देखिये.............जल कर ही मानता है............कोई अक्ल की बात है ये???? दिल का दर्द से पुराना रिश्ता है सब जानते हैं.....
प्यार में पागल दिल एक गुब्बारे सा होता है...........................साथी भरता जाता है प्यार की हवा........और फिर फट जाता है गुब्बारा........
अति सर्वत्र वर्जयेत !!!! मगर आशिकों को कहाँ समझ इसकी.......
प्रेमी विद्रोही होते हैं.......प्रेम करके लोग घर समाज सबसे दूरी बना लेते हैं.........और तो और कई तो दुनिया से भी कूच कर जाते हैं.....
सर टिकाने को एक कांधा क्या मिला ,आखरी वक्त में चार कंधों की ज़रूरत होगी ये भी भूल जाते हैं....
दिमाग जब चलता नहीं तब दिल की चलती है, ये बात तय है...............याने इश्क की पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त है मूर्खता....
और सबसे गंभीर स्थिति तो तब पैदा होती है जब अचानक ज्ञान चक्षु खुल जाते हैं..........अब न निगला जाये न उगला जाये वाली हालत का क्या करें!!!!
यूँही नहीं बड़े बुज़ुर्ग इसे "आग का दरिया " कह गए हैं............................
आग के दरिया में कोई अक्लमंद कूदेगा भला?????
गुल-बकावली के फूल लाना,चाँद के पार जाना,तारे तोड़ लाना,पलकों पर बैठाना.......प्रेमियों की इन बातों से ज़रा भी अक्ल की बू आती है क्या????
"दिल कहता है आओ....आकर रहो मेरे भीतर..........समां जाओ मुझमें................बस दिमाग से न कहना.........उससे पुरानी दुश्मनी है मेरी !!!!! वो तुम्हें आने ना देगा........"
-अनु
(मैं मूर्ख हूँ या नहीं, वो किस्सा कभी और.... :-)
और मेरी डायरी का हर पन्ना भी प्यार की वकालत नहीं करता..................
जैसे पढ़िए ये पन्ना ........................शायद आप रज़ामंद हों इस फलसफे से..............या ना भी हों !!!!!
मेरा तो ये मानना है कि मोहब्बत करने के लिए मूर्ख होना ज़रूरी है..................
चलिए साबित करने की कोशिश करती हूँ.
मुझे लगता है जिसके पास ज़रा भी अक्ल होगी वो कभी इश्क-मोहब्ब्त के फेर में नहीं पड़ेगा.................बेशक वो प्रेम कर सकता है-ईश्वर से प्रेम,फूल पौधों से प्रेम,मूक जानवरों से,सृष्टि से,चाँद तारों से ..किसी से भी........मगर मैं बात कर रही हूँ रूहानी प्रेम की जो एक लड़की/स्त्री करती है एक लड़के/पुरुष से...........
प्यार भरा दिल एक "मोमबत्ती" की तरह होता है.........सोचिये किसी हंसीन,रूमानी शाम को पाँच सितारा होटल में कैसे रांझे का "दिल" जलता है और हीर लुत्फ़ उठाती है कैंडल लाइट डिनर का.................
परवाने को देखिये.............जल कर ही मानता है............कोई अक्ल की बात है ये???? दिल का दर्द से पुराना रिश्ता है सब जानते हैं.....
प्यार में पागल दिल एक गुब्बारे सा होता है...........................साथी भरता जाता है प्यार की हवा........और फिर फट जाता है गुब्बारा........
अति सर्वत्र वर्जयेत !!!! मगर आशिकों को कहाँ समझ इसकी.......
प्रेमी विद्रोही होते हैं.......प्रेम करके लोग घर समाज सबसे दूरी बना लेते हैं.........और तो और कई तो दुनिया से भी कूच कर जाते हैं.....
सर टिकाने को एक कांधा क्या मिला ,आखरी वक्त में चार कंधों की ज़रूरत होगी ये भी भूल जाते हैं....
दिमाग जब चलता नहीं तब दिल की चलती है, ये बात तय है...............याने इश्क की पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त है मूर्खता....
और सबसे गंभीर स्थिति तो तब पैदा होती है जब अचानक ज्ञान चक्षु खुल जाते हैं..........अब न निगला जाये न उगला जाये वाली हालत का क्या करें!!!!
यूँही नहीं बड़े बुज़ुर्ग इसे "आग का दरिया " कह गए हैं............................
आग के दरिया में कोई अक्लमंद कूदेगा भला?????
गुल-बकावली के फूल लाना,चाँद के पार जाना,तारे तोड़ लाना,पलकों पर बैठाना.......प्रेमियों की इन बातों से ज़रा भी अक्ल की बू आती है क्या????
"दिल कहता है आओ....आकर रहो मेरे भीतर..........समां जाओ मुझमें................बस दिमाग से न कहना.........उससे पुरानी दुश्मनी है मेरी !!!!! वो तुम्हें आने ना देगा........"
-अनु
(मैं मूर्ख हूँ या नहीं, वो किस्सा कभी और.... :-)









