इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Wednesday, January 14, 2015

"पेशावर"


एक दर्द सा बहता आया है
कुछ चीखें उड़ती आयीं है
दहशत की सर्द हवाओं के संग
खून फिजां में छितराया है....

कुछ कोमल कोमल शाखें थीं
कुछ कलियाँ खिलती खुलती सीं
एक बाग़ को बंजर करने को
ये कौन दरिंदा आया है ?

हैरां हैं हम सुनने वाले
आसमान भी गुमसुम है,
कतरा कतरा है घायल
हर इक ज़र्रा घबराया है.....

टूटे दिल और सपने छलनी
इक खंजर पीठ पे भोंका है
घुट घुट बीतेंगी अब सदियाँ
ज़ख्म जो गहरा पाया है....

 11 जनवरी 2014 दैनिक भास्कर "रसरंग " में प्रकाशित
http://epaper.bhaskar.com/magazine/rasrang/211/11012015/mpcg/1/