इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Sunday, November 2, 2014

कहानी - मिष्टी

पढ़िए मेरी लिखी कहानी -  "मिष्टी'
 जो मध्यप्रदेश जनसंदेश के साप्ताहिक "कल्याणी " में आज प्रकाशित हुई है |


 “ मिष्टी “

मुझे इसी घर में रहना है , इसी घर में...बस !!
कहते हुए मिष्टी अमोल के गले से झूल गयी |
अरे बाबा रुको तो ज़रा, देखने तो दो कि घर में कमरे कितने हैं, कैसे हैं , किराया कितना है , मकान मालिक कौन हैं , कैसे हैं ! कुछ देखे भाले बिना यूँ ही कैसे तय कर सकती हो तुम ?
मैंने तय कर लिया है अमोल , मुझे इसी घर में रहना है... कितना प्यारा सा आँगन है , हरी दूब से ढंका हुआ और देखो किस तरह छितरे हुए हैं उस पर हरसिंगार ! ओ बाबा मुझे तो इश्क हो चला है इन फूलों से......
घर वाकई बहुत सुन्दर था | हरसिंगार के अलावा और भी मौसमी फूलों से क्यारियां भरी हुईं थीं | कोने में एक बांस का झूला लटका था , और सामने संगमरमर की कॉफ़ी टेबल | पीछे एक झरना सा बना हुआ था जिसमें से पानी बहने का मधुर स्वर जैसे आमंत्रण दे रहा हो |

 “अय्यर्स”
हाउस नंबर 44, न्यू मिनाक्षी एन्क्लेव
घर के बाहर लगी नेम प्लेट पर लिखा हुआ था |
अमोल ठिठक कर पढने लगा , तब तक दरवाज़ा खोल कर मिष्टी भीतर चली गयी और उसने कॉल बेल भी बजा डाली |
हे माँ ! क्या अधीर लड़की बांधी है तूने मेरे पल्ले से , नदी की तरह बहती चली जाती है बेरोकटोक ........अमोल बडबडाते हुए उसके पीछे पहुँच गया |
अमोल और मिष्टी की अभी अभी शादी हुई है और साथ ही अमोल का ट्रान्सफर भी | तमिलनाडु का त्रिची शहर दोनों के लिए अजनबी तो है ही साथ ही भाषा भी अनजानी है | सारी उम्र कोलकता में बिताने के बाद अचानक इतनी दूर चले आना दोनों के लिए आसान न था | यहाँ ज़्यादातर लोग तमिल ही बोलते थे और गैर तमिल भाषियों ने मिलने में ज़रा संकोच ही करते थे | पर मिष्टी और अमोल के उत्साह में कोई कमी नहीं थी |
दरअसल उनकी उम्र ही ऐसी थी उस पर नयी शादी , इश्क का ताज़ा ताज़ा बुख़ार , सब कुछ लुभावना लगना ही था , मानों आँखों पर गुलाबी काँच वाला चश्मा पहन रखा हो दोनों ने |  दोनों अकेले रहने के रोमांच का अनुभव तो करना चाहते थे मगर भीतर ही भीतर घबरा भी रहे थे कि कैसे सब कुछ सम्हाल पायेंगे |
शायद इसीलिए माँ-बाप की सलाह पर अमल करना चाहते थे कि ऐसा घर किराए पर लिया जाय जहाँ मकान मालिक का परिवार भी साथ रहता हो |
पढ़ाई ख़त्म करते ही तो शादी हो गयी थी मिष्टी की | अमोल को वो तकरीबन बचपन से जानती थी , पड़ोस में ही तो रहता था वो | साथ खेलते खेलते दोनों बड़े हुए और फिर कभी न जुदा होने की कसमें खा लीं | सब कुछ आसानी से होता चला गया था मिष्टी के जीवन में |
कुछ लोग ऐसे ही होते हैं.....ब्लेस्ड !!

अय्यर्स के घर का दरवाज़ा खुला और सामने खड़े थे एक सज्जन , जिन्होंने माथे पर चन्दन का बड़ा सा तिलक लगाया हुआ था और झक्क सफ़ेद धोती पहनी हुई थी | बदन पर कोई कपडा नहीं था, अलबत्ता उनका जनेऊ ज़रूर दिख रहा था | घर भीतर से एकदम सादा था | बाहर के कमरे में ही भगवान के कई फोटो फ्रेम किये हुए दीवार पर टंगे थे | घर अगरबत्ती की खुशबु से महक रहा था , सात्विक सा माहौल था |  एक पल को उन्हें लगा कि किसी मंदिर के द्वार पर खड़े हैं वो दोनों |

कुछ जगहों का अपना सम्मोहन अपनी ही पवित्रता होती है जो मन को बरबस खींचती है......पहले आँगन में बिखरे हरसिंगार और अब ये शांत सा कमरा.....
मिष्टी ने अपनी उँगलियाँ अमोल की कलाइयों पर कस दीं | अमोल समझ गया उसे इश्क़ हो गया है इस घर से |
अमोल ने नमस्ते की मुद्रा में हाथ जोड़ दिए | मकान मालिक याने अय्यर साहब ने प्रश्नवाचक दृष्टि उन पर गड़ाई और सिर्फ इतना पूछा – यस ?
“जी, हम बाहर टु-लेट का बोर्ड देख कर आये हैं, क्या आपके पास किराए पर देने के लिए कमरे हैं ,” अमोल ने पूछा |
सिर्फ हाँ कहते हुए उन्होंने आवाज़ लगाई – “ चित्रा...
अन्दर से एकदम पारंपरिक वेशभूषा में श्रीमती अय्यर बाहर निकलीं | वे पूरे नौ गज की सिल्क साड़ी में लिपटी थीं , उनके माथे पर भी वैसा ही चन्दन का तिलक था | नाक में मोर के डिज़ाइन वाली टिपिकल दक्षिण भारतीय नथ थी और बालों में खुशबूदार वेणी |
मिष्टी को लगा जैसे साक्षात देवी के दर्शन कर लिए हों | वो सम्मोहित सी खडी उन्हें देखती रह गयी |

अमोल ने ही फिर अपनी बात दुहराई – आपके पास किराए के लिए कमरे हैं ?
उन्होंने इशारे से अन्दर आने को कहा , साथ ही रूखे से स्वर में आदेश आया कि चप्पल उतार कर आना |
दोनों ने झटपट अपनी अपनी चप्पलें उतारीं और दरवाज़े पर पड़े डोरमैट पर पाँव घिसने लगे , मानों खुद को अच्छा बच्चा दिखाना चाहते हों दोनों |
भीतर पडी केन की सादी कुर्सियों पर उन्हें बैठने का आदेश मिला |
श्रीमती अय्यर ने मिष्टी को सर से पैर तक देखा |  मिष्टी अनमनी हो कर अपनी टी शर्ट को नीचे खींचने लगी और अपनी लम्बी खुली टांगों को कुर्सी के नीचे छिपाने की असफल कोशिश करने लगी |
कुछ कहे बिना ही इस होने वाली मकान मालिकिन ने मिष्टी को पसीने से भिगो दिया था |
खैर उन्होंने वार्तालाप शुरू किया | कौन जानता था कि ये वार्तालाप एक ही सवाल और उसके जवाब के बाद ख़तम होने वाला है......
 “ नाम क्या है आपका ?”  उन्होंने अमोल की ओर देखते हुए पूछा |
“अमोल मजुमदार “ अमोल ने जवाब दिया |
मजुमदार ? याने बंगाली ? श्रीमती अय्यर का लहजा ऐसा था जैसे बंगाली कोई गाली हो.......और साथ ही वो कुर्सी छोड़ कर खड़ी हो गयीं |
बेचारे अमोल और मिष्टी भी झट से खड़े हो गए और अमोल ने कहा......“ जी हम बंगाली हैं, हम दोनों ही |”
अमोल को लगा जैसे खुद को बंगाली कहकर वो कोई गुनाह कबूल कर रहा हो....

“सॉरी , हम आपको घर नहीं दे सकते ,” चित्रा जी याने श्रीमती अय्यर ने एकटूक फैसला सुना दिया |
मिष्टी की तो आँख ही भर आयी, उसने नर्म से लहजे में पूछा , “ क्यूँ आंटी, हमें आप घर क्यूँ नहीं दे सकतीं ? “
“ हम ब्राह्मण हैं, और तुम लोग रोज़ मांस मच्छी खाने वाले.......मैं अपने घर में इन सबकी बिलकुल इजाज़त नहीं दे सकती , कतई नहीं | आप यहाँ न बनायें तब भी नहीं........आप हम लोगों से एकदम अलग है......” उन्होंने जिस तरह फैसला सुनाया उसके बाद कुछ कहने- सुनने की गुंजाइश ही नहीं थी |
मिष्टी ने कुछ कहने को मुंह खोला कि अमोल ने टोक दिया – “ अब इस घर में रहने के लिए हम अपना खान पान तो नहीं बदल सकते न ? “
और वो मिष्टी का हाथ पकड़ कर बाहर निकल गया |
दोनों उदास मन से आँगन पार करने लगे.......मिष्टी बगीचे में जाकर ठहर गयी और झुक कर थोड़े से हरसिंगार चुन लिए , जैसे कोई याद लिए जाना चाहती हो इस अनजान घर से |
वाकई पहली नज़र का प्यार क्या किसी से भी हो सकता है ? हरसिंगार के पेड़ वाले घर से भी ?

अय्यर्स के घर से बाहर निकल कर दोनों उसी कॉलोनी में टहलने लगे | मिष्टी चुप थी | कौन जाने चुप थी या खुद से बात कर रही हो.....बहला रही हो अपने मन को |
किसी और के दिए दिलासों से कहीं ज्यादा आसान होना अपने आप को समझाना |
आखिर हम खुद से ज्यादा और किसके करीब होते हैं ?

मिष्टी बचपन से ऐसी ही थी | जो चीज़ उसे भाती वो उसे पाने की जिद्द ठान लेती, और न मिलने पर उदास हो जाती, घंटों बात न करती | वो जो करना चाहती वो करके ही रहती है....
अजीब खब्ती किस्म की लड़की हो यार तुम ...अमोल उसे अक्सर छेड़ता !
मगर मन की इतनी निश्छल थी कि उदासियों के बादल छटते ही खुद-ब- खुद खिल जाती, इन्द्रधनुष की तरह | जैसा नाम वैसा मन था उसका – एकदम मीठा | मिस्री की तरह साफ़ सफ़ेद लड़की , जो ज़रा में घुल-मिल जाती सबके साथ | यूँ ही तो सबकी चहेती नहीं थी वो |
मगर आज उन चित्रा अय्यर आंटी ने तो सिरे से नकार दिया था उनको......उदास होना तो बनता ही था उसका |
यूँ ही टहलते टहलते अय्यर्स के ठीक सामने वाले घर पर अमोल की नज़र पड़ी , वहां भी बोर्ड लगा था – “मकान किराए से देना है |” साथ ही एक फोन नंबर भी लिखा था |
दोनों वहीं पुलिया में बैठ गए और अमोल ने नंबर घुमाया | मिलिट्री के किसी मेजर का नंबर था | बस पांच दस मिनिट के संवाद में ही पूरी बात तय हो गयी | किराया अमोल को सूट किया और अमोल की बातें उन्हें भा गयीं | पड़ोस के घर से चाभी लेकर वे कभी भी शिफ्ट हो सकते थे ऐसा मेजर साहब ने बताया | किराया हर माह बैंक में जमा करना था |
फोन रख कर अमोल ने मिष्टी को आँख मारते हुए कहा , लो भाई अब सामने से तुम मिसिस अय्यर को घूरती रहना और माछेर झोल की महक उन तक पहुंचाती रहना |
“अरे नहीं रे बाबा , अगर पड़ोसियों को ऐतराज़ हो तो  अब हम कम ही बनाया करेंगे माँस मच्छी , “ मिष्टी ने सरलता से कहा |
दो-चार दिन तो मियां बीवी को होश ही नहीं था , अपनी गृहस्थी सजाने में जुटे रहे दोनों | पड़ोसी भी भले लोग थे , दोनों वक्त का चाय नाश्ता पहुँचा जाते थे | काम करते करते मिष्टी सामने के घर पर नज़र डालती और एक आह भर कर फिर सामान जमाने लगती |
हँस पड़ता अमोल उसकी नादानी पर | मिष्टी की मासूमियत पर प्यार आ जाता उसे |
“उदास मत हो , हम इस घर में भी एक हरसिंगार का पौधा लगा लेंगे बारिशों में ,” वो दिलासा देता अपनी बावली बीवी को |
यूँ ही दिन गुज़र रहे थे | अमोल सुबह दस बजे निकल जाता शाम छः सात बजे ही लौटता | टिफ़िन साथ ले जाता | सारा काम सुबह ही निपटा कर मिष्टी एक दम खाली हो जाती | वो दिन भर बालकनी में बैठी कवितायें कहानियाँ पढ़ती या पेंटिंग करती | वो माहिर थी मधुबनी पेंटिंग्स बनाने में | उसकी उँगलियों में जादू था | वो सभी को तोहफों में अपनी बनाई पेंटिंग ही भेंट करती, पाने वाला निहाल हो जाता | कभी-कभी वो अपनी पेंटिंग्स आर्ट गैलरी में नीलाम करती और पैसा अनाथ आश्रम में दे आती | ऐसा करके मिष्टी का मन संतुष्टि से भर जाता |
मिष्टी के भीतर कहीं एक चंचल लड़की थी तो कहीं एक गंभीर और समझदार औरत भी |
मिष्टी और अमोल को त्रिची आये कोई तीन महीने बीत चुके थे | आस पास के सारे दर्शनीय स्थल वे  देख चुके थे | नए लोग , नयी भाषा, वेशभूषा , खान-पान सबको बखूबी समझ लिया था दोनों ने और दिन मज़े में गुज़र रहे थे |
इतने दिनों में कई बार मिसिस अय्यर  दिखीं और मिष्टी ने मुस्कुराते हुए नमस्कार भी किया मगर उन्होंने रूखा सा “नमस्कारम” कहकर मुंह मोड़ लिया |
इस औरत की प्रॉब्लम क्या है ? अमोल कभी कभी चिढ़ जाता |
रिवाज़ों से जकड़ी हुईं है बस | देखने में तो भली लगती हैं , कौन जाने उनके ऐसे व्यवहार की कोई वजह हो | मिष्टी उनकी बेवजह वकालत करते हुए कहती |
“तुम उनका इतना पक्ष क्यूँ लेती हो.....वो तुम्हें अपने घर कभी एक कदम भी नहीं रखने देने वाली हैं मिष्टी मोजुमदार , बंगालन !! अमोल ने ठहाका लगाते हुए कहा.....
एक रोज़ बातों बातों में पड़ोसन ने मिष्टी को बताया कि मिसिस अय्यर की एक चौदह-पंद्रह साल की बेटी है जो न सुन सकती है न बोल सकती है | चार पांच साल की थी तभी एक सर्जरी के बाद से ऐसा हो गया | तबसे उन्होंने कहीं आना जाना, लोगों से मिलना जुलना बंद कर दिया |
उनका व्यवहार ऐसा हो गया है जैसे कोई हीनभावना से ग्रस्त इंसान का होता है |
बच्ची को पढाने भी कोई ट्यूटर घर आने लगे | अय्यर साहब ने वोलंटरी रिटायरमेंट ले लिया और घर बैठ गए | अब शायद पैसों की कुछ तंगी महसूस हुई होगी इसलिए किरायदारों का सोचा होगा |

पड़ोसन की बात मिष्टी के मन में बार बार गूंजती रही , बल्कि हथौड़े की तरह उसे चोट पहुंचाती रही |

इंसान अपनी कमियों को दूर करने की जगह उनको छिपाने का प्रयास क्यूँ करता है आखिर ! सबसे श्रेष्ठ जीव होते हुए भी हताशा इंसानों में सबसे ज्यादा देखी जाती है | मिष्टी के विचार जाने कहाँ कहाँ दौड़ते रहे .............
संयोग से अगले दिन ही घर के बाहर मिसेस अय्यर और उनके साथ एक लड़की दिखी , जिसे देखते ही मिष्टी समझ गयी कि ये उनकी बेटी है | बड़ी बड़ी आँखों और घने लम्बे बालों वाली प्यारी सी लड़की थी वो |
“ नमस्कारम आंटी “ मिष्टी ने मुस्कुराते हुए कहा |
वे भी हौले से मुस्कुराईं , या ये मिष्टी की खुशफ़हमी भी हो सकती थी | क्यूंकि वे जल्दी से घर के भीतर जाने लगीं | मिष्टी ने बच्ची को देख कर हाथ हिला दिया |
मिष्टी को अपनी मुस्कराहट के बदले उस बच्ची की खिलखिलाहट सुनने मिली.....वो मिष्टी को देख कर जोर जोर से हाथ हिला रही थी और हंसती जा रही थी | मां बेटी के भीतर चले के बाद भी मिष्टी बड़ी देर तक वहीं खड़ी  हाथ हिलाती रही ........
“कैसा अन्याय है ये देवी मां तुम्हारा ! “ मिष्टी बुदबुदाई....... इतनी प्यारी बच्ची को ऐसा अधूरापन दे डाला ! बिना दुखों और अभावों के सृष्टि की रचना नहीं की जा सकती थी क्या ? – मिष्टी बेहद भावुक और उदास हो गयी |
मगर आने वाले दिन उतने उदास नहीं थे | मिसेस अय्यर की बेटी अब अक्सर बालकनी में निकल आती और मिष्टी को देखकर हाथ हिलाती |
मिष्टी भी अपना हाथ हिलाती......
फिर वे दोनों इशारों में बात करते |
“ओह ! ये लड़की तो करीब भी आयी तो बात इशारों में ही होगी......” इस ख़याल से ही मिष्टी अनमनी हो जाती, उसका सुन्दर चेहरा बुझ सा जाता मानों सूरज के ढलने के बाद पंखुडियां समेट ली हों कमल ने|
एक रोज़ मिष्टी बाहर बगीचे में बैठी थी कि पीछे से उसकी आँख किसी ने बंद कर दी......मिष्टी उन नन्हें हाथों को पकड़ कर सामने लायी तो चौंक पडी वो..... मिसेस अय्यर की बेटी थी |
तुम ? तुम यहाँ कैसे आयीं ? जाओ, जल्दी जाओ यहाँ से वरना तुम्हारी माँ गुस्सा हो जायेंगी |
मिष्टी बोलते बोलते रुक गयी........ओ माँ , मैं तो भूल ही गयी कि ये सुन नहीं सकती |
लड़की मुस्कुराती रही , फिर उसने पास पड़ी टेबल से कागज़ और पेन उठाया और मिष्टी को थमा दिया...
तुम यहाँ क्यूँ आयीं , माँ नाराज़ होंगी ! मिष्टी ने लिखा .....
मुझे आप अच्छी लगती हो......माँ सो रही हैं | उस बच्ची ने जवाब दिया |
थोड़ी देर इसी तरह मिष्टी और वो आपस में सवाल जवाब करते रहे | जैसे कोई इम्तेहान हो.....एक सरल सा इम्तेहान, जिसके सभी जवाब दोनों को आते हों |
बच्ची ने बताया उसका नाम बुलबुल है |
बुलबुल जो गा नहीं सकती.....मिष्टी की आँखें बरस पडीं |
उस रोज़ संध्या आरती के समय उसका ध्यान पूजा में ज़रा भी नहीं लगा......आज वो भगवान से भी खफा थी |

अब बुलबुल कभी कभी आने लगी थी मिष्टी के पास | वो बड़े जतन से मिष्टी को पेंटिंग्स बनाते देखती | एक दिन एक कोरे कागज़ पर बुलबुल ने बहुत प्यारी मछली बनाई और मिष्टी को दे दी.....बहुत ही सुन्दर ड्राइंग थी वो, मिष्टी देखती रह गयी...... फिर अचानक उसने कागज़ पर लिखा माँ और मछली के चित्र को काट डाला | मिष्टी बुलबुल का चेहरा देखने लगी फिर दोनों ज़ोरों से हंस पड़ी |
बुलबुल बहुत अच्छी कलाकार थी , मिष्टी ने उसके हुनर को पहचान लिया था |
मिष्टी के घर बुलबुल का आना यूँ ही जारी रहा | वो कभी भी अचानक आ धमकती , शायद जब भी वो अपनी माँ से नज़रें बचा कर आ पाती , आ जाती थी | वो बमुश्किल पंद्रह बीस मिनिट ही रुकती और उनकी बातें रेखाचित्रों के माध्यम से ही होती | और बुलबुल में कमाल की अभिव्यक्ति क्षमता थी | 
मिष्टी कुछ इशारे करने की कोशिश करती तो वो अनदेखा कर जाती और उसकी तरफ कागज़ बढ़ा देती , जैसे उसे मज़ा आ रहा हो इस खेल में | हाँ खेल ही तो था ये उसके लिए |  बस इस बहाने बेहतरीन स्केचिंग करते थे दोनों |
मिष्टी को बुलबुल का यूँ छिप छिप कर आना ठीक नहीं लगता था तो एक दिन वो अचानक अय्यर्स के घर पहुँच गयी |
बाहर के कमरे में ही दोनों मियां बीवी और बच्ची बुलबुल बैठे हुए थे | उसे देखते ही वे तीनों ही चौंक पड़े | और चौंकने के लिए सबके पास अपने अपने कारण थे | उनमें से कोई कुछ कहता इसके पहले ही मिष्टी बोल पड़ी |
“ आंटी आप शायद जानती नहीं मगर बुलबुल कभी कभी मेरे घर आती है | “ मुझे उसका आना बहुत अच्छा लगता है मगर वो आपकी इजाज़त लेकर आये तो मुझे खुशी होगी | “
ये सुनते ही चित्रा अय्यर की भौंहें तन गयीं, उन्होंने इशारों से बुलबुल को डपटना शुरू किया | ये देख मिष्टी उनके बीच में आकर खड़ी हो गयी |
“आप ये क्या कह रही हैं ? मैंने उसे मछली खिलाई होगी ?”  मिष्टी की आवाज़ में गुस्सा और दुःख दोनों था |
 “ इतनी नादान नहीं हूँ मैं आंटी , और आपके रीति रिवाज़ और संस्कारों की इज्ज़त करती हूँ  | ”
मिष्टी की आवाज़ रुन्धने लगी थी |
श्रीमती अय्यर ने हैरानी से मिष्टी की ओर देखा ! “ तुम कैसे समझीं कि मैंने क्या कहा ? “ उन्होंने पूछा !
जब से बुलबुल से मिली हूँ थोडा बहुत समझने लगी हूँ, मिष्टी ने झिझकते हुए कहा |
मिसिस अय्यर के तने हुए चेहरे में ज़रा सी नरमी आयी | मगर आवाज़ अब भी वैसी ही थी , एक दम सख्त !
“देखिये मुझे पसंद नहीं कि मेरी बेटी किसी से मिले जुले , फिर जब मैंने आपको किरायेदार के रूप में ही नहीं स्वीकारा तो बुलबुल से दोस्ती के लिए कैसे विश्वास कर सकती हूँ | “
“आप बेशक मेरे बारे में कोई भी राय रखें मगर आप इस मासूम को क्यूँ इस तरह एकांतवास की सजा दे रही हैं ? आप उसे स्कूल नहीं भेजतीं , किसी से मिलने नहीं देतीं , आखिर क्यूँ ? “ मिष्टी का चेहरा सुर्ख लाल हो गया था, और वो आवेष से काँप रही थी |
बिना कुछ कहे मिसिस अय्यर भीतर चली गयीं और मिष्टी हारे हुए मन से घर लौट आयी |

उस दिन बुलबुल भी शायद बिना सुने इतना तो समझ ही गयी थी कि उसके मिष्टी के घर आने-जाने को लेकर ही बहस छिड़ी है |
मगर वो बच्ची क्या करती !
बस यूँ ही आती रही चुपके चुपके और पेंटिंग्स बनाती रही खामोशी से |

मिष्टी बेचैन रहती.......
तो एक दिन बुलबुल के वहां रहते हुए ही उसने मिसिस अय्यर को फोन करके बुला लिया |
धुन की बड़ी पक्की थी मिष्टी , और उसूलों की भी........अनूठा व्यक्तित्व था इस लड़की मिष्टी का |
मिसेज़ अय्यर के आते ही उसने वही अधूरी बहस छेड़ दी |
“आप बुलबुल को यूँ दुनिया से काट कर अच्छा नहीं कर रहीं है आंटी

मैं अपनी बेटी का अच्छा – बुरा जानती हूँ.....
मेरी बेटी दुनिया के और लोगों जैसी नहीं है न इसलिए.....
मिसिस अय्यर धीरे से बुद्बुदायीं.....
“लोग उसकी कमी का चर्चा करें ये मुझसे सहन न होगा.....”

मिष्टी उनकी सोच पर हैरान थी , मगर जानती थी कि ये एक माँ की ओर से बेटी को पहनाया गया सुरक्षा कवच है और कुछ नहीं....
आंटी आपने कभी सुना है कि किसी ने हेलेन केलर या बीथोवेन की कमियों की चर्चा की है ? मिष्टी ने बड़े स्नेह से कहा.....
मिष्टी ने उन्हें बुलबुल की बनाई पेंटिंग्स दिखाई |
आंटी आपकी लड़की में असाधारण प्रतिभा है.....इसे खिलने दीजिये | इस पर और मुझ पर यकीन कीजिये....
मिसिस अय्यर ने एक गहरी सांस भरी जैसे कुछ कहने की शक्ति जुटा रही हों |
मन जब उलझनों से घिरा रहता है तब शब्द भी कहीं उलझ से जाते हैं, मानो हलक से बाहर निकलने को राज़ी न हों.....खुद से ही संघर्ष करता है मन | और जिसमें कभी हार होती है और कभी जीत.....

उन्होंने बस इतना ही कहा – बुलबुल चाहे तो कभी कभार थोड़ी देर को तुम्हारे घर आ सकती है मगर उसको अपनी तरह मत बना देना तुम |
मेरी तरह याने ? मिष्टी ने पूछना चाहा मगर चुप रह गयी | कई बार पूर्वाग्रह से ग्रस्त इंसान को यूँ ही छोड़ देना बेहतर होता है जिससे उसे वक्त और मौका मिले अपनी सोच बदलने का |
अब बुलबुल नियम से मिष्टी के पास आने लगी | वो रोज़ थोड़े से हरसिंगार चुन कर ले आती और मिष्टी निहाल हो जाती | खुश होने के लिए दरअसल बहुत थोड़े की ज़रुरत होती है |
मिष्टी उसको मधुबनी पेंटिंग की बारीकियां सिखाने लगी | ईश्वर ने एक ओर तो उस प्यारी लड़की को बोलने सुनने से मोहताज़ रखा था मगर दूसरी ओर उसको कला की बेहतरीन समझ दी थी | ऊपरवाला हिसाब का बड़ा पक्का जो ठहरा |
बुलबुल ज़्यादातर मछलियाँ बनाती , न जाने कितने रंगों की छोटे बड़ी मछलियाँ | मिष्टी खूब हंसती |
तुम्हारी माँ मुझे मार डालेगी बुलबुल, यूँ मछलियाँ न बनाया कर हमेशा , मिष्टी उसे प्यार से उलाहना देती |
जवाब में बुलबुल ने लिखा – मछलियाँ मुझे पसंद हैं क्यूंकि वो भी नहीं बोलती |
मिष्टी ने उसे बुलबुल बनाना भी सिखाया, कोयल और मोर भी |
मिष्टी बुलबुल के आर्टवर्क इकट्ठे करती जा रही थी | कलकत्ता की एक आर्ट गैलरी जो फोक आर्ट को बढ़ावा देती है और उसको सहेजने के सभी प्रयास करती है , वहां मिष्टी ने बात की और बुलबुल की कुछ पेंटिंग्स भेजी दीं |
जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ......अब बुलबुल की पेंटिंग्स प्रदर्शिनी में जाने वाली थीं |
एक्सिबिशन का नाम बुलबुल ने ही दिया “ मिष्टी मछली ” | मिष्टी और अमोल खूब हँसे उसकी इस मासूमियत पर | लोगों ने खूब पसंद किया बुलबुल की कला को.....और मनमाने दाम देकर खरीदा भी | मिष्टी जानती थी कि ये तो सिर्फ शुरुआत है......

*अब मिष्टी उदास नहीं होती |
*बुलबुल बेरोक-टोक मिष्टी के पास आती है |
*श्रीमती अय्यर ने उसे स्पेशल स्कूल भेजना शुरू कर दिया है |
*मिसिस अय्यर अब मिष्टी को देख कर खुल कर मुस्कुराती हैं और कभी कभी रसम – चावल भी     खिलाती हैं |
*मिष्टी के आँगन में भी बुलबुल का दिया हरसिंगार झरने लगा है |

अनुलता राज नायर