इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Friday, September 19, 2014

मेरी लिखी कहानी - महक मिट्टी की - याद शहर में 92.7 big fm

आजकल लिख रही हूँ कहानियाँ  नीलेश मिश्रा के याद शहर के लिए....
92.7 BIG FM में ये कहानियां पढ़ते हैं नीलेश अपनी रूहानी आवाज़ में...................
आप भी सुनिये मेरी लिखी कहानी "महक मिट्टी की "

लिंक दे रही हूँ.....पढने से ज्यादा आपको सुनने में आनंद आएगा !

https://www.youtube.com/watch?v=cvPYY9jqcmo&index=2&list=PLRknjC5MPHa29hPAM0Mg1IfFEUuFkqeBx



महक मिट्टी की.....
एअरपोर्ट से लौट रही थी आरती......उसकी आँखें नम थीं मगर दिल गुनगुना रहा था | ठंडी हवा के झोंके  आरती के गालों पर यूँ पड़ रहे थे मानों हवा भी उसे थपथपा कर कर कह रही हो – वेलडन आरती !! आसमान पर बादलों के बीच पूरा चाँद चमक  रहा था.......आज आषाढ़ की पूर्णिमा यानि गुरु पूर्णिमा थी, क्या सुखद संयोग है...आरती मुस्कुरा दी !
लेकिन उसके गालों पर आँसू का एक कतरा लुढक आया.... 
मिस यू पापा.....आप खुश हो न अपनी बेटी से? आरती बुदबुदाई.....
आरती को लगा जैसे वो चाँद और तेज़ी से चमका और हौले से मुस्कुराया भी...
आरती भी मुस्कुरा दी ....... “लव यू पापा !”
आरती की कार जितनी तेज़ी से आगे दौड़ रही थी उसका मन उतनी ही तेज़ पीछे की ओर दौड़ रहा था, अतीत की गलियों की ओर......तकरीबन दो साल पीछे......
आरती के पापा को गुज़रे तब सिर्फ दो महीने ही हुये थे| वक्त धीरे-धीरे भर रहा था मन के घाव...... आरती अपनी माँ के साथ आने वाली ज़िन्दगी का ताना-बाना बुनती रहती | 27 बरस की बेहद समझदार और संवेदनशील लडकी थी वो | अपने पापा में उसकी जान बसती थी और उनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की थी उसने | मगर नियति से कौन जीत सका है | जाने वाले तो चले ही जाते हैं और उनके बाद भी जीवन जैसे तैसे चलता ही रहता है |
“माँ , मैं पापा की याद को मन में हमेशा के लिए ताज़ा रखने के लिए कुछ करना चाहती हूँ |” उस रोज़ आरती ने माँ के आँचल से खेलते खेलते अचानक कहा था |
माँ ने बिना कुछ कहे सवालिया नज़रों से आरती की ओर देखा.....
“माँ , मैं एक ऐसा काम करना चाहती हूँ जो पापा के बहुत चाहने पर भी मैंने नहीं किया | उनके जीते जी न सही मगर अब उनकी इच्छा पूरी करना चाहती हूँ और मैं लिखना चाहती हूँ एक किताब...उनके गाँव पर, उनके बचपन पर |”
“मगर इसके लिए तो बेटा तुम्हें केरल जाना पड़ेगा , और तुम्हें मलयालम भी नहीं आती” , माँ ने बस इतना जवाब दिया था |
“वही तो माँ......वही तो सीखना है सबसे पहले ! पापा की ये भी तो एक इच्छा थी कि मैं मलयालम सीखूँ ! मगर मेरा बचपना भी न , उनकी बातें हँसते हँसते टाल जाती थी...फिर पापा ने भी  कभी जिद नहीं की ..ना तुमसे और न मुझसे | पता नहीं क्या सोच कर आरती का गला रूंध गया था | जैसे कोई अपराधबोध पल रहा हो उसके भीतर......
“बड़ी समझदारहो गयी है मेरी बेटी ”....माँ ने आरती को दुलारा |
“हाँ माँ , मुझे बच्चा बनाये रखने वाले पापा जो नहीं हैं अब |” कहते कहते आरती खो गयी  , जैसे मन चल पड़ा हो कहीं दूर........... कोई तो ऐसा ख्याल था जो आरती के ज़हन में पल रहा था और जिसने इतने लम्बे सफ़र का रूप ले लिया था |

आरती अपने माता-पिता की एकलौती संतान थी | पापा केरल से थे  और माँ मध्यप्रदेश की पली बढ़ी थी | पापा नौकरी की तलाश में एम पी  आये और यहीं बस गए | घर में हिंदी अंग्रेज़ी ही बोली जाती रही और मलयालम दोनों भाषाओं के  बीच कहीं दब कर रह गयी | आस- पड़ोस के लोग, दफ्तर के साथी , बाज़ार में दुकानदार , सभी जो भाषा बोलते वही आरती के घर में बोली जाने लगी | जीने के रंग ढंग , खान पान के क़ायदे , तीज त्यौहार वगैरह सभी कुछ मध्य प्रदेश का हो गया |

“ठीक है भई, जैसा देस  वैसा भेस” ...आरती के पापा अक्सर ठंडी सांस भर कर बोलते |
आरती अपने पिता के बेहद करीब थी | पापा उसकी ऊर्जा थे और वो पापा के जीने की वजह | अपने पापा के स्नेह, मार्गदर्शन और प्रोत्साहन की वजह से ही आरती बेहद मज़बूत, और हौसले से भरी हुयी  लडकी थी |
पापा अपनी मिट्टी से दूर ज़रूर आ गए थे और बहुत खुश और सफल भी थे मगर उनके मन के भीतर एक गहरा लगाव था अपने गाँव से | और दूर चले आने की एक कसक भी थी........
वे आरती को अपने बचपन के ढेरों किस्से सुनाते |
“जानती हो बेटा , हम स्कूल तुम्हारी तरह बस से नहीं जाता था , तैर कर जाता था ....बीच में एक नदी था और नाव में खाली लडकी लोग होता था या फिर बूड़ा लोग | तो बस क्या हम छलाँग लगा देता था नदी में , और तैर कर पार कर जाता |
पापा नदी “था” नहीं ...”थी” और पार करता ‘था’ नहीं ..करते थे “| आरती हँसते हुए बस पापा की हिंदी सुधारने में लगी रहती और पापा उससे बेखबर अपनी किस्सागोई में खोये रहते |
 “हाँ , और किताब केला का पत्ता में  लपेटता था कि भीगे नहीं | पापा बोलते चले जाते |
आरती के पापा उसको बताते कि कैसे वे काली मिर्च की कंटीली बेल से फल तोड़ते , नारियल के लम्बे लम्बे पेड़ों पर सरपट चढ़ जाते | पापा की हर बात से गाँव की मिट्टी की सौंधी महक आती थी |
“तुम मुझसे मलयालम में बात किया करो तो तुम भी सीख जायेगा धीरे धीरे” .....कभी कभी उसके पापा प्यार से  कहते | “फिर अपना गाँव दिखाने ले जायेगा तुमको , तुम्हारा भी गाँव  “.........कहते कहते पापा कहीं खो जाते | 
मगर कान्वेंट में पढने वाली लड़की आरती , हिंदी ही मुश्किल से  बोलती थी तो मलयालम का सवाल कहाँ था | हाँ पापा की हिंदी जरूर सुधर गयी थी |
पापा उसे केरल की लोक कथाएं सुनाते , वहां के खान पान , संस्कृति , तीज त्योहारों के बारे में बताते रहते थे |
आज जब पापा नहीं हैं तब आरती को एहसास हुआ कि पापा उसको भी अपनी जड़ों से जोड़ने की कितनी चाहत रखते थे और वो अपनी नादानी में उनकी भावनाओं को अनदेखा करती रही |
जिस शिद्दत से पापा ने यहाँ की भाषा को सीखा और संस्कृति को अपनाया , क्या वैसे प्रयास हम नहीं कर सकते थे ... यह सोचकर आरती की आँखों से आँसू लुढ़क आये और वो देर तक माँ की गोद में सर छुपाये रोती रही |
“माँ मैं केरल, पापा के गाँव जाना चाहती हूँ , वो भी जल्द से जल्द |”
“भावनाओं में बह कर कोई फैसला मत करो आरती” माँ ने उसको समझाने की कोशिश की |
“सोच लो तुम कैसे मैनेज करोगी वहां? रहोगी कहाँ ? खाओगी क्या...! पहले प्लान तो कर लो बेटा”|
नहीं माँ.....ज्यादा प्लानिंग और देर की  तो कहीं अपने इरादे से पलट न जाऊं इसलिए मैं परसों ही चली जाऊँगी |”
बेटी का मन माँ ने पढ़ लिया था इसलिए कुछ नहीं कहा और उसका सामान पैक करने लगी | और बस आरती का सफ़र वहीं से शुरू हो गया था |

ख्यालों में खोये खोये ही आरती की एर्नाकुलम तक की लम्बी यात्रा पल में गुज़र गयी | वो जल्द से जल्द अपने पिता के गाँव “आइरूर” पहुंचना चाहती थी | स्टेशन पर उतर कर रिटायरिंग रूम में ही फ्रेश होकर आरती ने टैक्सी ली और चल पड़ी |
गाँव पहुँची तो उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था.....
“इतनी दूर न जाने किसके सहारे चली आयी हूँ | यहाँ कोई होटल तो मिलने से रहा, देखती हूँ कहीं ठहरने का कोई जुगाड़ हो जाय तो अच्छा हो, वरना वापस शहर तक जाना होगा |” आरती खुद से बातें करके खुद को ही तसल्ली देती जा रही थी | 
बहुत पहले बचपन में कभी वो आयी थी यहाँ जब उसके दादा का देहांत हुआ था | उसके बाद फिर आना नहीं हुआ और उस बात को करीब 12-13 साल बीत चुके थे | बाद में पापा ही अकेले आकर पूरी प्रॉपर्टी किसी को बेच कर चले गए थे | क्यूंकि न माँ की इच्छा थी कि केरल में सेटल हुआ जाय न आरती का मन था |
आरती सीधे जाकर अपने पिता के घर के सामने रुक गयी | सीधी सड़क पर बने इस घर को खोजने और फिर पहचानने में उसको ज़रा भी तकलीफ नहीं हुई|

घर के ठीक सामने एक मंदिर था जिसमें किसी भगवान् की नहीं बल्कि एक गाँव की वेशभूषा वाले इंसान की मूर्ती थी | पापा ने उसे बताया था कि ये मंदिर उसके दादाजी ने बनवाया था, इस बहादुर आदमी ने एक आदमखोर शेर से कई गाँव वालों को बचाया था मगर खुद मारा गया | नीची जाति का होने के कारण गाँव वालों ने मंदिर निर्माण का बड़ा विरोध किया था मगर दादाजी की ज़िद्द के आगे किसी की न चली थी | आरती ने मंदिर के आगे एक सल्यूट मारा ...उसे गर्व हुआ कि वो ऐसे दादा की पोती है |
आरती का गला सूख रहा था....बोतल निकाल कर उसने पानी पिया और ऊंचे बने घर की सीढियाँ चढ़ने लगी | दरवाज़ा यूँ ही खुला पड़ा था...लम्बे बरामदे के कोने में एक आराम कुर्सी पड़ी थी जो शायद तब भी थी जब उसके दादा यहाँ रहते थे
बरामदे में खड़े होकर उसने आवाज़ लगाईं...............हेल्लो !! कोई है.......??
भीतर से एक साठ पैंसठ साल की एक बुज़ुर्ग महिला निकलीं...अपनी ऐनक ठीक करते हुए उन्होंने पूछा – कौन है ? वो मलयालम में बात कर रही थीं...थोड़ा बहुत आरती को समझ आया और थोड़ा नहीं |
उसने अंग्रेज़ी में बातचीत आगे बढ़ाई– मैं आरती ! भोपाल से आयी हूँ !
उसने अपने पिता का परिचय दिया और उन्हें याद दिलाया कि ये घर और इससे जुडी ज़मीनें कभी उसके पिता की हुआ करती थीं |
उस औरत की आँखों में चमक आ गयी | उन्हें सब याद था | उन्होंने आरती को बैठाया...कॉफ़ी पिलाई और फिर उसके यहाँ इतनी दूर, वो भी अकेले आने का मकसद पूछा |
उनका अपनापन देख कर आरती को तसल्ली हुई कि इस गाँव में उसे कोई पहचानने वाला तो मिला|
वो रोज़ी आंटी थीं , उनके पति ने ही आरती के पापा से प्रॉपर्टी खरीदी थी | अब वे रहे नहीं और आंटी यहाँ अकेले  रह रही थीं |
सबसे ज्यादा हैरानी आरती को तब हुई जब रोज़ी आंटी ठीक ठाक हिन्दी में बात करने लगीं | और उन्होंने बताया कि उन्हें अच्छी समझ है हिंदी भाषा की |
“दरअसल मैंने कुछ साल यहीं गाँव के स्कूल में हिन्दी पढ़ाई है |” रोज़ी आंटी ने बताया |
रोज़ी आंटी ने आरती का खुले दिल से स्वागत किया और वहीं अपने घर में रहने और खाने पीने का बंदोबस्त भी कर दिया |
सारा घर ख़ाली पड़ा है...तुम जहाँ चाहे रह सकती हो | और जो चाहोगी वही मैं तुमको पका कर खिला सकती हूँ , आंटी ऐसे खुश थीं मानों उनका कोई अपना लौट आया हो |
आरती को लगा उसे जैसे कोई देवदूत मिल गया हो , उसकी समस्या का आसान सा हल लेकर लेकिन गाँव में रहना इतना भी आसान नहीं था |

आरती अब रोज़ी आंटी के साथ गाँव में यहाँ वहां घूमती, उनसे ढेरों सवाल करती | और आंटी भी बड़ी खुशी खुशी उसको सब कुछ विस्तार से बतातीं | एक ही परेशानी थी ..आरती के लिए मलयालम अभी भी एक मुश्किल भाषा थी | रोजी आंटी उसके लिए दुभाषिये का काम कर रही थीं |
आरती रोजी आंटी से पापा के बारे में पूछती और कभी रोजी आंटी की जिन्दगी की बारे में भी जानना चाहती |
आंटी ने बताया कि उनका परिवार बचपन से पापा के घर के पड़ोस में रहता आया है इसलिए जब ज़मीन बेचने की बारी आयी तो पापा ने सबसे पहले उनसे ही पूछा | शायद मन में ये उम्मीद रही हो कि कभी यहाँ आना हुआ तो कम से कम अपने लोग तो दिखेंगे |
“रोज़ी आंटी आप यहाँ अकेले रहते हुए बोर नहीं होतीं ?”  आरती ने एक रात खाना खाते हुए उनसे पूछा....
“यहाँ कितना सूना होता है सूरज ढलने के बाद.....कैसा सन्नाटा होता है ! आपको डर नहीं लगता ?”
रोज़ी आंटी की आँखों में अचानक उदासी तैर गयी थी |
“अकेले रहना किसे अच्छा लगता है बिटिया , ऐसी ज़िन्दगी कोई मांग के नहीं लेता.....किस्मत ऐसे फैसले हम पर थोप देती है | आंटी ने बुझी आवाज़ में कहा.......
उस रात आरती की आँखों में रोज़ी आंटी की उदासी घर कर गयी थी | उसने सारी रात तारे गिनते हुए काटी |
एक सुबह चाय और केले के चिप्स खाते खाते आरती ने उनसे पूछा –“आंटी आपका एक बेटा भी है न ? आप उनके पास क्यूँ नहीं चली जातीं ?”
आंटी थोड़ी देर चुप रही ...आरती को लगा शायद उसने अपनी हद पार कर दी है ....और आंटी इस सवाल का जवाब ही नहीं देना चाहतीं |
“कौन माँ नहीं चाहेगी अपने बेटों के साथ रहना | किसे नहीं अच्छा लगता भरा पूरा घर , नाती पोतों के साथ खेलना | मगर ये सुख मेरी किस्मत में नहीं है शायद ......आरती को लगा आंटी उससे नहीं बल्कि ख़ुद से बात कर रही थीं.......
क्या हुआ आंटी ? बताइए न ! – झिझकते हुए आरती ने दबाव डाला | मैं आपकी इतनी अपनी तो हूँ कि आप अपना दुःख मुझसे बाँट सकें |
मेरा बेटा तो बेटा कहलाने लायक ही नहीं है | यहाँ से अपने हिस्से की ज़मीन बेच कर जो गया तो फिर लौटा ही नहीं | न अपना पता ठिकाना बताया, न हमारी खबर ली | लोगों से पता लगा मुंबई में है और सुखी है | मुझे और क्या चाहिए |
आंटी की आवाज़ में अचानक गुस्सा तैर गया था |
बस आंटी ? आपको उसके सुख के सिवा और कुछ नहीं चाहिए ? आपका सुख कोई मायने नहीं रखता ??
आंटी खामोश रहीं.....कुछ कहा नहीं उन्होंने ......आंटी के दुःख का एक ही इलाज था ....मेहमान बनकर आयी आरती और उसको मलयालम सिखाने का जोश |
आरती को वहां रहते हुए कई दिन हो गए थे...उसने काफ़ी मलयालम सीख ली थी और आंटी के पास रखीं पापा की कुछ चिट्ठियाँ पढ़ना भी वह सीख गयी थी |

गाँव के ठीक बीच से एक नहर जाती थी , आरती ने कई दफा अपने पापा से उस नहर का ज़िक्र सुना था कि कैसे वे अपने दोस्तों के साथ नहर की संकरी दीवार पर दौड़ लगाया करते थे.......
उस रोज़ नहर पर पहुँचते ही आरती ने अपनी डायरी और पेन आंटी को पकड़ाया और चढ़ गयी उसकी दीवार पर, और दौड़ने लगी.......वो पूरी तरह जीना चाहती थी अपने पापा का बचपन |
आंटी ने डर कर आँखों पर हथेलियाँ रख लीं ...आरती हंस पड़ी और जोर से चिल्लाई......”डरिये मत आंटी, शहर के ट्रेफिक में  चलने वाली इस लड़की को गाँव की इस खाली पगडंडी पर कुछ नहीं होगा | “
उस दिन आरती को ऐसा लगा था कि उसने पापा को वापस पा लिया है |
उस दिन पहली बार ख्यालों में अपने पापा से मलयालम में बात करती रही थी आरती , ढेर सारी बातें.....!

अगले कई दिन तक आरती अपनी किताब लिखने में व्यस्त रही | रोज़ी आंटी उसका पूरा ख़याल रखतीं और वक्त वक्त पर उसको कई छोटी बड़ी बातें बताती रहतीं | कभी आरती बाज़ार आते जाते घर की चीज़ें भी ले आती |
आंटी खूब नाराज़ होतीं , उलाहने देतीं | इस मीठी तकरार के बीच दोनों का रिश्ता और गहरा होता रहा | आरती को यूँ लगता कि उसने अपने गांव में किसी करीबी रिश्तेदार को पा लिया है जो अपनी मुफलिसी में भी दरियादिली से उसका ख़याल रखती हैं |
रात दिन आरती अपनी किताब के लिए matter इकठ्ठा करती रहती | रोज़ी आंटी उसे बाकायदा मलयालम भाषा के पाठ पढ़ातीं, उससे सवाल जवाब करतीं , उसको वहां की लोक संस्कृति से जुड़ी हुई बातें बतातीं | शायद उनसे बेहतर टीचर आरती को कोई मिल ही नहीं सकती थीं |
बाद में आरती उन्हें प्यार से गुरु माँ कहने लगी और रोजी आंटी इस बात से बहुत खुश होतीं |
आंटी की याददाश्त बहुत तेज़ थी और दिमाग भी | इस उम्र में भी उन्हें हज़ारों कहानियां, किस्से, और कवितायें रटी हुईं थीं | थोड़े समय में ही उन्होंने आरती को मलयालम और केरल से पूरी तरह जोड़ दिया था |
“आंटी , पता नहीं मैं आपका एहसान किस तरह चुका पाऊँगी |” एक रोज़ आरती ने बहुत भावुक होकर उनसे कहा |
“कैसा एहसान बेटा...बल्कि तुम आयी यह मेरे लिए अच्छा हुआ .......मेरे घर के सन्नाटे कम हो गये|
तुम्हारी हंसी से ये घर खिलखिलाने लगा है | काश मैं तुमको हमेशा के लिए रोक पाती”......आंटी की आवाज़ भर आई थी |
“चलिए कॉफ़ी पीते हैं, फिर मंदिर भी तो जाना है” – कहते हुए आरती उठ गयी , अपने आँसू दिखा कर वो आंटी को और दुखी नहीं करना चाहती थी |
उन दिनों गाँव के मंदिर में उत्सव चल रहा था | केरल के मंदिरों में ये ख़ास अवसर होता है | रात भर वहां तरह तरह के लोक नृत्य होते हैं ,जिनमें गाँव के ही पुरुष ,स्त्रियाँ और बच्चे हिस्सा लेते हैं | बहुत रौनक रहती है उन दिनों गाँव में |
रात रात जाग कर आरती ने भी कथकली, थैय्यम और तिरुवादिरा का आनंद लिया |
“तुम एकदम सही वक्त पर आयी हो आरती,” आंटी खुश होकर उससे कहतीं |
वहां रह कर आरती ने तरह तरह के अप्पम बनाना सीखे, केले के पत्ते पर खाना और उसमें परोसना भी सीखा |
“जानती हो पत्ते में हर डिश की अपनी एक तय जगह होती है और पत्ते को रखने की दिशा भी तय होती है |” आंटी उसे जितने चाव से बतातीं आरती उतने ही चाव से सब कुछ समझती और लिखती जाती |
अगले दिन आरती केरल के प्रसिद्द अरमुला मंदिर गयी | वहां धातु को घिस कर आईना बनाने की नायाब तकनीक देखी |
आरती को याद आया कि पापा ने बताया था कि शुभ होता है इस आईने का घर में होना | आरती ने एक सुन्दर सा आइना खरीद लिया और उसमें अपनी सूरत देखने लगी |
मंदिर से मिले चन्दन के आड़े टीके और गुच्छा भर वेणियों से सजी आरती अपना अक्स देख कर मुस्कुरा उठी |
“आंटी , आज पापा मुझे इस रूप में देखते तो खुश हो जाते ” कहते कहते आरती का गला रुंध गया|
आंटी ने उसकी बलाएँ ली और माथा चूम लिया | आंटी के इस प्यार के वजह से आरती की जिन्दगी को एक नया मकसद मिल गया था |


अगले दिन सुबह वो उठकर  बरामदे में आयी तो आंटी एक बॉक्स में कुछ पैक कर रही थीं | आरती वहीं फर्श पर उनके पास बैठ गयी | “क्या है ये सब आंटी ?”
“ये सब तुम्हारे लिए है, मेरी तरफ से तोहफा समझ लो ! ...... ध्यान से देखो इन तस्वीरों को | ये सब तुम्हारे पापा की या उनके बचपन से जुड़ी तस्वीरे हैं | कुछ चिट्ठियाँ हैं,  और भी कई छोटी छोटी चीज़ें हैं.......
ये सब मुझे परछत्ती पर पड़े एक संदूक में मिली थीं जिन्हें शायद तुम्हारे पापा देख नहीं पाए होंगे|”
आरती की आँखें भीग गयीं | भाषा ज्ञान के अलावा आंटी ने उसकी झोली अनमोल सौगातों से भर दी थी | वो आंटी के पैरों पर झुक गयी, आंटी ने उसे गले लगा लिया और पता नहीं कितनी देर दोनों आंसुओं से एक दूसरे का कंधा भिगोती रहीं |
अगले सुबह आरती जल्दी उठ कर सामने की पहाडी पर बने घर गयी | ये उसकी दादी का घर था और यहाँ पापा का जन्म हुआ था | वहां खड़े होकर आरती ने गहरी सांस ली....उसे लगा कोई अपनी सी , जानी पहचानी महक उसकी नाक से सीधे ज़हन में पहुँच गयी | उसने ज़मीन से मिट्टी उठायी और अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं |
आरती सोचने लगी – “ऐसे ही एक मुट्ठी मिट्टी पापा भी लेकर आये थे जब उन्होंने ज़मीन का आख़री टुकड़ा बेचा था और उस मिट्टी को उनके साथ ही विदा किया था हमने.......”
आरती सिसक सिसक कर रोती रही ......घर के बाहरी दरवाज़े की चौखट पर पापा की जन्म तिथी खुदी हुई थी , आरती ने हौले से उन शब्दों को सहलाया | पूरी पहाडी में आरती एकदम अकेली थी मगर उसको ज़रा भी न डर लग रहा था न अकेलापन | बस बरसों बाद अपने घर लौट आने जैसा एहसास तारी था |
उस दिन आरती बहुत अनमनी रही | उसे एहसास हुआ था कि पापा का मन कितना कलपा होगा इस ज़मीन को छोड़ने में | वो सोचती रही – “काश मैं उनके जीते जी यहाँ आ पाती और उन्हें तसल्ली दे पाती कि पापा आप फ़िक्र न करें, मैं सींचती रहूंगी उन जड़ों को जिनसे आपका जीवन अंकुरित हुआ है |”
रात गहरा रही थी और आरती करवटें बदलती रही...कुछ दिनों में उसे वापस जाना था | तभी उसे आहट महसूस हुई, रोज़ी आंटी थीं......
“आइये न आंटी ” , आरती उठ कर बैठ गयीं...
“नहीं नहीं उठो मत आंटी ने स्नेह से ज़िद्द करके उसको फिर लिटा दिया |” उसके बालों में हाथ फेरते हुए वो गुनगुनाने लगीं.....
“ओमन तिंक्कल किडावो ”....................
आरती चौंक गयी...वो उठ बैठी....
“आंटी ये गीत क्या है ?” वो हैरान होकर कहने लगी , बचपन से सुनती आयी हूँ अपने पापा से ये कविता ! न अर्थ जानती थी न सुर समझती थी , मगर एक एक लफ्ज़ याद हो गया था मुझे | मैं जब जब पापा से कहती तब तब वो गाने लगते और मैं खूब खुश हो जाती.....
“आरती ये एक लोरी है जो शायद केरल के हर घर में हर बच्चे को उसके माता पिता ने सुनायी होगी.....इसे बरसों पहले केरल के राज कवि ने लिखा था , और जिसे यहाँ के राजा “स्वाति तिरुनल” को सुनाया  जाता था |” आंटी अब भी उसके बाल सहला रही थीं |
अपने पूरे केरल प्रवास के दौरान आरती ने पापा का समूचा गाँव अपने भीतर समेट लिया था | उसके मन में बहुत खुशी थी और उससे भी ज़्यादा था आत्म संतोष |
आरती अपना सामान पैक कर रही थी....रोज़ी आंटी उदास आँखों से उसे देख रही थीं | आरती का मन भर आया.....अचानक वो बोली – “आंटी आप चलिए न मेरे साथ भोपाल, कुछ दिनों के लिए ही सही , आपका मन बहल जाएगा ”.. “प्लीज प्लीज आंटी, आपने मुझे मेरी जड़ों से मिलवाया है आंटी , अब मैं आपको वो डालियाँ दिखाउंगी जिन पर मैं फली ,फूली और झूली हूँ” आरती बच्चों की तरह ज़िद्द करने लगी |
ह्म्म्म......आंटी ने कुछ सोचते हुए सर हिलाया और फिर कहा , “इस मिट्टी को सींचने वाला भी तो कोई बचा होना चाहिए न गाँव में , तभी तो बची रहेगी महक मिट्टी की...
आरती को एहसास हुआ कि मिट्टी की महक दरअसल इंसान के साथ साथ ही चलती है चाहे ज़मीन क्यों न बदल जाए |
आरती ने आगे बढ़कर रोज़ी  आंटी को गले लगा लिया और खुद से यह वायदा किया कि साल में एक बार पापा के गाँव ... अपने गाँव जरूर लौटेगी |

अनुलता राज नायर





Tuesday, September 9, 2014

बेटियाँ


दुष्यंत संग्रहालय, भोपाल में सरोकार संस्था द्वारा बेटियों पर आधारित समारोह - 


मेरी जिस कविता को सम्मान और सराहना मिली वो साझा कर रही हूँ.....


" भेदभाव "

मिट्टी नहीं करती भेदभाव
अपने भीतर दबे बीजों पर...
होते हैं सभी बीज अंकुरित
और लहलहाते हैं
फूलते हैं, खिलते हैं....
मनुष्य ऐसा नहीं है !
वो मसल देता है
उन बीजों को
जिनसे जन्मती हैं बेटियाँ ...
ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि दी,
मनुष्य ने
स्वयं को ईश्वर बना लिया |
ईश्वर के आंसुओं से भीगती हैं मिट्टी
अन्खुआते हैं बीज,
मनुष्य का मन नहीं भीगता
न आंसुओं से न रक्त से !


बेटियाँ

बेटियाँ अलग होती हैं

पहला निवाला
घी वाला
उसका नहीं होता अक्सर
मगर
उसे आता है ये भूल जाना
और तोडती है वो अपने निवाले खुद,
हर कौर उसका अपना !

उसके हिस्से आती है पुरानी यूनिफोर्म
पढ़ती है पुरानी किताबों से
फिर लिखती है नयी कहानियाँ
उसके हस्ताक्षर अब सब जानते हैं !

उसके जन्म के समय
नहीं खाए माँ ने लड्डू,
नहीं बांटी मिठाई पिता ने/दादी ने
मगर बेटियाँ नहीं याद रखतीं ये सब...
लड्डुओं की बड़ी टोकरी
पहुँचती है मायके
हर सावन
बिना नागा !

सच !! बेटियाँ अलग होती हैं !!

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