इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Tuesday, November 26, 2013

स्वेटर

आँखें खाली
ज़हन उलझा
ठिठुरते रिश्ते  
मन उदास....
सही वक्त है कि उम्मीद की सिलाइयों पर
नर्म गुलाबी ऊन से एक ख्वाब बुना जाय !!

माज़ी के किसी सर्द कोने में कोई न कोई बात,
कोई न कोई याद ज़रूर छिपी होगी
जिसमें ख़्वाबों की बुनाई की विधि होगी,
कितने फंदे ,कब सीधे, कब उलटे......

बुने जाने पर पहनूँगी उस ख्वाब को
कभी तुम भी पहन लेना..
कि ख़्वाबों का माप तो हर मन के लिए
एक सा होता है |
कि उसकी गर्माहट पर हक़ तुम्हारा भी है.....

~अनुलता~

Tuesday, November 19, 2013

सज़ाएं कभी ख़त्म नहीं होतीं.............किये, अनकिये अपराधों की सदायें जब तब कुरेद डालती हैं भरते घावों की पपड़ियों को |
वक्त ज़ख्मों को भरता है...नासूर रिसते हैं ताउम्र.......

जो गलतियाँ हम करते हैं उसके लिए खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाते हैं और अपने ही नाखूनों  से अपना अंतर्मन खुरचते रहते हैं .शायद अपने लिए यही सजा मुक़र्रर कर लेते हैं |
और अनकिये अपराधों की सज़ा तो दोहरी होती है | बेबसी की यातनाएं सहता लहुलुहान मन बस एक काल्पनिक अदालत में खड़ा चीखता रह जाता है और उनकी दलीलें टकरा-टकरा कर वापस उसी पर प्रहार करती रहती  हैं | 
कभी हम खुद को कोसते हैं कभी कोई यूँ ही आता जाता हमारे ज़ख्मों के सूखे  दरवाजों पर दस्तक देता निकल जाता हैं...बस यूँ ही !!
तारीखें बदलती हैं ....वक्त के साथ सब कुछ घटता जाता है ,सिर्फ अपराध वहीं के वहीं रह जाते हैं ,उतने ही संगीन |
सज़ाएँ पूरी करके भी अपराधी रहता अपराधी ही है |और उसे जीना होता इन  बेचैनियों का बोझ ढोते हुए |
किसी निरपराधी को सज़ा मिले तो मौत ही मिले , कि आत्मा के घुटने  से सांस का घुट जाना बेहतर है....

~अनु ~

[कुछ ख़याल यूँ ही आते हैं ज़हन में......और उन्हें कह देना सुकून देता है....बस थोडा सा आराम बेचैनियों को....]

Thursday, November 14, 2013

दुखों के बीज

आस पास कुछ नया नहीं....
सब वही पुराना,
लोग पुराने
रोग  पुराने
रिश्ते नाते और उनसे जन्में शोक पुराने |
नित नए सृजन करने वाली धरती को
जाने क्या हुआ ?
कुछ नए दुखों के बीज डाले थे कभी
अब तक अन्खुआये नहीं
दुखों के कुछ वृक्ष होते तो
जड़ों से बांधे रहते मुझे/तुम्हें /हमारे प्रेम को....
सुखों की बाढ़ में बहकर
अलग अलग किनारे आ लगे हैं हम |
~अनुलता ~