इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Monday, April 22, 2013

डायरी का मुड़ा पन्ना ....

मेरी डायरी का एक पन्ना....
माय शेटर्ड ड्रीम्स एंड .....टेटर्ड एक्सप्रेशंस

उसकी याद
मेरी डायरी का एक पन्ना है
वो पन्ना,
जिसे मोड़ रखा था  मैंने
किनारे से..
ताकि खो न जाय.
जब किसी रात यकायक चौंक कर उठती
तब खुद-ब-ख़ुद खुल जाता वो पन्ना...
और लफ्ज़ तैरने लगते सूने कमरे में
स्मृतियाँ पन्ने से निकल कर उड़ने लगती !
सख्त यादें आपस में टकराती,
बड़ा शोर करती हैं.
मधुर शब्द भी अक्सर
जब याद बन जाते है तो बड़े कर्कश हो जाते हैं...
करवटों में गुज़रती एक रात...

उस रोज़ अचानक,यादों के शोर में 
सोने की जद्दोजहद में
खीज कर मैंने कोई स्विच दबाया और
सारे लफ्ज़ उड़ गए
एक्जॉस्ट फैन से बाहर...
अहा ! खाली पन्ना....
सन्नाटा !!!
सुकून!!!
सोचा, नो मोर स्लीपलेस नाइट्स....
(अपनी ही पीठ थपथपाई मैंने.)

मगर फिर
करवट बदलती एक और रात....

अब भी !!
अक्सर सोचती हूँ तुम्हें
उस खाली मुड़े पन्ने को देखते हुए .....

"यादें कहाँ लफ़्ज़ों की मोहताज होती हैं."

~अनु ~

Monday, April 15, 2013

[प्रेम के वैज्ञानिक दृष्टिकोण]


यदि प्रेम एक संख्या है
तो निश्चित ही
विषम संख्या होगी....

इसे बांटा नहीं जा सकता कभी
दो बराबर हिस्सों में.
[प्रेम का गणित ]
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तुम्हारे प्रेम में डूब गयी....
नहीं चाहती थी डूबना
डूब कर अपना अस्तित्व खोना मुझे नापसंद था

उत्प्लवन के सिद्धांत तय करते हैं शर्तें - तैरते रहने की.
डूब जाने की कोई शर्त नहीं!!!!
[प्रेम का भौतिक शास्त्र ]
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शायद तुम कुछ कहते नहीं
और क्यूँ मेरी सदायें पहुँचती नहीं तुम तक ??

oh!! sound needs a medium to travel....

(हमारे बीच ये निर्वात आखिर कब पनपा???)
अब हमारी wavelenghths भी match नहीं करतीं शायद!!
[प्रेम का  वैज्ञानिक दृष्टिकोण]

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प्रेम का एक पल
छिपा लेता है अपने पीछे
दर्द के कई कई बरस....

कुछ लम्हों की उम्र ज्यादा होती है, बरसों से!!!
[प्रेम की प्रकृति....होती है समझ के परे!!]

~अनु~

Tuesday, April 9, 2013

इन दिनों.......

इन दिनों,
सांझ ढले,आसमान से
परिंदों का जाना
और तारों का आना
अच्छा नहीं लगता
गति से स्थिर हो जाना सा
अच्छा नहीं लगता.....
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इन दिनों,
कुछ दिनों में
बीत गए कितने दिन
मानों
ढलें हो
कई कई सूरज
हर एक शाम...

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इन दिनों 
दहका पलाश 
दर्द देता है.
भरमाता है 
इसका चटकीला रंग
जीवन की झूठी तसल्ली देता सा....
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इन दिनों,
तितलियाँ नहीं करतीं
इधर का रुख...
न रंग है न महक है
इधर इन दिनों...
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 इन दिनों,
ज़िन्दगी के हर्फ़
उल्टे दिखाई देते हैं
तकदीर आइना दिखा गयी है
ज़िन्दगी को इन दिनों !!
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इन दिनों ,
चुन रही हूँ कांटे
जो चुभे थे तलवों पर
तुम तक आते आते...
तुम्हारे ख़याल से परे
रख रही हूँ अपना ख़याल 
इन दिनों... 
~अनु ~



Friday, April 5, 2013

यादों के पदचिन्ह

आगे बढ़ते बढ़ते
अनायास
कोई खींचता है पीछे....
मुझे बेबस सा करता हुआ.
एक कदम पीछे रखती हूँ और
धंसती चली जाती हूँ
यादों के दलदल में
गहरे, बहुत गहरे...
डूबती उतराती हूँ
छटपटाती हूँ बाहर आने को...
कभी मिल जाता है किसी हाथ का सहारा
कभी खुद-ब-खुद निकल आती हूँ
लगा देती हूँ अपनी पूरी शक्ति
चल पड़ती हूँ आगे...
मगर इन पाँव का क्या?
ये तो सन जाते  हैं यादों की मिट्टी से
और छोड़ जाते  हैं अपने निशाँ
शायद,पीछा करती यादों के लिए.......

अनु
5/4/2013
एक महीना बीत गया......

Tuesday, April 2, 2013

प्रेम/तलाश/अँधेरा



मैंने बोया था उस रोज़
कुछ,
बहुत गहरे, मिट्टी में
तुम्हारे प्रेम का बीज समझ कर.
और सींचा था अपने प्रेम से
जतन से पाला था.
देखो !
उग आयी है एक नागफनी...

कहो!तुम्हें कुछ कहना है क्या??

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परेशां हूँ
जाने कहाँ खो सी गयी हूँ...
खोजती हूँ खुद को
यहाँ/वहां/खुद में/तुम में
हैरां हूँ..
तुम्हारे भीतर भी नहीं हूँ?
रात तुम्हारी नींद को भी टटोला....
नहीं !!!
तुम्हारे ख़्वाबों में भी नहीं

आखिर कहाँ गुम हुई मैं, तुम्हें पाने के बाद...
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अंधेरे को मैंने
कस कर लपेट लिया
आगोश में
भींच लिया सीने से इस कदर
कि उसकी सूरत दिखलाई न पड़े.
पीछे खडी
कसमसाई सी रौशनी
तकती थी मुझे

अँधेरे से जल गयी लगती है रोशनी !!
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अनु