इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Thursday, January 31, 2013

जानती हूँ , मैं तेरी कुछ नहीं लगती !

तेरी सूरत चस्पा है
मेरी आँखों की पुतलियों में
मेरी तस्वीर तेरी
पुरानी किसी दराज में नहीं.....
      जानती हूँ , मैं तेरी कुछ नहीं लगती !

तेरा ज़िक्र मैं करती रही
हर बात में हर सांस में
पढ़ कर मेरी नज़्म कोई
तू कभी चौंका ही नहीं .....
      जानती हूँ , मैं तेरी कुछ नहीं लगती !

तेरे इश्क में मैं
मुमताज़ हुई
बस एक ताजमहल सा तूने
कुछ कभी गढ़ा ही नहीं...
       जानती हूँ, मैं तेरी कुछ नहीं लगती !

मैं सुलगती रही
गीली लकड़ी की तरह
(उठता रहा धुंआ धीरे धीरे...)
तेरी आँखों में मगर
आँसू सा कुछ उतरा ही नहीं.....
       जानती हूँ, मैं तेरी कुछ नहीं लगती !

अनु

Saturday, January 26, 2013

प्रतीक्षा ...



मिलोगे तुम मुझे अब ?
जाने कितने अरसे बाद....
लगता है सदियाँ बीत गयीं,
बात कल की नही है,
मानों किसी 
पिछले जन्म का किस्सा था.
जाने कैसे पहचानूंगी तुम्हें
तुम भी कैसे जानोगे
कि ये मैं ही हूँ ??
जिन्हें तुम झील सी 
शरबती आँखें कहते थे,
अब पथरा सी गयीं है,
गुलाब की पंखुरी सामान अधर
सूख के पपड़ा गए हैं
इनमें बस
भूले भटके ही 
आती है कोई
पोपली सी,खोखली सी हंसी !!
रेशमी जुल्फों के साये खोजने निकलोगे,
तो चंद चांदी के तारों में
उलझ कर ज़ख़्मी हो जाओगे...
स्निग्ध गालों की लालिमा
महीन झुर्रियों में लुप्त हो गयी है
मगर ये सब तो होना ही था,
तुम होते या ना होते !!
परिवर्तन तो अवश्यम्भावी है..
बस फर्क इतना होता कि
तुम साथ होते तो
मेरी आँखें पथराती नहीं,
उन पनीली आँखों में
तुम देख पाते अपना अक्स
और हम देखते 
गुज़रते हुए वक्त को 
इन्ही सब सहज बदलावों के साथ
कितना आसान होता यूँ 
साथ साथ बुढा जाना..


-अनु 

Thursday, January 17, 2013

हर क्षण मन से झरतीं क्षणिकाएं....

(कुछ बिखरे जज्बातों को समेत कर रख दिया है, बस .......)
स्नेह की मृगतृष्णा
मिटती नहीं...
रिश्तों का मायाजाल
कभी सुलझता नहीं.
तो मत रखो कोई रिश्ता मुझसे
मत बुलाओ मुझे किसी नाम से...
प्रेम का होना ही काफी नहीं है क्या ??
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सबसे है राब्ता
मगर तुम कहाँ हो..
मेरी भटकती हुई निगाह को
कोई ठौर तो मिले...
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वहम
शंकाएं
तर्क-वितर्क
गलतफहमियाँ
सहमे एहसास......
लगता है मोहब्बत को रिश्ते का नाम मिल गया.
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ऐसा नहीं कि
जन्म नहीं लेती
इच्छाएँ अब मन में
बस उन्हें मार डालना सीख लिया है..
शुक्रिया तुम्हारा.
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न मोहब्बत
न नफरत
न सुकून
न दर्द.........
कमबख्त कोई एहसास तो हो
एक नज़्म के लिखे जाने के लिए..
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सर्दियाँ शुरू हुईं
धूप का एक टुकड़ा
उसने मेरे क़दमों पर
रख दिया....
आसान हो गयी जिंदगी.

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न पलकें भीगीं
न लब थरथराये
न तुम कुछ बोले
न हमने सुना- कुछ अनकहा सा ....
मोहब्बत करने वाले क्या यूँ जुदा होते हैं ????
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तेरा इश्क
साया था पीपल का
ज़रा से झोंके से
फडफडा गए पत्ते सारे...
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 जब से दिल मोहब्बत से खाली हुआ......
सुकून ने घर कर लिया.
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अनु
 

Sunday, January 13, 2013

दुआ

प्रेम में
रख दिये थे उसने
दो तारे मेरी हथेली पर
और कस ली थी मैंने
अपनी मुट्ठियाँ....
भींच रखे थे तारे
तब भी ,जब न वो पास था न प्रेम....
जुदाई के बरसों बरस
उसकी  निशानी मान कर.

तब  कहाँ जानती थी
कि मुरादों के पूरा होने की दुआ
हथेलियाँ खोल कर
टूटते तारों से मांगनी होगी...
मगर
उस  आखरी निशानी की कुर्बानी
मुझे मंज़ूर नहीं थी,
किसी कीमत पर नहीं.....
मेरी लहुलुहान हथेलियों ने
अब भी समेट रखे हैं
वो दो नुकीले तारे...
अनु

Monday, January 7, 2013

दम तोड़ती ज़िन्दगी.....

ज़िन्दगी ने
क्यों पहन लिया
ये काला लिबास...
जाने किस बात का
मातम मनाती है ज़िदगी.
ज़िन्दगी के करीब
कोई मर गया लगता है.

यूँ रोती रही ज़िन्दगी
तो किस तरह
जी पाएगी ज़िन्दगी ?
घुट घुट कर इक रोज
खुद भी मर जायेगी ज़िन्दगी.

मरते एहसासों को साँसें देना है
संवेदनाओं को आवाज़ देकर जगाना है
रंगना है दागदार दीवारों को
रवायतों को बदल कर
बेचैनियों को सुकून करना है...
बेमतलब
बेमकसद
क्षत-विक्षत और
कराहती ज़िन्दगी को
ताज़ा हवा देकर
हरा करना है......
ज़िन्दगी  को नयी ज़िन्दगी देना है......

अनु

Friday, January 4, 2013

प्यार की परिभाषा



तुम्हारे लिए प्यार था
ज़मीं से फलक तक साथ चलने का वादा
और मैं खेत की मेड़ों पर हाथ थामे चलने को
प्यार कहती रही....
तुम  चाँद तारे तोड़ कर
दामन में टांकने की बात को प्यार कहते रहे
मैं तारों भरे आसमां तले
बेवजह हँसने और  बतियाने को
प्यार समझती रही….
तुम सारी दुनिया की सैर करवाने को
प्यार जताना कहते,
मेरे लिए तो  पास के मंदिर तक जाकर
संग संग दिया जलाना प्यार था...
तुम्हें मोमबत्ती की रौशनी में
किसी आलीशान होटल में
लज़ीज़ खाना, प्यार लगता था
मुझे रसोई में साथ बैठ,एक थाली से
एक दूजे को
निवाले खिलने में प्यार दिखा...

शहंशाही प्यार था तुम्हारा...बेशक ताजमहल सा तोहफा देता... मौत के बाद भी.

मगर मेरी चाहतें तो थी छोटी छोटी
कच्ची-पक्की
खट्टी मीठी.......चटपटी
ठीक  ही कहते थे तुम
शायद पागल ही थी मैं.
अनु 
(खामोश ख़ामोशी और हम से....)

Tuesday, January 1, 2013

सु -स्वागतम

देखो
कैसे आ गया
हौले से
बिना आहट के..
ना कोई नानुकुर
ना कोई नखरा.
कोई बुलाए ना बुलाए...
चाहे न चाहे,
चला आता है
बिना दस्तक दिए-
अबोध  बालक की तरह, 
और खुद को कर देता है सुपुर्द
हमारे हाथों में..
अब चाहे जैसे हम उससे बर्ताव करें..
देखिये आपके द्वार खड़ा है..
नया नवेला
कोरे कागज़ सा
अनछुआ 
"नववर्ष" 
आपके  आलिंगन की आस लिए..
और ढेरों सौगात लिए..
अनगिनत आशाओं व सैकड़ों  संभावनाओं की..
       कीजिये स्वागत! 
            लीजिए हाथों हाथ!
                मनाइए उत्सव!

अनु