इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Thursday, August 22, 2013

मैं तुम्हें फिर मिलूंगी........

प्रतिष्ठित पत्रिका "आधी आबादी" के अगस्त अंक में  अमृता प्रीतम जी पर मेरा लेख
लेख लिखने का यह पहला प्रयास था मेरा....


इमरोज़ ठीक ही कहते हैं कि उसने जिस्म छोड़ा है,साथ नहीं छोड़ा.वाकई कुछ रूहें जिस्म से जान निकल जाने के बाद भी आबाद रहती हैं और मोहब्बत करने वालों के दिलों में होता है उनका बसेरा.
हिंदी और पंजाबी साहित्य की ऐसी ही एक बेहद रूमानी शख्सियत से आपको रूबरू करवाती हूँ,जो जितनी खूबसूरत थीं उससे कहीं ज़्यादा हसीं और ज़हीन थे उनके शब्द. आइये मिलते हैं “अमृता प्रीतम” से,मेरी कलम के जरिये....
अमृता,जिन्होंने कच्ची उम्र से ही अपने सपनों की इबारत लिखनी शुरू कर दी थी, जिंदगी के सफ्हे पर रोशनाई कभी जिगर का खून था तो कभी आँसू.अमृता कहती हैं-“मेरा सोलहवां वर्ष आज भी मेरे हर वर्ष में शामिल है”,शायद इसीलिए उनकी नज्में और कहानियाँ प्रेम को इतनी पूर्णता से परिभाषित कर पाती हैं.
अमृता की ज़िन्दगी को साल दर साल  लिख पाना मुश्किल है क्यूंकि किसी एक एहसास को पन्ने पर उतारती हूँ तो कोई कोई गुजरा एहसास फिर दस्तक देता है या आने वाला कोई एहसास सामने खड़ा हो जाता है.मेरे ज़हन में गुत्थमगुत्था इन एहसासों के  मोती यूँ ही बिखेर देती हूँ आपके आगे,चुन कर माला में पिरोने का जिम्मा आपका.
अमृता प्रीतम पंजाब (पकिस्तान) के गुजरांवालां में ३१ अगस्त १९१९ में जन्मीं थीं.माता थीं राज बीबी और पिता नंद साधु.नंद स्वयं धार्मिक कविताएँ लिखते थे “पियूष“ उपनाम से.इसलिए पुत्री का नाम उन्होंने “अमृत” रखा. सच ! शायद ईश्वर ने उसे गढ़ते हुए मिट्टी भी शहद और अमृत से गूंथी होगी.
माँ के देहांत के बाद पिता को फिर वैराग्य अपनी ओर खीचने लगा मगर अमृता का मोह संसार से जोड़े रखता. अमृता कभी  बिलख उठती कि वे पिता को स्वीकार थीं या अस्वीकार..अपना अस्तित्व एक ही समय में चाहा और अनचाहा लगता था. पिता की ख़ुशी के लिए वो लिखती रही मगर माँ की मृत्यु के बाद उनकी ईश्वर से आस्था उठ सी गयी थी सो वे चोरी चोरी रूमानी कविताएँ लिखने लगीं. उन दिनों उन्होंने अपने मन में एक काल्पनिक प्रेमी “राजन” को बैठा लिया था और वे उसके सपने देखतीं.अमृता का पहला काव्य संकलन “अमृत लहरें” बाज़ार में आया तब वे मात्र सोलह साल की थीं.
दरअसल अमृता का मन एक पंछी की तरह था जो उड़ना चाहता था खुले आसमान में,एकदम स्वच्छंद,मगर एक तीखा दर्द लिए....
                      एक दर्द था
                    जो सिगरेट की तरह
                   जो मैंने चुपचाप पिया है
                     सिर्फ कुछ नज्में हैं-
                     जो सिगरेट से मैंने
                    राख की तरह झाडी हैं!
अमृता का विवाह सरदार प्रीतम सिंह से हुआ और वे दो बच्चों की माँ बनीं.पति के साथ ज्यादा दिन निभ न सकी मगर प्रीतम नाम उनके साथ सदा जुड़ा रहा.
बात अमृता की हो और साहिर का ज़िक्र न आये ये मुमकिन नहीं.साहिर लुधयानवी साहब से उनकी मुलाक़ात लोपोकी गांव से लौटते हुए किसी काफिले में हुई.इस काफिले में साहिर के सिवा वो सबको जानती थीं मगर उनकी नज़र साहिर पर ही अटक गयी.वे साहिर के साए में उनके पीछे पीछे चलती रहीं और उन्हें एहसास हुआ कि –“मैं ज़रूर उनके साए में चलती रही हूँ,शायद पिछले जन्म से.”साहिर से वो इश्क ,वो दीवानगी जो एक साए से शुरू हुई उनके साथ ताउम्र रही मगर सिर्फ एक साया बनकर.
अब ज़िक्र साहिर का छिड़ा है तो सिलसिला जारी रखती हूँ. अमृता को साहिर से इश्क़ बंटवारे से पहले ,हिन्दुस्तान आने के पहले हुआ.अमृता देहरादून होते हुए दिल्ली में आ बसीं और साहिर बम्बई(मुंबई) चले गए मगर सम्मेलनों,समागमों और खतोकिताबत के जरिये वे सदा जुड़े रहे.अमृता साहिर को ख़त लिखतीं और हर ख़त एक नज़्म होती.उनका इश्क़ किसी मुक्कमल रिश्ते की शक्ल तो न ले सका मगर दोनों की तरफ से नज्मों और कविताओं का अनमोल खजाना दुनिया को दे गया.
इमरोज़ कहते हैं कि इतने लम्बे सफ़र के दौरान साहिर नज़्म से बेहतरीन नज़्म तक पहुंचे,अमृता कविता से बेहतरीन कविता तक पहुँचीं,मगर ये जिंदगी तक नहीं पहुंचे.अमृता ने इसे ख़ामोशी के हसीं रिश्ते का नाम दिया.
                 आसमान जब भी रात का
                 और रौशनी का रिश्ता जोड़ते हैं
                 सितारे मुबारकबाद देते हैं
                 क्यों सोचती हूँ मैं
                 अगर कहीं...
                 मैं,जो तेरी कुछ नहीं लगती!
मेरा मानना है कि यदि अमृता को जानना है, तो हमें उनके भीतर झांकना होगा उनकी नज्मों और कहानियों की खिड़की से. अमृता की नज्मों में जादू है, उन्हें पढ़ते हुए एक तिलस्म सा तारी हो जाता है और आप खो जाते हैं कहीं लफ़्ज़ों और एहसासों के बियाबान में.....
यूँ तो अमृता मोहब्बत करने वाले दिलों की मलिका हैं मगर उनकी कविताओं में सिर्फ इश्क़ या रूमानियत ही नहीं थी.उन्होंने समाज और दुनिया को बेहद करीब से देखा और उसका दर्द अपनी संवेदनशील कलम से पन्नों पर उतारा.बंटवारे का दर्द उन्होंने खुद भुगता है और अपनी आत्मकथा
“रसीदी टिकट” में उन्होंने लिखा-मैंने लाशें देखीं,लाशों जैसे लोग देखे थे.अपने दिल्ली के सफ़र के दौरान बाहर की वीरानियाँ देख उन्हें वारिस शाह की पंक्तियाँ याद आयीं जिनमे उन्होंने हीर का दुःख लिखा है -भला मोए ते बिछड़े कौन मेले (जो मर चुके हैं,बिछड़ चुके है उनसे कौन मिलन कराये...) अमृता के ज़ेहन में ख़याल आया कि आज एक हीर नहीं पंजाब की लाखों बेटियां रो रही हैं, इनके दुःख को कौन गायेगा...और तब उन्होंने वारिस शाह को संबोधित करके अपनी कांपती कलम से लिखा-
अज्ज आक्खां वारिस शाह नूं किते कबरां बिच्चों बोल
ते अज्ज किताबे-इश्क दा कोई अगला वर्क खोल...
इक्क रोई सी धी पंजाब दी,तू लिख लिख मारे बैन
अज्ज लक्खां धीयां रोंदियां,तैनू वारिस शाह नु कहन...............

इस कालजयी कविता ने उन्हें बाद में शोहरत की नयी ऊंचाइयां दी मगर जब ये लिखी गयी थी तब पंजाब में कई पत्र-पत्रिकाओं ने उन पर तोहमतें लगाईं.यहाँ तक कि इस कविता के विरुद्ध  कई कविताएँ लिखी गयीं.
अमृता औरत के दिल को बखूबी समझती थीं और अपने एहसासों को अपनी कहानियों में बेहद सुन्दर लफ़्ज़ों में व्यक्त किया. उन्होंने जलियांवालाबाग़, देशप्रेम, राजनीति, किसान, मजदूर, फिरकापरस्ती, गुरुदेव.लेनिन,वियतनाम जैसे विभिन्न विषयों पर कविताएँ लिखीं. अपने छियासी साल के जीवन में उन्होंने सत्तर साल लेखन करते हुए व्यतीत किये.उन्होंने २८ उपन्यास,१८ पद्य संकलन,कई लघु कथाये,आत्मकथा और संस्मरण लिखे.वे पहली महिला थीं जिन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड से नवाज़ा गया,१९५७ में “सुनहरे” के लिए.१९६९ में पद्मश्री,२००४ में पद्मविभूषण,१९८२ में “कागज़ ते केनवस” के लिए उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ अवार्ड मिला. शान्तिनिकेतन जैसे कई प्रसिद्द विश्वविद्यालयों ने उन्हें डी.लिट की मानद उपाधी से नवाजा. अमृता को अपने देश में ही नहीं विदेश में भी बहुत प्यार और सम्मान मिला.
अमृता के मुताबिक १९६० उनकी ज़िन्दगी का सबसे उदास वर्ष था,जिंदगी के केलेंडर में फटे हुए पृष्ठ की तरह.उन्हीं दिनों अमृता ने जाना कि साहिर को ज़िन्दगी की एक नयी मोहबत मिल गयी है.इमरोज़ से उनकी दोस्ती थी मगर बहुत दुविधाओं से घिरी....ज़िन्दगी की सबसे उदास कविताएँ भी उन्होंने इन्ही दिनों लिखीं.
गज़ब की कल्पनाशीलता और अद्भुत अभिव्यक्ति सामर्थ्य थी अमृता में.जबकी अपनी मानसिक स्थिति को समझने और सम्हालने के लिए उन दिनों वे साइकेट्रिस्ट से भी मिलती थीं.और उसे बताने के लिए अपने सपनों को कागज़ पर लिख लेते थीं...जो बाद में “काला गुलाब” किताब में छपे.
उनकी इस नज़्म से उनके दर्द को महसूस किया मैंने –
मेरी रात जाग रही है
तेरा ख़याल सो गया.....
तेरे इश्क की पाक किताब
कितनी दर्दनाक है
आज मैंने इंतज़ार का सफ़ा
इसमें से फाड़ दिया.....
अमृता की नज्मों की तरह उनकी कहानियाँ भी ह्रदय को हौले से छू कर भी झकझोर दिए जाने का दम रखती हैं.
“पिंजर” उनका सबसे प्रसिद्द उपन्यास है, “पूरो” का किरदार पाठकों के दिल के भीतर नश्तर सा चुभ जाता है,और एक दर्द का एहसास भी देता है साथ ही सहलाता भी है. उनके एक उपन्यास “धरती सागर और सीपियाँ” पर फिल्म बनी कादम्बिनी,१९७५ में.उस फिल्म के लिए उन्होंने एक गीत दिया जो दरअसल उन्होंने १९६० में इमरोज़ से पहली बार मिलने पर लिखा था-
“अम्बर की एक पाक सुराही,बादल का एक जाम उठाकर
 घूँट चांदनी पी है हमने,बात कुफ्र की की है हमने.”
अमृता जी की कहानियों के पात्र इसने सजीव होते थे कि यकीन करना मुश्किल था कि उन पात्रों को उन्होंने खुद नहीं जिया है.हालांकि उनका मानना था कि कई पात्र चेतन या अचेतन मन से उनकी आस-पास की जिंदगियों से जुड़े थे.
उनकी एक कहानी “नागमणि” जो “३६ चक’  नाम से भी छपी,उसकी नायिका अलका का चरित्र अमृता जी को खुद के सबसे ज्यादा करीब लगता है.शायद कई पाठकों को वो किरदार सबसे अधिक प्रभावित करता हो.उनके शब्दों  के मायाजाल में हर कोई उलझ जाता है.
साहिर के ज़िक्र से इब्तेदा हुई तो इन्तहा इमरोज़ के ज़िक्र से ही होगी....अमृता ने अपने जीवन का ज़्यादातर वक्त इमरोज़ के साथ बिताया.इमरोज़-एक बेहतरीन इंसान  और जानेमाने चित्रकार.अमृता ने अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में इमरोज़ का ज़िक्र एक अल्लाह के बन्दे की तरह किया है,जिसने हँसते हुए उनका हाथ थामा और चल पड़ा बिना कोई सवाल किये.
अमृता कहती हैं “इमरोज़ एक दूधिया बादल है,चलने के लिए वह सारा आसमान भी खुद है और वह पवन भी खुद है जो उस बादल को दिशा मुक्त करती है.”
और इमरोज़ कहते हैं-
अमृता -आखर आखर कविता
       कविता कविता ज़िन्दगी.......
३१ अक्टूबर २००५,दिल्ली में अमृता ने आख़री सांस ली....”वे मैं तिड़के घड़े दा पानी,कल तक नइ रहना.......” तब से अब तक वो बसी हैं मोहब्बत करने वालों की साँसों में खुशबू बन कर.
अमृता एक बूँद अमृत की या अथाह सागर मीठे पानी का....उन्हें लफ़्ज़ों में समेट पाना मुमकिन नहीं....
उन्हें सिर्फ पिया जा सकता है...जिया जा सकता है......जी भर के......
अनु
अनुलता राज नायर

50 comments:

  1. अमृता -आखर आखर कविता
    कविता कविता ज़िन्दगी......
    सत्य कथन!!!

    बहुत सुन्दर आलेख!
    आधी आबादी में छपने पर बधाई!!!

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  2. अमृता जी पर उनके व्यक्तित्व के अनुरूप बहुत ही सारगर्भित आलेख लिखा आपने, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  3. बेमिसाल मोहब्बत की इबादत का अफ़साना और अमृता प्रीतम के बारे में बहुत खूबसूरत जानकारी

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार, 23/08/2013 को
    जनभाषा हिंदी बने.- हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः4 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


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  5. सही कहा आपने उनको पूरा समेटना मुमकिन नहीं ,तभी तो पड़ने के बाद भी जिज्ञाषा बना रहा ………. सुन्दर आलेख

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  6. अमृता जी के बारे में विस्तृत लेख ..... बहुत सुंदर ।

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  7. बहुत खूबसूरत जानकारी

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  8. लगता है आपने बहुत शोध कार्य किया है अमृता पर.
    सुन्दर, विस्तृत , गहरा विश्लेषण।

    हैरान हूँ कि किस तरह असफल प्रेम इन्सान को बेहतरीन शायर / शायरा बना देता है !

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    1. सच में बहुत पढ़ा इन दिनों अमृता जी को,इन्टरनेट,youtube पर उनसे जुड़े लोगों के साक्षात्कार देखे...आपने मेरी मेहनत को समझा इसके लिए शुक्रिया डॉक्टर साहब :-)

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  9. बहुत ही बढ़िया लिखा है अनु ...सच अमृता जी को पढ़ते हुए लगता है जैसे अपने ही दिल की बात को उन्होने शब्द दे दिये।

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  10. एक दर्द था
    जो सिगरेट की तरह
    जो मैंने चुपचाप पिया है
    सिर्फ कुछ नज्में हैं-
    जो सिगरेट से मैंने
    राख की तरह झाडी हैं!

    बेशक कीमती राख....

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  11. बहुत अच्छा लगा आज यह लेख पढ़कर...आपको हार्दिक धन्यवाद...अमृता जी को पढ़ना जितना अच्छा लगता था उससे अधिक उनसे मिलना लगता था...कितने आत्मीय ढंग से मिलती थीं और कितना स्नेह देती थीं सबको...वो सदैव जिंदा रहेंगी...
    आपको साधुवाद और हार्दिक शुभकामनाये;-))

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  12. बहुत ही प्यारी और भावो को संजोये रचना......

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  13. अमृता प्रीतम जी के विषय में बहुत कुछ जानने को मिले इस लेख के माध्यम से
    बहुत बहुत आभार !

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  14. नाम भी अच्छा है amrata pritam.

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  15. अमृता प्रीतम को पढ़ना बहुत अच्छा लगता है
    उनपर लिखना बहुत बड़ी बात है...
    बहुत सुंदर आलेख... बहुत बहुत बधाई.....!!!

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  16. अमृता जी को मैंने तब करिबसे जाना जब उन्होंने ओशो की एक किताब की भूमिका लिखी,फिर उनके साहित्य से परिचित होती गई अमृता जी एक भावप्रवण कवयित्री, लेखिका थी जिनके साहित्य सृजन से हमारा देश ही नहीं विश्व साहित्य भी धन्य हुआ है … बहुत बढ़िया लेख अनु, बधाई आपको !

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  17. वाह बहुत गहन जानकारी प्राप्त हुई अमृता जी के बारे में इस एक लेख से

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  18. Maine inhe pura padha hai, lkn jitni baar padhti hun kuch naya lagta hai. There is magic in her writing...Congrats Anu ji

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  19. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  20. whom the cigrrete belong to

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  21. बहुत सुन्दर लेख अनु ...बहुत बहुत बधाई प्यारी !!

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  22. सुन्दर आलेख के लिए शुभकामनाएं.

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  23. ये टिप्पणी कौशलेन्द्र कुक्कू जी की है, facebook पर की गयी थी जिसे सदा सहेजने के उद्देश्य से यहाँ भी प्रकाशित कर रही हूँ :-)ऐसे शब्द रोज़ रोज़ नहीं सुनने मिला करते हैं :-)शुक्रिया तहे दिल से सर !!
    कौशलेन्द्रम कुक्कू
    11 hours ago
    मैं तुम्हें फिर मिलूँगी ......अनु।

    यह लेख नहीं बल्कि गद्य में गज़ल है।

    बड़ी नफ़ासत के साथ ...बेहतरीन उर्दू में ...अमृता की ज़िन्दगी के कुछ टुकड़ों को समेटने की क़ामयाब कोशिश करने वाली अनु के इस आलेख को पढ़ने के बाद लगा कि केमिस्ट्री के फ़ार्मूलों को एक बार फिर पढ़ने की ज़रूरत है। बस्तर बाला अनु को (शायद) भोपाल में रहने का यह फायदा मिला कि वे उर्दू को इतनी नफ़ासत के साथ लिख पा रही हैं। परिष्कृत भाषा सदा ही मुझे आकर्षित करती रही है।
    आज मैं स्मरण कर रहा हूँ, मेरे ब्लॉग पर कभी एक टिप्पणी आयी थी, टिप्पणीकर्ता का नाम था एक्स्प्रेशन, और छविचित्र के स्थान पर थीं इन्द्रधनुषी रंगों वाली कुछ खड़ी रेखायें। बाद में पता चला कि उनका नाम है "अनु" । आज उनका आलेख पढ़कर फिर से उन्हें जानने की चाहत ने दिल से डायरेक्ट कनेक्शन मिलाने को मज़बूर किया।

    वहाँ ग़ुलाब थे ....सुर्ख़ लाल रंग के ग़ुलाब ही ग़ुलाब। शायद सुर्ख़ लाल रंग ही अनु की पसन्द है। कैमिस्ट्री के फ़ार्मूलों में बड़े-बड़े रहस्य छिपे रहते हैं। मैं सोचने लगा ये ग़ुलाब ग़ुलाबी क्यों नहीं हैं? और जब ग़ुलाबी नहीं हैं तो फिर इन्हें क्यों कोई और नाम नहीं दे दिया जाता? ख़ैर ..उनकी कलम जिस काग़ज पर चलती है उसका रंग हल्का ग़ुलाबी देखकर तसल्ली हुयी।

    कोमलता, सुन्दरता और सुगन्ध के लिये मशहूर ग़ुलाब वाकई ग़ुलों का आब है और इसी आब की सुर्ख़ी से लिखे जाते हैं ढ़ाई अक्षर। ....हाँ सिर्फ़ ढ़ाई अक्षर ही।

    अनु प्रायः कवितायें लिखती हैं, वाकई दिल से कनेक्शन जोड़ने वाली कवितायें। उनकी कविताओं में सहज प्रेम है, चिड़ियों की स्वच्छन्दता है, प्रश्न हैं, कोमल और भोली अनुभूतियाँ हैं ....और भी बहुत कुछ है। किंतु मुझे लगता है कि अनु के लिये कविता की कैमिस्ट्री के स्थान पर फ़िज़िक्स का गद्य कहीं अधिक एक्स्प्रेसिव है।

    कई बार हम ख़ुद को ही नहीं जान पाते, नहीं-नहीं कई बार क्या ...हम तो ख़ुद को जान ही नहीं पाते। बस यह भ्रम भर रहता है कि हम सब कुछ जानते हैं। जानते होते तो अनु ने कैमिस्ट्री की जगह साहित्य न पढ़ा होता!

    लेकिन सिर्फ़ पढ़ने भर से क्या होता है, पढ़ कर कितने लोग विद्वान बन पाते हैं? कबीर ने किस विश्वविद्यालय में पढ़ाई की थी? हमारे लिये तो यही आश्चर्य और प्रसन्नता की बात है कि कैमिस्ट्री, फ़िज़िक्स और मेडिकल के स्नातक या परास्नातक हिन्दी साहित्य के मर्म को स्पर्श कर पा रहे हैं।

    अनु से परिचय हुये बहुत दिन हो गये किंतु आज अनु को कुछ-कुछ पहचान पा रहा हूँ। लिखती रहो ...यूँ ही ...गद्यनुमा गज़लें .......

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  24. bahut hi shandaar lekh.............dhanyavaad anu ji..........

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  25. बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

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  26. अमृता पर आपकी पोस्ट बहुत सुंदर है। बहुत जानकारी परक और दिल से लिखी हुई। इमरोज की गहराई भी लेख से पता चलती है। अभी छत्तीसगढ़ में उनके एक नॉवेल पर फिल्म भी बनी है। कुक्कु जी की टिप्पणी इस पोस्ट के सौंदर्य को और बढ़ा रही है। आप बस्तर से हैं यह जानकर और भी खुशी हुई।

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    1. आपका बहुत बहुत शुक्रिया
      यहाँ मैं स्पष्ट करना चाहती हूँ कि मैं बस्तर से नहीं हूँ हाँ मैंने अपने जीवन का शायद सबसे सुन्दर वक्त वहीं बिताया है,मेरे बेटे का जन्म भी वहीं हुआ है इसलिए बहुत लगाव है उस सुन्दर प्रदेश से :-)

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  27. नि:शब्‍द हूँ .... आपके इस उत्‍कृष्‍ट लेखन पर
    बधाई सहित शुभकामनाएँ
    ....

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  28. reading it for the second time.. Anulata congrats and thanks for this awesome article. each and every paragraph reflects the extensive research that you have done for this write-up .brilliant... :)

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  29. अमृता जी जिस तरह कविताएं लिखती थीं , वैसे ही लफ्जों में आपने रूबरू कराया है ... आगामी 31 अगस्त को उनका जन्मदिन भी है , ऐसे में यह लेख सामयिक भी है , बहुत बधाई आपको

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  30. बहुत तृप्ति हुई लेख पढ़ कर और प्यास भी बढ़ गयी अमृता जी की लेखनी में डूबने की
    ...सुंदर उपलब्धि पर बहुत-बहुत बधाई

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  31. अमृता पर आपका लेख पढ़ रहे थे ... ब्लॉग पर टिपण्णी करी तो खो गयी ... शायद हमसे कोई गलती हो गयी ...

    बच्चों के कार्यक्रम में भाग लेने कि लिए आकाशवाणी भवन जाया करते थे तब गलियारों में नज़र आती थीं चौड़े पाय्चों वाली सलवार पहने ... लापरवाह दुपट्टा कन्धों पर डोलता रहता ... कहाँ पता था कि घूमते फिरते भावनाओं और पीड़ा के लावा को देख रहे हैं ... कैसे समझ आता दस बरस के इस हम को ... उनकी वह तस्वीर वैसी की वैसी ही पड़ी है ... न बदली न ही बड़ी हुई ... आवाज़ बूढ़ी हुई और बाते बदलने लगीं ...

    अमृता तो सिर्फ बातें सुनाती हवा है ... बातें जो नत्थी हो जाती हैं मन से और कभी नहीं कटती ... हवा बन छूती रहती है ... देखो तो वही तस्वीर ...

    हिन्द पाकेट बुक्स कि एक एक रुपये में खरीदी नीना , रसीदी टिकट , आशु , डाक्टर देव और उनकी कवितायें गहरी उतर गयीं शायद इस लिए भी मन साफ़ और कोरा था पर उन्होंने अपनी बातें ऐसे लिख दीं कि न तो पुरानी हुई और न ही धुंधली ... उनकी बातों से और बातें लहराते दुपट्टे बनी जुडती चली गयीं और उन्हें और भी निखारती रहीं ... क्या एक उस उम्र का लड़का अमृता के रंग में रंगा जा रहा था ... क्या वे रंगरेज थीं ...

    उन्होंने अपनी यात्राओं के वृत्तांत लिखे है जो अनमोल है ... हवा सी हो वे दुनिया भर को बाहों में घेरती जाती है और अपने रंगों से सजाती जाती है ...

    कौन कहता है अमृता नहीं है ... कभी हवाएं भी मरती है ...

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  32. अमृता प्रीतम को पढ़ना बहुत अच्छा लगता

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  33. कौशलेन्द्र कुक्कु जी ने जो लिखा वैसे ही विचार मेरे भी हैं प्यारी अनु के लिए..कविताएँ तो प्रभावित करती ही थीं...इस आलेख ने मन मोह लिया...पत्रिका में छपने की बधाई !!

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  34. बहुत उम्दा लेख

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  35. अमृता प्रीतम की यादों को संजोती उत्कृष्ट लेखनी . इनकी रसीदी टिकट पढ़ी है .
    (http://dehatrkj.blogspot.com)

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  36. अमृता जी के अमृत का घडा बर लाईं आप तो ।

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  37. बहुत उत्कृष्ट आलेख...बधाई!

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  38. बहुत उत्कृष्ट आलेख...बधाई!

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  39. ammma likes ur aricle, me too .very good piece of information on the great persons life and work.congr8s

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  40. ammma likes ur aricle, me too .very good piece of information on the great persons life and work.congr8s

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  41. nice article. amma is also sending her blessings to her favourite beti.

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  42. तेरे इश्क की पाक किताब
    कितनी दर्दनाक है
    ------------------------------
    अमृता प्रीतम पर बेहतरीन लिखा है आपने ...

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  43. गहरे तक ले जाती है आपकी पोस्ट ... जितनी गहराई लिए अमृता लिखती हैं .. उतना ही गहरा आपने लिखा है ... बहुत बधाई ...

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  44. मैंने शरत साहित्य का हिंदी अनुवाद बहुत पढ़ा है। अमृता जी को भी पढ़ा है। किन्तु एक लेखक के बारे में परिचयात्मक आलेख इतना ह्रदय स्पर्शी, इतना गहरा हो सकता है ये आपके इस आलेख से जाना। साधुवाद व शुभकामनायें।

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  45. अमृता प्रीतम जी के बारे में आपकी नजर से जानना बहुत ही मनभावन लगा..
    सुन्दर:-)

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  46. ये पोस्ट बचा कर रखा था कि आराम से पढूंगी..अमृता प्रीतम पर लिखा अनु का आलेख जल्दबाजी में नहीं पढ़ा जा सकता .
    बहुत सुन्दर आलेख
    सच कहा ,अमृता को लफ़्ज़ों में नहीं समेटा जा सकता...पर तुमने बहुत ख़ूबसूरत कोशिश की और सफल रही..

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  47. amrita se main college library mein mili thi aur fir aksar milti rahi... unke likhe kitne hi lafz aaj bhi meri purani diaries ko sajaa rahe hain .. Amrita ke shabdon mein nasha hai, aag hai aur unse amrit bhi barstaa hai.

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