इन्होने पढ़ा है मेरा जीवन...सो अब उसका हिस्सा हैं........

Tuesday, October 30, 2012

इश्क

कल रात
चाँद यूँ ठहरा
मेरे पहलु  में आकर
जैसे आया हो
कभी न जाने के लिए...

मैं
चाँद
और मोहब्बत...
बंद कर लिए किवाड़ हमने
कभी न खोलने के लिए....

कसमें खायीं
चाँद ने मेरी,
मैंने चाँद की
मोहब्बत ने
मेरी और  चाँद की भी.
कसमें..
कभी न तोड़ने के लिए...

आखिर दिल क्या चाहता है ?
सच्चा  इश्क ? ?
याने-

चाँद रात
नर्म  लहजा
जज़्बात
करीबियां
और  चंद झूठी कसमें !!

-अनु



Friday, October 26, 2012

कोई भी इंसा मुझे बुरा नहीं लगता.

दिल की उलझन ने जन्म दिया कुछ अटपटे और बेतरतीब  ख्यालों को....उन ख्यालों को करीने से रखा तो लगा कुछ गज़ल सी बनी......काफिया रदीफ कहाँ है पता नहीं ....हाँ,एहसास जस के तस रखें हैं.....आप भी महसूस करें...

मौसम का मिजाज़  खरा नहीं लगता
सावन भी इन दिनों हरा नहीं लगता.

एक प्यास हलक को सुखाये हुए है
पीकर दरिया  मन भरा नहीं लगता.

चमकता है सब चाँद तारे के मानिंद
सोने का ये दिल  खरा नहीं लगता.

आदत सी पड़ चुकी है हैवानों की मुझे
कि कोई भी इंसा मुझे बुरा नहीं लगता.


अपने ही घर के लोग अंजान बन गए
कोई  पहचाना एक चेहरा नहीं लगता

सुनता नहीं है वो मेरी,जाने क्यों इन दिनों
कहते  जिसे तुम खुदा,बहरा नहीं लगता.


अनु    

Monday, October 22, 2012

जगा देना मुझे गर.....

गहरा रही है उदासी
थकन हद से ज्यादा
जी है उकताया सा
पलकें नींद से बोझिल....

अब बस सो जाना चाहती हूँ...
एक लंबी सी नींद.

तुम जगा देना मुझे
गर बीत जाय ये पतझर
और फूटें गुलाबी कोंपलें इन ठूँठों पर....

तुम  जगा देना मुझे
जब  समंदर खारा न रहे
और बुझा लूँ मैं प्यास,मोती खोजते खोजते....

तुम जगा देना मुझे
जिस रोज आसमां कुछ नीचा हो जाय
और चूम सकूँ मैं चाँद का चेहरा....

तुम जगा देना मुझे
गर मैं छू सकूँ तारे, बस हाथ बढ़ा कर
और तोड़ कर सारे बिखरा दूँ आँगन में अपने..

जाने क्यूँ इन दिनों हरसिंगार भी झरता नहीं.....


जगा देना मुझे
इस युग के बीतते ही.....
-अनु
"मधुरिमा" दैनिक भास्कर में प्रकाशित16/१/२०१३
http://epaper.bhaskar.com/magazine/madhurima/213/16012013/mpcg/1/

Thursday, October 18, 2012

एक दबी चाह ....आयी है तेरे शहर से गज़ल बन कर

त्योहारों की आमद पर पुराना कबाड तलाशते अकसर कुछ ऐसा हाथ लग जाता है जो खुशियों पर एक गहरा साया सा डाल देता है....जाने हम ऐसा कबाड सहेजते क्यूँ हैं? क्यूँ पुरानी डायरियां सम्हाली जाती हैं जबकि उनमें सिवा दर्द के आपने कुछ उकेरा नहीं होता.....क्या हम खुद ही अपने ज़ख्मों को कुरेदना चाहते हैं??? या शायद उम्मीद होती है दिल को कि इस कड़वी ,आंसुओं से भीगी यादों के पन्नों से चिपका कोई और ऐसा लम्हा भी चला आये जो कुछ पल को महका दे आपका धूल भरा कमरा.......

आज सोचती हूँ कोई एक याद ऐसी खोज निकालूँ  जो मरहम सी लगे...ठंडी हवा की बयार सी छुए....मीठे पानी सा हलक में उतरे....हरसिंगार सा मेरे बदन को छू के झरे.....जूही की कलि सा मेरा आँचल महकाए......
कहो ??? कोई याद होगी क्या ऐसी.....कहीं डायरी के पन्नों में दबी सी....
हाँ  है तो सही...एक दबी हुई गज़ल......दिल गुनगुना तो रहा है...


हवाओं  में तेरे एहसासों  की छुअन पायी है 
ये बयार क्या  तेरे शहर से आयी है ?

एक सुरीली सी धुन कानों ने सुनी
क्या  बांसुरी तेरे शहर ने बजाई है ?

एक मधुर संगीत से झूमा सा है मन
कोई धुन क्या तेरे शहर ने गुनगुनाई है ?

महका सा है आँगन,और रूह भी है महकी
क्या जूही की कलियाँ तेरे शहर ने झरायीं हैं ?

पानी के एक घूँट से बेताबी और बढ़ी
मेरे गाँव की नदी क्या तेरे शहर से बह आयी है ?

अनु




 


Monday, October 15, 2012

उस रोज़... या शायद हर रोज़...


~~~~~~~~~~~~~~~~~
उस रोज़-
एक कांच का ख्वाब
पत्थर दिल से टकराकर
हुआ लहुलुहान
कतरा कतरा...

उस रोज़-
एक फूल सी उम्मीद
डाल से टूटी
बिखर गयी
पंखुरी पंखुरी...

उस रोज़-
एक नर्म सी ख्वाहिश
किसी सख्त बिस्तर की
सलवटों पर थी
दम तोड़ती ....

उस  रोज़-
एक महका सा एहसास
पनाह  की खोज में
भटकता रहा
सड़ता  रहा.....


ऐ लड़की ! वो ख्वाब, वो उम्मीद, वो ख्वाहिश,वो एहसास
कहीं तू ही तो नहीं???

अनु 

Thursday, October 11, 2012

थका हुआ सा एक ख्वाब.....

जाने कब से पल रहा है
न जाने कब से चल रहा है.....
एक ख्वाब
मेरे ज़ेहन में,
मेरे मन में.....

एक ख्वाब
जो थक गया है
पलते पलते
चलते चलते.....

थक गया है ये
मुकम्मल होने का इंतज़ार करते करते
थक गयी हूँ मैं भी
इसको ढोते ढोते.....

सोचती हूँ
सुला दूं इस ख्वाब को
चिरनिद्रा  में
तो शायद
मुझे भी नींद आ जाए
थोड़ा सुकून मिल जाए.....
(कभी कभी ख़्वाबों का टूटना भी ज़रूरी है )

अनु

Monday, October 8, 2012

नभ का कोना



कभी कभी मन अशांत रहता है तो उसे फिर कुछ नहीं भाता...मन निर्मोही तो जाता है...ये जग मिथ्या लगने लगता है.... और वो भगोड़ा बन जाता है.....(मगर कहाँ आसान है भाग जाना....) आहत ह्रदय एकांत खोजने लगता है......कहता है भीड़ में तन्हा हो जाने से बेहतर है कहीं अकेले ही रहा जाय...
कुछ ऐसे ही दुर्बल पलों में लिखा गया कुछ अपनी डायरी से चुरा लायी हूँ.....(क्या पता कोई ऐसा पल कभी आपने भी जिया हो....)

दे दो मुझको
भूला भटका
कुछ सूना सूना
बस मेरा अपना
वो नभ का कोना...
 
न कोई संगी
न कोई साथी
मीलों मीलों
कुछ न होना
वो नभ का कोना....
 
न कुछ लेना
न ही देना
न इसका उसका
कोई आना जाना
वो नभ का कोना....
 
कोई फूल ना पंछी 
  चाँद न तारे
न सूरज का फेरा
बस तम हो घना
वो नभ का कोना...
 
न दुःख कोई
न खुशियों का डेरा
जब तक हों साँसें
है  तन्हा जीना
वो नभ का कोना....

बस  मेरा अपना..नभ का कोना.....
-अनु

Thursday, October 4, 2012

ज़िन्दगी कुछ यूँ ही बसर होती है.......



अपने कुछ बिखरे एहसासों को जोड़ कर ...सिलसिलेवार संजोया हैं मैंने.....मेरे दिल की खुली किताब के कुछ भीगे पन्ने समझ लीजिए.....
तुम से शुरू और तुम पे ही आकर रुकी है मेरी हर नज़्म......तुमसे जुदा कोई बात नज़्म सी लगती नहीं ,
क्या करूँ !!
मेरे हाथों में तुम्हारा हाथ..
याने
-अवसर,संभावना,खुशी....
तुम्हारे काँधे पर टिका मेरा सर
याने

-प्यार,आशा जादू....
तुम्हारा मेरे नज़दीक होना
याने
-ज़िन्दगी,ज़िन्दगी,ज़िन्दगी 
देखा था एक ख्वाब...संजोयी थी एक आस....कि बस यूँ ही बसर होती रहे ज़िन्दगी एक नज़्म सी....एक गीत सी,एक राग सी जो रहे सदा सुर में....
उस रोज
जब सीना चीर कर
तुम दे रहे थे
सबूत अपनी मोहब्बत का..
तब चुपके से वहाँ
मैंने अपना एक ख्वाब
छिपा दिया था ...

जो हलचल है तेरे दिल में उसे
धडकन न समझना....

मगर न तुम हो,न जादू,न खुशी ,न ख्वाब,न ज़िन्दगी,न मोहब्बत,न कोई नज़्म.......बस मैं हूँ और मेरे सवाल कि –जब कुछ नहीं तो मेरा होना भी कोई भरम तो नहीं....

बूंदा बांदी के बीच
अचानक नाज़ुक सी धूप खिल गयी..
मुस्कुराते बादलों की ओट से
इन्द्रधनुष झाँकने लगा,
दूर कहीं बांसुरी बज रही है शायद...
और ये खुशबु का झोंका???

अरे बस कर मेरे मन...
उसकी मोहब्बत का तुझे
फिर से भरम हुआ लगता है....

.......और इन दिनों
ज़िन्दगी यूँ ही बसर होती है.
बस यूँ ही..


ओफ्फो...
गुड़ की तरह
जुबां पर घुलती मोहब्बत में
जाने किरकिरी कहाँ से आई थी!
इस मोहब्बत को भी न
बदमज़ा होने में वक्त नहीं लगता..

अनु