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Showing posts from October, 2012

इश्क

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कल रात
चाँद यूँ ठहरा
मेरे पहलु  में आकर
जैसे आया हो
कभी न जाने के लिए...

मैं
चाँद
और मोहब्बत...
बंद कर लिए किवाड़ हमने
कभी न खोलने के लिए....

कसमें खायीं
चाँद ने मेरी,
मैंने चाँद की
मोहब्बत ने
मेरी और  चाँद की भी.
कसमें..
कभी न तोड़ने के लिए...

आखिर दिल क्या चाहता है ?
सच्चा  इश्क ? ?
याने-

चाँद रात
नर्म  लहजा
जज़्बात
करीबियां
और  चंद झूठी कसमें !!

-अनु



कोई भी इंसा मुझे बुरा नहीं लगता.

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दिल की उलझन ने जन्म दिया कुछ अटपटे और बेतरतीब  ख्यालों को....उन ख्यालों को करीने से रखा तो लगा कुछ गज़ल सी बनी......काफिया रदीफ कहाँ है पता नहीं ....हाँ,एहसास जस के तस रखें हैं.....आप भी महसूस करें...

मौसम का मिजाज़  खरा नहीं लगता
सावन भी इन दिनों हरा नहीं लगता.

एक प्यास हलक को सुखाये हुए है
पीकर दरिया  मन भरा नहीं लगता.

चमकता है सब चाँद तारे के मानिंद
सोने का ये दिल  खरा नहीं लगता.

आदत सी पड़ चुकी है हैवानों की मुझे
कि कोई भी इंसा मुझे बुरा नहीं लगता.


अपने ही घर के लोग अंजान बन गए
कोई  पहचाना एक चेहरा नहीं लगता

सुनता नहीं है वो मेरी,जाने क्यों इन दिनों
कहते  जिसे तुम खुदा,बहरा नहीं लगता.


अनु    

जगा देना मुझे गर.....

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गहरा रही है उदासी
थकन हद से ज्यादा
जी है उकताया सा
पलकें नींद से बोझिल....

अब बस सो जाना चाहती हूँ...
एक लंबी सी नींद.

तुम जगा देना मुझे
गर बीत जाय ये पतझर
और फूटें गुलाबी कोंपलें इन ठूँठों पर....

तुम  जगा देना मुझे
जब  समंदर खारा न रहे
और बुझा लूँ मैं प्यास,मोती खोजते खोजते....

तुम जगा देना मुझे
जिस रोज आसमां कुछ नीचा हो जाय
और चूम सकूँ मैं चाँद का चेहरा....

तुम जगा देना मुझे
गर मैं छू सकूँ तारे, बस हाथ बढ़ा कर
और तोड़ कर सारे बिखरा दूँ आँगन में अपने..

जाने क्यूँ इन दिनों हरसिंगार भी झरता नहीं.....


जगा देना मुझे
इस युग के बीतते ही.....
-अनु
"मधुरिमा" दैनिक भास्कर में प्रकाशित16/१/२०१३
http://epaper.bhaskar.com/magazine/madhurima/213/16012013/mpcg/1/

एक दबी चाह ....आयी है तेरे शहर से गज़ल बन कर

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त्योहारों की आमद पर पुराना कबाड तलाशते अकसर कुछ ऐसा हाथ लग जाता है जो खुशियों पर एक गहरा साया सा डाल देता है....जाने हम ऐसा कबाड सहेजते क्यूँ हैं? क्यूँ पुरानी डायरियां सम्हाली जाती हैं जबकि उनमें सिवा दर्द के आपने कुछ उकेरा नहीं होता.....क्या हम खुद ही अपने ज़ख्मों को कुरेदना चाहते हैं??? या शायद उम्मीद होती है दिल को कि इस कड़वी ,आंसुओं से भीगी यादों के पन्नों से चिपका कोई और ऐसा लम्हा भी चला आये जो कुछ पल को महका दे आपका धूल भरा कमरा.......

आज सोचती हूँ कोई एक याद ऐसी खोज निकालूँ  जो मरहम सी लगे...ठंडी हवा की बयार सी छुए....मीठे पानी सा हलक में उतरे....हरसिंगार सा मेरे बदन को छू के झरे.....जूही की कलि सा मेरा आँचल महकाए......
कहो ??? कोई याद होगी क्या ऐसी.....कहीं डायरी के पन्नों में दबी सी....
हाँ  है तो सही...एक दबी हुई गज़ल......दिल गुनगुना तो रहा है...


हवाओं  में तेरे एहसासों  की छुअन पायी है 
ये बयार क्या  तेरे शहर से आयी है ?

एक सुरीली सी धुन कानों ने सुनी
क्या  बांसुरी तेरे शहर ने बजाई है ?

एक मधुर संगीत से झूमा सा है मन
कोई धुन क्या तेरे शहर ने गुनगुनाई है ?

महका सा है आँगन,और रूह भ…

उस रोज़... या शायद हर रोज़...

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उस रोज़-
एक कांच का ख्वाब
पत्थर दिल से टकराकर
हुआ लहुलुहान
कतरा कतरा...

उस रोज़-
एक फूल सी उम्मीद
डाल से टूटी
बिखर गयी
पंखुरी पंखुरी...

उस रोज़-
एक नर्म सी ख्वाहिश
किसी सख्त बिस्तर की
सलवटों पर थी
दम तोड़ती ....

उस  रोज़-
एक महका सा एहसास
पनाह  की खोज में
भटकता रहा
सड़ता  रहा.....


ऐ लड़की ! वो ख्वाब, वो उम्मीद, वो ख्वाहिश,वो एहसास
कहीं तू ही तो नहीं???

अनु

थका हुआ सा एक ख्वाब.....

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जाने कब से पल रहा है
न जाने कब से चल रहा है.....
एक ख्वाब
मेरे ज़ेहन में,
मेरे मन में.....

एक ख्वाब
जो थक गया है
पलते पलते
चलते चलते.....

थक गया है ये
मुकम्मल होने का इंतज़ार करते करते
थक गयी हूँ मैं भी
इसको ढोते ढोते.....

सोचती हूँ
सुला दूं इस ख्वाब को
चिरनिद्रा  में
तो शायद
मुझे भी नींद आ जाए
थोड़ा सुकून मिल जाए.....
(कभी कभी ख़्वाबों का टूटना भी ज़रूरी है )

अनु

नभ का कोना

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ज़िन्दगी कुछ यूँ ही बसर होती है.......