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Showing posts from May, 2012

उस बहकी रात की याद.......

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तुम्हारे साथ बिताया हर एक लम्हा मैंने सजा रखा है अपनी यादों के नन्हे नन्हे कमरों में......
हर कमरे की खिड़की यदाकदा खोल दिया करती हूँ....यादों को धूप दिखाती हूँ ताकि कहीं फफूंद ना पड़ जाये......कुछ देर को जी लेतीं हूँ वो लम्हा फिर से.....और बंद कर देतीं हूँ वो कमरा दोबारा......
बड़ी साज सम्हाल चाहिए होती है यादों को संजोये रखने के लिए.....वरना वक्त की धूल परत दर परत चढती चली जाती है और धुंधला कर देती है यादों को.......


आज मैंने जिस याद का कमरा खोला वो महक रहा था एक भीनी भीनी खुशबु  से.......तुम्हारी खुशबु से.......और अन्दर चारों ओर चांदनी फैली थी जो जाने कैसे कैद हो गयीं थीं यादों के साथ.......
उस रात,दिन भर की बारिश के बाद चाँद निकला था.........बड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी उसे ......बार बार बादलों की शैतान टोली उसे धकिया रही थी धूसर गुबार के पीछे.....
नदी का किनारा था और तुम्हारा साथ...................जंगल की गीली खुशबु से मदहोश थे हम दोनों.....
नदी में चाँद  का अक्स कैसा प्यारा दिखता था.......
लहरों के साथ चाँद भी मानों नाच रहा हो........मैं हाथ से पानी को जोर से हिलाती और कुछ देर को गुम हो जा…

ज़िद- जीने की

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कभी जब ह्रदय आहत हो....चोट खा-खा कर परास्त हो गया हो .....वेदना असह्य हो चली  हो......नियति के आगे आत्मसमर्पण कर दिया हो.....अपमानित सा जीवन जी कर अहम् हाहाकार कर रहा हो......तब अकसर एक दोराहा आता है-
या तो इहलीला समाप्त कर ली जाये ताकि कष्टों पर पूर्ण विराम लग जाये. या फिर मन हठ कर ले जीवन जीते जाने की.....जीवन से टकराने की.......
और ऐसे में कविता जन्म लेती है.....        
साँसों का बस हो आलंबन ह्रदय में बाकि एक स्पंदन पीकर बेशक कड़वे आँसूं ज़िद है बस मुस्काने की     और जीते जाने की..........
भले ठूंठ सा हो ये जीवन पुष्पहीन हो चाहे यौवन कर सिंचित स्नेह से बगिया ज़िद है फूल खिलाने की      और जीते जाने की..........
मन वीणा के तार हों टूटे बेसुर से कोई स्वर जो फूटें कर के एक अनवरत साधना ज़िद है सुर में गाने की         और जीते जाने की.........
हो चाहे अन्धकार घनेरा जीवन पथ भूतों का डेरा राह करूँ रोशन ,खुद जल कर ज़िद है मंजिल पाने की         और जीते जाने की..........
-अनु  "ह्रदय तारों का स्पंदन"
साहित्य प्रेमी संघ के तत्वाधान में प्रकाशित "ह्रदय तारों का स्पंदन"'का विमोचन हुआ है|मैं भी इस …

वो पनीली आँखें.....

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[भास्कर भूमि में प्रकाशित  http://bhaskarbhumi.com/epaper/index.php?d=2012-05-26&id=8]

स्तब्ध सी !
शून्य में ताकती
सूनी सूनी सी
वो खाली आँखें...


सूखे होंठों वाले
उदास चेहरे पर टंकी
डबडबाई सी
वो  पनीली आँखें...


बंजर  पड़ी
ह्रदय भूमि को
जब तब
आंसुओं से सींचती,
जाने क्यों कभी
हँसती नहीं
वो नीली आँखें...


शायद कुछ छिपा रखा है
मन की सिलवटों के पीछे..
पढ़ न ले कोई
उसकी  कहानी,
इसलिए अकसर 
झुका रखती है
वो पथरीली  आँखें....


जाने कैसा  
भाग्य लिए जन्मीं, 
तब से अब तक 
बस बरसीं जब तब .....
सूख गयीं अब तो
वो कंटीली आँखें....


अपने हर स्वप्न को
मरते देखती
अपनी ही आँखों से... 
उस मासूम सी
लड़की की
वो सीली आँखें...


-अनु 


"ह्रदय तारों का स्पंदन"
साहित्य प्रेमी संघ के तत्वाधान में प्रकाशित "ह्रदय तारों का स्पंदन"'का विमोचन हुआ है|मैं भी इस संकलन का हिस्सा हूँ|इसमें ३० कवियों की  कृतियाँ  शामिल है|
http://www.sahityapremisangh.com/2012/05/blog-post_6490.html इस लिंक पर आकर अपना बहुमूल्य मत प्रकट कर अनुगृहित करें| आभार.

दिल के बहलाने को ये ख़याल अच्छा है.....

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हर उम्र की अपनी खुशी होती है, या कहिये हर खुशी की एक उम्र होती है ........एक ही बात आपको तमाम उम्र खुशी नहीं दे सकती......जैसे छोटा बच्चा माँ के आँचल में सारा जहां पाता है.....थोड़े बड़े हुए तो खिलौनों में सारी दुनिया सिमट जाती हैं..........
एक उम्र आती है जब तारे ताकना,सुबह सुबह ओस की बूँदें चुनना,चाँद की कलाएं आँखों में उतारना, ऐसे ना जाने कितने बेतुके से काम जाने कौन सी खुशियाँ देते हैं.........
ऐसी  ही उम्र में मुझे भाता था समंदर किनारे सीपियाँ  चुनना.......
सुबह सुबह मंद हवाओं के साथ सुर मिलाते
या शाम के हल्के धुंधलके में चांदनी के सहारे, घंटों सुनहरी रेत खंगाला करती........
साथ और भी कई होते थे सीपियाँ चुनने वाले.........
हम सब अपनी अपनी सीपियाँ इकट्ठी करते और गिनते...मानों गिन रहे हो खजाना कोई......
आतुरता से सब अपनी सीपियाँ खोलते कि कहीं कोई मोती निकल आये......
मगर मैं अपनी सीपियाँ बंद रहने देती.........और बस मान लेती कि  इसमें मोती है...........इस तरह जब सभी खाली सीपियाँ लिए दुखी हो रहे होते मैं अपनी सीपी को मुट्ठी में दबाये या कहिये  खुशियाँ  मुट्ठी में दबाये चल पड़ती .........
आज तक…

पटाक्षेप एक नाटक का

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कैसा मधुर स्वर था,
जब तुमने हौले से किया था वादा.. मुझसे मिलने का.
मानों बज उठें हों,कई जलतरंग एक साथ.... मानों झील में खिला कोई सफ़ेद झक कमल.. मानों  तारों भरा आकाश टिमटिमाने लगा हो...द्विगुणित आभा से.. मानों इन्द्रधनुषी रंगों वाला मोर नाच उठा हो , परों को फैलाये.. मानों कोई किसान लहलहाती फसल के बीच  गा रहा हो कोई गीत...
कैसे महक उठी थी फ़िजा ....

फिर सुबह से सांझ और अब रात होने आई....
कहाँ हो तुम??? देखो दृश्य परिवर्तन होने लगा मेरे जीवन के रंगमंच का ...

जलतरंग टूट के बिखरे...अश्रुओं संग बहा  जल,  कमल ने  पंखुडियाँ समेट लीं...
पंछी घरों को लौट गए, आसमां में यकायक बादल घुमड़ आये..
रात स्याह हो चली.. किसान की  फसल पर मानों पाला पड़ गया..
ये घुटन सी क्यूँ है ???
कितना बदल गया सब- तेरे होने और ना होने के दरमियाँ...

शायद पटाक्षेप हुआ.... 


अनु 

तुम गये नहीं अब तक !!!

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मोहब्बत भी अजीब शय है..........एक बार जो हो गयी सो हो गयी........किसी शख्स को जिंदगी से निकाला जा सकता है मगर एहसासों को नहीं.......वो तो दिल की दीवारों पर चिपक के रह जाते हैं...........खुरच के निकालेंगे तो जो दर्द होगा वो कहाँ सह पायेंगे........

पुराने किसी गीत को सुन कर कहीं खो जाना... किसी फूल के खिलने पर  यूँ ही मुस्कुराना... बारिश में भिगो के पलकें  अश्कों को छिपाना... बेमौके ही तक-तक आईना आँखों में काजल सजाना... किसी भीनी सी आती खुशबू पर चौंक कर पलट जाना ! तू है तो सही अब भी
मुझ में,
मेरे आस पास.... हर सू .... सोचती हूँ 
के तुझको भुलाऊं कैसे ? बिना खुद मिटे, 
तेरा वजूद मिटाऊं कैसे ??
-अनु

चुगलखोर पन्ने

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डायरियां बड़ी चुगलखोर होतीं हैं................
जब आप लिखते हैं तो भावनाओं का ज्वार उठा होता है........और आप लिख डालते हैं वो सब कुछ जो शायद आप किसी से कह नहीं सकते......बस कलम चलती जाती हैं और दिल का खाका खिचता जाता है कोरे कागज़ पर.......
बड़ा आनंद आता है किसी पुरानी डायरी को पढ़ने में........फिर चाहे वो हमारी अपनी हो या हमारे किसी अपने की या फिर किसी अनजाने की/किसी पराये की.........
जैसे कि आप पढते हैं मेरी डायरी के पन्ने.......जबकि जानते  नहीं मुझे.....पहचानते भी नहीं.......और शायद जानना चाहते भी नहीं....मगर पढ़ तो लेते ही हैं.......मैंने भी पढ़ी हैं डायरियां चोरी से........जब जिसकी हाथ लगी........बड़े राज़ खोलते है ये पन्ने.....
कोई पराया शायद चाहता हो आपको दिलो जान से........या आपका कोई करीबी आपकी सूरत भी ना देखना चाहता हो......बड़ा रिस्क है डायरी पढ़ने में.


डायरियां समेटे रहतीं  हैं 
प्यार के पल/तकरार के पल...
पहली मुलाक़ात
या जुदाई की रात....
मोहब्ब्त के रंग 
और नफरत के ढंग....
इनमे होता है 
मनुहार/इकरार
करार/इंकार
या कभी 
स्वीकार और अंगीकार.....
या फिर कुछ नहीं.....
सब फरार........
डायरी होती …

एक लफ्ज़ नन्हा सा - माँ

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भास्कर भूमि में प्रकाशित http://bhaskarbhumi.com/epaper/index.php?d=2012-05-13&id=8


इतनी सारी माँओं में एक ना एक माँ तुम्हारी भी होगी..........


माँ-
मेरी
तुम्हारी
उसकी
मेरे दुश्मन की
तुम्हारे दोस्त की
उसके पडोसी की
एक बछड़े की
कातिल की
कान्हा की
भिखारी की
व्याभिचारी  की
इसकी-उसकी
माँ तो माँ है.


मेरी माँ
मेरी अम्मा
सीधी,सरल, सुघड,सुंदर
बिना किसी कारण खुश रहती
कोई कारण खोजती,
तो क्या खुश हो पाती??


उनकी माँ
चार संपन्न बेटों की माँ.
आस लिए
चार धाम की यात्रा के
काटती तीन-तीन माह
चारों के घर.


माँ
भोली
गंवार,घरेलू,अनपढ़.
मगर गहनों से लदी....
बस इन्तेज़ार है
बूढ़े बाप की मौत का......
माँ तो भोली है!!!


स्त्री
एक पत्नि,एक माँ
सुनती रही-
तुम्हारे बच्चे
तुम्हारा पति
तुम्हारा घर.
समझती रही-
कुछ नहीं मेरा.
हूँ बस एक ज़रूरत.


माँ
करती न्योछावर
अपना सर्वस्व,
स्वेच्छा से...
मांगती नहीं कुछ अपने लिए....
सो कुछ पाती भी नहीं.






-अनु

नागफनी

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आँगन में देखो
जाने कहाँ से उग आई है 
ये नागफनी....
मैंने तो बोया था 
तुम्हारी यादों का 
हरसिंगार....
और रोपे थे 
तुम्हारे स्नेह के
गुलमोहर.....
डाले थे बीज 
तुम्हारी खुशबु वाले
केवड़े के.....
कलमें लगाई थीं
तुम्हारी बातों से 
महके  मोगरे की.......


मगर तुम्हारे नेह के बदरा जो नहीं बरसे.....
बंजर हुई मैं......
नागफनी हुई मैं.....
देखो मुझ में काटें निकल आये हैं....
चुभती हूँ मैं भी.....
मानों भरा हो भीतर कोई विष .....


आओ ना ,
आलिंगन करो मेरा.....
भिगो दो मुझे,
करो स्नेह  की अमृत वर्षा...
सो अंकुर फूटें 
पनप जाऊं मैं  
और लिपट जाऊं तुमसे....
महकती ,फूलती
जूही की बेल की तरह...
आओ ना...
और मेरे तन के काँटों को
फूल कर दो.....


-अनु 




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वो तुम्हारे जाने का दिन था.....और सीखा मैंने खुद से प्यार करना......वरना तुम्हें प्यार करने से फुर्सत ही कहाँ थी मुझे!!!!!


तुमने तय कर लिया था मेरी जिंदगी से दूर चले जाने का,और हर फैसले लेने का अख्तियार सिर्फ तुम्हें ही तो था....इसलिए मैं मौन थी.......मानों लीन थी किसी समाधि में या शायद मौत ही तो नहीं आ गयी थी मुझे !!!!
किसी तरह खुद को संयत किया....जी चाहा कुछ सवाल-जवाब करूँ.....मगर क्या फायदा....फैसले हो जाने के बाद कहाँ गुंजाइश रहती है किसी तर्क-वितर्क की.....दिलो-दिमाग में उथल-पुथल मची थी......सोचती रही कि क्या करूंगी तुम्हारे बिना.......किस तरह जीऊँगी अधूरी होकर मैं......मुझ में कुछ भी तो ऐसा न था  जिसमे तुम शामिल न थे......
मेरी साँसें तुम्हारी साँसों की रफ़्तार से चलतीं थीं....मेरी धडकनें  भी शायद मोहताज थी तुम्हारे सीने के स्पंदन की......काश के मैं कुछ ऐसे करती कि तुम भी मेरे बिना अधूरा महसूस करते........मगर मैं रिश्तों में स्पेस देना चाहती थे.......ताकि तुम्हें घुटन ना हो........मगर  स्पेस दूरी में बदल जाएगा ये कहाँ जानती थी......
सो तुम चले गए.....................
खुद को सम्हाला म…

आसरा

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(भास्कर भूमि में प्रकाशित)http://bhaskarbhumi.com/epaper/index.php?d=2012-05-06&id=8


मौसम भी सुहाना है.. तबियत के हाल भी ठीक सुबह की लाली भी सुकून देने वाली थी... कमल भी रोज़ की तरह खिला.. चिड़ियों ने भी वैसे ही गुन-गुनाया,शोर मचाया...
फूल पर तितलियों का मंडराना 
बदस्तूर जारी है.......... घर के सब काम भी यथा समय हो गए... किसी की कोई नाराजगी भी नहीं....... फिर भी न जाने क्यों दिल उदास सा है.
मन अनमना सा है... एक अनजाना सा डर है या कोई असुरक्षा के भाव ?? अजीब सी थकन है .... शायद कोई बुरा ख्वाब देखा हो....??? नहीं !! ख्याल तो नहीं आता... लगता है, माँ की याद आ रही है... हाँ !!
ये सारे बहाने है मेरे,
उस तक पहुँचने के,
उसकी गर्म गोदमेंसररखकरसोने के ... उसके नर्म हाथों का स्पर्श पाने के..... हाँ,शायद यही बात है....
मेरे भीतर भी  एक नन्हे पंछी की तरह कुछ पल को अपने नरम घोंसले में जा छिपने की आस जगी है शायद......
अनु 

वो आँखें अब भी देखतीं हैं मुझे.......

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आँखों की रूमानियत सबकी प्रेम कहानी के किस्से का अहम्  हिस्सा होती है..............क्योंकि जाने अनजाने आँखें ना जाने क्या क्या कह जाती हैं......एक अनकहा रिश्ता बना लेतीं है.......जिसे चाहें एक डोर से बाँध लेती हैं......आँखों से देख सकते हैं हम रूह उसकी......
अब भी यकीं नहीं होता की वो ऑंखें मुंद गयी हैं..........अब भी महसूस होती हैं वो आँखें मुझे ,अपने चार सू.....अपनी डायरी के पन्नों में.......अपनी कविताओं के लफ़्ज़ों में........अपनी यादों के दरीचों में....
ऐसी ही थीं उसकी आँखें........जाने कितने रंग ,कितने एहसास लिए थीं..........शायद समझा  ना सकूं.......या शायद समझा ही लूँ............

उसकी आँखें और वो तारा....
दोनों टिमटिमाते से
मानों पलकें  झपकाते,
मगर तारा बहुत दूर था .....
और उसकी आँखें
एकदम करीब.....
मेरे चेहरे पर टिकी......................

उसकी आँखें और वो झील.....
दोनों गहरे
लबालब भरे हुए,
मगर झील का पानी  मीठा
और उसकी आँखों में था
खारा पानी....................


उसकी आँखें और वो नीला कमल......
दोनों सबसे जुदा
शांत और सात्विक...
कमल शाम ढले बंद हो जाता...
मगर वो आँखें खुली रहतीं,
शायद…