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Showing posts from April, 2012

फरेब

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बड़े बुसूक से दुनिया फरेब देती है....बड़े ख़ुलूस से हम ऐतबार करते हैं.......


क्यूँ आसान है किसी पर यकीं करना...
क्यूँ आसान है किसी को फरेब देना...
क्यूँ आसान नहीं किसी फरेब को सह जाना?????


जाने क्यूँ मिल जाते है फरेबी आसानी से..
जाने क्यूँ मिल जाते हैं हम फरेबियों को....
जाने क्यूँ नहीं मिलते सच्चे लोग सच्चों को?????

















उसने अपनी
दोनों बंद मुट्ठियाँ
मेरे आगे रख दीं ...
कि चुन लूँ मैं 
कोई एक.
मैंने एक पर हाथ रखा..
उसमें थी
एक तितली...
जो मुट्ठी खुलते ही उड़ गयी...
खो देने के एहसास से घबरा कर 
मैंने जिद्द की,
और दूसरी मुट्ठी भी मांग ली.
पर उसमें  तो रेत निकली..
जो फिसल गई ...
कुछ हाथ ना आया मेरे.....
तब समझी,
कुछ देने की
नियत जो नहीं थी
उस फरेबी की ...
-अनु 



एक गुलाबी/एक बेरंगा

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मेरी डायरी का कोई पन्ना धूसर है कोई सफ़ेद....कोई गुलाबी ,कोई इन्द्रधनुषी.....कोई फटा तो कोई सीला....कोई खारा तो खुशबू लिए.....क्यूंकि ये जीवन जो कभी एक सा नहीं रहता......कभी खुशी,कभी गम; कहीं धूप, कहीं छांव;कहीं आँसूं कहीं हंसी;कभी उम्मीद कभी उदासी ;कभी मिलन कभी जुदाई.......


जैसा दिन वैसी कविता........आज पढ़िए एक गुलाबी और एक बेरंगी!!!!



वो आया
धड़कने बढ़ गयीं....
मन हिरन की तरह कुलांचें मारने लगा,
मानों कोई कीमती सौगात मिली हो....
हाथों में उसका हाथ...
साँसों से मिलती उसकी साँसें....
मुस्कुराते लब...
हर रात मानों
हो पूरे चाँद  की रात....





उसके जाते ही-
थम गयी धड़कनें
रीता हो गया मन...
जैसे कुछ बाकी न रहा...
खाली मुट्ठी,
गहरी साँसे,
सिसकियां .....
देखो ना !!
वो चाँद मुझे अमावास दे गया....


-अनु

हादसा...........

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भागी जा रही थी मैं...

अपनी तेज रफ़्तार
जिंदगी के साथ,
पूरे जोर से,
जोशोखरोश से.
भागती चली जा रही थी
मैंऔर 
मेरी जिंदगी !
लापरवाह ,
बेख़ौफ़,
बिना किसी रोक टोक के....
मगर 
हर तेज रफ़्तार
शायद
हादसे  का सबब
बनती ही है-
और बस.....
मैं भी
टकरा गयी
तुमसे-
अचानक !!!!
तब से
थम गयी हूँ मैं
और मेरी जिंदगी भी...
लहुलुहान सी
पड़ी हूँ तब से
अब तक 
वहीँ....
क्षत-विक्षत
बे-इन्तहा दर्द के साथ,
शायद किसी
चारागर की आस में...........
-अनु 

रस्साकशी -सच और झूठ के बीच.

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कभी कभी मन बड़ा व्यथित होता है.............तब डायरी के पन्ने अकसर लिख कर फाड़ दिये जाते हैं..........शायद हम सब कुछ संजो कर रखना नहीं चाहते.........जो दर्द दे उस पल को क्या संजोना........
हां मन के किसी कोने में दबा ज़रूर रह जाता है दर्द..................
आज कुछ महका सा नहीं......दहका सा लिखने को जी चाहा......


एक उलझा सा ख़याल..................कभी सोचा है आपने कि कोई अपने ऊपर लगे इल्ज़ामों की सफाई ना दे पाए तो???? या देना ही नहीं चाहे शायद !!!!!
क्यूँकि सच बड़ा स्वाभिमानी होता है....वो चीख चीख कर अपनी सत्यता प्रमाणित नहीं करता...
जबकी झूठ बड़ा चालबाज़ है- वो सारे प्रपंच करता है खुद को सच साबित करने के....


सत्य निर्विकार होता है.....उसे अपना भी  पक्ष लेने की आदत नहीं होती....


कहते हैं,
झूठकी पुनुरावृत्ति
झूठ को अक्सर
सच बना दिया करती है...
बार बार कही
असत्य बात
कभी कभी
सच को झुठला जाती है.


मगर क्या
मान लेने से
वास्तविकता बदल जाती है??
चोर चोर कह कर
किसी को
गुनेहगार साबित कर देते हो..
पर क्या उसके भीतर का
ईमान तुम मार पाते हो??


अपमान और वेदना के

जुदाई......

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कभी कभी कोई रिश्ता ऐसे टूटता है मानों मुट्ठी से रेत फिसलती जाती हो.........लाख सम्हाले नहीं सम्हालता....और सारा कसूर इस दिल का होता है,जो प्यार करता है तो टूट कर और नफरत करता है तो भी पूरी शिद्दत से.....तभी दिल के ज़ख्म कभी भरते नहीं शायद.......


दिल में हो रंजिश अगर तो दूरियां बढ़ जाती हैं, कैसे थामे हाथ उनके मुट्ठियाँ कस जाती हैं......
हो खलिश बाकी कोई तो कुछ न बाकी फिर रहा, एक तिनके की चुभन भी आँख नम कर जाती है......
तेरे कूचे से जो लौटे दस्तक दोबारा दी नहीं, गर उठायें फिर कदम तो बेड़ियाँडल जाती हैं.........
चोट खायी एक दफा तो ज़ख्म फिर भरते नहीं वक्त कितना भी गुज़रता                इक  कसक  रह जाती है........
होंजुदा हम तुमसे या के राहें तुम ही मोड़ लो
टूटे जो रिश्ते अगर तो,
                चाहतें मर जातीं हैं.......


-अनु

मेरे आस-पास कुछ बिखरा सा.......

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बिखरी है कविता ,मेरे चारों ओर........आपके इर्द-गिर्द भी होगी ही...............मानों टूटी  हो कोई माला मोतियों की................और जो टूट कर भी हो अनमोल........
सो जो दिखता है आँखों को उनसे कुछ ख़याल चुरा कर रख देती हूँ पन्नों पर,और सजा देती हूँ कुछ चमकीले भावों से.......कभी कहती हूँ कुछ....कभी पूछती सवाल......और रच जाती है मेरी कविता........

मोगरा 

                                मोगरे की भीनी खुशबु....
                           बादलों में लुकता छिपता चाँद
                                  सब सफ़ेद,उजला
                             फिर आँखों के डोरे लाल क्यूँ ???





घास 

                           नर्म मुलायम घास
                        औंधे पडी तकती आसमां.....
                              सब कुछ यहीं है
                        फिर  दिल जाने कहाँ भागा ???



          अमलतास 

                            जगमग आभा लिए
                          लटका झूमर की तरह
                                 मेरी तरह
                   क्या इसके भीतर भी आग है???



लड़की

                         आसमां पिघल कर
 …

गुल्लक

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बड़ा  ही असंतोषी और व्याकुल जीव है मानव...........ज़रा सा गतिरोध आया कहीं ,तो कहने लगेगा..."मेरी तो किस्मत खराब है"......"अरे मेरे साथ ही ऐसा क्यूँ होता है".......हे प्रभु! मुझसे क्या दुश्मनी है??....."मैंने किसी का क्या बिगाड़ा".....वगैरा वगैरा............बड़ी छोटी याददाश्त होती है हमारी...........एक तकलीफ सारे अच्छे दिनों का लेखा जोखा साफ़ कर देती है....सभी सुखद लम्हों को विस्मृत कर देती हैं...........क्यों ना हम याद रखें सिर्फ - मधुर  पल......मीठी बातें......चहकते दिन.......महकती रातें...... 

एक रोज मैं
खरीद लायी

मिटटी की वो गोल सी गुल्लक....
मेरे इस बचपने पर घर में सब हंस पड़े.
मैंने उसे छुपा कर
रख दिया 
रसोई की दराज में..
और जब मन चाहे
उसमे डाल दिया करती हूँ
एक पर्ची...
जिसमे लिखा होता
"आज मै खुश हूँ.."

कभी जब मन उदास होगा
तब तोडूंगी
मधुर स्मृतियों से खनकते
इस गुल्लक को,
और फिर
करुँगी
अपनी खुशियों का हिसाब... -अनु



नियति

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मैं एक राह का पत्थर
उस कठिन पथ पर पड़ा जीवन भर ठोकरें खाता बनता रहा, लोगों की राह का रोड़ा....
थी विशाल अट्टालिका जिसका मैं अंश था
चोट खाकर  यूँ टूट कर बिखरा और राह में जा पड़ा....
मेरे कोने थे नुकीले चुभते राहगीरों को
वे मुझसे होते आहत..  मुझे कोसते
और मारते ठोकरें....

ऐसे ही तिरस्कृत होता, 
बिना उफ़ किये  मार मौसम  की सहता रहा... गुम हुई वो नोकें.. निःशब्द मैं बहता रहा..
बरसों की वितृष्णा से मैं थक  चुका था... पर नियति में मेरी कुछ और बदा था...
ऐसी ही एक ठोकर... ले गयी मुझे एक पीपल की छाँव में थका हुआ मैं मानो .. सो गया  ईश्वर के पाँव में..
तभी कुछ  भोले पथिक आये- वक्त की मार झेल चुके मेरे कोमल चमकदार तन पर, सिन्दूर  और पुष्प  चढ़ाये...
आस्था जताई,गुण गाये....
विस्मित हूँ मैं .... वो साधारण  राह का पत्थर आज सबका भगवान कहलाए !!!
-अनु 


प्यार और मूर्खता.....एक सिक्के के दो पहलु!!!

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डायरी में सिर्फ इश्क मोहब्बत नहीं होता........बनिए का हिसाब भी होता है :-)
और मेरी डायरी का हर पन्ना भी प्यार की वकालत नहीं करता..................
जैसे पढ़िए ये पन्ना ........................शायद आप रज़ामंद हों इस फलसफे से..............या ना भी हों !!!!! 


मेरा तो ये मानना है किमोहब्बत करने के लिए मूर्ख होना ज़रूरी है..................
चलिए साबित करने की कोशिश करती हूँ.
मुझे लगता है जिसके पास ज़रा भी अक्ल होगी वो कभी इश्क-मोहब्ब्त के फेर में नहीं पड़ेगा.................बेशक वो प्रेम कर सकता है-ईश्वर से प्रेम,फूल पौधों से प्रेम,मूक जानवरों से,सृष्टि से,चाँद तारों से ..किसी से भी........मगर मैं बात कर रही हूँ रूहानी प्रेम की जो एक लड़की/स्त्री करती है एक लड़के/पुरुष से...........
प्यार भरा दिल एक "मोमबत्ती" की तरह होता है.........सोचिये किसी हंसीन,रूमानी शाम को पाँच सितारा होटल में कैसे रांझे का "दिल" जलता है और हीर  लुत्फ़ उठाती है कैंडल लाइट डिनर का.................
परवाने को देखिये.............जल कर ही मानता है............कोई अक्ल की बात है ये???? दिल का दर्द से पुराना रि…

गीत..........जो लिख न सकी.

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तुझ पर क्या कोई गीत  लिखूँ???

संग लिखूँ या साथ लिखूँ
चुभती है जो दिल में बात लिखूं ......
बीच डगर में छोड़ गए तुम जो पा ना सकी , सौगात लिखूँ?
राग लिखूँ या गीत लिखूँ
कोई रस्म लिखूँ या रीत लिखूँ ......  गाये जो तुमने संग नहीं फिर मूक सा क्या संगीत लिखूँ?
आग लिखूँ , अँगार लिखूँ
अनचाही  कोई चाह लिखूं..... साँसों में  है धुआं  भरा  हुआ  एक  ठंडी सी फिर आह  लिखूँ ?


मान  लिखूँ  अभिमान लिखूँ
तुझको सारा जहान लिखूँ......
वादा  था तेरा जन्मों का 
अब  दो दिन का मेहमान लिखूँ ?
प्रीत लिखूँ या मीत लिखूँ
या सहमा सा अतीत  लिखूँ ...... तुम पर सब कुछ तो हार दिया अब हार के कैसे जीत लिखूँ?
मैं तुम पर कैसे कोई गीत लिखूँ........


-अनु 

भटकन

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मन रे ! तू भागे क्यों ?

क्यूँ भागे इन गलियन में-
जो उलझी सी हैं  आपस में
गाँठ भी पड़ती जाती है
सुलझाने की कोशिश में 
आखिर क्या पायेगा  भटकन में..........

क्यूँ भागे...मन क्यूँ भागे...

जीवन की लम्बी भाग दौड़ में
अंतहीन इस होड़ में
गुणा-भाग और जोड़ में
खतरनाक से मोड़ में
निकला कोई न आगे........

मन क्यूँ भागे ...तू क्यूँ भागे ?

इस रंग बिरंगे रेले में,
इन चक्कर खाते झूले में..
जब खोना तय इस मेले में...
तो क्यूँ पड़ विकट झमेले में...
रे चंचल मन,तू क्यूँ भागे....

इस झिलमिल करती दुनिया में,
जब आँखें तेरी चुंधियाती हैं
दृष्टी भी धुंधला जाती है...
जब मन तेरा बैरागी है
तो क्यू न रहे अकेले में
मन मस्त मगन अकेले में....


मत भाग रे मन इस रेले में.............

अनु 
18 aug 2011

उसने कहा था.....

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हर रात कहता,
दर्दे-जुदाई है                                                           
नींद नहीं आती.............
और सुबह सुनाता कोई ख्वाब 
जिसमे वो होता ...मैं होती.....
झूठा कहीं का!!!!!
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मेरे दिल के हर राज़
जान लेता. 
शायद दिल के ताले की चाभी है उसके पास...
"मास्टर की"  कहता खुद को...
तभी हो जाता, हर किसी दिल पर फिट!
चोर कहीं का!!!!!
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वो मेरा है
वो चाँद है
सभी को लगता, 
कि वो मेरा है......
चालबाज़ कहीं का!!!!!
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कहता था 
तुम अलग हो...
सबसे जुदा हो.
तभी रहती हूँ तन्हाइयों में,
सबसे जुदा........
कभी सच भी कहता था वो!!!!!!


-अनु 







नहीं मरना मुझे ..........

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कुछ नया नहीं है डायरी के इस पन्ने में.........हर इंसान की जीवन की डायरी में ये पन्ना ज़रूर होता है.........मोटे मोटे अक्षरों से लिखा........कि मुझे मौत अच्छी नहीं लगती..........


किसे अच्छी लगती है?????
मगर यहाँ मै बता रहीं हूँ वो बातें  जिनकी वजह से मुझे मौत पसंद नहीं.....
मुझे मौत नापसंद है क्यूंकि मुझे उजाले पसंद है....(खिला हो इन्द्रधनुष हमेशा )
और उजालों में कम से कम साया तो साथ होता है........
मुझे मौत बुरी लगती है क्यूंकि मुझे बोलना पसंद है........मौत के  सन्नाटे से नफरत है मुझे......
नफरत है मुझे मौत से क्योंकि मुझे
दौडना पसंद है..................................हरे हरे मैदानों में.
हंसना पसंद है..................................बेवजह.
रंग पसंद है..........
फरिश्तों के पास सुना सिर्फ काला सफ़ेद रंग होता है.
मुझे नहीं चाहिए मौत, क्योंकि मुझे चाहिए
रिश्तों के बंधन
नातों के बंधन
स्नेह के बंधन
साँसों के बंधन
तुम्हारी बाहों के बंधन......
और जानती हूँ मौत मुझे मुक्त कर देगी सभी बंधनों से...................
मुझे  नहीं चाहिए मौत................आज नहीं,कल नहीं...................कभी भी नहीं.................

स्ट्रोबेरी शेक .............

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मैं भी ना.....डायरी के पन्ने पढवाते पढवाते जाने कब कविताएं पढवाने लगी आप सबको....चलिए आज फिर एक पन्ना आपके लिए......
ये मेरी डायरी का नहीं......मगर शायद ज़िक्र मेरा है इसमें..............लगता तो है.....कौन जाने?????


छोटे छोटे लम्हों से बना करतीं हैं यादें.......और ये लम्हे कितने बड़े हो जाते हैं अकसर.......ढेर सारी जगह घेर लेते हैं हमारी स्मृतियों की...........क्या वक्त के साथ बढते जाते हैं लम्हे???? जैसे पौधा बढ़ता है कोई............
 एक वो नन्हा सा लम्हा.......तुम्हारे साथ गुजारा हुआ...................तकरीबन बेमकसद सा...................आज उसकी याद मेरे जीने का मकसद बनी हुई है..
याद आती है वो शाम जब तुमने मेरे ग्लास से पिया था वो स्ट्रोबेरी शेक ..............
तुम्हारे होंठों के निशान  वाला वो ग्लास अब तक रखा है....यूँ ही बगैर धुला.
कितना मीठा और गुलाबी हो गया था वो शेक यकायक.............तुम्हारे होंठों के स्पर्श से.........
मैंने तुमसे कहा भी था.
तुम हंस पड़ीं थीं........अरे!!! स्ट्रोबेरी शेक है.....मीठा और गुलाबी तो होगा ही ना ????? 
मगर नहीं!!!! तुम गलत थीं..........
अब कितना बेस्वाद लगता है…

सिलसिला

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बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी ....................इसी उम्मीद पर शायद लोग गज़ल लिखा करते हैं.......


मोहब्बत में शिकवा गिला छोड़ दे अपने दिल से मेरा सिलसिला जोड़ दे जो राहें मेरे दर को आती न हों उन राहों का रुख तू अभी मोड़ दे.... जाना चाहे न दिल बिन तेरे अब कहीं मेरे साए पे साया तेरा ओढ़ दे... मेरी साँसों की रफ़्तार मद्धम हुई इन रगों में तू अपना लहू छोड़ दे.. वो कहते हैं तुम, अब के तुम न रहे अपने माज़ी को शिद्दत से झकझोर दे... चल न पायेंगे हम बिन तेरे एक कदम अपनी यादों पे तू फिर ज़रा जोर दे... अपने दिल से मेरा सिलसिला जोड़ दे .....
अनुलता